नौ कविताएँ

विजय सिंह नाहटा



चैत की विकराल आंधी में
सीना तान खडे पंक्तिबद्ध
जंगली ताम्बई पौधे
हवा में झूमते हैं
झेलते हैं जख्म अपनी देह पर
झुकते नहीं पलभर
अहर्निश जूझते हैं
और-इस तूफान के ही उदर से
यकायक फूट पडेगी जल-धार
जो धोयेगी जख्म
और रक्त-बीज से
पहले-पहल एक कोंपल में
खिल उठेगी हरियाली
फिर धीरे-धीरे छा जायेगी
पूरे जंगल की आत्मा पर। द्य

अपने भीतर समोए अगणित बरसातें
इस समय-
उन्मुक्त आंगन सी
खुली है देह गांव के सूखे तालाब की
गोया अनन्त तक जाती हुई एक छटपटाहट
या कि-
मूर्त के पथ पर आरूढ एक स्वप्न
जो खिल उठेगा
फिर इस बरसात में। द्य

यदि अनवरत है तुम्हारा जीवन-वृत
तो, मैने किसी एकाकी क्षण में तुम्हें बांध लिया है
यदि-कभी न रुकने वाले कारवां की तरह
है तुम्हारी यात्रा
तो, मैंने किसी प्रशस्त सुबह
किसी पदचाप में तुम्हें साध लिया है
गर; प्रवाह है गिरते जल प्रताप का
तो; मैंने तुम्हें उजास में लिखी
एक बून्द में याद किया है
यदि किसी अन्तहीन कथा के
हो तुम महाआख्यान
तो; लघु-प्रसंग के बहाने
मैंने तुम्हें-
स्मृति की सुनहली जिल्द में
काल के अमर पृष्ठ सा बांध लिया है। द्य

सारे बंधनों से
बाहर आने पर लगा कि
इतनी जटिल और
अपरिचित दुनिया में
महज एक निर्दोष सी
मुस्कुराहट में खिल उठता प्रेम
निर्दोष......शाश्वत। द्य

इतने अरसे का लम्बा संग-साथ
एक विरासत भी तरह कमतर ही रहा
शेष रही अपरिचय की धुंध में
उतरें गहरे-दर-गहरे
आत्मा के सुदूर अतल में
त्वचा के गहन अंधकार में
ज्ञान के किसी अप्रस्फुटित आलोक-तंतु में
अस्तित्व के किसी खामोश से प्रकोष्ठ में
यकायक; गर ओझल भी हो जाये जीवन-संकेत
और किसी मोड पर
फिर मिल जायें अनायास जीवन-राहें
तो हम मिल सकें उसी गर्म-जोशी से
एक दूजे की खूबियों से वाकिफ
और-
कमजोरियों से बेखबर.....। द्य

रेगिस्तान में
सुदूर सडक किनारे
चल रही रंग बिरंगी दो औरतें
काल के विराट सूनेपन को भरती हुई
अनन्त की विकरालता को हरती हुई। द्य

एक शहर से दूसरे शहर में लौटता
दूसरे से तीसरे
इसी तरह-
अगणित शहरों में उद्घाटित-सा मौन
घास की हर पती में घुला हुआ
बीते क्षण-प्रहरो में
ज्यों बसा हुआ
गोया
काल की जिल्द के
पन्ने-दर-पन्ने पलटता हुआ। द्य

सब कुछ खोते-खोते
यहां तक कि अपने अस्तित्व को
खोने की कगार पर
बह सबकुछ पा सकेंगे; हम
जो अब तलक सब कुछ पा लेने की
अंधी हसरत में
हमारी आँखों के आसमान से
अविरल ओझल होता रहा। द्य

सारी अक्लमंदियों से उपर
यह एक रात है; अजेय
जहां-
दिवस की तमाम जल्द बाजियाँ
थक-हार कर
सो रही ज्यूँ कवच में
जिस बच्चे की नींद में
कुलबुला रहे दबे हुए स्वप्न
वो सभी आ जायेंगे बाहर
अदृश्यता की झीनी चादर से
और जीवन की सबसे पहली सुबह में
कल खिल उठेंगे। द्य
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