रेगिस्तानी आठ कविताएँ

माधव राठौड


१. शहर में लू
मैं रेगिस्तान की लू हूँ
हरगिज नहीं आती इस धुएँ भरे शहर में
न ही बंद दरवाजों के मकां में समाती
मैं तो खुली ढाणी के खुले दिल में बहती हूँ
परफ्यूम की तीखी गंध सूँघने नहीं आती
बल्कि मजदूर के देह से टपकते पसीने को
सूखाने चली आती हूँ शहर की ओर कभी कभी
ना ही इस इरादे से
कि तुम्हारे ब्रांडेड सूट को खराब कर दूँ
सिर्फ इसलिए खटखटाती हूँ तुम्हारें बँगले को
कि तुम्हें आज भी बेइन्तहा याद करते है
स्कूल की वो बोरडी और शेरो बा द्य
२. बालू रेत
क्या कहा
गाँव से आ रहे हो
एक किलो देशी घी लेते आना
जिसे बिलोणे से निकाला हो
माँ ने
हो सके तो कुछ खेजडी के खोखे भी
थैली भर लेते आना
जिसे खेत की माड वाली खेजडी से
चुन कर लाये थे बाबू जी
आधेक किलो धोरे की बालू रेत लेते आना
जिस पर खेलते थे गिल्ली डंडा
आखातीज से तीन पहले
और थोड जून की आँधी भी बोरी में लेते आना
ए.सी. में बरसों हो गये
लू लगे हुए..... द्य
३. फलता रेगिस्तान
रेगिस्तान और फैल जाता है
शहर से गाँव जाते वक्त मेरे भीतर
धोरा और तपता हुआ लगता है
स्कूल से घर जाते वक्त
नंगे पाँव बच्चे के भीतर
सारी बोरडियाँ खत्म होने लगती है
विदेशी बबूलों को उगाते वक्त
जोगमाया के ओरण के भीतर
मेरे भीतर फैलने लगता है
गहन उदासीपन उस वक्त
ठीक इस तरह
उजडे गाँव से शहर की और लौटते वक्त
छह बजे वाली बस के भीतर
४. कविता और लू
ऐ कविता,
तू रेगिस्तान में उतर
जिस तहर लू उतरती है
भन्तुलिये में लिपटे हुए
उस धोरे के इस पार
आकडे, खेजडी, बोरडी
और केर में उलझती हुई
मेरी ढाणी के अंदर छन जाती है
पूरी दुपहरी मेरे खाट के नीचे
कोरे घडे के आसपास पसर जाती है
काली कुतिया के साथ,
जीभ निकाल
साँझ होते ही कंघी ले चल देती है
सूरज के साथ उसकी नानी के पास
हर रविवार को माथा गुंथाने
इस धोरे के उस पार
५. साख
१. तुम्हे साख भरनी होगी
उस घडी की
जब खेजडी के नीचे संतोलिया खेलते हुए
तूने कहा था
भाभू को मत कहना मैं स्कूल नही चला तेरे साथ।
२. तुम्हे साख भरनी होगी मेरी उस
गौरी गाय की
जिसे चुफ से बेच दिया था
मास्टर जी को
पिछले काळ में चारा खत्म होने पर।
३. तुम्हें साख भरनी होगी
उस लोन की
जिसे मेरे ब्याव पर लिया था सेठ जी से
जीसा ने
दादीसा के दिए गये जेवर गिरवी रख।
४. साख तो उसकी भी भरनी होगी
जब जीसा ने
अंतिम बार आँख के इशारे से पूछा
बाई आई काई?
तूने नीचे देखते हुए कहा था हाँ।
६. कुछ कविताएँ
कुछ कविताएँ
आज भी सिमटी सी पडी है
मेरे गाँव में।
कुछ ढाणी की उस बोधी बाड में,
जिसे भूल आया था कुदाली के साथ
खेत पर।
कुछ अटकी पडी है उस बकरियों के बाडे पर,
जिसे लिखी थी भूरकी बकरी के
ब्याने पर।
कुछ रळक गई नाडी के उस आगोर में,
बुनी थी गायों को आरेण में
चराते हुए।
कुछ को तो भर लिया था पानी की पखाल में
और डाल दिया था घर की मीठे पानी की
टांकली में।
कुछ तो आज भी टँगी हुई है कोटडी के खम्भों पर
बा के ऊनी कोट और ढेरियों के साथ
उलझी हुई।
बाकी बची थी वो यादों के धुँए में काली पड गई
जिसे भाभू ने रीस में खोसा था झूँपडे
के बाहर।
इस बरसात में में गळ कर भींत से बहने लगी
गोबर के आंगन में नीपी हुई मेरी वो
पहली कविता।
वो कविता भी मेरे इंतजार में सिमटी पडी है
जिसे लिखना था इस जेठ की लू भरी
आंधियों में।
कुछ आज भी सन्देश भेजती है भुन्तालिये के संग
जो खो गई थी कई साल पहले यादों के
रिन्धरोई में।
कुछ कविताएँ
आज भी सिमटी सी पडी है
मेरे गाँव में।
७. रेगिस्तान में बरसात
यह बरसात मेरे गाँव के धोरों में उतरती है कुछ इस तरह
बरसों तपा दर्द पिघल मिट्टी में जज्ब हो रहा हो गल कर
जब यह रेगिस्तान में बाढ लाती है ऊँचे धोरे को फाड कर
उसे देख लगता है टुकडे कर दिये हो काळजे के काटकर ढाणी के छज्जों से टपकता है काला पानी आँगन में इस तरह
जैसे योग वर्षा के बाद बह रहा हो भीतर का मैल बन कर
बरसात में गाँव की यादें तंग रकती है मिन्जल घास सी उग कर
मैं इसे मेट्रो शहर में कुरटता रहता हूँ भूरकी बकरी बन कर
बारिश के बाद यह खेजडियाँ निर्विकार सी लगती है इस कदर
जैसे ओरण में बुद्ध खडे हुए हो गहरे ध्यान से भीगकर
यह बरसात मेरे गाँव के धोरों में उतरती है कुछ इस तरह
बरसों तपा दर्द पिघल मिट्टी में जज्ब हो रहा हो गल कर
८. जोगीडा
मेरे भीतर पसरता रहा
यादों का रेगिस्तान
लू के थपेडों सा जलता रहा
यह दागिस्तान
तू भरती रही मीठे पानी की
पखाल
मगर शक से टपकती रही मेरे
मन की मटकी
फिर भी तेरे स्नेह को पाकर
पनपती रही
इस मरुस्थल में सेवण घास की
उम्मीद
कई बार चुभते रहे वफाई के
भुरन्ट
फिर भी खिलता रहा मैं
बाजरी की भाँति
कई बार उग आती है तेरी
यादों की खुम्भियाँ
जो चुभती रहती मेरे भीतर
जोगीडा बन
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