नौ कविताएँ

अशोक आत्रेय



मेरे भीतर एक आकाश है
जहां जन्म-जमांतर से
टंगी है एक लालटेन
बुरी तरह घिस चुके हैं जिसके कांच
धुंए से चौंधिया गयी है
जिसकी रौशनी
मेरे भीतर की धरती
खाइय खंदकों से अटी पडी है
जिसमें भटक रहा है
अभिशप्त अश्वत्थामा
शिला को ढोता सिसीफस
हजारों सालों की सभ्यताएँ-संस्कृतियाँ
महलों के खंडहरों में बिखरी पडी हैं
करोडों वर्षों की धूल में दफन हैं
हारे और जीते गए सभी युद्ध
उनके विजय-स्तम्भ
विभीषिकाएँ विभत्स
और कोई अजन्मा विरोध अब भी
दर्ज है मुझमें ईसा-गाँधी जैसी
सैकडों की हत्याओं के विरुद्ध
अब तक जितना जितना बाहर से
मैला-मटमैला और टूटफूट चुका हूँ मैं
भीतर से उतना ही मजबूत
और मुकम्मल हूँ फिर भी।

इतिहास-पुरुष की तरह
वेद से हिंसा पुराण से सैक्स गीता-उपनिषद से
तर्क और तरफदारी का हूनर लेकर बैठ गया मैं
रामगंज बाजार में राजनीति की ‘कालगर्ल्स’ के बीचोबीच
तलाशने थे अब मुझे नए जीवन के कुछ ‘‘ब्रह्मसूत्र’’
लिखना था उनपर माक्र्सवादी भाष्य।
सामने मंदिर पीछे मस्जिद पिंजरापोल मदरसे लेकर
अंतिम क्रिया-कर्म का सुनियोजित पुश्तैनी व्यापार...
आसमान से एक कटी पतंग की तरह उतरी
मेरे सामने कोई अप्सरा और इशारे से मुझे ले गयी
इंद्र के दरबार में। उधर बडे बडे नामी गिरामी ऋषिमुनि
पडे थे औंधे मदहोशी में...इधर, इंद्रा-सभा में प्रश्नकाल में
जहां कोई इन्द्र संबोधित कर रहे थे जन-प्रतिनिधियों
को गुण्डा...!
‘‘क्या क्या देखना-सुनना था मुझे...क्षण भर के लिए
मैं अचकचाया...फिर चिल्लाया और बाद में
वहीं ढेर हो गया मैं महाशून्य में। द्य

एक दिन मैं
नहीं लिखूंगा
कविता
करूँगा प्रेम।
एक दिन मैं
लिखूँगा कविता
प्रेम पर
पर तब भी नहीं करूँगा
प्रेम केवल स्त्री से। द्य

जब हम करते हैं प्रतीक्षा
प्रेम पैदा होता है
बीज बोने के साथ
पेड का सपना देखने लगते है
और देखते भी है
सचमुच पेड को
बीजसे निकलते।
क्या तुमने ईश्वर को देखा है कभी
इसी तरह फलते फूलते
क्या की है ऐसी ही प्रतीक्षा
प्राणपन से क्या खिलाया है
ईश्वर को गोद में
स्तन से दूध पिलाया है
ओ स्त्री ओ माँ
तुमने ही तो जन्म दिया है
ईश्वर को
अरे मैं तो भूल ही गया था।
तुम्हारे गर्भ से बाहर आने के बाद ही
उल्टी गिनती शुरू हो गयी थी मेरी।
बलात्कार करते हुए नहीं सोचा था
कौन हो तुम।

जो हमारा पुण्य है शेष
वही मिलता है हमें सुख में
पाप तो छीन लेता है जो कुछ
उसने ही दिया था हमें।
उसके बदले देता है दुःख
जो हमारा नहीं है उसे लेना छीनना
ही पाप है जो दूसरों का है उसे दे देना पुण्य
सबलेन- यहीं करलो दोस्त समय रहते
सबसे बडा मित्र सबसे बडा शत्रु
समय ही है। पाप-पुण्य उसकी गठरियाँ।
गठरियां अस्थायी होती हैं।
सुख-दुःख की तरह।
मायाजाल। द्य

शब्द देती है मां
गुरु भी
अन्धकार से निकालता है
जिस तरह दिन के सूरज
पालता पोसता है कौन
शायद पिता
फिर क्यों फैल गयी है यह दुनिया
क्यों काटती है चक्कर
चकरघिन्नी की तरह
क्या करते हैं चाँद सितारे
पेड-पौधे हवा और चिडिया
शायद प्रेम करना सिखाते हैं
घृणा भय मृत्यु के बारे में
मेरे पास कोई अधिकृत
जानकारी नहीं। द्य

मैं कोशिश करता हूँ...
बार बार शब्दों को संवेदना के
धागों में पिरोने की
टूट जाता है धागा बार बार
फिसल जाते हैं शब्द।
मैं कोशिश रखता हूँ बरकरार
निराशा अैर टूटन में भी
रेखाएं, रंगफूल स्त्रियाँ
उलझ जाती है धागों से
संघर्ष अवसाद और खुशी के बीच
उछलकूद मचाते हैं शब्द
लडते झगडते हैं
चीखते चिल्लाते हैं
कभी सोते हुए कभी जगते हुए
देखता हूँ भ्रमित होकर भी
कभी कभी किन्तु कोशिश
बनी रहती है अन्तरंग पडताल भी
कुछ भी व्यर्थ नहीं होता कविता में
युद्ध घृणा या प्रेम की तरह।

गणेश-चतुर्थी को गणपति-वंदना
भटकता है मन बादलों सा
बिजलियाँ कडती हैं
भावनाएं चाहती हैं बरसना
झमाझम।
मिलन का पल है प्रतीक्षित
प्यार की बेला बुभुक्षित
देह फिर भी क्यों खडा
मूक-अभिशप्त
और कितने झेलने
आडंबर-अंधविश्वास
मानव को बे वजह
क्यों वह संत्रस्त।
तोडने में वृत्त के दुर्ग क्या
केवल इंद्र ही है समर्थ
क्यों अभी असमर्थ मानव
क्यों अभी असमर्थ
ओ गणेशा आओ प्रथपुरुष
विघ्न-बाधाओं के झंझावातों से
करो उन्मुक्त सृष्टि को
प्यास सदियों की बुझाओ
प्रिय से मिलन की
प्यास उनमें जगाओं
जो घुटन में
अभी तक संतप्त।

हम मिलने का वो बिछुडने का
बहाना ढूँढते हैं
हम आशियाना वो गगन में
उडने का बहाना ढूँढते हैं
जरूरी नहीं है जिन्दगी भर
साथ रहना एक आदमी के
वो कुछ दिन बाद ही नया
ठिकाना ढूँढते हैं।