सात कविताएँ

डॉ. रामप्रसाद दाधीच ‘प्रसाद’



दुखी हृदय के हिम श्रगो से पिघले
आँसुओं की गंगा
कपोलों पर बही है
इसे कर कमलों में से
इसका आचमन करलो
आँसू कई भय दुखों की औषधि है। द्य

प्रतीक्षाओं को कभी झुकने मत दो
उन्हें सींचो शुद्धमन प्रार्थनाओं से
उन्हें रखो मन के खुले दरवाजे पर
वह तुम्हारा अपेक्षित आयेगा
जरा धीरज रखो
प्रार्थनामय प्रतीक्षाये भी
हताश निराश नहीं करती द्य

मन के दर्पण पर
वक्त की जो गर्द जमती जा रही है
फुर्सत से उसे हटा कभी
खुद को उसमें, देख लेना चाहिये
क्यों किसी और की और देखें
खुद को ही जान लेना चाहिये। द्य

मैं पंक्ति का वाक्य नहीं हुआ
अपना अर्थ जिये ‘अकेला जो शब्द’ रहा
और करता रह समय के जिये
जो संभव हुआ
एक अकेले से।
मैं प्रेम ही कर पाया सृष्टि से
मैं एक बूंद ही बहुत हूँ
सागर कहाँ होना चाहता हूँ। द्य

मैंने कभी गंभीर हो एकान्तर-मन
अपने आपको तराशा नहीं
तराश लेता तो अच्छा था
सारे भ्रम टूट जाते, और मैं जान लेता
अपनी नुमादा हकीकत को
आखिर मैं क्या हूँ? द्य

मैंने एक बार प्रेम किया
शायद कई बार किया
और संभव यह भी है कि
मैंने कभी प्रेम नहीं किया
केवल प्रेम की कवितायें लिखी। द्य

उसकी सर्वांग सम्पूर्णता में
मैं कभी समझ नहीं पाया
पता नहीं वह सांख्य दर्शन की
मिमांसा थी या फिर
वेदान्त थी।
९३, नेहरु पार्क, जोधपुर (राज.)