‘कान्हा की बांसुरी की आखिरी धुन’

देवदत्त शर्मा


भारतीय संस्कृति में ईश्वरीय शक्ति के अवतारों में अटूट श्रद्धा है। त्रेता युग के मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा द्वापर युग के कृष्णावतार सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। लौकिक जीवन में राम से भी अधिक कृष्ण के प्रति जन मानस का सर्वाधिक आकर्षण है। कृष्ण की बांके बिहारी छवि जिसमें राधा-कृष्ण की युगल छवि को जन मानस नमन तो करता ही है, स्वयं का जीवन भी वैसा ही चाहता है। युगल छवि में कृष्ण की छवि बांसुरी वादन की है। बांसुरी कृष्ण की संगिनी है। इसी के वादन से कृष्ण सबको मोह लेते हैं। इस युगल छवि को जन मानस प्रेम के देवता के रूप में पूजते हैं। कृष्ण की राधा के साथ इसी छवि को माधुर्य भाव में प्रतिमाओं में तथा चित्रों में दर्शाया जाता है। इस छवि में कृष्ण एवं राधा को युवा रूप में चित्रित किया जाता है। यह भी माना जाता है कि राधा कृष्ण की पे*यसी थी तथा कृष्ण स्वयं को राधा के बिना अधूरा मानते थे। यद्यपि श्रीकृष्ण विवाहित थे तथा रुक्मणी सहित उनकी प्रिय रानियाँ थीं, परन्तु प्रतिमाओं एवं चित्रों में कृष्ण को राधा के साथ ही दर्शाया जाता है। कहते हैं की राधा कृष्ण की विवाहिता नहीं थी अपितु किसी अन्य गोप की विवाहित स्त्री थी फिर भी वह कृष्ण की आराधिका थी।
आज भारतीय संस्कृति में कृष्ण एवं राधा का संबंध स्त्री-पुरुष के पावन रिश्तों का प्रतीक माना जाता है। जहाँ पे*म में वासना का कोई स्थान नहीं है। आत्मीय पे*म की निश्छलता है। मुरली धारण करने के कारण विशिष्ट भाव भंगिमा में प्रदर्शित श्रीकृष्ण को जन मानस मुरलीधर एवं बांके बिहारी के रूप में देखता है।
श्रीकृष्ण के जीवन का प्रमाणिक परिचय श्रीमद्भागवत महापुराण है। इसका दसवां स्कन्ध केवल कृष्ण के संबंध में है। कृष्ण के संबंध में प्रचलित धारणाओं एवं भागवत में वर्णित तथ्यों में कई विसंगतियाँ हैं। इस लेख का विषय कान्हा की बांसुरी एवं श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधा के संदर्भ में है। भागवत के अनुसार बाल्यकाल में गोकुल एवं ब्रज में कृष्ण को ‘‘कान्हा’’ के रूप में पुकारा जाता था। माखनचोर कान्हा से लेकर गोपियों के संग महारास तक वे कान्हा ही थे। कान्हा चूंकि गाये भी चराते थे अतः उनका प्रिय ग्वाल स्वरूप सदैव आकर्षित रहा। इसी रूप में उन्होंने बाँसुरी बजाना प्रारंभ किया था। वे इतनी मधुर बाँसुरी बजाते थे कि समस्त ब्रज में कान्हा को मुरली मनोहर कहा जाने लगा। भागवत के अनुसार उनकी बाँसुरी की धुन का असर स्तब्ध कर देने वाला था ः-
‘‘इति वेणु रवं राजन सर्वभूत मनोहरम’’
अर्थात - ‘यह बंशी ध्वनि जड-चेतन समस्त भूतों का मन चुरा लेती है।’
‘वेणुगीत’ नामक इक्कीसवे अध्याय में विस्तार से कान्हा की बाँसुरी का प्रभावोत्पादक वर्णन है। उसका सार यह है कि जब कान्हा ग्वाल-बाल के बीच में मधुर स्वर में बाँसुरी बजाते थे तो सारा वातावरण उस बांसुरी के स्वर में डूब जाता था। पशु-पक्षी तक उस मुरली की धुन से आकर्षित रहते थे। ब्रज की गोपियाँ इसी धुन पर मर मिटती थीं। सारे ब्रज म मुरली मनोहर कान्हा प्रिय थे।
बालक कान्हा की रास लीला का प्रसंग अद्यतन भागवत कथा का प्रमुख आकर्षण है। रास नृत्य पर आधारित चित्र मन को लुभा लेते हैं। ’श्ाृंगार रस से सम्बंधित साहित्य में रास का वर्णन मनोहर लगता है। शरद पूर्णिमा की अमृतमयी रात्रि में जब कान्हा ने ब्रज की गोपियों के साथ ‘‘महारास’’ किया था तब रास नृत्य का प्रमुख वाद्य यंत्र कान्हा की बाँसुरी ही था। बाँसुरी की धुन सुनकर ही ब्रज की गोपियाँ जो अपने घरों में जिस स्तिथि में थीं, अपनी सुध-बुध खोकर कान्हा के पास यमुना के पुलिन में मध्य रात्रि में पहुँच गई थी। इसका रोचक वर्णन भागवत में तो है ही, आज भी भजनों में एवं लोक गीतों में सुनने को मिलता है। बाँसुरी बजाते हुए कान्हा बीच में तथा चारों तरफ मण्डलाकार गोपियों का उल्लासमय नृत्य। विचित्र बात यह की प्रत्येक दो गोपियों के बीच स्वयं कृष्ण दूसरे रूप में दिखाये जाते हैं। भागवत में इस महारास का वर्णन इतना रोचक है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हम महारास को प्रत्यक्ष देख रहे हों।
महारास के समय कृष्ण की आयु मात्र ग्यारह वर्ष थी। गोपियाँ विवाहित बताई गई हैं। अतः वे अवश्य अधिक
उम्र की रही होंगी। परन्तु चित्रों में एवं प्रतिमाओं में महारास के नायक कान्हा को युवावस्था का चित्रित किया जा रहा है। भागवत एक प्रचलित परम्पराओं में यह विसंगति है। इसी प्रकार भागवत में गोपियों का वर्णन तो है परन्तु ‘‘राधा’’ नामक किसी गोपी का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है। जबकि प्रचलित कथाओं में राधा को प्रमुख गोपी एक कृष्ण की पे*यसी बताया जाता है। मेरा अनुमान है कि ‘‘राधा’’ का कृष्ण की पे*यसी बताने का प्रसंग पश्चातवर्ती रससिद्ध श्ाृृंगारिक कवियों ने जोडा है। इस बारहवीं सदी के प्रसिद्ध रससिद्ध कवि ‘जयदेव’ को ले सकते हैं जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध संस्कृत रचना ‘गीत-गोविन्दम’ में राधा को कृष्ण की पे*यसी बताया है। यह संपूर्ण काव्य ग्रन्थ श्रीकृष्ण एवं राधा पर आधारित श्ाृंगार प्रधान है। इसके पूर्व ग्रंथों में ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
मान ले की राधा नामक कोई गोपी रही होगी जो ‘बरसाना’ ग्राम के वृषभानु की पुत्री थी तथा वही कृष्ण के बचपन में साथ खेली होगी, लेकिन इसी आधार पर उसे कृष्ण की पे*यसी बताने का कोई आधार नहीं है क्योंकि कृष्ण तो ग्यारह वर्ष की आयु में ही ब्रज छोड चुके थे। हाँ, बाल सखी कहा जा सकता है। पे*यसी नहीं। ब्रज छोडकर मथुरा जाना, वहाँ राजनीति में उलझ जाना तथा द्वारका बसाकर जा बसना- पुनः ब्रज में कभी नहीं आए। ग्यारह वर्ष की अवस्था के बाद न राधा नामक गोपी से कृष्ण का मिलन हुआ तथा न ही अन्य गोपियों से। हाँ, बचपन की यादों के तहत उद्धव एवं बलराम जी को अवश्य बाद में ब्रज भेजा था। स्वयं कभी नहीं गए। इसी प्रकार महारास में कान्हा के रूप में उन्होंने अपनी बाँसुरी की धुन बजाई थी। उसके बाद ब्रज छोड दिया तथा बाँसुरी बजाने का अवसर ही नहीं मिला। फिर भी जहाँ-जहाँ भी राधा एवं कृष्ण की युगल छवि दिखाई जाती है उसमें बाँसुरी की प्रमुखता होती है।
श्रीमद्भागवत पुराण के आधार पर मेरा तो यही मानना है की श्रीकृष्ण जब तक अर्थात ग्यारह वर्ष की आयु तक बाल्यकाल में ‘‘कान्हा’’ नाम से ब्रज में रहे, उन्होंने वर्णित चमत्कारी लीलाएँ की थीं तथा तभी तक उन्होंने बांसुरी वादन से सबका मन मोहा था। कृष्ण की अधिकृत जीवनी भागवत में ‘‘राधा’’ गोपिका का कहीं उल्लेख नहीं है अतः कल्पना ही मानना चाहिए। युवावस्था में राधा एवं कृष्ण का मिलना भी सिद्ध नहीं होता है तो फिर प्रतिभाओं में एवं चित्रों में इनकी युगल छवि का प्रदर्शन काल्पनिक ही है।
स्पष्ट है, महाभारत में कान्हा की बांसुरी की आखिरी धुन बजी थी तथा वे अल्पायु में थे, ऐसे में राधा के साथ युगल छवि के रूप में उन्हें युवावस्था को दिखाना
भागवत पुराण से मेल नहीं खाता है। इस पर विस्तृत शोध अपेक्षित है।
भागवत कथावाचकों का भी कर्तव्य बनता है की वे भागवत में वर्णित तथ्यों को सही रूप से प्रस्तुत करें।
कृष्णावतार पर मैं यही कहना चाहुँगा की उन्होंने अपने जीवन म मानवीय मर्यादाओं को प्रश्रय दिया था तथा ‘गीता’ में दिए उपदेश के माध्यम से भारतीय दर्शन को ही जीवन दर्शन सिद्ध किया था, अतः उनका अवतार स्वरुप लोक प्रिय हने के कारण वन्दनीय है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत पर जन मानस में प्रेरणा भरी है। अतः सही हैः-
‘‘कृष्ण वंदे जगाद्गुरुम’’
जन मानस में राधा के प्रति अटूट आस्था है। कृष्ण के पहले राधा का उच्चारण राधा के प्रति श्रद्धा भाव दर्शाता है तथा राधा के अस्तित्व को स्वीकारता है अतः राधा एवं कृष्ण दोनों श्रद्धा के पात्र हैं। राधे-राधे शब्द लोगों के अंतर्मन में बसा हुआ है अतः राधा भी वन्दनीय है।
‘‘कोप भवन में राम एवं कैकेई की गुप्त वार्ता’’
कैकेई कोप भवन में क्यों थी, इसका कारण तो सभी भली भाँति जानते हैं। इसी कोप भवन में जब राम ने प्रवेश किया तो उस समय का दृश्य असामान्य था। राम
को वह दृश्य भयभीत लगा-तुलसी के शब्दों में दशरथ एवं कैकेई की दशा-
‘‘सूखहि अधर जरइ सब अंगु। मनहु दीन मनि हीन भुजंगु।।
सरूष समीप दीखि कैकेई। मोनहू मीचू धरी गनि लेई।।
राम घबरा गए! इसके पूर्व उनके जीवन में ऐसा दृश्य कभी नहीं आया था। ऐसा क्या हो गया? राम दशरथ एवं कैकेई दोनों के प्रति श्रद्धा रखते थे, परन्तु दशरथ से बोला नहीं जा रहा था। राम ने कैकेई से ही जानकारी लेना उचित समझा-
‘‘करूणामय मृदु राम सुमाऊ। प्रथम दीन दुख सुना न काऊ।।
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूछी मधुर वचन महतारी।।’’
राम को विश्वास था कि माता कैकेई सच्ची बात निःसंकोच बताएगी। कैकेई स्वयं राम से आत्मीय स्नेह रखती थी तथा राम पर विश्वास करती थी, तथापि वास्तविकता बताने से पूर्व राम को पूर्ण विश्वास में लेना चाहती थी। अर्थात् वह यह विश्वास चाहती थी कि राम उसे गलत न समझें। अतः सारी बातें स्पष्टता से बताने से पूर्व कैकेई ने राम से जो कहा उसका वर्णन करते हुए रामायण में वाल्मीकि ने उल्लेख किया है-
यदि तद् वक्ष्यते राजा शुभवा यदि वाशुभम्।
करिष्यसि ततः सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम्।।
वाल्मीकि/अयो./१८/२५
अर्थात्- ‘‘ यदि राजा जिस बात को कहना चाहते हैं, वह शुभ हो या अशुभ, तुम सर्वथा उसका पालन करो तो मैं सारी बात पुनः तुमसे कहूँगी’’
श्लोक २६ में यह भी उल्लेख है कि कैकेई ने राम से कहा कि वह बात स्वयं राजा तुमसे नहीं कहेंगे और राम ने प्रतिज्ञा करके कैकेई को विश्वास दिलाया कि माता जो भी बताएगी मैं उसे सत्य मानकर उसका पालन करूँगा-
तद्बूहि वचनं देवि राज्ञो यदमिकाडक्षतम्।
करिज्ये प्रतिज्ञाने च रामो द्विनाभिभाषते।।
वाल्मीके/आयो. १८/३०
‘‘...... राजा को जो अभीष्ट है वह मुझे बताओ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उसे पूर्ण करूँ गा। राम दो तरह की बात नहीं करता है।’’
जैसा कि सभी रामकथाओं से स्पष्ट होता है कि कैकेई राम से अति स्नेह करती थी तथा राम के प्रति उसके मन दुराग्रह नहीं था, अतः उसने राम से कहा-
सर्व प्रथम कैकेई ने रघुकुल की इस प्रतिष्ठा को दोहराया-
रघुकुल रीति सदा चल आई। प्राण जाई पर वचन न जाई।।
और वार्ता को आगे बढाते हुए राम को विश्वास दिलाया कि उसका (कैकेई) एक मात्र उद्देश्य रघुकुल की उसी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए कठोर बनना पडा है। उसका निजी स्वार्थ नहीं है। कैकेई ने राम को बताया कि महाराजा दशरथ ने रघुकुल की वचन प्रियता को तोडा है जो रघुकुल के लिए कलंक की बात है। और कैकेई ने राम को अपने एवं दशरथ के विवाह के प्रसंग को बताया जिसके तहत दशरथ ने कैकेई के पिता अश्वपति को वचन दिया था कि कैकेई से उत्पन्न संतान ही दशरथ की उत्तराधिकारी होगी। कैकेई ने राम को तत्कालीन परिस्थितियों से इस वार्ता में अवगत कराते हुए कहा कि उस समय तुम्हारी अन्य माताओं से कोई संतान नहीं थी तथा न भविष्य में संतान होने की आशा थी। अतः निःसंकोच उन्होंने यह वचन दे दिया था।
राम को आज एक नई बात का पता चला। वे कैकेई की बात को ध्यान से सुन रहे थे। कैकेई ने वार्ता को आगें बढाते हुए कहा कि कालांतर में तुम चारों भाईय का जन्म हुआ। बडी महारानी कौशल्या से तुम्हारा जन्म होने के कारण इक्ष्वाकु कुल की वंश परंपरानुसार तुम राज्य के अधिकारी हो। मैं भी इस बात को स्वीकार
करती हूँ।
परन्तु रघुकुल एवं दशरथ की वचन प्रियता भंग हो रही है। महाराज तुम्हारा राजतिलक करना चाहते हैं। इससे महाराज एवं रघुकुल दोनों की बदनामी होगी। महाराज
ने तुम्हारे राज्यभिषेक का निश्चय करके कौशलके सभी जन पद राजाओं को न्यौता दे दिया तथा राज्यभिषेक की तैयारियों की भी धूमधाम है। परंतु महाराज ने तुम्हारे श्वसुर महाराज जनक एवं मेरे पिता को निमंत्रित नहीं किया क्योंकि सत्यावादी होने के कारण जनक उस वचन के कारण जो महाराज ने मेरे पिता को दिया था, इस राज्यभिषेक का विरोध करते। मरे पिता को तो वचन दिया ही था, अतः वे भी विरोध करते।
स्वयं महाराज को इन दोनों की तरफ से विरोध की आशंका थी। तुम्हें भी तो बुलाकर कहा था-
‘‘सुहदश्र्वा प्रमत्तस्त्वां रक्षन्त्वद्य समन्ततः।
भवन्ति बहुविहनानि कार्याण्येव्यैविछानि हि।।
वाल्मीकि/आयो. ४/२४
(आज तुम्हारे सुहृद सावधान होकर सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें क्योंकि इस प्रकार के शुभकर्मों में बहुत से विघ्न आने की संभावना रहती है)
निःसंदेह यह संकेत कैकयराज अश्वपति द्वारा विघ* डालने की आशंका को इंगित करता है। दशरथ ने यह भी कहा था-
‘‘विप्रोषितश्च भरतो यावदेव पुरादितः।
तव देवाभिषेकस्ते प्राप्तकालो मतो मंम।।
वाल्मीकि/आयो. ४/२५
(जब तक भरत इस नगर से बाहर अपने मामा के यहाँ निवास करते हैं तब तक ही तुम्हारा अभिषेक हो जाना मुझे उचित प्रतीत होता है)
इस प्रकार से कैकेई ने राम को यह बात बताई कि महाराज दशरथ ने अपने वचन को तोडा है। इसलिए मैंने तुम्हारे स्थान पर भरत के राज्याभिषेक की माँग की है! यही कारण है कि महाराज खिन्न हैं। वचन भंग वाली बात इसलिए नहीं दोहरा रहे हैं कि वे तुम्हें ही राज्य देने पर अटल हैं। मैं इस बात को जानती हूँ कि भरत को राज्य का लाभ नहीं है परन्तु वचनप्रियता के पालन के लिए भरत का राज्यभिषेक आवश्यक है।
अब तक राम को इन बातों की जानकारी नहीं थी। कैकेई ने जब सारी बातें राम को बताई तो राम कैकेई से पूर्णतः सहमत हो गए तथा दशरथ के वचन की रक्षा के लिए भरत को राजा बनाने में सहर्ष सहमति देते हुए कैकेई का साथ दिया। चूंकि कैकेई स्वयं राम से स्नेह रखती थी अतः उसने राम को आश्वत किया कि वंश परम्परानुसार राज्य पर तुम्हारा ही अधिकार है अतः भरत को सीमित अवधि तक राजा बनाकर वचन की पालना की जाए तथा उसके बाद तुम्हें राज्य मिले। दशरथ की वचनप्रियता की भी रक्षा हो जाएगी तथा तुम्हारे साथ भी अन्याय
नहीं होगा।
यद्यपि राम को राज्य का लोभ नहीं था परन्तु माता कैकेई के प्रति उनकी श्रद्धा बढ गई। उन्होंने कैकेई की आज्ञा को शिरोधार्य करके आगामी योजना पर विस्तृत मार्गदर्शन मांगा।
कैकेई ने अपनी बात को आगे बढाते हुए राम से कहा कि इस वचन की रक्षा के लिए उसने दशरथ द्वारा प्रदत्त दो वचनों को उपयोग किया है जो दशरथ के पास धरोहर थे। कैकेई ने देवासुर संग्राम में जो कुछ हुआ उससे राम को अवगत कराया कि कैसे उसने महाराज दशरथ के सारथि के रूप में भाग लिया था तथा महाराज के घायल हो जाने पर युद्ध क्षेत्र से बाहर ले जाकर उनकी सेवा सुश्रुषा करके उनके प्राण बचाए थे, जिससे प्रसन्न होकर दशरथ ने दो वर दिए थे। उन्हीं दो वचनों द्वारा रघुकुल की प्रतिष्ठा का उपाय समझकर इस समय महाराज से उनकी पूर्ति करा रही हूँ। एतदर्थ प्रथम वचन द्वारा भरत को तुम्हारे स्थान पर युवराज बनाने का वर माँगा है तथा दूसरे वचन के तहत् तुम्हें दण्डकारण्य में चौदह वर्ष तक निवास करके आयोध्या का प्रतिनिधित्व करते हुए राक्षसों, विशेषकर रावण का विनाश करना होगा। तब तक भरत राज्य पर न्यासी के रूप में रहेंगे तथा इसके पश्चात तुम राजा होंगे! यही न्याय होगा।
कैकेई ने दण्डकारण्य में जाने की बात इसलिए बताई कि उस क्षेत्र इस्वाक (अयोध्या) राज्य के क्षेत्राधिकार का है जिस पर रावण की बहिन शूर्पनखा के नेतृत्व में विदूषण के माध्यम से रावण ने अधिकृत कर रखा है तथा वहाँ के ऋषिमुनियों पर अत्याचार हो रहे हैं। इसके अलावा दशरथ से भी पूर्व अयोध्या नरेश अनरण्य के समय रावण ने अयोध्या पर आक्रमण करके अनरण्य का वध कर दिया था। मरते समय अनरण्य ने रावण को आप श्राप दिया था-
‘‘उत्पात्स्यते कुले हास्मिन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम्।
श्रामो दाशरथिनमि स ते प्राणान हरिष्यति।।
वाल्मीकि/उत्तर/१९/३०
(महात्मा इक्ष्वाकुंवशी नरेशों के इस वंश में ही दशरथनंदन श्री राम प्रकट होंगे जो तेरे प्राणों का
हरण करेंगे)
इस प्रकार रावण के विनाश का उत्तरदायित्व तुम्हें पूरा करना है। चूंकि दशरथ एवं वशिष्ठ तथा सभी अयोध्यावासी राम को ही राजा बनाना चाहते थे अतः दूरदर्शी राजनीतिज्ञ कैकेई को अयोध्या में उपद्रव की आशंका थी अतः राम को सारी परिस्थितियों से अवगत कराते हुए तत्काल प्रस्थान करने के लिए राजी किया। और! रघुकुल की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए प्रसन्न मन से अयोध्या को तत्काल छोडना उपयुक्त समझा। (दण्डकारण्य के लिए) कोप भवन में राम एवं कैकेई की इस गुप्त वार्ता तथा परिस्थितियों का भरत को पता नहीं था। यही कारण था कि वे अपनी माता को दोष देते रहे तथा स्वयं को सारे घटनाक्रम को कारक मानकर राज्य ग्रहण करना स्वीकार नहीं करके राम को मनाने चित्रकूट गए।
राम अपने कर्त्तव्यपथ पर थे परन्तु भरत जब चित्रकूट पहुँच गए तथा राम का राजतिलक करने की जिद्द पर अड गए तब विवश होकर राम ने कैकेई से हुई गुप्त वार्ता का रहस्य बताकर भरत को मनाया। राम ने कैकेई द्वारा विगत के इतिहास को इस प्रकार दोहराया-
‘‘पुरा भ्रातः पिता नः समातरंते समुद्वहन।
मतामहे समाश्रोषीद् राज्य शुल्कमनुत्तमम्।।’’
वाल्मीकि/उत्तर/१०७/३
‘‘भैया आज से बहुत पहले की बात है पिताजी का जब तुम्हारी माताजी के साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नाना से कैकेई के पुत्र को राज्य देने की उत्तम शर्त करा ली थी।’’
ततःसा सम्प्रतिश्रव्य तव माता यशस्विनी।
अयाचत नरश्रेष्ठ द्वौ वरौ वर वर्णिनी।।
वाल्मीके/उत्तर/१०७/४
‘‘उसी पूर्ति के लिए प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माता ने उन नर श्रेष्ठ पिताजी से दो
वर माँगे।’’
वाल्मीकि ने कोप भवन में हुई राम एवं कैकेई की गुप्त वार्ता का रहस्य चित्रकूट में राम के मुख से प्रकट कराया। यद्यपि प्रयाग में जब राम भरद्वाज मुनि के आश्रम पर गए थे तब मुनि के पूछने पर राम ने इस वार्ता का संकेत दे दिया था। यही कारण था कि जब चित्रकूट जाते समय भरत भी मुनि के आश्रम पर रुके थे तब भारद्वाज ने भरत की ग्लानि दूर करने के लिए भरत को कहा था कि कैकेई का कृत्य गलत नहीं है, उसे गलत मत समझो! उन्होंने कहा-
मानस के अनुसार-
‘‘सुनहु भरत हम सुधि पाई...
लोकदेव समत सबु कहहि। जोहि पितु देह राजु सो लहई।।
राउ सत्यव्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बडाई।।
स्पष्ट है कि कैकेई के पिता को दिए वचन के अनुसार दशरथ ने राज्य भरत को ही दिया था। राजा सत्यव्रती थे, उन्हें चाहिए था कि तुम्हें बुलाकर राज्य सौंपते (वचन के अनुसार) तो सुख मिलता धर्म की रक्षा होती तथा उनकी बडाई होती।
यानी भारद्वाज की निगाह में भी दशरथ ने वचन भंग किया था परन्तु कैकेई ने रघुकुल की लाज रख ली।
इसलिए राम अयोध्या लौटने के लिए राजी नहीं हुए। अपितु पिता द्वारा भरत के नाना को दिए वचन की रक्षा के लिए चारों भाईयों से सहयोग मांगा-
शत्रुघ्नास्त्वतुलमतिस्तु ते सहायः
सौमित्रिर्मम विदितः प्रधान मित्रम्।
चत्वारस्तनयवरावयं नरेन्द्रं
सत्यर्स्थ भरत चराम मा विषिद।।
वाल्मीके/उत्तर/१०७/१९
‘‘भरत अतुलित बुद्धिवाले, शत्रुघन तुम्हारी सहायता में रहे और सुविख्यात सुमित्रा कुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र हैं। हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथ के सत्य की रक्षा करें। तुम विषाद मत करो।’’
यह उसी वचन की बात है जो दशरथ ने कैकेई के पिता को दिया था जिसको उन्होंने तोडा था परन्तु माता कैकेई ने उनकी प्रतिष्ठा को बचा लिया। इसलिए राम ने कैकेई की माँग को उचित बताते हुए कहा-
‘‘युक्त मुक्त च कैकेई.....’’
‘‘कैकेई ने उचित माँग ही प्रस्तुत की थी....।
अतः भरत को यह भी स्पष्ट निर्देश दिया कि कैकेई पर क्रोध करना उचित नहीं है।
राम द्वारा कोप भवन में कैकेई की गुप्त वार्ता का रहस्य चित्रकूट में भरत को बताने पर ही भरत को यह विश्वास हो पाया कि माता कैकेई ने रघुकुल की वचन प्रियता की प्रतिष्ठा की रक्षा की। इसी आधार पर चौदह वर्षों की अवधि तक के लिए पिता के वचन की रक्षार्थ न्यासी के रूप में अयोध्या का राज्य स्वीकार किया तथा स्वयं भी राम की तरह वनवासी के समान नंदीग्राम में रहे।
राम ने माता कैकेई के निर्देशानुसार चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में रहते हुए उक्त क्षेत्र को राक्षसों से मुक्त कराया तथा रावण का वध किया। सर्वविदित इस कथा को दोहराने की आवश्यकता नहीं है।
हाँ, आयोध्या लौटते ही सर्वप्रथम राम ने कैकेई से भेंट करके उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। कैकेई की महानता को प्रणाम किया।
कैकेई इसी रूप में स्मरणीय है कि राजनीतिक सूझबूझ एवं दूरदर्शिता से उसने रघुकुल की प्रतिष्ठा को भी बचाया तथा राम के वंशानुगत राज्याधिकार की भी
रक्षा की।
राम एवं कैकेई की कोप भवन में गुप्त वार्ता से ही सारी भ्रांति दूर हो जाती है। यह भी कि, सौदेश्य दण्डकारण्य भेजा था, वनवास नहीं दिया था। जन मानस म यह भ्रांति भी दूर हो जाती है कि कैकेई ने राम को वनवास दिया था। इस गुप्त वार्ता में कैकेई ने राम को निर्देशित करते हुए सीधे दण्डाकरण्य में जाकर राक्षसों के विनाश का अभियान प्रारंभ करने को कहा था।
वस्तुतः कौशल की सीमा में (क्षेत्राधिकार) रावण का हस्तक्षेप कौशल एवं श्रीलंका का पुराना वैरभाव था जो रावण के विनाश पर ही समाप्त हो सकता था। अतः कैकेई ने राम को कहा-
‘‘सप्त सप्त च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः।
अभिषेकमिंद त्यक्त्वाजटा-चीर धरो भवः।।
वाल्मीके/आयो./१८/३७
और तुम इस अभिषेक को त्याग कर चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में रहते हुए जटा और चीर धारण करो।
और, राम ने वही किया जो कैकेई ने कहा। सर्वप्रथम रावण के सहयोगी किष्किंधा नरेश वानरराज ‘बालि’ का वध किया। उस समय राम ने स्वयं को अयोध्या के राजा भरत का प्रतिनिधि बताते हुए बालि को कहा था - किष्किंधा काण्ड सर्ग १८ के श्लोक १८ में वाल्मीकि लिखते हैं-
‘‘भरत की ओर से हमें तथा दूसरे राजाओं को यह आदेश प्राप्त है कि जगत में धर्म के पालन और प्रसार के लिए यत्न किया जाए.....एतदर्थ.....’’ भरत की आज्ञा को सामने रखते हुए हम धर्म मार्ग से भ्रष्ट पुरूष को विधिपूर्वक दण्ड देते हैं।
स्पष्ट है कि राम को वनवास नहीं दिया था। चौदह वर्षों की अवधि तक राम ने अयोध्या पर भरत को राजा मानकर उनका प्रतिनिधित्व किया था।
राम एवं कैकेई की कोप भवन में हुई गुप्त वार्ता से कई भ*ांतियाँ दूर हो जाती हैं तथा कई रहस्य प्रकट
होते हैं। द्य
ई-१४०, ‘‘ऋतुचक्र’’ शास्त्रीनगर, अजमेर (राज.)-३०५००१
मो. ७५९७५२६०७९