एक अलंकार एवं संपूर्ण पद्धति के रुप में की परतें

डॉ. प्रवीण पण्ड्या


ऊह-अपोह, प्रश्र-प्रतिप्रश्र के द्वारा शताब्दियों से देश के कोने-कोने में चले आ रहे लंबे शास्त्रार्थ से काव्य विमर्श में जो गंभीरता एवं समृद्धि भारत के मनीषियों ने संपादित की है, वैश्विक काव्यचिंतन में उसकी स्वायत्त सत्ता है, अपना एक पक्ष है। कश्मीर, काञ्चीपुरम्, पाटन, मालवा के रुप में भारत की चारों दिशाओं ने इसमें भाग लिया है। हाँ, इस विमर्श में जो शास्त्र बना, वह किसी भाषा के काव्य की अपेक्षा भाषा निर्विशेष काव्य-सामान्य पर केंद्रित था, किन्तु चिंतन की भाषा भारत के समस्त क्षेत्रों की सामान्य भाषा संस्कृत रही। इस विमर्श में अनेक मानदंडों की खोज हुई, जो काव्य की न केवल पूरी संरचन को खोल देते हैं, अपितु उसकी संवेदना के लिए उचित संरचना के विकल्पों को पूरी गंभीरता से परखते हैं। शताब्दियों तक बहसें चली हैं और उनकी व्याप्ति देश के एक से दूसरे छोर तक है। भारत की चिंतन परंपरा में बहुवचन-संपादन को गौरव का विषय माना गया है और यह वह सूत्र है, जो इस देश को अपने स्वभाव में लोकतांत्रिक एवं सहिष्णु बनाए हुए है। इस बहुवचनीयता में बहुत कुछ प्रस्तावित हुआ और काफी कुछ छूटा और काफी कुछ बचा रहा। संकेतमात्र ही ठीक रहेगा कि लक्षण छूट गए, अलंकार रह गए। अलंकार चिंतन भरत मुनि से अद्यावधि निरंतर है।
अलंकार काव्य की संरचना का महाविषय है, इस बारे में संपूर्ण भारतीय काव्यशास्त्र का एकमत है। एक प्रश्न यह है कि क्या काव्य का यह ताना-बाना क्या अत्यन्त अल्प विषय है, क्या कोई मंदप्रतिभ कवि इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सका है? दूसरा यह है कि अलंकार को जो नहीं खोल पाता है, क्या वह कवि की आवा*ा तक, काव्यार्थ तक पहुँच पाता है? मेरा अपना मंतव्य है कि वेद आज तक अबूझ है तो केवल इसलिए कि हम उसके अलंकार को पकड नहीं सके है। अलंकार को पकडे बिना कथ्य का ठीक-ठीक ग्रहण संभव नहीं है। यही नहीं, अपितु जिस तरह एक काव्य का एक अलंकार होता है, उसी तरह एक राष्ट्र/एक संस्कृति का भी एक अलंकार होता है और जब तक हम उसके उस आधारभूत अलंकार को पकड नहीं पाते हैं, ईमानदारी होने के बावजूद उसके संदर्भ में हमारा संपूर्ण चिंतन तथ्य और तथ्य पर नहीं पहुँच पाता है। अलंकार काव्य में आखिर तो लोक से आते हैं। भरत मुनि का वक्तव्य है
उपमाया बुधैरेते ज्ञेया भेदाः समासतः। ये शेषाः, लक्षणैर् नोक्तास्ते, ग्राह्य लोककाव्यतः।। (ना.शा. १६-५१) अस्तु, प्रकृतमनुसरामः।
(२)
डॉ. मथुरेशनंदन कुलश्रेष्ठ हिन्दी के उन गिने चुने विद्वानों में हैं, जो संस्कृत में निष्पन्न भारत के इस काव्यचिंतन के अभिज्ञ हैं और इस चर्चा में हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य रखते हैं। इनका २०१७ में प्रकाशित ग्रंथ ‘श्रेषालंकार स्वरूप और विस्तार’ इनकी लगभग चालीस वर्ष की अलंकार-विचारणा का परिणाम है और स्वाभाविक रूप से यह उनके क्रमशः स्वाभावोक्ति, अर्थान्तरन्यास, वक्रोक्ति, यमक और अनुप्रास पर लिखे गए पाँच गंथों से न केवल परिमाण में, अपितु चिंतन की परिधि के फैलाव की दृष्टि से भी महत्तर है। संक्षेप में सही, किन्तु शिल्प और चित्रों में कैसे श्रेष हो सकता है, इस पर भी उपयुक्र्त ग्रंथ में विचार किया है। यानी पूरे सौंदर्यशास्त्र तक परिधि का विस्तार है। ग्रंथ में प्रवेश करते ही पाठक यह समझ लेता है कि योजना की एक पूरी पद्धति है, जो अलंकार के रूप में जाने-पहचाने से बहुत व्यापक है। इतनी व्यापक है कि कोई आधुनिक कुंतक यहाँ से संकेत पाकर एक वक्रोक्ति सिद्धान्त की तरह एक नये सिद्धान्त को रच कर कह सकता है आत्मा काव्यस्य।’ डॉ. कुलश्रेष्ठ लिखते हैं ‘कामायनी और पद्मावत को अन्योक्ति कहा जाये या समासोक्ति कहा जाये, यह विवाद का विषय हो सकता है परन्तु दोनों ही महाकाव्य श्रीष्ट पद्धति का परिणाम हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।’ पृ. १६
तात्पर्य यह कि अन्योक्ति और समासोक्ति अलंकारों के मूल में कोई तत्त्व ही है। डॉ. कुलश्रेष्ठ ने इस पुस्तक में विषयक पूरे शास्त्रार्थ को समेट लेने का यत्न किया है। उसी तहत वह भामह से आरंभ कर पण्डितराज तक अठारह विचारकों के लक्षण पर विचार करते हैं और उन्हें एक-दूसरे के आलोक में रखते हुए इस तरह विश्षण करते हैं कि पूरे काव्यशास्त्र को असमग्र रुप से
पढने वाले पाठक के समक्ष का सारा विमर्श हस्तामलक की तरह अवबोध्य हो जाता है। इन काव्यचिंतकों के लक्षण की परिपुष्टि में उनके द्वारा गृहीत प्रायः समस्त उदाहरणों की व्याख्या पुस्तक में समाहित है। ग्रंथ का दूसरा अध्याय संस्कृत काव्यशास्त्र में विकीर्ण चिंतन को उसके साथ जुडे सांगोपांग विमर्श के सहित अपनी समझ के आलोक में स्थापित करता है और ऐसा उसी व्यक्ति के लिए संभव है, जो इन ग्रंथों का नैष्ठिक अध्येता होने के साथ इस विमर्श के अन्तस्तल में प्रविष्ट होने के लिए अपेक्षित सारस्वत शक्ति रखता हो। यक मीमांसा स्पष्ट तो है ही, विशेषता यह है कि वह पूर्ण भी है। क्योंकि प्रत्येक विचारणीय स्थल पर ने केवल प्रशन उठाये हैं, अपितु उन्हें समाहित करने का प्रयास भी हुआ है। लेखक अपने विवेच्य का विश्षण तक ही सीमित नहीं है, अपितु अपने विवेच्य के आधार सामग्री को भी पाठक के सामने ज्यों की त्यों रखने को भी कृतसंकल्प हैं। वह एक तरह से श्रेष संबंधी पूरी सामग्री की एक संहिता, एक संकलन भी हिन्दी पाठकों के लिए उपलब्ध करवाते हैं, जिससे उन मनीषियों के लिए बडी सुविधा हो जाती है, जो इसे पूरे प्रपंच को उसके मूलरूप में जानना चाहते हैं। श्श्रेष से जुडे शास्त्रार्थ को लेखक सीधे ही उठाते तो विचार के क्षेत्र में वह अपनी इस क्षेत्र इस क्षेत्र की शक्ति के बल पर अधिक केंद्रित हो सकते थे। यहाँ विवेचन को हिन्दी में प्रस्तुत करने के बाद वह जो टिप्पणियाँ देते हैं, वे निर्भ्रान्त और सारवान् होती है। महिमभट्ट के सारांश में के बारे में बहुत सी सूक्ष्मता एकत्र हो उठी है। ग्रंथ का चौथा अध्याय हिन्दी के २१ काव्यशास्त्रियों के लक्षण और उदाहरण पर विचार है तो पाँचवें अध्याय में अन्य अलंकारों के साथ श्रेष के संबंध पर मंथन है। छठे अध्याय में सामायिकता, दुराव आदि के से संबंध पर सामान्य विचार है। जबकि पुस्तक के तीसरे अध्याय में जुडे शास्त्रार्थ, बहस के जो विषय हैं, उन पर विचार हुआ है। उपमेयोपमेय, एक प्रयत्नोच्चार्यमाणता, सभंगता-असंभगता, धर्म-धर्मी, की स्वतंत्र-आश्रित स्थितियाँ, आभासकता-अनुप्रसाणकता, भाषा , के संदर्भ में वाच्यार्थ-व्यङ्ग्यार्थ की स्थिति आदि विषयों को समटते हुए विचार की ओर लेखक प्रवृत्त हुए हैं।
श्रेष को जो चिंतन अभी उपलब्ध है, उसका क्रमिक विकास हुआ है। भामह श्रेष की उत्पत्ति रूपक से मानते हैं और उनका श्रेषचिंतन रूपक से श्रेष को अलगाना है। दण्डी श्रेष का स्वतंत्र सत्ता मानते हैं और वह उसका आत्मस्वरूप एक प्रयत्नोच्चार्यमाणता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उद्भट दण्डी द्वारा किये गए लक्षण की दिशा में अपने को केद्रित कर लेते हैं और उस कारण वह श्रेष का निर्दुष्ट लक्षण दे पाते हैं
एकप्रयत्नोच्चार्याणं तच्छायां चैव बिभ*ताम्।
स्वरितादिगुणैर्भिन्नैर्बन्धः श्ा*ष्टमिहोच्यते।।
अलङ्कारान्तरगतां प्रतिभां जनयत् पदैः।
द्विविधैरर्थशब्दोक्तिविशिष्टं तत् प्रतीयताम्।। (४.१-१०)
भट्ट प्रतिहारेन्दु ने इस एकप्रयत्नोच्चार्यमणता को अपने व्याख्यान में अधिक स्पष्ट किया हैश्रेष का अर्थ ‘दो विभिन्न शब्दों को समानोच्चारण के तंत्र से बांधना’ है। वामन के पूरे काव्यशास्त्र चिंतन के तीन बीज हैं- शब्द, अर्थ और अलंकार। उन्होंने श्रेष को इन तीनों स्तरों पर पाया है और शब्द के स्तर वह मसृणत्व गुण है तो के स्तर पर घटना नामक गुण। अलंकार के स्तर पर वह भामह और दण्डी दोनों को संगम करते हुए उसे रूपक और एकप्रयत्नोच्चार्यता दोनों से जोडते हैं। रुद्रट के विवेचन को इस ग्रंथ में लगभग पचास पृष्ठ मिले हैं। रुद्रट के श्रेष के आठों प्रकारों को प्रस्तुत कर उनके पारस्परिक भेद की सार्थकता के आधार पर परीक्षा की गयी है। इसी के चलते उन्होंने भाषा श्रेष को तो खारिज किया गया कि उसमें श्रेष की आधारभूत दो शर्तों में से एकप्रयत्नोच्चार्यमाणता तो है, किन्तु दूसरी अनेकार्थता रूपी नहीं है। डॉ. कुलश्रेष्ठ प्रश्नो को अपने ग्रंथ में उठाते हैं, जो कि किसी तत्त्व के स्वरूप उद्घाटन के लिए आवश्यक है। रुद्रट के अधिक नामक श्रेष भेद पर इनकी टिप्पणी हैः
‘‘अधिक श्रेष का यह लक्षण एक तो अविशेष श्रेष के साथ इसके अन्तर की स्पष्टता की माँग करता है और दूसरे ‘अधिक’ शब्द की व्याख्या भी अपेक्षित है।----अधिक श्रेष में यह दूसरा अर्थ प्रथम या प्राकरणिक अर्थ की अपेक्षा ‘अधिक’ होता है। ‘अधिक’ से क्या तात्पर्य है, यह इस लक्षण से स्पष्ट नहीं होता।’’ पृ. ८७
‘प्रेम्णा निधाय मूर्धनि वक्रमपि बिभर्ति यः कलावन्तम्। भूतिं च वृषारूढः स एव परमेश्वरी जयति।। (‘पे*म से जो रखे हुए है माथे पर/ टेढे भी कलावन्त को/ और है लिए हुए विभूति को/ बस, उसी की जय हो/ वृषारूढ परमेश्वर की।’) उदाहरण में प्रकरण उस धर्मात्मा राजा का है, जो कलाकरों को उनके टेढेपन के बावजूद लिए सम्मान देता है, किन्तु साथ ही टेढे चाँद के सिर पर चढा रखने वाले परमेश्वर शिव का अप्राकरणिक अर्थ भी है।
नमिसाधु कहते हैं कि यहाँ प्राकरणिक अर्थ में राजा मुनष्य कोटि को है और शिव देवकोटि के, अतः प्राकरणिक अर्थ से अप्रकारणिक अर्थ की अधिकता है। डॉ. कुलश्रेष्ठ कहते हैं कि यहाँ तो निर्णय करना सरल है, किन्तु सर्वत्र ऐसा निर्णय स्पष्टता के साथ नहीं किया जा सकता। जहाँ प्राकरणिक दोनों के विशेषण विशेष्य समान हो, अविशेष हो, वहाँ अविशेष श्रेष, जहाँ दोनों के विशेषण विरुद्ध हो, वहाँ विरुद्ध श्रेष जहाँ दो संबद्ध अर्थों का रस भिन्न हो, वहाँ वक्र श्रेष होता है। जहाँ विशेषण विरुद्ध नहीं हो, किन्तु भिन्न हों तथा दूसरा अर्थ पहले की अपेक्षा अधिक हो, वहाँ अधिक श्रेष होता है। उनका दूसरा प्रश्न जो इसके स्वरूप को समझने की दृष्टि सके नितांत प्रशंसनीय है, यह है कि जब अधिक श्रेषके स्वरूप का निर्णय प्राप्त होने वाले अर्थों के न्यूनाधिक्य से किया जाना है तो इसके लक्षण में विशेषणों की शर्तें क्यों रखी है। इन दो महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के साथ ही तीसरा प्रश्न यह भी है कि अप्रकृत अर्थ की अधिकता से अधिक श्रेष है तो उसकी न्यूनता पर कौनसा श्रेष होगा, या वह न्यून श्रेषक्यों नहीं माना गया?
लेखक वक्र श्रेष जिसकी संज्ञा पर उन्हें आपत्ति है, के विवेचन में भी इस अधिक को खींच ले आते हैं। वहाँ ‘आक्रम्य मध्यदेशं विदधत्संवाहनं श्ाृङ्गार। दोनों अर्थों में रसभिन्नता से होने वाले वक्र श्रेष में अप्राकरणिक अर्थ में रसराज की उपस्थिति होने पर प्रशन उठाया गया है कि इसे अधिक श्रेष क्यों नहीं कहा जाए? डॉ. कुलश्रेष्ठ की सारी दृष्टि रुद्रट के आधिक्य के आधार को खोजने में लगी है और उनकी दृष्टि में यह आधिक्य अबूझ पहेली है। डॉ. कुलश्रेष्ठ की रुद्रट के संदर्भ में एक सैद्धान्तिक आपत्ति है कि श्रेष का मूलाधार ही जब दोनों अर्थों का वाच्य होना है तो श्रेष के वे भेद श्रेष कसे होंगे, जिन्हें वे ‘गम्य’ कह रहे हैं। असंभव नामक श्रेष जब व्यञ्जना है तो वह श्रेष कैसे रह पाएगा? रुद्रट के विवेचन के बारे में लेखक का अपना वक्तव्य हैः ‘हमने अपने उपयुक्र्त विवेचन में यह दिखाने का प्रयास किया है कि इन भेदों की सीमाएँ स्पष्ट नहीं है। एक भेद दूसरे में समाहित हो जाता है।’ पृ. ९८
डॉ. कुलश्रेष्ठ जी की मान्यता स्पष्ट है और वह अलङ्कार मर्मज्ञों के उत्तरवर्ती विचार को आमंत्रित करती है। डॉ. कुलश्रेष्ठ नौ रसों में किसी के बडे या छोटे की कल्पना की है, वैसी काव्यशास्त्र की कोई स्वीकृति है या नहीं अथवा श्ाृंङ्गार की रसराजता अर्थवाद है या कोई सिद्धांन्त, इसे जाँच लेना उचित है। यद्यपि शब्दतः श्ाृंङ्गार की सर्वोपरिता रुद्रट के ही वक्तव्य के रुप में ही उदाहृत की जा सकती है और उसे नमिसाधु के टिप्पण ‘सर्वरसेभ्यः श्ाृङ्गारस्य प्राधान्यं प्रचिकटयिषुराह’ से प्रतिपुष्ट भी किया जा सकता है, किन्तु तात्त्विक रूप में इस पर विचार अभीष्ट है। डॉ. कुलश्रेष्ठ जी के लिए अज्ञात नहीं है कि रुद्रट और उनकी प्रतिभा का काव्यशास्त्र में कितना ऊँचा कद है। रुद्रट के श्रेष विवेचन के बारे में (देखें पृ.१०१) में उनके योगदान को मुक्तकण्ठ से कहा है। डॉ. कुलश्रेष्ठ के अनुसार रुद्रट ही हैं, जिन्होंने श्रेष को उसकी विराटता में साक्षात् और प्रतिपादित किया। भाषा की ईकाईयों में श्रेष की ‘सूक्ष्म उपस्थिति का अनुभव कराने वाला उनका विवेचन प्रथम ही’ है और रुद्रट ने ‘बडी ही विद्वता से इस ओर ध्यान खींचा कि श्रेषालंकार को विविध कोणों से देखा जा सकता’ है।
आनंदवर्धन के सामने अलंकार और ध्वनि दो पक्ष हैं और वह ध्वनि को प्रातिष्ठित करते हैं। जबकि रुद्रट को काव्यविवेचन के रूप में किसी तरह का द्वन्द्व नहीं है। वह एकनिष्ठ हो अलंकार विचार करते हैं। आनंदवर्धन को तो सारा चिंतन शब्दशक्तियों पर टिका हुआ है और वह अलंकारों को भी उस दृष्टि से परखते, रखते हैं। उनका श्रेष लक्षण हैः
वस्तुद्वये च शब्दशक्त्या प्रकाशमाने श्रेष
वस्तु मात्र का जहाँ अभिधा से ही बोध होता हो, वहाँ श्रेष अलंकार है। श्रेष अलंकार को अभिधा से बाँधने वाले पहले व्यक्ति आनंदवर्धन हैं, उनसे पहले यह विचार नहीं है। आनंदवर्धन के सामने अलंकार से अतिरिक्त व्यञ्जना की सिद्धि की चुनौति थी। जब अर्थान्तर को उन्होंने व्यञ्जना से प्राप्य बताया तो स्वाभाविक रूप से श्रेष के पूरे क्षेत्र को हडप जाने रूप आपत्ति आती। तब उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अर्थान्तर यदि वाच्य है तो ही श्रेष का क्षेत्राधिकार है, अन्यथा वह श्रेष न होकर ध्वनि है। आनंदवर्धन अलंकारों की गरिमा और महिमा दोनों के अभिज्ञ हैं और उसी के चलते वह अपने पूर्ववर्ती धुरंधर अलंकार चिन्तक उद्भट का बडे सम्मान से उल्लेख करते हैं। आनंदवर्धन श्रेष की अभिधा को पहचानते हैं और इस पहचान को उनके परवर्ती अलंकार चिंतकों ने स्वीकार की है। वाच्य से निष्पन्न होने वाले काव्यार्थ की मीमांसा को तो आनंदवर्धन आदर से ज्यों का त्यों स्वीकार कर चले हैं और उस क्षेत्र में हस्तक्षेप को वह तैयार ही नहीं हुए। अतः श्रेष क्या, किसी भी अलंकार के बारे में उसके सामान्य-विशेष को लेकर कोई चर्चा नहीं करते हैं, यदि उनके जैसा महामेधावी वैसा कर लेता तो अलंकार और वाच्य दोनों ही धन्य हो उठतें। अस्तु। डॉ. कुलश्रेष्ठ जिस विचारक के लक्षण को सबसे अधिक सधा हुआ मानते
हैं, वह विचारक इन्हीं आनंदवर्धन के साथ टकराहट कारण महिमा को प्राप्त होने वाले महिमा भट्ट हैं। महिमाभट्ट मानों आनंदवर्धन के शेष उत्तरदायित्व को पूर्ण करते हैं। महिमभट्ट के लक्षण पर डॉ. कुलश्रेष्ठ की टिप्पणी हैः ‘‘महिम भट्ट का श्रेष लक्षण अन्य काव्यशास्त्रियों की अपेक्षा अधिक सधा हुआ और श्रेष अलंकार में अपेक्षित विशेषताओं का समाहार करता है,----दोनों प्रकार के श्रेष में जिस तत्त्व की अनिवार्यता मानी है, वह है अन्य अर्थ के कारण का निबंधन।’’ पृ. १२३
डॉ. कुलश्रेष्ठ की ने श्रेष विवेचन में महिमभट्ट की महत्ता का योग्य कथन किया है। वास्तव में महिमभट्ट ने श्रेष को सर्वांगतया लक्षित कर लिया है। बस, इतनी-सी टिप्पणी करना आवश्यक लग रहा है कि यहाँ पर महिमभट्ट आनंदवर्धन के सबसे योग्य भाष्यकार सिद्ध होते हैं और श्रेष पर उनकी दृष्टि के अनुसार सर्वथा सटीक लक्षण कर पाने में सफल होते हैं। अन्य अर्थ के कारण का निबंधन श्रेष के शतप्रतिशत वाच्यता को सुनिश्चित करता है। सधा हुआ इसलिए है कि वह अन्य अलंकारों से सर्वथा अलग रूप से प्रतिपादित हो गया है- दो वस्तुओं के अन्यूनातिरक्त सादृश्य को शब्दमात्र से कह जाने से। विशेषणों के दोनों अर्थों में समान रूप से घटित होने रूप अन्यूनातिरक्तता के मानदंड के आधार पर महिमभट्ट ने ‘इह चटुलतया.’ में न्यूनत्व तो ‘दिशि दिशि.’ में अधिकत्व रूप दोष बताया तो हमारे समकाल के महीयान् काव्यशास्त्री आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी ने इन दोषों को उलट कर बता दिया। डॉ. कुलश्रेष्ठ इस विवाद में हस्तक्षेप करते हैं और अपना दृष्टिकोण रखते हैं।
भोज के अलंकार चिंतन में अपने तरह की एक अलग व्यवस्था है, अतः उन्हें विशेष रूप से पढे जाने की आवश्यकता है। डॉ. कुलश्रेष्ठ जी ने उनके सरस्वतीकण्ठाभरण को तो उद्धृत किया है, किन्तु श्ाृंङ्गारप्रकाश वह देख नहीं सके हैं। श्रेष पर भज की जो मान्यताएँ उन्होंने रखी हैं, वे सरस्वतीकण्ठाभरण से ही हैं।
भोज के बारे में यह जान लेना चाहिए कि उनके लिए श्रेष नाम वाले दो अलग-अलग अलंकार हैं। एक है वस्त्र-मालादि के सदृश शब्दालंकार श्रेष रूप बाहरी अलंकार। इसका लक्षण श्ाृंङ्गारप्रकाश में है- ‘द्व्योस्तन्त्रेणाभिधानं श्रेष । होगा अभिधा से अधिधान और वह निर्भर रहेगा तन्त्र पर। एक तन्त्र एक है। भोज ने इसके छह भेद ही माने हैं। वर्ण और लिङ्ग के श्रेष रूप भेद नहीं है। भोज का पहला श्रेष शब्दालंकार है, जबकि दूसरे श्रेष को उन्होंने अर्थालंकार में नहीं रखा है। भोज उन अलंकारों को उभयालंकार कहते हैं, जो होते तो हैं मुख्यतः शब्द के किन्तु अर्थ तक पहुँच जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे काजल बाहर की वस्तु होकर आभ्यंतर हो जाता है। इसके लिए उनका लक्षण है- ‘एकपदेनानेकार्थाभिधानं श्रेष । अभिज्ञ अध्येता यहाँ उस चर्चा को कर सकते हैं, जो यहाँ एक ही पद से अनेक अर्थों के अभिधान से जुडी है। यह भी छह प्रकार का है। इसके भेद समझने योग्य हैं कि वे पद, क्रिया और कारक की भिन्नता और अभिन्नता के आधार पर होते हैं। डॉ. कुलश्रेष्ठ जी ने सरस्वती कण्ठाभरण के आधार पर विवेचन किया है, श्ाृङ्गारप्रकाश में भी वह वही है, शब्दावली जरूर अन्य है।
मम्मट हमारे सुपठित हैं, उनके बाद रुय्यक के प्रश्नो को उठाया है, जो उचित है। रुय्यक की मान्यताएँ अलंकार के क्षेत्र में बहुत ही महत्त्व की हैं। रुय्यक ने भेद, अभेद, भेदाभेद के आधार पर प्रस्तुताप्रस्तुत के संबंध को बडी गहराई से उभारा है। इस संबंध को वह ‘सादृश्य’ कहते हैं। इस सादृश्य का अर्थ है- प्रस्तुताप्रस्तुत के मध्य का साधर्म्य और वैधर्म्य। श्रेष को रुय्यक ने भेदाभेद प्रधान अलंकार माना है। यानी प्रस्तुत अप्रस्तुत से जितना समान, उतना ही असमान। यह भाव जब होगा, तब बनने वाले अलंकारों में जो एकप्रयत्नोच्चार्यमाणता के आधार पर बनता है, वह श्रेष है। अब मीमांस्य यह है कि क्या रुय्यक का स्वयं का विवेचना और इसमें प्रस्तुत उदाहरण उसके इस मथितार्थ के अनुरुप है। बाद में हेमचन्द्र, वाग्भट, विद्यानाथ,
विश्वनाथ का विवेचन तो क्रमिकता के लिए ही है। श्रेष के बारे में इनकी कोई मौलिक उपस्थापना नहीं है।
अप्पय दीक्षित और पण्डितराज महान विचारक हैं और दोनों के बीच बडी तीखी टकराहट है। अन्य लोग जहाँ शब्दावली तक दोहराते हैं, वहाँ ये दोनों मनीषी विचार को आगे बढाते हैं। अप्पय दीक्षित के लिए वह श्रेष है, वर्ण्य-अवर्ण्य दोनों पर आश्रित हो और नाना अर्थों का आश्रय हो। यहाँ दीक्षित के जो भेद एवं उदाहरण हैं, उन्हें उनके कनिष्ठ समकालीन पण्डितराज ने परखा है। पण्डितराज के लिए ‘एक श्रुति से अनेक अर्थों का प्रतिपादन’ श्रेष है। पण्डितराज के भेद भी दीक्षित की तरह ही नये हैं। दीक्षित ने प्रकृतानेक की श्रेषष्टता के साथ प्रकृताप्रकृतानेक की श्रेष्टता को मान्यता दी। औचित्य का प्रशनो तो अपनी जगह है ही, परन्तु उनके चिंतन की प्रत्यग्रता और आचार्य साहस की सराहना तो करणीय है ही। अप्पय दीक्षित की श्रेष पर जो मान्यताएँ हैं, वे मौलिक हैं। वह दोनों अर्थों को वाच्य मानते हैं, किन्तु उन दोनों से होने वाले सौन्दर्य को ध्वनित मानते हैं। विनम्रता से यह कहना है यहाँ कि पण्डितराज जो गंभीर शास्त्र रच पाए, उसमें अप्पय दीक्षित का चिंतन आधार पीठ बना है। विचार के क्षेत्र में तो प्रायः वही सबसे बडा भाष्यकार होता है, जो कि विरोधी है। पण्डितराज अपने मूल में इसी प्रकृताप्रकृत को लेकर श्रेष का भेदन करते हैं। डॉ. कुलश्रेष्ठ पण्डितराज पर अपना विवेचन समाप्त करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार ‘संस्कृत काव्यशास्त्रके विकास में पण्डितराज जगन्नाथ अन्तिम कडी माने जाते हैं।’ बहुत पहले लिखी गई यह पुस्तक २०१७ में प्रकाशित है। मैं समझता हूँ कि आज उनका यह मन्तव्य नहीं होगा। पण्डितराज के बाद में विश्वेश्वर पण्डित और उनका अलंकार कौस्तुभ उल्लेखनीय है, जो कि इस पुस्तक में समाविष्ट नहीं हो सका है। अलंकार चिंतन में उनका बडा योगदान है। विश्वेश्वर पण्डित का श्रेष लक्षण है- उभयविशेष्यान्वितयोरेकेन प्रोक्तिरर्थयोः श्रेष ।
भेद तो उन्होंने वे ही किए हैं वर्ण आदि के आठ।
सभङ्ग अभङ्ग के रूप में उनके दो वाक्य हैंः ‘अभिन्नानुपूर्वीकशब्दप्रतिसन्धानबोध्यान्ताकत्वं सभङ्गत्वम्। समानान्नानुपूर्वीकशब्दप्रतिसन्धानबोध्यान्ताकत्वं सभङ्गत्वम्। हमारे समय में अभिराज राजेंद्र मिश्र ने अभिराजयशोभूषण में ‘अभिधान बह्वर्थानां श्ा*ष्टैर्यत्र पर्दर्मतम्’ कह कर श्रेष का लक्षण किया गया है तो रेवाप्रसाद द्विवेदीह ने अलंकारों के भी वाच्य नहीं होने का तर्क उपस्थापित किया है।
(४)
उपयुक्र्त अठारह काव्यशास्त्र विमर्शकों के लक्षणों की पृष्ठभूमि में कौनसी दृष्टि काम कर रही है, इसे भी बखूबी आलोचित किया है। कुछ की दृष्टि शब्द की अनेकार्थता पर है तो कुछ उपमेयोपमान भाव से सोच रहे हैं। इस विवेचन में एकप्रयत्नोच्चार्यमाणता, तन्त्र जैसी परिभाषाएँ भी शामिल हुई है तो श्रेष के शब्द तथा अर्थ के अलंकार के रूप में मतभेद का भी उभारा गया है। यही नहीं, अपितु धैर्य के साथ उपमेयोपमान भाव और एकप्रयत्नोच्चार्यमाणता के श्रेष के साथ संबंध की स्थिति को जाँचा गया है और अपनी ओर से निर्णय भी किया गया है। डॉ. कुलश्रेष्ठ का मन्तव्य है कि श्रेष में प्रस्तुत-अप्रस्तुत भाव महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अनिवार्य तत्त्व
नहीं हैः
श्रेष अलंकार अपने मौलिक रूप में प्रस्तुत अप्रस्तुत भाव से स्वतंत्र है। इसका सबसे बडा प्रमाण है भाषा श्रेष की स्वीकृति। यदि भाषा श्रेष को श्रेष का भेद स्वीकार किया जाता है, जैसा कि रुद्रट, मम्मट और भोज ने तो किया भी हैं तो श्ा*ेषालंकार के क्षेत्र में प्रस्तुत अप्रस्तुत भाव की अनिवार्यता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। इस भेद में शाखला परिवर्तक और चूर्णक जैसे पदभंग के सभी प्रकार तो प्राप्त हो जाते हैं परन्तु अप्रस्तुत भाव के लिए कहीं भी कोई अवकाश नहीं है। अतः के लक्षण का आधार प्रस्तुत अप्रस्तुत आधार है, यह सिद्धान्त नहीं हो सकता।’ पृ.२३५
डॉ. कुलश्रेष्ठ यह मानते हैं कि प्रस्तुत अप्रस्तुत के आधार पर श्रेष का लक्षण करने वाले आचार्य वास्तव में तो उसका लक्षण नहीं करके रूपक, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति से उसके अंतर को ही रेखांकित कर रहे हैं। डॉ. कुलश्रेष्ठ की मान्यता हैः ‘वह ही लक्षण श्रेष का लक्षण स्वीकार किया जा सकता है जो एकप्रयत्नोच्चार्यमाणता से उत्पन्न अनेकार्थता को दृष्टि में रखकर किया गया हो।’ (पृ. २३८) परन्तु डॉ. कुलश्रेष्ठ जानते हैं कि भाषा श्रेष को यहाँ तर्क के रूप में प्रस्तुत करना कमजोर पक्ष है, अतः उन्होंने ‘यदि’ का अवलंब लेकर सशर्त निष्कर्ष निकाला है। वह पहले ही लिख चुके हैं कि इस भेद को स्वीकार नहीं किया गया और विश्वनाथ ने इसे भाषासम के नाम से भिन्न अलंकार के रूप में प्रतिपादित किया। डॉ. कुलश्रेष्ठ स्वयं इसे उचित मानते हैं। यहाँ हम उनके पक्ष के बारे में भ्रान्त हो जाते हैं।
प्रस्तुत-अप्रस्तुत भाव आधार लक्षण करने वाले आचार्यों ने प्रस्तुत अप्रस्तुत की जगह शब्द प्रयोग विशेष्य विशेषण का क्यों करते हैं, इस बात को स्पष्ट करते हुए यह ग्रंथ श्रेष का विश्ष करने में पूरी तरह सफल हुआ हैः ‘किसी अप्रस्तुत विधान की स्थिति में प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों ही विशेष्य कहलाते हैं (इस पक्ति को अन्त में इस तरह भी पढा जा सकता है कि ‘किसी अप्रस्तुत विधान की स्थिति में प्रस्तुत और अप्रस्तुत दो तरह के विशेष्य होते हैं।), उपमेय रूप विशेष्य प्रधान होता है और उपमान रूप विशेष्य अप्रधान, अतः लक्षण में ‘विशेष्य’ और ‘विशेषण’ शब्दों के प्रयोग से यह स्थिति सामने आ सकी है कि प्रथम स्थिति में जहाँ विशेष्य श्ा*ष्ट हों, वहाँ विशेषणों की श्ष्टता या तो अप्राकरणिक होगी या केवल प्राकरणिक।......इस स्थिति का तात्पर्य यह है कि कवि का मन्तव्य श्ा*ष्ट पदों के माध्यम से एक ही वर्ण्य विषय के दो-दो उपमान प्रस्तुत करना है और इन दोनों ही उपमानों के विशेषण भी श्ा*ष्ट ही होंगे। वे विशेषण उपमानपरक होंगे, उपमेयपरक नहीं। यह कहना ठीक होगा कि ये
विशेषण उपमान को उफत करने के माध्यम से ही उपमेय के उपकारी होंगे, सीधे-सीधे नहीं।’ पृ. २३६
एक अन्य महत्त्वपूर्ण टिप्पणी प्राप्यमाण स्वरूपों के सर्वेक्षण से संबद्ध पठनीय हैः
‘......श्रेष के ऐसे उदाहरण जहाँ विशेषणों के उभय अर्थ प्राकरणिक हैं, बहुत कम प्राप्त होते हैं। ये सभी वे उदाहरण हैं,जो श्रेष कि स्वतंत्र सत्ता को सिद्ध करते हैं। काव्यशास्त्र में इसी निमित्त उद्धृत किए गए हैं। इसी प्रकार ऐसे उदाहरण भी बहुत कम हैं, जहाँ विशेषणों के उभय अर्थ अप्राकरणिक हैं। श्ा*ेषालंकार का जो स्वरूप काव्य में बहुलता के साथ पाया जाता है, वह है-जहाँ प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों का अभिधात्मक रूप से कथन है और विशेषण उभयपक्षीय हैं। श्रेष का यही रूप अन्य अलंकारों के साथ मिलकर अनेकविध संरचनाएँ प्रस्तुत करने में समर्थ है। निष्कर्ष यह है कि उपमेयोपमान भाव श्रेष के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अनिवार्य नहीं है। जो अनिवार्यता है, वह है समानता अर्थात उभयार्थ की एक शब्द रूप अभिव्यक्ति।’ पृ.२३६
लेखक एकप्रयत्नोच्चार्यमाणता से उत्पन्न अनेकार्थता को ध्यान में रख के पक्षधर हैं, यद्यपि वह जानते हैं कि सभंगपद श्रेष में यह स्थिति गडबडा जाती है। वास्तव में यहां अधिक विश्रेषण और काव्यशास्त्र में उदृत उदाहरणों की सीमा से बाहर जाकर प्रबंधों में सभंगपद श्रेष के कारण उत्पन्न होने वाले सौन्दर्य को अधिक गंभीरता से परखने की आवश्यकता है। काव्यपाठ के समय यह सौन्दर्य किस पर अवलंबित करता है, यह अनुसन्धेय है।
श्रेष के बनने की चार स्थितियाँ होती है। विशेष्य-विशेषण दोनों के श्ा*ष्ट होने पर उनसे दोनों अर्थ प्राकरणिक या अप्राकरणिक होने पर दो तरह का श्रेष हुआ और तीसरा बनता है केवल विशेषण के श्ा*ष्ट होने और दोनों विशेष्यों का शब्दशः कथन होने पर। इन तीनों पर काव्यशास्त्र एकमत है। चौथी स्थिति पर विवाद है। पहले दो की तरह जब विशेषण-विशेष्य दोनों श्ा*ष्ट तो हों किन्तु दोनों अर्थों में एक प्रकरण से जुडा हो और दूसरा अप्राकरणिक हो तो क्या उसे श्ा*ेष कहना चाहिए? प्रकरण का अर्थ तो वाच्य है, किन्तु अप्राकरणिक तो व्यञ्जना से प्राप्त होता है। यहाँ आनंदवर्धन और उनके अनुगामी विचारकों ने इसे श्ा*ेष भी कह देते हैं और अलंकार को ध्वनित भी बता देते हैं। अप्पय दीक्षित जैसे प्रतिभाशाली व परिपक्व चिंतन धनी काव्यशास्त्री एक तरह के विशिष्ट सौन्दर्य को श्ा*ेष कहने के पक्ष में है। डॉ. कुलश्रेष्ठ को पण्डितराज का तर्क
ज्यादा उचित प्रतीत हुआ, जो इसे समासोक्ति के अपर भेद के रूप में इसे परिगणित किए जाने से जुडा है। यह टकराहट काव्यचिंतन के दो अलग-अलग दृष्टिकोण की टकराहट है।
आनंदवर्धन और रुद्रट दो विपरीत धाराएँ है। रुद्रट की अध्यायषोडशी में शब्दवृत्तियाँ अनुपस्थित हैं और वह उनके आधार पर न तो कोई विचार करते हैं और न कोई विभेदन। उत्तरवर्ती परिष्कारों के निकष पर रुद्रट का यथोचित स्वीकार अस्वीकार किया जा सकता है, किन्तु उन्होंने जो अपने मानदंड लिए हैं, उनके आधार पर वह प्रतिज्ञाच्युति के दोषी नहीं हो सकते। यहाँ रुद्रट के श्ा*ेष लक्षण को पुनः देखने की आवश्यकता है। ‘युगपदनेकं वाक्य यत्र विधीयते स श्ा*ेषः’ रुद्रट के लक्षण को हम अस्वीकार कर सकते हैं, किन्तु उनके अपने लक्षण की सीमा म दो वाक्य, जिनका अपनी अपनी भाषा में अलग-अलग अर्थ है, उच्चरित होने भाषाश्ा*ेष सर्वथा उपपन्न है। वस्तुतः रुद्रट की दृष्टि यहाँ लोक पर टिकी हुई है और वह लोक की बोली/अन्य भाषा और काव्य की भाषा के श्ा*ेष को अलंकार के रूप में ले रहे हैं। विश्वनाथ ने इसे महत्त्व तो दिया किन्तु श्ा*ेष को काव्य की अपनी भाषा तक सीमित रखने की रुद्रट के उत्तरवर्ती और अपने पूर्ववर्ती विचारकों की दृष्टि के अनुरूप नये अलंकार के रूप में स्थापित किया।
लेखक इन सभी विचारकों को अलंकारवादी और ध्वनिवादी खेमों में विभाजित कर विश्ा*ेषण करने की अपेक्षा उनके कालक्रम की स्थिति को आधार बनाया है। इससे विचार के क्षेत्र में कालिका विकास का क्रम का ज्ञान होता है और पूरा काव्यशास्त्र समाहृत हो जाता है। इस पूरी विवेचना को करना बडे ही धैर्य और प्रखर प्रातिभ बल की अपेक्षा रखता है, उसके लिए लेखक अभिनंदनीय है, परन्तु श्ा*ेष के संदर्भ में ध्वनिवादी मानदंडों पर अलंकार संप्रदाय की स्थापनाओं और लक्षणों को परखने की अपेक्षा ध्वनि और अलंकार की वैचारिकताओं के अलग अलग कसौटी पर उनका स्वायत्त विवेचन करणीय है। प्रकृत ग्रंथ श्ा*ेष के बारे में पूरी समझ दे सकने में सफल रहा है। श्ा*ेष अभिधा का अलंकार है और उसकी अन्य अलंकारों में सौंदर्यपूर्ण उपस्थिति होती है। यह ग्रंथ हिन्दी के उन समकालिक काव्यों को इस निकष पर कसने का आमंत्रण देता है जो संवेदना के स्तर पर महनीय माने गए हैं।
हिन्दी में काव्यशास्त्र चिंतन की परंपरा में यह अभिनंदनीय योगदान है।
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