पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी : जीवन, व्यक्तित्त्व तथा कृतित्त्व

डॉ. पीयूष गुलेरी


हिन्दी-साहित्य की उन्नीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण का युग युगान्तरकारी परिवर्तनों परिवर्द्धनों और नव-नव उत्थानात्मक दृष्टियों से सदैव-सदैव के लिए स्मरणीय रहेगा। इस कालखण्ड में भाषा, साहित्य और रचना-शिल्प की दृष्टि से तो उल्लेखनीय समृद्धि हुई ही, साथ-साथ साहित्य की विभिन्न विधाओं के पदापर्ण से हिन्दी का विपन्न साहित्य भी सम्पन्न हुआ।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक साहित्योत्थान में पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी का नाम सर्वतोभद्र प्रतिभा के इने-गिने प्रथम पंक्ति के साहित्य-सेवियों में लिया जाएगा। गुलेरी जी उन हिन्दी-प्रेमियों में से हैं जिन्होंने स्वभाषा की संगठनात्मक, प्रचारात्मक और रचनात्मक दृष्टि से भरपूर सेवा की। कदाचित् इसलिए उनकी गणना आधुनिक हिन्दी-साहित्य के कर्णधारों में होती है।
सन् १९६७-६८ ईसवी तक हिन्दी-साहित्य में पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी विशेषतया, कहानीकार और सामान्यतया निबंधकार के रुप में ही जाना जाता रहा है। उनकी तीन कहानियाँ, पुरानी हिन्दी और गुलेरी-ग्रन्थ में कतिपय संकलित निबंध ही ग्रन्थाकार रुप में उपलब्ध होते थे। गुलेरी जी की अमर कहानियाँ शीर्षक पुस्तक गुलेरी जी के कनिष्ट पुत्र शक्तिधर शर्मा गुलेरी द्वारा सरस्वती प्रेस बनारस से प्रकाशित हुई। इस कहानी संकलन में कहानीकार की तीन कहानियाँ ‘सुखमय जीवन’, ‘बुद्धू का काँटा’ तथा ‘उसने कहा था’ एवं संक्षिप्त प्रामाणित जीवनी प्रकाशित हुई।
पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा लिखित निबंधों का ग्रन्थाकार रुप श्री कृष्णानन्द जी संदाकत्व में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा सम्वत् २००० में निकला, जिसमें छोटे-बडे आकार के तैंतीस निबंध संकलित हैं। कृष्णानन्द जी का यह उद्योग तत्कालीन साहित्य-मनीषिय की सतत् प्रेरणा और गुलेरी जी के कृतित्त्व के संरक्षणार्थ संभव हुआ। इस संदर्भ में कृष्णानन्द जी के ये पक्तियाँ द्रष्टव्य है यह ग्रन्थ जिनके कृपापूर्ण प्रोत्साहन, प्रवर्त्तन, अनुग्रह और सद्भाव से सम्पादित हो सका है और यह पहला भाग प्रकाशित हो रहा है उनका कृतज्ञता पूर्वक स्मरण अब मेरा सुखद कर्त्तव्य है। स्वर्गीय बाबू जयश्ंकर प्रसाद जी ने मुझे इस आवश्यक कार्य के लिए प्रोत्साहित किया, डॉ. श्याम सुंदर दास जी ने अपने पास संकलित सामग्री देकर मुझे इसमें प्रवृत्त किया। इन दोनों महानुभावों की कृपा से ही नागरी प्रचारिणी सभा ने मुझे इसका संपादन सौंपने का अनुग्रह किया और स्वर्गीय गुलेरी जी के सुपुत्र पं. योगेश्वर शर्मा गुलेरी और शक्तिधर गुलेरी एम. ए. ने इसमें अपेक्षित सहमति तथा सहयोग का सद्भाव प्रदान किया।
‘पुरानी हिंदी’ शीर्षक ग्रंथ हिंदी के स्वनामधन्य विद्वान आचार्य विश्व नाथ प्रसाद मिश्र (तत्कालीन काशी प्रचारिणी सभा के साहित्य मंत्री) के संपदाकत्व म सम्वत् २००२ विक्रमी में नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने प्रकाशित करवाया। हिन्दी भाषा के विकासात्मक इतिहास एवं भाषा विज्ञान की दृष्टि से गुलेरी जी का यह प्रबंध हर प्रकार से बेजोड है, कदाचित् इसलिए वर्तमान में भी प्रासंगिक है। आचार्य विश्व नाथ प्रसाद मिश्र की यह टिप्पणी उद्धरणीय है ‘‘पुरानी हिंदी नाम बहुत सोच विचार कर प्रयुक्त किया गया है। पुरानी बंगला, पुरानी गुजराती, पुरानी मराठी आदि प्रयोगों का भ्रम मिटाने के लिए।............... इस सोपान पर आकर पुरानी हिन्दी में किस प्रकार प्रादेशिक प्रवृत्तियाँ स्फुट हो चली थीं, इसका परिचय इस प्रबंध के आधार पर स्वर्गीय आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने अपने ‘बुद्ध चरित’ की भूमिका में दिया है और हिन्दी की तीनों प्रधान उपभाषाओं - ब्रज, अवधी और खडी का पार्थक्य स्पष्ट किया है। यद्यपि अपभश की बहुत सी सामग्री इधर उपलब्ध हो गई है पर इसके जोड का दूसरा प्रबंध आज तक प्रस्तुत नहीं हुआ।’’
स्पष्ट है कि गुलेरी जी का ‘पुरानी हिन्दी’ प्रबंध हिन्दी भाषा एवं साहित्य का एक बेजोड प्रबंध है जो स्वंय में एक नया मील का पत्थर हैं। इस प्रकार इस प्रकाशित सामग्री के आधार पर ही आधुनिक हिन्दी साहित्य के आलोचकों ने नपी-तुली टिप्पणी-नुमा समीक्षाएं प्रस्तुत कीं।
पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के समग्र व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व को लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य विनय मोहन शर्मा और डॉ. पद्म सिंह शर्मा कमलेश की सतत् प्रेरणा, प्रोत्साहन और सहायता से गुलेरी जी के वंशज पीयूष गुलेरी ने सन् १९६७-६८ ईसवी में शोध कार्य में प्रवृत्त होकर सन् १९७३ ईसवी में कुरुक्षेत्र विश्वविधालय से पी.एच.डी. की उपाधि अर्जित की। गुलेरी जी के जीवन, व्यक्तित्त्व सम्बन्धी सामग्री जुटाने के लिए जयपुर, अजमेर, खेडती, इलाहबाद और बनारस की अनेक बार यात्राएँ की। इस कालावधि में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, गुलेरी जी के मित्रों, शिष्यों और साहित्यकारों से साक्षात्कार के दौरान बहुत से तथ्य, पाण्डुलिपियाँ, पत्र-साहित्य गुलेरी जी के सेवा पंजिका, गुलेरी जी की निजी गुप्त सेवा पंजिका तथा डायरियाँ आदि उपलब्ध हुए। इसके अतिरिक्त गुलेरी जी के गांव गुलेर (जिला कांगडा, हिमाचल प्रदेश) से उनकी पुत्र-वधु श्रीमती शकुंतला गुलेरी और बाद में पौत्र विद्याधर शर्मा की सहायता से गुलेरी जी विषयक कुछ दुर्लभ दस्तावेज भी मिले, जिनसे उनके व्यक्तित्त्व की महानता और कृतित्त्व की समग्रता को समझने में सहायता मिली। तत्त्कालीन समाज सेवी, राजनेता विद्वान, प्राचीन भारत के गौरव के संरक्षक, प्राच्य-संस्कृति के पुनरोद्धारक एवं संग्राहक और जाने-माने शिक्षा विद् पंडित मदन मोहन मालदीव तथा गुलेरी जी के मध्य व्यावहारिक पत्राचार में उन दोनों की प्रागाढ मैत्री और एक-दूसरे के प्रति स्नेह समर्पण, भली भाँति उजागर होती है।
पीयूष गुलेरी द्वारा ‘बीसवी’ शताब्दी का प्रारंभिक साहित्योत्थान और पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी शीर्षकांतर्गत शोध-प्रबंध गुलेरी जी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में सन् १९८३ ईसवी में श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व के नाम से ऋषभ चरण जैन एवं संतति, दरियागंज दिल्ली से प्रकाशित हुआ जो उनके समग्र व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व पर सर्वप्रथम प्रामाणिक प्रकाशित ग्रंथ है। इस ग्रंथ के पृष्ठ १८३ पर गुलेरी जी के विविध विषयों और अनेक भाषाओं में लगभग नवासी निबंधों की सन् संवत् एवं प्रकाशन स्थानों के साथ संदर्भ सूची दे दी गई थी। कालांतर में गुलेरी जी की रचनाओं को पृथक-पृथक रुपों पृथक-पृथक संस्थानों से प्रकाशित करने में उक्त शोध की संदर्भ सूचनाएँ अनुसंधित्सुओं, हिन्दी साहित्य प्रेमियों तथा गुलेरी जी के प्रशंसकों के लिए कारगर सिद्ध हुई।
इस कालावधि में गुलेरी जी के अंतरंग मित्र, साहित्यकार हिन्दी सेवी, उद्भट विद्वान और जाने-माने पत्रकार पंडित झाबर मल्ल शर्मा भी गुलेरी जी के समग्र रुप को ग्रंथकार में प्रकाशित करने के उद्योग में जुटे हुए थे।
उनका यह उद्योग उनके जीवनकाल में साकार न हो सका। बाद म सन् १९८४ ईसवी में नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने ‘गुलेरी गरिमा ग्रंथ’ शीर्षक से इसे ग्रंथकार के रुप में प्रकाशित करवाया। ‘गुलेरी गरिमा-ग्रंथ’ गुलेरी जी पर प्राथमिक और मौलिक सामग्री जुटाने वाली महत्वपूर्ण रचना है जिसके आधार पर गुलेरी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने में निश्चय ही कोटि की सहायता मिलती है।
नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ग्रंथावली (दूसरा भाग) सन् १९८५ ईसवी में प्रकाशित हुई। इसमें गुलेरी जी की पुरानी हिन्दी, गुलेरी ग्रंथ (प्रथम भाग) के निबंधों के पुनर्मुद्रण के साथ उनकी तीनों कहानियों को एक स्थान पर संकलित कर दिया गया है। परिशिष्ट में कतिपय निबंध भी दे दिये गए हैं। सभा द्वारा प्रकाशित उक्त दोनों गं*थ साहित्य पिपासुओं की भली प्रकार संतुष्टि करते हैं, फिर भी ‘गुलेरी-गरिमा-ग्रंथ’ एक सशक्त मौलिक रचना है जो अनुसंधाताओं और समीक्षकों के लिए पे*रणादयक माना जाएगा।
अमर रचनाकार गुलेरी जी के संम्पूर्ण रचनाकर्म को जब उनके विराट व्यक्तित्त्व के आधार पर देखें तो उनके आदर्शवादी संयमित जीवन के अनेक पक्ष उजागर होते चले जाते हैं। वे न केवल कोटि के बहुज्ञ विद्वान ही थे प्रत्युत् उनका व्यावहारिक जीवन सच्चरित्रता के सुदृढ आधार पर अवस्थित था। वे जीवन को अनुशासन के कडे नियमों में ढालने के पक्षधर थे। कदाचित् इसी कारण पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के व्यक्तित्त्व के ऊँचे मान उनके निजी जीवन और साहित्य में घुलमिल गए थे। वे सद्साहित्य लिखने से पूर्व सात्त्विक जीवन जीने के पक्षपाती रहे और आजीवन उन नियमों को पालन भी किया। इस सबके पृष्ठाधार में उनके पिता पंडित शिवराम जी ‘महाराज’ (महाराज उनकी उपाधि थी) का विशेष योगदान रहा है। पंडित शिवराम महाराज का जन्म हुआ तो कांगडा के गुलेर गांव में किंतु उनकी लगभग तेरह वर्ष की शिक्षा वाराणसी के गुरुकुल में सम्पन्न हुई। वे काशी के तत्कालीन नामी विद्वान पंडित विभवराम जी के शिष्य थे और काशी में आयोजित त्रिमूर्ति शास्त्रार्थ में अनेक विद्वानों को परास्त करके उन्होंने गुरु से मंत्रणा के पश्चात् जयपुर राज्य के सवाई राम सिंह को कृतार्थ किया। जयपुर में उनकी नियुक्ति प्रधान पंडित के रुप में हुई। साथ ही उन्हें धर्म व्यवस्था देने वाली ‘मान मंदिर’ सभा का भी अध्यक्ष बना दिया गया। इन पदों के अतिरिक्त वे स्थानीय संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे। लगभग अडतालीस वर्ष तक उन्होंने संस्कृत- व्याकरण, दर्शन-शास्त्र और वैदिक-दर्शन की शिक्षा दी। अपने पिता के संघर्षपूर्ण जीवन, विद्वता और मान प्रनिष्ठा का गुलेरी जी के जीवन पर गहरा प्रभाव पडा, जिसके प्रकाश में वे स्वयं प्रकाशित हुए ही, साथ-साथ दूसरों को भी आलोकित किया।
पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के पूर्वज पुरोहित नारायण गुलेरी (जिला कांगडा- तब पंजाब-प्रांत, अब हिमाचल प्रदेश) के निवासी थे। पुरोहित नारायण के पुत्र पंडित शिवराम जी काशी में शिक्षा प्राप्त करके राजा जयपुर के दरबार में संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल, प्रधान पंडित, धर्म व्यवस्था देने वाली मान मंदिर सभा के अध्यक्ष और मंत्री के रुप में नियुक्त हुए तो पूरा जीवन वहीं बिताया। यदा-कदा अवकाश अथवा विवाह शादियों में अपने गांव आने-जाने का क्रम चलता रहा और कांगडा से बराबर सम्बन्ध भी बना रहा। बाद में इस परम्परा को पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी और उनके सुपुत्र योगेश्वर गुलेरी ने भी अक्षुण्ण बनाए रखा, जबकि उनकी पुत्रवधु श्रीमती शकुंतला गुलेरी देहरादून से आकर पैतृक गांव गुलेर में ही आ बसीं।
राज-सम्मान-प्राप्त महान संस्कृतज्ञ, दार्शनिक और लब्ध- प्रतिष्ठ विद्वान पंडित शिवराम जी शास्त्री के घर उनकी तृतीय पत्नी से अमर कहानीकार श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म २६ आषाढ संवत् १८४० तद्नुसार ७
जुलाई, सन् १८८३ ईसवी को जयपुर में हुआ। उस दिन शनिवार था। पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी अपने पिता के चिर प्रतीक्षित ज्येष्ठ पुत्र थे। इनकी जन्म कुण्डली में कर्क राशि का स्वामी ‘चन्द्र’ था, इसलिए पिता ने इनका नाम चन्द्रधर रख दिया। यह बात गुलेरी जी की निमंकित जन्म कुण्डली से स्पष्ट हो जाती है
चन्द्रधर शर्मा अपने कुल कि परम्परा अनुसार बडे मेधावी ओर प्रत्युत्पन्नमति थे। यथा नाम तथा गुण की कहावत को चरितार्थ करके वे अनुदित चन्द्रकलाओं की भाँति वृद्धि को प्राप्त होकर प्रकाशित होने लगे। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी में शैशव काल से ही अद्भुत प्रतिभा के लक्षण प्रकट होने लगे थे। उनकी बुद्धि बडी प्रखर थी। चार-पाँच वर्ष की आयु में इन्होंने संस्कृत बोलने का अच्छा अभ्यास कर लिया था। गुलेरी जी की विलक्षण मेधा को देखकर बडे-बडे विद्वान दंग रह जाते थे। पांच-छः वर्ष की आयु में इन्हें संस्कृत के तीन-चार श्लोक और अष्टाअध्यायी के दो अध्याय एवं कई सूत्र कंठाग्र थे। नौ-दस वर्ष की आयु में गुलेरी जी मातृभाषा की भाँति संस्कृत में वार्तालाप आदि किया करते थे। एक बार संस्कृत में एक छोटा-सा भाषण देकर आपने ‘भारत धर्म महामण्डल’ के सदस्यों को चमत्कृत कर दिया था।
बाल्य काल से ही गुलेरी जी की प्रतिभा और योग्यता को देखकर ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ वाली कहावत स्मरण हो आती है। पंडितों ने शिशु-चन्द्रधर में महापुरुष के बीजों की विद्यमानता की भविष्य वाणियाँ की थी, जो उनके जीवन में शनैः-शनैः सत्य सिद्ध होती गई।
बालक चन्द्रधर ने सन् १८९३ में महाराजा कॉलेज जयपुर में प्रवेश लिया। इस प्रकार यहीं से इनकी अंगेजी शिक्षा का श्री गणेश हुआ। सन् १८९७ ईसवी में द्वितीय श्रेणी में मिडिल की। सन् १८९९ ई. में इलाहबाद विश्वविद्यालय से एंट्रेंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की और अब तक के सभी रिकार्डों को तोड कर सर्वप्रथम रहे। इसी वर्ष इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इनकी अपूर्व सफलता पर महाराजा जयपुर ने जयपुर राज्य की ओर से इन्हें एक स्वर्णपदक और कई अन्य पुरस्कार प्रदान किये।
बालक गुलेरी विविध-विषयों के ज्ञानार्जन में रुचि रखते थे। उन्होंने एम. ए. की परीक्षा में- तर्कशास्त्र, ग्रीक तथा रोमन इतिहास, भौतिकी, रसायन-शास्त्र, संस्कृत और गणित विषय लिए। यही नहीं एम. ए. की परीक्षा में अंगे*जी गद्य के पर्चे में कलकत्ता के सभी कॉलेजों में दूसरा स्थान प्राप्त किया था।
सन् १९०२ ईसवी में जब कर्नल सर स्विण्टन जेकब और कैप्टन ए.एफ. गैरेट जयपुर वेधशाला के जीर्णोद्धार के लिए नियुक्त हुए तो उन्हें ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो संस्कृत का प्रकाण्ड पंडित, ज्योतिष-शास्त्र का वेत्ता तथा पश्चिम की दो-तीन-भाषाओं में भी पारंगत हो। इस कार्य में विदेशियों की सहायता के लिए युवक चन्द्रधर शर्मा को चुना गया। उन्होंने जयपुर के ज्योतिष यंत्रालय के जीर्णोद्धार में दुर्बोध ज्योतिष ग्रंथ का अंगेजी में अनुवाद किया। इसके साथ-साथ यंत्रों को स्थिर तथा निश्चित करने और उनके परीक्षण में भी योगदान दिया।
गुलेरी जी की योग्यता, कर्मठता, निष्ठा, अद्भुत ज्ञान तथा अमूल्य सहायता से प्रभावित होकर, दोनों विदेशी विद्वानों ने उन्हें अनेक संस्तुति-पत्र प्रदान किये थे। यही नहीं गुलेरी जी ने उन दोनों विदेशी विद्वानों की ‘जयपुर ऑब्जरवेटरी एण्ड इट्स बिल्डर्स’ शीर्षक पुस्तक लिखने में सहायता की थी। इसके लिए जयपुर राज्य ने उन्हें तीन सौ रुपये की पुस्तके प्रदान कर सम्मानित किया था।
सन् १८९७ ईसवी में गुलेरी जी का जयपुर के श्री जवाहर लाल जैन से परिचय हुआ। यह ‘जैन वैद्य’ के नाम से प्रसिद्ध थे। वह विद्यानुरागी, हिन्दी-प्रेमी तथा सजग काँग्रेस कार्यकर्ता थे। उनका अनेक सामाजिक और साहित्यिक संस्थाओं से संबंध था। उन दोनों ने मिलकर हिन्दी-सेवा का व्रत लिया और सन् १९०० ईसवी में जयपुर में ‘नागरी भवन’ स्थापित किया।
गुलेरी जी ने सन् १९०२ ईसवी में इलाहबाद विश्वविद्यालय की बी. ए. परीक्षा प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करके उत्तीर्ण की थी। बी.ए. में विषय थे- अंगे*जी, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र। इस परीक्षा की उपलब्धि के लिए जयपुर-राज्य ने उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया। यहीं नहीं उन्होंने एक बार फिर जयपुर राज्य का स्वर्ण पदक भी जीता। इसके साथ-साथ उन्हें विश्वविद्यालय की ओर से जयपुर-राज्य का नार्थब्रुक रजत पदक प्रदान कर वर्ष का सर्वोत्तम छात्र घोषित किया गया था।
गुलेरी जी दर्शन-शास्त्र में एम.ए. करने के इच्छुक थे किन्तु एक आकस्मिक घटना के कारण पूरी परीक्षा न दे सके। हुआ यों कि परीक्षा के एक दिन पहले वे देर रात तक अध्ययन करते रहे। नींद पूरी नहीं हुई और परीक्षा भवन में तन्द्रा की अवस्था में सारा समय बिताकर चले गये। गुलेरी जी के स्वयं के शब्दों में ‘.....मैंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. की तैयारी की थी। परीक्षा की आवश्यकता से भी बढकर विषय का अनुशीलन किया किन्तु अस्वस्थता के कारण परीक्षा न दे सका।’’
इधर सन् १९०४ ईसवी में गुलेरी जी जयपुर-राज्य के आग्रह से खेतडी-नरेश जयसिंह के शिक्षक और अभिभावक बनकर मेयो कॉलेज अजमेर चले गए। इस प्रकार उनका एम.ए. करने का विचार पूरा न हो सका।
लगभग बीस-बाईस वर्ष की अवस्था में गुलेरी जी का विवाह पद्मावती से हुआ। उनके विवाह की भी बडी अद्भुत कहानी हैं, जहाँ संयोग और घटना अन्योन्याश्रित रुप से जुडे हुए हैं। जब गुलेरी जी बी.ए. पास कर चुके तो पिता ने उनका संबंध ‘गरली’ में निश्चित कर दिया।
शिवराम जी उनके विवाह के लिए अपने गांव गुलेर गए हुए थे। विवाह की तैयारियाँ पूरी कर ली गई थीं। दुर्भाग्यवश कन्या के पिता का देहान्त हो गया। पंडित शिवरामजी असमंजस में पड गए। वह चन्द्रधर जी को अविवाहित लेकर जयपुर लौटना नहीं चाहते थे। कारण, उन्हें जयपुर राज्य की ओर से विवाह के लिए पाँच सौ रुपये की सहायता मिली हुई थी। वह विवाह किए बिना लौटने में अपमान समझ रहे थे, इसीलिए शीघ्र ही ‘हरिपुर’ निवासी कवि रैणा की पुत्री से उनका विवाह बडी धूमधाम से सम्पन्न किया।
गुलेरी जी परिवार में ज्येष्ठ थे। उनके दो भाई- सोमदेव और जगद्धर थे तथा एक बहन विद्या देवी थीं। गुलेरी जी की कुल चार संताने हुईं- योगेश्वर, शक्तिधर, अदिति और विजया। योगेश्वर जी का विवाह शकुंतला देवी (नैहरनपुक्खर कांगडा) से हुआ। उनका अधेड अवस्था में देहान्त हो गया। आप देहरादून में प्राध्यापक थे और अपने समय के प्रतिष्ठित कहानीकारों और निबंधकारों में गिने जाने लगे थे। यही नहीं, उनकी अनेक कहानियाँ पुरस्कृत भी हुई। योगेश्वर जी के तीन पुत्र - सुधीर, जयधर और विद्याधर हुए। दुर्भाग्यवश सुधीर और जयधर का किशोरवस्था में देहावसान हो गया। विद्याधर मानव-संसाधन विभाग में संस्कृत अधिकारी थे किन्तु वे भी असमय २३ सितम्बर २००३ ईसवी को दिल्ली में स्वर्गलोक सिधार गए।
श्री शक्तिधर अपने पिता के मेधावी पुत्र थे। उन्होंने अंगे*जी में एम.ए. प्रथम श्रेणी मंत उत्तीर्ण किया और प्रयाग विश्वविद्यालय से प्राचीन लिपिय पर शोध कर रहे थे। उन्होंने गुलेरी जी की कहानियों को ‘गुलेरी जी की अमर कहानियाँ’ शीर्षक से संकलित किया। दुर्भाग्यवश वह भी दीर्घजीवी न हुए। बेटी आदिति का बाल्यकाल में ही स्वर्गवास हो गया। विजय का विवाह पालमपुर (कांगडा) के श्री श्यामचरण बेदवा से हुआ। विवाह के कुछ ही समय बाद विजया भी स्वर्ग सिधार गईं। आज गुलेरी जी का कुल उनके पडपौत्र विकास से दीप्त है।
इस बात का हम ऊपर उल्लेख कर चुके हैं कि गुलेरी जी ने सन् १९०४ ईसवी में एक अभिभावक और शिक्षक के रुप में शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश किया था। बाद में वे नियमित रुप से मेयो कॉलेज अजमेर के अध्यापक मण्डल और जयपुर हाऊस के अधीक्षक तथा खेतडी के महाराज के अभिभावक आदि अनेक पदों पर एक साथ कार्य करते रहे। कहना न होगा कि यहीं से उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत होने लगा। वह सफल अभिभावक रहे। राजा जयसिंह भी अपने गुरुवर पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की भाँति अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। गुलेरी के कुशल निर्देशन और व्यावहारिक जीवन-दर्शन से राजा जयसिंह में विनय और सौजन्य का सुन्दर समन्वय हुआ। मेयो कॉलेज के प्रिंसिपल और जयपुर हाऊस के मोतमिद सभी गुलेरी जी की योग्यता और सदाचार की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते थे। वह कुशल शिक्षक, सहृदय मित्र, विनम्र सेवक और महान सहयोगी माने जाते थे। उनका सभी लोग हृदय से आदर किया करते थे।
सन् १९०७ ईसवी में पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी को जयपुर - भवन का मोतमिद भी नियुक्त कर दिया गया। वह अनुशासन के हामी थे। बडी कडाई से नियमों का पालन करते और करवाते। वह स्वभाव से जितने विनम्र थे, नियम पालन करवाने में उतने ही कठोर भी थे। इस संदर्भ में एक घटना यों है ः- एक बार एक राजकुमार किसी पेड के नीचे छिपकर मदिरापान कर रहा था। अकस्मात् गुरुदेव गुलेरी जी उधर से आ निकले। भयातुर राजकुमार जैसे ही बोतल फेंक कर भागने लगा, ठोकर खाकर गिर पडा। इस बीच गुलेरी जी दूर निकल गए थे। उसकी घिग्घियाँ बंध रही थीं। बार-बार यही पूछ रहा था- ‘गुरुदेव ने मुझे देखा तो नहीं’?
गुलेरी जी ने जयपुर के समस्त सामंतों की कुशलता पूर्वक देखभाल की। मेयो कॉलेज में कश्मीर नरेश हरि सिंह, प्रतापगढ के नरेश रामसिंह, ठाकुर रामसिंह (आर्मी मिनिस्टर जयपुर) गाजीगढ के ठाकुर कुशल सिंह, रोहेट के ठाकुर दलपत सिंह प्रभृति शिष्यों पर उनकी बडी
कृपा थी।
गुलेरी जी सन् १९१६ ईसवी तक मोतमिद रहे। उनकी अध्यापन में विशेष रुचि थी। वह जब जयपुर-भवन के अधीक्षक रहे तब भी मेयो कॉलेज में अवैतनिक रुप से अध्यापन कार्य किया करते थे।
३ जुलाई १९१६ ईसवी को गुलेरी जी ने मेयो कॉलेज अजमेर में संस्कृत विभागाध्यक्षक का पद भी संभाला। मेयो कॉलेज अजमेर में गुलेरी जी की कार्यदक्षता और योग्यता की धाक के कारण उनका यश-सौरभ दूर-दूर तक फैल गया। उन दिनों महामना पंडित मदन मोहन मालवीय हिन्दू विश्वविद्यालय काशी के लिए घूम-घूम कर धन एकत्र कर रहे थे। इस बीच उनका गुलेरी जी से परिचय हुआ। गुलेरी जी ने इस काम के लिए मालवीय जी की बडी सहायता की। मालवीय जी भी देश के कोने-कोने से चोटी के विद्वानों को बुलाकर हिन्दू विश्वविद्यालय में लाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। वह गुलेरी जी विद्वत्ता तथा साहित्यिक पैठ एवं कर्मशीलता से प्रभावित थे। इसीलिए उन्हें काशी विश्वविद्यालय में लाने का प्रत्यन करने लगे। उन्हीं के प्रयत्न से बाद में वह हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य-विभाग (ओरियंटल कॉलेज ऑव लर्निंग) के प्राचार्य तथा पुरातन इतिहास और धर्म की मनीन्द्रचन्द्र चेयर के प्रोफैसर नियुक्त हुए।
गुलेरी जी ने काशी पहुँच कर प्राच्य-विभाग का पुनर्गठन किया। विभाग के लिए भवन निर्माण और छात्रावास की योजनाएँ बनाई। उस समय संस्कृत प्राध्यापकों के वेतनमान दूसरे विषयों के प्राध्यापकों से अपेक्षाकृत न्यून थे। उन्होंने वेतनमानों की विसंगतियाँ दूर करवाकर सभी विभागों के समान वेतनमान करवाए। प्राचीन इतिहास और धर्म-संबंधी विषयों का समुचित विभाजन करके शिक्षण की सुव्यवस्था की। कुछ ही दिनों में उन्होंने प्राच्य-विभाग का कायाकल्प ही कर दिया।
सच तो यह है कि गुलेरी जी को काशी जाना फला नहीं। वह जिन भावनाओं को लेकर वहाँ गए थे, वे सब धरी की धरी रह गईं। वहाँ पहुँचने के कुछ समय पश्चात् उन पर एक-एक कर विपत्तियाँ टूटने लगीं। वह अजमेर से काशी जाने की तैयारी में ही थे कि उनकी बेटी अदिति का देहांत हो गया। अभी काशी पहुँचकर स्वयं को अच्छी तरह व्यवस्थित भी नहीं कर पाए थे कि मध्यम भ्राता सोमदेव जी के आकस्मिक देहांत का दारुण दुख झेलना पडा। वह व्याकुल और शोक संतप्त रहने लगे। उनका मन जैसे संसार से विरक्त हो गया। सोमदेव जी के देहांत के लगभग अढाई मास के बाद उनकी छोटी भाभी (जगद्धर जी की प्रथम पत्नी श्रीमती जयदेवी) को काशी में स्वर्गवास हो गया।
उन दिनों गुलेरी जी को भयंकर पीलिया हो गया। वे सूखकर काँटा हो गए थे परंतु कुछ समय के अनंतर धीरे-धीरे शरीर में शक्ति आने लगी और पहले जैसे हृष्ट-पुष्ट हो गए। उन्हें पीलिया हो जाने को मुख्य कारण मानव स्वभाव की कुटिल प्रवृत्ति थी। किसी ईर्ष्यालु ने उनके मान-सम्मान से चिढकर कोई ची*ा खिला दी थी। परिणामतः पीलिया हो गया। इसी बीच उनकी भतीजी परलोक-गमन कर गई और सोमदेव जी का एक बालक भी चल बसा। अब तो वह पूरी तरह शोक सागर में डूब गए।
गुलेरी जी के अंतिम रोग की भी विचित्र कहानी है। अपने देहावसान से मात्र सोलह दिन पूर्व अपनी भाभी (श्रीमती जयदेवी) के अंतिम संस्कार के लिए ‘मणिकर्णिका घाट’ (काशी) पर गए हुए थे। उनका शरीर कुछ ढीला था। अतः उन्होंने गंगाजल का आचमन और छिडकाव ही किया, स्नान नहीं। तब पंडित पद्मानाभ (भाभी का भाई) ने क्रोधित होकर कहा- ‘‘क्या तुम नहाओगे नहीं? जान पडता है तू ब्रह्म राक्षस है।’’
पद्मानाभ क्रोधी ब्राह्मण था। गुलेरी जी सनातनी थे। यदि उन्हें श्मशानघाट पर नहाना होता तो वस्त्रों सहित नहाते। उन्हें पद्मानाभ की बात से बडा क्षोभ हुआ। उन्होंने कहा- ‘अरे चाण्डाल! जो तू मेरे प्राण लेना चाहता है तो ले।’ यह कहकर वह गंगा में कूद गए, उसी दिन से उन्हें हल्का ज्वर रहने लगा। किन्तु उन्होंने विश्वविद्यालय के कार्य में ढील नहीं आने दी। भाभी के उत्तर-कृत्य किये और दुःख के घूँट पिये। नंगे-सिर पैर विश्वविद्यालय जाते। यहाँ तक कि वह अपने भोजन के प्रति भी उदासीन रहने लगे। अब उन्हें तेज ज्वर रहने लगा। चिकित्सा शुरू हुई परन्तु मर्ज बढता ही गया। ज्वर १०४० हुआ, १०५० हुआ और फिर १०७० हो गया। डॉक्टरों ने नंगा करके बर्फ पर लिटाने का परामर्श दिया। उन्हें बर्फ की सिल्लियों पर लिटाया गया। बाद में जब बिस्तर पर लिटाने लगे तो होश में आ गए। वह ‘हटो’ कहकर पार्श्व में पडे कुशासन पर जा बैठे। कुछ क्षणों के लिए ध्यान लगा। ‘विजय चन्द्र’ (गुलेरी जी के शिष्य) गीता सुनाओ इतना कहकर वहीं लेट गए। प्रलाप चल रहा था।......रा....ज......नि.....कमल......
आदि, टिकाओं का खण्डन हो रहा था। पक्ष के समर्थन के लिए तर्क दिये जा रहे थे। वह ‘शत्पथ ब्राह्मण’ पर एक विद्वान की टीका का खण्डन कर रहे थे।
रोती हुई आवा*ा में विजय चन्द्र ने विराट-रुप-दर्शन का पाठ आरंम्भ किया। फिर गुलेरी जी अपनी पुत्री से बोले ः- विजया! रुद्राक्ष ले आ। भोली लडकी रुद्राक्ष की माला उठा लाई। गुलेरी जी अंतिम हँसी हँसे और पुत्र से कहा- योगा (योगेश्वर) जा मेरे कैशबॉक्स में अनबिंधे रुद्राक्ष रखे हैं, सिरहाने से चाबी ले ले।’’ योगेश्वर रुद्राक्ष ले आए। विजय चन्द्र जी ने गुलेरी जी के संकेत पर रुद्रास उनकी चोटी से बाँध दिया। वह कुछ समय तक निश्चेष्ट पडे रहे। उनकी पुत्री ने टैम्परेचर लिया। १०९० से भी ऊपर था। गुलेरी जी ने आँखे खोल दीं। गऊदान हुआ, स्वर्णदान हुआ और न जाने क्या-क्या हुआ?
गुलेरी जी ने नेत्र बन्द कर लिये। विजय चन्द्र ने झुककर जोर से उनके कानों में कहा- ‘ओम् नमः शिवाय।’ यह गुलेरी जी का प्रिय मंत्र था। उन्होंने जोर से एक हिचकी ली और सदैव के लिए आँखें खोल दीं। उस समय प्रातः के चार बज रहे थे। इस प्रकार हिन्दी-संसार का यह भास्कर १२ सितम्बर, सन् १९२२ को अस्त हो गया। उस समय वह उनतालीस वर्ष दो महीने और पाँच दिन के थे।
मानव-व्यक्तित्त्व एक इकाई है, उसका विभाजन संभव नहीं है। व्यक्तित्त्व के दो पक्ष हैं- अंतः पक्ष और बाह्य पक्ष किन्तु इन दोनों को एक दम पृथक-पृथक नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनका अन्योन्याश्रित संबंध है। फिर भी संक्षेप से हम कह सकते हैं कि व्यक्ति की बाह्य रचना, व्यवहार की विशेषताओं, वृत्तियों, रुचियों, धारणाओं शक्तियों योग्यताओं और कुशलताओं का सर्वाधिक लाक्षणिक समायोजन ही व्यक्तित्त्व की परिभाषा है।
गौर वर्ण लगभग छः फुट ऊँचा हृष्ट पुष्ट शरीर, सुन्दर क्रियाशील, विशाल वक्षस्थल, चौडा और ऊँचा ललाट, भरा-भरा प्रभावशील चेहरा, तेजोमय आँखों पर मोटे शीशे की ऐनक, घनी बरौनियाँ, फलाई-कट मूँछे और सागर की तरह गंम्भीर, ऐसे थे चन्द्रधर शर्मा गुलेरी। लम्बे और बडे कान, बारीक होंठ, लम्बे भुजदण्ड और भरा हुआ पेट था। छाती, पेट और पीठ पर घने, काले और लम्बे बाल थे। हाथों व पैरों की सुन्दर लम्बी उंगलियाँ थीं। उनकी भरी हुई जंघाएँ और सुन्दर पिंडलियाँ थीं। उनका सिर बहुत बडा था। जिस पर छोटे-छोटे घने और नरम बाल शोभा पाते थे। सिर पर जयपुरी गोल पगडी, प्राचीन शैली की तनीदार बगलबँदी, स्वच्छ निर्मल पटलीदार धोती और पैरों में पादुकाएँ। देसी चोंचदार जडाऊ जूती-आजीवन उनका यही परिधान रहा। माथे पर त्रिपुण्ड, गले में दुपट्टा और बगलबँदी के ऊपर बडे-बडे रुद्राक्ष वाला कंठा उन्हें और भी आकर्षक बनाते थे। जब कभी उन्हें राज दरबार को सम्मानित करना होता तो विशेष तौर पर लाल वस्त्र और हाथों में कडे पहना करते। पहले-पहले वे कानों में सोने की बालियाँ (नंतियाँ) भी पहनते थे। हाथों की लम्बी कलात्मक उंगलियों में सोने की भारी अंगूठी बहुत शोभा पाती थी। अधिकतर वह सफेद वस्त्र पहना करते थे, जिन पर काला अंगरखा उनके भरे हुए गोल चेहरे की आभा द्विगणित कर देता था। अंगरखा में जेबी घडी रखा करते। उनकी मुद्रा प्रभावशाली और गंम्भीर थी। किन्तु अन्दर से वे अत्यंत कोमल और सरल स्वभाव के थे। हँसते समय उनके छोटे-छोटे सुन्दर दाँत उज्ज्वल मोतियों की तरह दमकते। आपस में बातचीत करते-करते गुलेरी जी थोडा हकलाया करते थे। परन्तु अध्यापन और भाषण के समय
अबाध गति से बोलते जाते थे। उनका हकला कर बोलना बहुत प्यारा था।
गुलेरी जी को ब्रह्म मुहूर्त में जगने का अभ्यास था। प्रातः उठते ही ईश्वर स्मरण करके जोर-जोर से अंगडाइयाँ लेते। उस समय उनकी हड्डियों की चटकने की विशेष ध्वनि होती थी। स्वाध्याय आदि करके स्नान करते और फिर वैदिक रीति से तीन-चार घण्टे संध्या किया करते थे। पूजा-पाठ से निवृत्त होकर अध्यापन कार्य, छात्रावास, कॉलेज और क्रीडा-क्षेत्र सभी स्थानों पर वे सक्रिय रहते। साँयकाल संध्या, फिर छात्रावास का चक्कर और देर तक अध्ययन करना उनकी दिनचर्या के अभिन्न अंग थे। पलभर भी ऐसा नहीं बीतता जब वे अध्ययन और अनुशील में व्यस्त न हों। उनका भोजन शुद्ध सात्त्विक था। भृत्य-निरर्भता उन्हें बिल्कुल नापसन्द थी।
गुलेरी जी का व्यक्तित्त्व जितना रौबदार दिखता था, प्रकृति से वे उतने ही विनम्र और दयालु थे। लोकहित के लिए तो सर्वस्व लुटाने को तैयार हो जाया करते। निर्धनों, विधवाओं, पशुओं और अनाथ लोगों के तो वे पालक थे। मनमौजी और प्रसन्नचित रहने वाले व्यक्ति थे। अपने गाँव की तीन-चार विधवाओं को गुप्तदान दिया करते। पद-प्रतिष्ठा ने उनमें अहंकार नहीं भरा बल्कि विनय और विनम्रता के गुणों से सम्पन्न कर दिया। गुलेरी जी निष्कपट और आडंबरहीन प्रकृति के पुरुष थे। गुलेरी जी विद्याव्यसनी थे। उन्होंने सारा जीवन अध्ययन अनुशीलन और अनुसंधान कार्य में बिताया। माँस-मदिरा, सिगरेट और पान आदि को छूते तक नहीं थे। हाँ सुपारी खाने के शौकीन थे। प्रायः साबुत सुपारी मुँह में डाल लेते और धीरे-धीरे खाते रहते। कभी-कभी नसवार अवश्य सूँघते थे। नसवार सूँघने का उन्हें व्यसन न था, हाँ यदा-कदा प्रयोग अवश्य करते थे। गुलेरी जी बडे व्यवस्था-सम्पन्न संग्राहक रहे हैं, इसका ज्ञान उनकी फाइलों, डायरियों और कागज-पत्रों से होता है। उनके प्रमाण-पत्र, सरकारी फाइलें, आयकर का लेखा-जोखा, साहित्यिक मित्रों के पत्र आदि भी उनके घर में सुरक्षित हैं? पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी पारिवारिक व्यक्ति थे। वे कोटि के पितृ भक्त और गुरुभक्त थे। वे एक आदर्श पुत्र थे। पितृभक्ति में उनके आदर्श भगवान राम थे। माता-पिता को लेटकर साष्ठांग करते हुए विनम्रता से कहते ‘मैं चन्द्रधर आपको प्रणाम करता हूँ।’ पिता जी का एक बडा चित्र उनके पूजा के कमरे में रखा रहता था। वे षोडषोपचार विधि से चित्र की पूजा किया करते।
गुलेरी जी अपने भाई-बहिनों से बहुत प्रेम किया करते थे। उन्हें सभी भाई-बहिन ‘बडा भाऊ’ या ‘ज्येष्ठ’ कहकर पुकारते। सबके दुःख में दुःखी और सबके सुख में सुखी होने वाले गुलेरी जी अपने सुख में सबको भागीदार समझते थे।
अपने गाँव गुलेर के प्रति उनका गहन आकर्षण था। इस आशंका से कि उनके उत्तराधिकारी ग्राममोह छोडकर मारवाडी न बन जाएँ, उनके पिता श्री शिवराम जी ‘महाराज’ ने जयपुर-राज्य द्वारा प्रदत्त जागीर को अस्वीकार कर दिया था। गुलेरी जी पिता के देहावसान के पश्चात् हर वर्ष छुट्टियाँ बिताने गुलेर जाया करते थे।
गुलेरी जी ने जब लिखना शुरू किया तो अपने साथ गाँव का अन्योन्याश्रित सम्बंध दिखाकर गुलेर से ‘गुलेरी’ उपाधि धारण कर ली। इस प्रकार गुलेरी जी ने अपने नाम के साथ-साथ अपने गांव गुलेर का नाम भी सदैव के लिए साहित्य-संसार में अमर कर दिया। अपने गाँव के प्रति यह साहित्यिक मौन समर्पण है।
गुलेरी जी एक सफल गृहस्थ थे। उनकी अतिव्यस्तता ने उनके पारिवारिक जीवन को कभी भी अतृप्त न होने दिया। उनका दाम्पत्य-जीवन सर्वथा सफल था और आजीवन प्रसन्नता पूर्वक बीता। एक आदर्श-पति के साथ-साथ वे एक योग्य पिता भी थे। अपने बच्चों की उचित शिक्षा और उनकी सच्चरित्रता में उन्होंने कभी ढील नहीं आने दी। संतान के प्रति अपने कर्त्तव्यों को भी उन्होंने खूब निभाया तथा इस विषय में सदैव सचेत और सजग रहे।
गुलेरी जी विनोद प्रिय थे और बच्चों के साथ तो अबोध बालक बन जाते थे। खूब खेलते। उन्हें देखकर बच्चे किलकते हुए दौडकर उनसे लिपट जाते। गुलेरी जी का व्यक्तित्त्व एकदम आडम्बर हीन और प्रदर्शन शून्य था। वे कथनी और करनी में दृढ थे। वचन बद्धता तौ जैसे उनकी नस-नस में रची हुई थी। वे अज्ञात शत्रु थे। अपना समय और अर्थ नष्ट करके भी मैत्री का नाता निबाहने में तत्पर रहते। इस संबंध में बाबू श्याम सुन्दर दास जी का कथन द्रष्टव्य है--- ‘‘गुलेरी जी का स्वभाव बडा सरल, निष्टकपट और आडम्बरहीन था। मित्रता के नाते को निबाहना ये खूब जानते थे।’’
मित्रों के लिए तो वे कल्पतरू थे और उनके प्रत्येक कार्य में हाथ बटाते थे। स्वयं तो उन्हें साहित्य-प्रकाशन से अर्थ - प्राप्ति या यश कमाने का जैसे कोई लालच ही न था। वे दूसरों के प्रेरणा -स्रोत रहे। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त को साहित्यिक सम्मतियाँ दीं, राय कृष्णदास जी की पाण्डुलिपियों को सुधारा और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे विद्वानों के आदि देव बन गए।
उन्होंने अपने मित्रों को रचनाओं के प्रकाशनार्थ उत्साहित किया किन्तु अपनी पुस्तक तक न छपवाई। उन्होंने जैन वैद्य के साथ हिन्दी-सेवा का व्रत लिया तो आयु पर्यंत निभाया। यही कारण है कि बाबू सुन्दर श्याम दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बाबू मैथिली शरण गुप्त, राय बहादुर गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी, रायकृष्णदास और पंडित झाबर मल शर्मा सरीखें साहित्यकार और पंडित मदन मोहन मालवीय, पुरुषोतम दास टंडन तथा जवाहर लाल ‘जैन वैद्य’ जैसे साहित्यक-राजनीतिज्ञ, गुलेरी जी के प्रशंसकों और अनुरागियों में रहे। हाँ साहित्य-प्रकाशन में वे परिमाण की अपेक्षा गुण के हामी थे। विश्लेषण की अपेक्षा संश्लेषण के पक्षपाती थे। थोडा लिखा जाए परन्तु स्तर का लिखा जाए। लिखने में स्वयं संयमी थे, वहीं मित्रों को भी यह सम्मति देते रहे।
सरकारी सेवक के रुप में वे अत्यंत सफल और अपने-अपने अधिकारियों के लिए संतोषदायक रहे। समय-निष्ठा, कर्तव्य-परायणता और कर्त्तव्य-सतर्कता का उन्होंने सदैव पालन किया। उनके ज्ञान ने उन्हें कभी अहंकारी और अहंमन्य नहीं बनाया, बल्कि विनम्र और परिश्रम बना दिया। वास्तव में गुलेरी जी ने अपनी विद्वत्ता और कार्यशीलता के मर्म को भली भाँति समझ लिया था। अतः कॉलेज में, कार्यालय में, श्रेणी कक्ष में, पुस्तकालय में, छात्रावास और क्रीडा-क्षेत्र में गुलेरी जी कहीं भी पीछे न रहते।
मेयो कॉलेज छोडते समय गुलेरी जी को जो प्रशंसा-पत्र प्रिंसिपल ने प्रदान किया उससे एक अधिकारी के नाते उनके व्यक्तित्त्व को समझने और उसके विषय में अंतिम धारणा बनाने में सहायता मिलती है..... पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी एक प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ हैं। इस विषय में इन्हें विशिष्ट स्थान प्राप्त है परन्तु इसके साथ इनको अंगे*जी-साहित्य और इतिहास पर भी अधिकार प्राप्त है और इनका इन्होंने गहन अध्ययन किया है।.....मैं, उनका अध्यायपक- मण्डल का सर्वाधिक माननीय सदस्य के नाते आदर करता हूँ, और मेरा विश्वास है कि वे अपनी योग्यता और चरित्र के बल पर इससे भी ऊँचे पद के अधिकारी हैं।’’
शिक्षक के रुप में जो सम्मान और श्रद्धा गुलेरी जी को प्राप्त हुई वह बहुत ही कम अध्यापकों को सुलभ होती है। कठोर अनुशासन प्रिय होने पर भी अपनी सरलता और स्नेहशील स्वभाव के कारण वे छात्रों के हृदय सम्राट बन गए थे। प्रायः सभी राजकुमार उन्हें अपना बडा हितैषी समझते थे। एक उदाहरण देना अन्यथा न होगा। जब मेयो कॉलेज से गुलेरी जी को हिन्दू विश्वविद्यालय जाना था तो वहाँ मकान की समस्या थी। किसी ने बताया, वहाँ राजा विजय नगरम् की कोठी है। शिष्य को गुरु-सेवा का अवसर मिले और वह भी गुलेरी जी जैसे प्रताणी गुरु का। यह तो पुण्यों का फल है। विजय नगरम् के युवराज लिखते है ‘......प्रिय गुलेरी जी महाराज...... अपना मकान आफ पारिवारिक उपयोग के लिए अर्पण करने में युवराज को महान प्रसन्नता का सुअवसर प्राप्त हुआ।.... मैंने प्रसन्नता पूर्वक बनारस के अपने एजेंट को लिख दिया है कि वह आफ परिवार के रहने के लिए मकान दे दे, जिसके विषय में आपने लिखा था। वहाँ पर मेरे अधिकारियों से मेरा परिचय देने पर आपको हर चीजे तैयार मिलेंगी।......अनेक नमस्कार।
मैं हूँ आपका हितेच्छु
ए. सत्यनारायण राव
शिष्यों को ऐसा आदर, श्रद्धा और समर्पण-भाव निश्चित ही शिक्षक-गुलेरी की अपूर्व सफलता का द्योतक है। बहुभाषाविद् गुलेरी का व्यक्तित्त्व और भी विराट तथा प्रभावजन्य है। इतनी अल्पायु में अनेक भाषाओं के साहित्य का शीर्षस्थ ज्ञानार्जन और तलस्पर्शी-शोध उनकी बहु-भाषा-विज्ञता का प्रमाण है। एक और उन्होंने वैदिक संस्कृत, संस्कृत, पुरातत्त्व, भाषा-शास्त्र, प्राचीन-इतिहास, पाली, प्राकृत अपभ्रंश तथा हिन्दी का गंभीर अनुशीलन किया तो दूसरी ओर लेटिन, अंगेजी, फ्रेंच तथा जर्मन पर अधिकार प्राप्त कर लिया। इसके अतिरिक्त अरबी और फारसी में भी उनकी खासी पैठ थी। अन्य भारतीय भाषाओं में बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी और हिमाचली (पहाडी) पर भी इनका अच्छा अधिकार था। इतना कह देना ही पर्याप्त नहीं कि वे बहु भाषा-विज्ञ थे प्रत्युत् उनकी विलक्षणता उन भाषाओं के सृजानात्मक योगदान से भी परिलक्षित होती है। ‘पुरानी हिन्दी’ नामक पुस्तक का अध्ययन-मात्र उनकी निरुक्ति-विषयक प्रतिभा का आश्वस्त प्रमाण है। गुलेरी जी लोभ और लालच से कोसों दूर थे। जिन पदों पर उन्होंने कार्य किया यदि कोई दूसरा होता तो अपार सम्पत्ति और वैभव जुटा लेता किन्तु वे तो दूसरी ही धातु के
बने थे।
गुलेरी जी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के प्रति बडे दयालु थे और मानवीय धरातल पर पेश आते थे। वह प्रत्येक कर्मचारी के स्वभाव, आवश्कताओं, इच्छाओं और कार्यों के प्रति सजग रहते थे। काशी जाते समय अजमेर के मोतमिद को दिये गए निर्देश उनकी प्रकृति और स्वभाव के सुन्दर उदाहरण हैं‘........फर्राश नत्थू सीधा-सादा और परिश्रमी है परन्तु स्वयं काम करने का अभ्यस्त नहीं हैं..... ईमानदार....उसे लगभग बीस या सत्रह वर्ष काम करते हो गए हैं।.....अतः वह मदद का अधिकारी हैं।...भंगी
लाला बहुत भला और परिश्रमी व्यक्ति है। हर प्रकार की सहायता का अधिकारी है।....रहीम बख्श माली बडे काम का परन्तु उद्दण्ड और चालाक है। वह सदैव यही चाहता है कि उसका सम्बन्धी सहायक माली अथवा भिश्ती नियुक्त हो जाए।....पौधों को संभालने के लिए, वह वृक्षों की टहनियाँ काट लेता है और बाद में ईंधन बनाकर जलाता है।..... वह आफ यहाँ से फूल तोडकर अपने संरक्षकों को गुलदस्ते भेंट देने का आदी है।....जब कभी वह निवृत्ति प्राप्त करना चाहे उसकी पूरी पेन्शन के लिए सिफारिश कर दें।’’ इस प्रकार सब कुछ जानते-बुझते हुए भी, वे अपने कर्मचारियों के प्रति क्षमाशील और दयावान थे। हमारा मानना है कि गुलेरी जी की प्रामाणिक जीवनी और व्यक्तित्त्व के परिप्रेक्ष्य में उनके साहित्य का अवगाहन करने से उनकी विराटता और महानता और भी देदीप्यामान होगी। वे कथनी और करनी में विश्वास रखने वाले सच्चरित्र सर्जक थे। साहित्य में जिन ऊँचे मानों की स्थापना की, उनका जीवन में कडाई से पालन करने के पश्चात् प्राणवत्ता से मौलिक-सर्जना की और सदैव-सदैव के लिए अमर हो गए। कहना न होगा कि गुलेरी जी का जीवन और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका सुदृढ एवं अन्योन्याश्रित सम्बंध है। वर्तमान काल में उनके से आदर्श रेखांकनीय हैं।
गुलेरी जी जैसे अन्तर्मुखी विद्वान, परिपक्व साहित्य-साधक, असाधारण प्रतिभा सम्पन्न, संतुलित जीवनयापी और तलस्पर्शी अध्यात्मवादी महापुरुष विरले ही मिलते हैं, जिनमें एक साथ अनेक सद्गुणों के विलक्षण समन्वय के दर्शन हों ।
संदर्भ ः
१. गुलेरी जी की अमर कहानियाँ, शक्तिधर शर्मा गुलेरी, सरस्वती पे*स बनारस, संस्करण सन् १९४५ ईसवी.
२. गुलेरी-ग्रंथ (प्रथम भाग) सम्पादक कृष्णानन्द संवत् २०००विक्रमी, काशी नागरी प्रचारणी सभा,
३. पुरानी हिन्दी, सम्पादक आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, संवत् २००५ विक्रमी, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, बनारस
४. श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ः व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व, लेखक पीयूष गुलेरी, ऋषभ चरण जैन एवं संतति दरियागंज, दिल्ली सन् १९८३ ईसवी,
५. मेयो कॉलेज अजमेर पत्रिका अंक नवम्बर, १९२२ ईसवी
६. दि. जयपुर आब्*ारवेटरी एंड इट्स बिल्डर्स् की प्रस्तावना
७. निबंध रत्नावली, बाबू श्याम सुन्दर दास, प्रस्तावना
८. गुलेरी जी की पर्सनल फाईल, मेयो कॉलेज अजमेर
९. गुलेरी जी के अंतिम क्षण, नया समाज, पृष्ठ ४३०, जून
१९५० ईसवी
१०. गुलेरी जी के भतीजे पंडित कीर्तिधर शर्मा गुलेरी से दिनांक १२ जुलाई १९७२ ईसवी को गुलेर में भेंटवार्ता
११. श्रीमती विद्यादेवी बेदवा (गुलेरी जी की कनिष्ट भागिनी) से नगरोटा बगवाँ (कांगडा) में दिनांक १३ जून सन् १९६८ ईसवी को भेंट।
१२. कविवर त्रिलोचन शास्त्री से भेंटवार्ता, दिनांक ७ जून १९६९ ईसवी, बनारस।
१३. कार्य विवरण, नगरी प्रचारिणी सभा वाराणासी, पृष्ठ २६, २६ नवम्बर, १९२२ ई. की बैठक में प्रस्तुत जॉर्ज ग्रियर्सन
का पत्र।
अपर्णा-श्री हाऊसिंग कॉलोनी, चीलगाडी धर्मशाला, १७६२१५ (हि.प्र.)
मो. ९४१८०-१७६६०, दू.भा. ०१८९२-२२६२२४