शिक्षण में मातृभाषा का महत्व

प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा


भारत म शिक्षा, उत्तरोत्तर अंगेजी भाषा केन्द्रित होती जा रही है। आज विश्व में हुए अधिकांश शोध, मातृभाषा में शिक्षण को ही सर्वाधिक प्रभावी सिद्ध कर रहे हैं। वैसे भी भाषा व्यक्ति व समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार होती है।१ संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के २००१ के ‘सांस्कृतिक विविधता सम्बन्धी सार्वभौम घोषणा पत्र’ के अनुसार भाषाएँ, सांस्कृतिक संवर्द्धन का भी महत्वपूर्ण साधन होती हैं। इसलिए यूनेस्को के घोषणा पत्र व अभिसमय (Convention) मातृभाषा म शिक्षण पर ही बल देते हैं। विगत ५० वर्षों में हुये १५० से अधिक अध्ययनों के अनुसार, अन्य भाषाओं में शिक्षण की अपेक्षा, मातृभाषा में शिक्षण से छात्रों की समझ का बेहतर विकास होता पाया गया है। इसलिए, यूनेस्को ने वयस्क शिक्षा के विकास सम्बन्धी १९७६ के अपने घोषणा पत्र में भी मातृभाषा के माध्यम से ही शिक्षा का आवाह्न किया है। देश में एक ही राष्ट्रीय भाषा या किसी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा में शिक्षण की परम्परा की दशा में भी, यूनेस्को ने अपने १९९९ के वार्षिक घोषणा पत्र में ‘बहुभाषिक शिक्षा’ अर्थात् शिक्षण हेतु माध्यम के रूप में राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के उपयोग के साथ-साथ मातृभाषा के अनिवार्यतः उपयोग पर भी बल दिया है। यूनेस्को के शिक्षा के माध्यम सम्बन्धी सभी विलेखों में, इसी कारण द्विभाषिक या बहुभाषिक माध्यम से शिक्षण की अनुशंसा की गयी है।२ इसलिये भारत में अंगेजी माध्यम से शिक्षण के प्रसार की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
मातृभाषा में शिक्षण के बेहतर परिणाम
विगत ५० वर्षों में, विश्व में हुये १५० से अधिक अध्ययनों में सिद्ध हुआ है कि मातृभाषा में शिक्षण की दशा में शिक्षा की गुणवत्ता एवं छात्रों का निष्पादन बेहतर होता है। इसके कुछ संक्षिप्त संदर्भ अग्रानुसार हैं-
* अमेरिका के वर्जिनिया स्थिति जार्ज मैसन विश्वविधालय की एक अनुसंधान इकाई ने १९८५ से २००० के बीच पन्द्रह वर्षों तक, १५ राज्यों के २३ विद्यालयों में मातृभाषा में शिक्षण पर प्रयोग किये। छः पाठ्यक्रमों में से चार पाठ्यक्रमों के शिक्षण में अंगे*जी के साथ-साथ मातृभाषा का भी आंशिक प्रयोग किया गया, जबकि, अन्य दो पाठ्यक्रमों के शिक्षण में मातृभाषा का बिलकुल उपयोग नहीं किया गया। इस सर्वेक्षण में ११ वर्ष की विद्यालयी शिक्षा के परिणामों की समीक्षा पर पाया कि छात्र के शैक्षणिक परिणामों की गुणवत्ता, उसके शिक्षण में मातृभाषा के प्रयोग की अवधि के समानुपात में थी। माध्यमिक शिक्षा में उन छात्रों का निष्पादन व परिणाम बेहतर पाया, जिनका शिक्षण द्विभाषिक माध्यम से हुआ था अर्थात एक अधिकारिक भाषा के साथ-साथ जहाँ शिक्षण हेतु मातृभाषा का भी प्रचुर उपयोग हुआ था।३
* न्यूजीलैण्ड में किये एक अध्ययन से सिद्ध हुआ कि माउरी (Maori) समुदाय के बच्चों में, अंगेजी भाषा में शिक्षित बच्चों की तुलना में, उन बच्चों का निष्पादन बेहतर था, जिनका मौलिक शिक्षण उनकी अपनी भाषा में हुआ था।४
* यूनेस्को-वियतनाम के एक अध्ययन के अनुसार, छात्र का शैक्षणिक अभिलेख एवं वियतनामी भाषा सीखने की गति तब अच्छी होती है, जब उन्हें अपनी मातृभाषा में पढाया जाता है।
* जार्ज मेसन विश्वविद्यालय के दो आचार्यों, जो दोनों ही Professor Emeritus थे, ने एक वृहद् शोध परियोजना के अन्तर्गत ही ७,००,००० छात्रों पर २० वर्षों तक अनुसंधान किया। प्रोफेसर वेन थॉमस एवं प्रोफेसर वर्जिनिया कॉलिन्स ने इस अनुसंधान के अनुसार बताया कि अंगेजी को एक द्वितीय भाषा के रूप में (English As Second Language) पढने वाले छात्रों के अध्यापन में उनकी मातृभाषा का जितना अधिक उपयोग किया जाता है। उन छात्रों की उत्तरवर्ती वर्ष में अंगेजी में शैक्षिक उपलब्धि उतनी ही श्रेष्ठ पायी गयी। जिन छात्रों के शिक्षण में मातृभाषा का बिल्कुल उपयोग न कर केवल अंगेजी माध्यम से ही शिक्षण कराया गया। इनकी तुलना में उन छात्रों का निष्पादन बेहतर पाया गया, जिनके शिक्षण में अंगेजी को द्वितीय भाषा रखकर अंग्रेजी के साथ-साथ मातृभाषा का प्रचुरता से उपयोग किया गया।५
* अमेरिका में ही केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक शिक्षा व अनुसंधान विभाग ने १९८१-१९९१ की अवधि में अमेंरिका के पांच राज्यों में फैले ५१ विद्यालयों के छात्रों पर मातृभाषा बनाम अंगेजी माध्यम से शिक्षण पर एक अध्ययन किया। उनके अनुसार भी छात्र की मातृभाषा में अध्ययन सर्वाधिक प्रभावी होता है। अकेली अंगेजी भाषा में शिक्षण की तुलना में अंगेजी के साथ-साथ छात्र की मातृभाषा का उपयोग करते हुये अध्यापन करने पर उसके बेहतर परिणाम आते हैं। उन्होंने स्पेनिश भाषी छात्र को केवल अंगेजी माध्यम और अंगेजी व स्पेनिश के दोनों माध्यम से अध्यापन करने के प्रयोग में पाया कि स्पेनिश माध्यम के भी उपयोग से अध्यापन की दशा में छात्रों का निष्पादन पर्याप्त बेहतर था।
* इंग्लैण्ड के बेडफोर्ड विश्वविद्यालय ने पंजाबी छात्रों को दो दलों में बाँटकर एक दल का शिक्षण केवल अंग्रेजी माध्यम से किया और दूसरे दल को अंशतः अंगेजी और अंशतः पंजाबी माध्यम से कराया। तब उन्होंने पाया कि पंजाबी व अंगेजी के संयुक्त माध्यम से अध्यापन वाले छात्रों की तुलना में अकेले अंगेजी माध्यम से पढाये छात्रों के अंक अपेक्षाकृत अत्यन्त कम पाये गये। ऐसा ही प्रयोग उन्होंने इंग्लैण्ड में इतावली भाषी छात्रों पर भी किया वहाँ भी मातृभाषा में शिक्षण के परिणाम कहीं अधिक बेहतर थे।
* शिक्षा में अफ्रीकी भाषाओं के उपयोग की समस्याओं व दृष्टिकोणों पर आयोजित अफ्रीकी सम्मेलन की तैयारी के क्रम में ‘‘एसोसिएशन फॉर दी डेवलपमेण्ट ऑफ एज्यूकेशन इन अफ्रीका’’ के शैक्षिक अनुसंधान एवं नीति विश्षण कार्य दल ने भी ऐसे तीन शोध प्रयोजित किये थे। इन तीन अनुसंधानों के आधार पर सम्मेंलन हेतु एक सन्दर्भ पत्र तैयार किया गया। इस संदर्भ पत्र का शीर्षक था ‘‘ए सिनाप्सिस ऑफ रिसर्च फाइण्डिंग्स ऑफ लेंग्वेजस ऑफ इन्सट्रक्शन एण्ड देअर पॉलिसी इम्पलीकेशन्स फार एज्यूकेशन इन अफ्रीका’’। इस परियोजना के अन्तर्गत छः अफ्रीकी देशों, बोत्सवाना, केन्या, माली, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका एवं तंजानिया में और विश्व के कुछ अन्य स्थानों पर अध्ययनप किये गये।६ इसके परिणम निमानुसार रहे
* अफ्रीकी अनुसंधानों में १९७० के नाइजीरिया के अध्ययनप के निष्कर्ष सर्वाधिक स्पष्ट व निर्णायक थे। नाइजीरिया के इफे (Ife) क्षेत्र में मातृभाषा म शिक्षा दिये जाने वाले विद्यालयों एवं अन्य क्षेत्रों के नियमित अंगेजी भाषी विद्यालयों के छात्रों की तुलना पर पाया कि मातृभाषा (योरूबा भाषा) में शिक्षित छात्रों की विद्वता एवं जानकारियाँ दोनों ही अंगेजी माध्यम से पढे छात्रों से बेहतर पायी गयीं। यही नहीं जिन छात्रों को प्रयोग अवधि के छः वर्षों में योरूबा भाषा में शिक्षा दी गयी उनका अंगेजी भाषा कौशल, ऐसे छात्र जिन्हें छः वर्षों में से अन्तिम तीन वर्षों में पूर्णतः अंगेजी माध्यम से पढाया उनसे किसी भी दृष्टि में कम नहीं था।
* माली में १९८५ में सम्पादित प्रयोगों में १५४ छात्र प्रयोगान्तर्गत मातृभाषा में शिक्षण प्राप्त किये हुये थे, जबकि ३४० छात्र फ्रेंच भाषी नियमित विद्यालयों से लिये गये थे। प्रारम्भिक छः वर्ष के अध्ययन में ४८ प्रतिशत छात्रों ने छहों कक्षाएँ बिना किसी कक्षा में अनुर्त्तीण हुये उत्तीर्ण की, जबकि फ्रेंच भाषी विद्यालयों में ७ प्रतिशत छात्र ही ऐसे थे जो बिना किसी वर्ष में अनुतीर्ण हुए छहों कक्षाएँ उत्तीर्ण कर सके।
* दक्षिण अफ्रीका में १९९० में सम्पन्न इस अनुसंधान परियोजना से पढने के बाद छात्रों को दो दलों में बाँट कर एक दल का माध्यम अंगेजी कर दिया। तब पाया गया कि अंग्रेजी माध्यम का परिणाम असंतोषप्रद था।
* तंजानिया में भी स्वाहिल्ली जो वहाँ की मातृभाषा है उसमें व अंगेजी भाषा में शिक्षण के तुलनात्मक अध्ययन
में स्वाहिल्ली माध्यम से छात्रों के उत्तरों में अधिक प्रासंगिकता व क्रमबद्धता पायी गयी।
इस प्रकार के अनेक प्रयोगों से यह निर्विवादतः सिद्ध हुआ कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण की दशा में छात्र का ज्ञान, प्रस्तुति कौशल एवं समझ आदि सभी बेहतर होते हैं। इसलिए विश्व के कई भागों में अकेले अंगेजी माध्यम से शिक्षण के स्थान पर अंगेजी के साथ-साथ छात्र की मातृभाषा को भी शिक्षण के संयुक्त माध्यम के रूप में चुन लिया जाता है। यथा आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रान्त के सभी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षण को माध्यम केवल अंगेजी ही न होकर मातृभाषा का भी समान उपयोग करने की बाध्यतावश द्विभाषिक है।
भाषाओं का विलोपन शिक्षा में एक ही अन्तर्राष्ट्रीय भाषा अंगेजी को माध्यम बना लेने से विश्व में अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ विलोपित हो रही हैं। ‘‘ऐसा अनुमान हैं कि प्रतिवर्ष न्यूनतम १० भाषाएँ लुप्त हो रही हैं और आज विश्व में जो ६००० भाषाएँ बोली जा रही हैं उनमें से आधी आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं। यह भी अनुमान है कि मानव सभ्यता के इतिहास में ३०,००० भाषाएँ विलुप्त हो गयी हैं। केवल संस्कृत, चीनी, ग्रीक व हीब्रु ही ऐसी प्राचीन भाषाएँ हैं जो २००० वर्ष तक जीवित रही।’’७ आर्थिक वैश्वीकरण एवं विश्व के वित्तीय बाजारों के समेकीकरण और इण्टरनेट के प्रादुर्भाव से भी भाषाओं के विलोपन में तेजी आ रही है। अंगेजी आज विश्व के केवल २० प्रतिशत लोगों द्वारा बोली जाती है, जबकि आज इण्टरनेट के ६८ प्रतिशत वेब पृष्ट अंगेजी में है।’’८ विविध प्रमुख भाषाओं के बोलने वालों की संख्या हेतु देखें तालिका क्रमांक-१
तालिका १ विश्व की व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाएँ

भाषा का आत्म गौरव आवश्यक चीन अपने भाषाई आत्म गौरव को बना कर द्रुतगति से औद्योगिक प्रगति भी कर रहा है। इसके कारण आज यूरोप व अमेरिका के युवाओें का बहुत बडा भाग चीनी भाषा ‘मेण्डारिन’ सीख रहा है। सम्पूर्ण यरो-अमेरिकी देशों को औद्योगिक उत्पादों के आपूर्तिकर्त्ता, चीन के साथ व्यवसाय की ललक, इन देशों में मेण्डारिन सीखने की प्रेरणा दे रही है। भारत में चीन को भी पीछे कर देने की पूरी सामर्थ्य है। भारत की छवि चीन की तुलना में अधिक विश्वसनीय व प्रामाणिक है। इसलिये आज भारतीय जन समाज को भी भाषाई आत्म-गौरव से समझौता नहीं करना चाहिये।
संस्कृत भाषाओं की जननी भाषाओं के विवेचन के अन्तर्गत यह चर्चा भी अप्रसांगिक नहीं है कि संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है और विश्व के सभी भाषाशास्त्री, सभी भारतीय भाषाओं यथा हिन्दी, तमिल, तेलगु आदि व यूरोप की सभी भाषाओं यथा ग्रीक, जर्मन, फ्रेंच, रूसी, अंगे*जी आदि को संयुक्त रूप से ‘भारोपीय भाषाओं’ (Indo European Languages) के वर्ग में रखते हैं, क्योंकि ये सभी संस्कृत से विकसित हुयी हैं। संस्कृत की व्याकरण, आज की ६००० भाषाओं में से सर्वाधिक सुव्यवस्थित व प्राचीनतम हैं। संस्कृत की आज उपलब्ध प्राचीनतम व्याकरण, पाणिनी की अष्टाध्यायी है जो २६०० वर्ष पूर्व पाणिनी ने रची थी। पाणिनी की २६०० वीं जयन्ती को पाकिस्तान ने अत्यन्त गौरव के साथ मानया था। पाणिनी का जन्म, पुष्कलावती में हुआ था जो आज पाकिस्तान के गान्धार क्षेत्र के खैबर परव्तुन्रव्वा प्रान्त में है।९ नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की पुस्तक ‘आर्ग्युमेण्टेटिव इण्डियन (Argurmentative Indian)’ के अनुसार खैबर परव्तून्रव्वा के लोगों को पाणिनी पर गर्व होना चाहिये जिसने वहाँ गान्धार से प्रवाहमान ‘काबुल नदी’ के तट पर, विश्व के आज उपलब्ध प्राचीनतम व्याकरण व उच्चारण या स्वरशास्त्र की रचना की थी।१० पुष्कलवती भी प्रागैतिहासिक नगर है, जिसकी स्थापना श्रीराम के भ्राता भरत जी के सुपुत्र पुष्कल
ने की थी। भरत जी के दो पुत्रों में से ‘तक्षक’ ने तक्षशिला की स्थापना की थी। श्रीराम के पुत्र लव द्वारा स्थापित लाहौर के आगे तक्षशिला व तक्षशिला के आगे पुष्कलवती स्थित है। गूगल मेप में ये सभी स्थान देखें जा सकते हैं। महर्षि पाणिनी ने अपनी व्याकरण में अनेक अति प्राचीन व उन्नत व्याकरणों के संदर्भ दिये हैं। वे सभी संदर्भित व्याकरण आज अनुपलब्ध हैं। वेद, जो विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ माने गये हैं और पाश्चात्य विद्वान भी इनकी (वेदों की) परवर्ती सीमा ५००० वर्ष मानते हैं। लेकिन, पूर्ववर्ती सीमा का आकलन करने में वे अपने आपको असमर्थ पाते हैं। ये वेद भी संस्कृत भाषा में हैं। वाल्मीकि रचित रामायण भी संस्कृत में है। अमरीकी अन्तरिक्ष ऐजेन्सी के अनुसार रामसेतु आज १७.५ लाख वर्ष प्राचीन है। उसमें भी वेदों से सन्दर्भ हैं। वाल्मीकि रामयाण में चार दाँत वाले हाथियों ( Four Tusked Elephant Or Mammoths) के वर्णन आते हैं।११ वे भी पृथ्वी से १० लाख वर्ष पूर्व विलुप्त हो गये थे, जो २.५ करोड वर्ष पहले से होते आये थे।१२ इस प्रकार इतने प्राचीन पुरातात्विक प्रमाण युक्त ग्रन्थों की भाषा होने से संस्कृत व्याकरण की अति प्राचीनता स्वतः सिद्ध हो जाती है। लेकिन, आज संस्कृत माध्यम से उपाध्याय (१२वीं कक्षा तुल्य), शास्त्री (बी.ए. समतुल्य) व आचार्य (एम.ए. समतुल्य) में अध्ययन विलुप्त सा हो रहा है। राजस्थान में ही संस्कृत में आचार्य के ३१ विषय थे, इनमें नव्य व्याकरण, प्राच्य व्याकरण, साहित्य, शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा, कण्वा शाखा, रामानुज दर्शन, सांख्य दर्शन आदि पूरे ३१ भिन्न-भिन्न विषय थे। आज ये विषय सिमट कर ६ रह गये हैं। इनमें भी पौर्वात्य पद्धति के शास्त्री-आचार्य आदि उपाधि वाले अधिकांश महाविद्यालयों में न प्राध्यापक हैं और नहीं ही छात्र हैं। ऐसे में देश के लिये संस्कृत का संरक्षण भी एक विचारणीय विषय है। इसलिये, मातृभाषा में शिक्षण के साथ ही पौर्वात्य पद्धति से संस्कृत शिक्षा के प्रसार के भी विशेष प्रयास आवश्यक हैं। आधुनिक विश्वविद्यालयों में तो संस्कृत शिक्षण व परीक्षा
का माध्यम हिन्दी होने से वहाँ से उत्तीर्ण छात्रों का संस्कृत ज्ञान अत्यन्त प्रारम्भिक ही होता है। अतएव आज पौर्वात्य पद्धति से संस्कृत में शास्त्री व आचार्य की उपाधि प्राप्त करने वाले छात्रों को बेहतर जीवन वृत्ति के अवसर प्रदान किये जाने परम आवश्यक हैं। यदि राष्ट्रीय प्रादेशिक स्तर पर ऐसे शास्त्री व आचार्य उपाधि धारकों के लिए राष्ट्रीय व प्रादेशिक संस्कृत सेवाओं का शुभारम्भ किया जाये तो देश में पौर्वात्य पद्धति से संस्कृत माध्यम वाली शास्त्री व आचार्य की उपाधि हेतु शिक्षण को पुनर्जीवित किया जा सकेगा। अन्यथा संस्कृत में बी.ए. व एम.ए. की परीक्षाएँ हिन्दी माध्यम में देने का विकल्प होने से उन छात्रों में संस्कृत के श्रेको का पदान्वयन करना, शब्दों का निर्वचन आदि की सिद्धता नहीं होती है।
हिन्दी अथवा मातृभाषा माध्यम के विधालयों को सृदृढ किया जाना आवश्यक
आज अच्छे केरियर की महत्वाकांक्षा अथवा अंगेजी भाषा के आकर्षण से बहुत बडी संख्या में अभिभावक अंगेजी माध्यम के विद्यालयों को ही प्राथमिकता देते हैं। वस्तुतः अंगेजी भाषा में किसी विषय या प्रश्न को पढने अथवा सुनने पर, उस छात्र का मस्तिष्क सर्वप्रथम उस सुने हुए या पठित विषय अथवा प्रश्न का पहले हिन्दी अथवा मातृभाषा में भाषांतर करता है। तब उस छात्र का मस्तिष्क उस विषय-वस्तु या प्रश्न को समझता है। इसके उपरान्त उस छात्र का मस्तिष्क उस विषय का उत्तर भी पहले हिन्दी या मातृभाषा में सोचता है, फिर उसका भाषांतर अंग्रेजी भाषा में कर, वह मौखिक या लिखित में उत्तर, अंगेजी में देने की स्थिति में आता है। इस प्रकार छात्र के मस्तिष्क की तीन गुनी बौद्धिक ऊर्जा इसमें लगती है। इसलिये विद्यालय स्तर पर छात्र को मातृभाषा में समग्रतापूर्वक अध्ययन करवाना बेहतर परिणामदायी होगा। ये छात्र अंगेजी माध्यम के छात्रों की तुलना में भी परीक्षाओं में बेहतर परिणाम भी दे सकेंगे। तब अभिभावकों में भी हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यालयों की ओर रूझान
बढेगा एवं छात्रों के लिए अध्ययन, क्रीडा व आमोद की तरह ही सहज व रोचक हो सकेगा। द्य
संदर्भ
१. यूनेस्को का शिक्षा क्षेत्र हेतु न्यूजलेटर ‘एजूकेशन टुडे’ क्रमांक ६, जुलाई सितम्बर - २००३, पृष्ठ ६
२. यूनेस्को के मातृभाषा में शिक्षण के समर्थक, तर्कसम्मत प्रलेखों में प्रमुख निम* हैः
(i) Promoting education in the mother tongue to improve the quality of education
(ii) Encouraging billingual and or multilingual education at all levels of schooling.
(iii) Pushing languages as a centarl part of inter-cultural education.
३. पूर्वोक्त १, पृष्ठ ५
४. पूर्वोक्त
५. वियना इण्टरनेशनल स्कूल के ईएसएल व एम टी विभाग
की वेगसाइट-http://school.vis.ac.at/esl mothertongue.html
६. Vol. 8, No. 4 of the newsletter of the association for the Development of Education in Africa.
७. पूर्वोक्त १, पृष्ठ ७
८. पूर्वोक्त
९. पाकिस्तानी समाचार पत्र ष्ठ*ङ्गहृ, दिनांक २७ मार्च २०१२
१०. पूर्वोक्त
११. वाल्मिकी रामयाण, सुन्दरकाण्ड (४.२७.१२)
१२. www.thoughtco.com/prehistoric/elephats/everyone/should/know/1093344
अध्यक्ष, पेसिफिक उच्चतर शिक्षा एवं अनुसंधान अकादमी विश्वविद्यालय, उदयपुर