तीन कविताएँ

राम जैसवाल


अभी ‘तक्षक’ जीवित है
ये
किस नस्ल के लोग हैं।
जिनकी शक्लें तो
आदमी जैसी ही हैं
पर
जिनकी प्यास
रक्त पायी है,
और
भूख
मांसाहारी है।
जिनकी आनन्द
दूसरों के अर्जित सुख को
रक्त रंजित करके ही
ग्रहण करना है।
एक युग बीत गया,
राम ने तो,
अहम् वादी,
दूसरों के सुख को
बलात्
भोगने वाले
रावण का
वंश नाश कर दिया था।
फिर
कृष्ण ने भी,
अहम्, ईर्ष्या
और
स्वार्थ के व्रत ग्रस्त
कौरवों को ही नहीं।
उनके समर्थकों
या
इनके छल से बहके
भीष्म,
और कर्ण जैसी
महान् विभूतियों को भी
मृत्यु दण्ड दिया था,
फिर
कहां चूक हुई
राम से,
कहां शेष रह गया
रावण का
अतृप्त-राक्षसी मन,
या,
पाण्डवों के वंशज
के मन में
क्यूं क्षमा रह गई
अपराधी के लिये
कि
नागयज्ञ रचने
पर भी
‘तक्षक’
बच गया,
भ्रम, या भूल से
कुछ गलत हो जाये,
क्षम्य है वह,
किन्तु
यदि मानसिकता ही
अपराधी हो,
तो
उसे क्षमा करना
नपुंसकता है।
अभिशापित होता है
समग्र जीवन।
जीवन-शैली
का नाम कुछ भी हो।
किन्तु, यदि
वेष-भूषा,
अतीत की बड मान्यताएं,
रूढि हुई परम्पराएं
ही जीवन की जड बन
जाएं,
तो,
अहम्, ईर्ष्या, और
बलात्कार ही जीवन
के गुण बन जाते हैं,
ये
किस नस्ल के लोग है।
जिनके कारण
जीवन की सहजता
अविश्वास, आशंकाओं
के बीच
अपमानित होकर
रह रही है।
अभिशापित धरती
समय की
किस गुहा में
ध्यानस्थ हो गए
वे देवता
जो
मानवीय संवेदनाओं
के सौन्दर्य को
आहत होते ही,
उसे
परिभाषित और
प्रतिष्ठित करने
के लिये,
व्याकुल धरा पर
अवतरित होते थे
कभी रघुवंश में,
कभी
‘अंजनि’ को कोख से’
और कभी
बन्दी गृह में ही
साकार
हो जाते थे,
पाँच, पाँच पाण्डवों
के रूप में उतरते थे,
इस धरती पर,
मानव के अन्दर
बौखलाये, स्वार्थ, अहम्
और ईर्ष्या के प्रेत को
संहार करते थे,
भले ही महायुद्ध
रचना पडे,
कितना कठिन,
दुष्कर,
होता था यह,
क्योंकि
इस धरती को तो
पता नहीं
किसका शाप लगा है,
कि इसकी सन्तानें
एक दूसरे को
खा कर ही जियेंगी,
चाहे वह जड हों
या चेतन।
किन्तु
अशरीरी देवताओं को
सह्य नहीं था यह।
तभी तो वे
किसी पृथ्वी सरीखी
मानवी,
या,
की कोख से
अप्रतिम-पौरुष
के साथ जन्म लेते थें,
उन्हें
सह्य नहीं था
कि कोई सबल
दुर्बल का
माल
शारीरिक भक्षण
ही नहीं करे,
वरन,
उसकी संवेदनाओं को
रक्त रंजित करे
उन्हें, धज्जी, धज्जी
नष्ट करें,
वे,
इस मांसाहारी-रक्तपायी
जड--चेतन,
से
सजी, इस धरती पर
प्रतिष्ठित करते थे,
प्रत्येक अनुभूति में
संवेदना- की मर्यादाएं,
जो
एक युग तक,
किसी
सलिला नदी की तरह,
जीवन में
प्रवाहित रहती थी;
अब तो,
आदमी पर से
आदमी होना
ऐसे उतर गया,
जैसे धूप पडने से
जल जाय-जल
जल का रूप,
तरलता,
जाने किस
निस्सीम-अतल
आकाश में
समा गये सब,
अथवा
भूमिगत हो गई
संवेदनाएं, संवदनाओं
का,
सौन्दर्य-वैविध्य,
सम्बन्धों की सरिताएं
कुछ भी नहीं भासता
आदमी को अब,
ग्राह्य- अग्राह्य,
अपना-पराया,
बस
एक अतृप्त प्यास,
कहाँ
ध्यानस्थ हो गये
वे देवता
जो
मानवीय-संवेदनाओं को
परिमार्जित कर
रूपायित और
प्रतिष्ठित करने के लिये
शारीरिक-सीमाओं में
असीमित हो
उतरते थे,
अवतरित होते थे;
कहां
ध्यानस्थ हो गये।
पुनरावृत्ति
कौन सी
सुबह का सूरज
करेगा,
इस
अभिशापित समय को
शापमुक्त,
कि
साधारण-जन
धर्म और राजनीति
के
नाटकों से उतरेगा,
अतृप्त-अकांक्षाओं
के ‘जेहाद’, ‘युद्ध’
और
चुनाव में ‘‘अनिवार्य-
रचे गये व्यूह-चक्रो को
समझेगा,
फिर,
महाभारत की
पुनरावृत्ति हो रही है,
स्थिति,
अब अधिक भयानक है,
तब तो
अन्धी महत्वाकांक्षाओं
के कारण,
मात्र धृतराष्ट्र ही अन्धेरो
और गान्धारी
अन्धी बनी हुई थी
आज तो,
हर व्यक्ति की आँखों पर
पट्टी बंधी हुई है,
और
हर निकटतस्थ
उपस्थिति को
शिकार मान कर
चल रहा है वह,
और,
जब आँखों पर
पट्टी बंधी ही
तब
अपनी भूख के अतिरिक्त
और कुछ
महसूस हो ही नहीं सकता,
यही परिदृश्य है,
चतुर-समर्थ-कोण
चौसर बिछा कर
आदमी को
अनेक प्रकार के
ऋण देकर
उसकी सामर्थ्य के
रहन रख रहे हैं,
और
उसके सहज-सुखों को, अपने
बिस्तरों पर
निर्वसन और बेहोश
करके
भोग रहे है।
कौन-कृष्ण,
हिमालय में हिमखण्ड हुए
वैरागी-पाण्डवों को
वापस लायेगा
और
ईर्ष्या, अहम्, बलात्कारों
के विरूद्ध
रचेगा
कुरुक्षेत्र,
कौन सी
सुबह का सूरज करेगा
इस समय को
शाप मुक्त।
कला लक्ष्मी सदन, न्यू कॉलोनी-रामगंज, अजमेर-३०५००३
मो. ८२९००९५१७६