चार कविताएँ

ओम नागर



जब नहीं था दर्पण
तब भी था जल
सृष्टि में जब
न जीव था न जीवन
समय के गर्भ में बने रहें थे
जीवों के चेहरें
तब भी जल था ही
रोज
तीन चौथाई जल में
अपना अक्स देखती
यह पृथ्वी
बहुत उदास हैं इन दिनों
पहले-पहल
जब जल से बन रहा था जीवन
सृष्टि
की आँख में था जल
मनुः
की आँख में इच्छा-बी*ा
श्रद्धा
की आँख में जीवन।

जल जो
बचा हैं अभी
घुटक दो घुटक
नदी-दो नदी
जोहड-दो जोहड
कुँआ दो कुँआ
टाँके दो टाँके
भरे हैं अभी
तपते मरुथल के बीच
प्यास का हलक गीला हैं
कुछ दिन
बचाते-बचाते
बच ही जाता है घडे में
जल कहने जितना
प्यासे कव्वै की
चोंच पर उघडा हैं
पानी के हवा होने का
अंतिम निशान।

जल-दर्पण में
हमारे समय का चेहरा
बहुत खुरदरा
बहुत बदसूरत
जल-दर्पण में
चेहरा देखकर
पहली बार शर्मायी थी
सारी नायिकाएँ
जल-दर्पण में
तैरती दो सजीव छवियाँ
गुम हो गई कहीं
जब नहीं था दर्पण
तब जल ही जल था
आज दर्पण ही दर्पण
जल नहीं दिखता।

न जल झूठ बोलता
न दर्पण
दर्पण साफ हैं
चेहरा धूल-सना
जल दूषित हैं
और चेहरा धुला।
३ ए २६, महावीर नगर तृतीय, कोटा-३२४००५ (राज.)
मो. ९४६०६७७६३८