साहित्य के लिए ‘विचार’ का महत्त्व ज्यादा है- विचारधारा का कम..... हेमंत शेष से भानु भारवि का संवाद

भानु भारवि


भानु भारवि-आप एक कवि, लेखक, कथाकार, कला-समीक्षक, छायाकार, वृत्तचित्र निर्माता आदि रहे हैं, हम आप को किस रूप में देखें ? कोई इतनी सब चीजो को एक साथ कैसे सहेज पाता है ? किन्तु क्या मेरा यह सोचना सही है कि आप मूलतः एक कवि हैं.....?
हेमंत शेष-भानु जी! ये बात ठीक है कि कई विधाओं में गहरी दिलचस्पी रखते हुए सब में इन में शायद बहुत काम करने की कोशिश भी की है, पर साहित्य में कविता से नहीं, शुरूआत हुई थी कहानी-लेखन से। हरीश भादानी की पत्रिका ‘वातायन’ सूक्ष्म प्रयोगकामिता और वैचारिक जटिलता के लिए अवकाश, कथ्य की आणविकता, संवेदनात्मक-एकाग्रता, ‘ओब्स्क्योरिटी’ और बिम्बात्मकता के आकर्षण ने मेरे रचनाकार को कुछ ज्यादा जकड लिया... कहानी में विस्तार, नैरेशन के प्रति अनुराग और स्फीति के लिए जो ‘धीरज’ चाहिए उसकी तुलना में कविता ज्यादा करीब लगने लगी, क्यों कि एकाध कहानियाँ शरद देवडा की ‘अणिमा’ और राज. साहित्य अकादमी की ‘मधुमती’ आदि में १९६९ में छपने के लगभग तुरंत बाद प्रकाश जैन ने १९७० में ‘लहर’ में पहली कविता, बद्रीविशाल पित्ती जी ने सन् १९७३ में ‘कल्पना’ में और धर्मवीर भारती ने १९७४ में ‘धर्मयुग’ में मेरी कई कवितायें बराबर छापीं-और तब से मेरी प्रकाशित करीब २४ किताबों में १४, कविता की ही सब से ज्यादा हैं। हालाँकि कहानी के बारे में एक ‘सोच’ या सवाल बराबर बना रहा-हिंदी ‘लघु कथा’ में रूढ-कथानक की धारणा को मन में कुछ ‘नए तरह से’ गुनने के बहुत साल बाद २०१२ में ‘वाग्देवी’ से आया था लघु-कथा संग्रह ‘रात का पहाड’। मेरी माँ जया गोस्वामी, एक श्रेष्ठ स्वनिर्मित चित्रकार और संवेदनशील गजल-लेखिका हैं, चित्रकला के प्रति मेरी संलग्नता उन्हीं की अचेतन-देन है। अपनी कृतियों की ६ प्रदर्शनियाँ भी कीं। जिन में से तीन का उद्घाटन बाकायदा रामगोपाल विजयवर्गीय, कृपाल सिंह शेखावत और विष्णु खरे आदि जैसे लोगों ने किया। स्कूली दिनों से ही ‘राजस्थान-पत्रिका’ और फिर ‘इतवारी-पत्रिका’ में कला पर नियमित स्तम्भ-लेखन संपादकों-श्रीगोपाल पुरोहित और कर्पूचन्द्र ‘कुलिश’ के मौखिक-आदेश पर १९७२ से आगे कई साल किया और पश्चिम क्षेत्र संस्कृतिक केंद्र, उदयपुर के लिए ‘कला-प्रयोजन’ त्रैमासिक का नियमित संस्थापन-सम्पादन अकेले हाथ १५ बरस (वर्ष १९९५ से २०१० तक) करने के कारण गंभीर साहित्यिक-पत्रकारिता (सम्पादन) से भी जुडा। मेरा विश्वास हैः सभी कलाओं का उत्स एक है, और वह है सर्जनात्मकता, जो एक अदम्य मानवीय संवेदना है-फर्क है तो सिर्फ अभिव्यक्ति के माध्यमों का ही। कविता, कहानी, प्रकृति-प्रदत्त नैसर्गिक प्रतिभा का है उस से ज्यादा, विकसित की गयी रुचियों का...जब मैं कुछ लिख नहीं रहा होता, तो चित्र बनाता हूँ, या तस्वीरें खींचता हूँ या दूसरे संस्कृति-रूपों (बतौर श्रोता, संगीत के और बतौर पाठक इतिहास, पुरातत्व आदि) के पास उत्सुकतापूर्वक चला जाता हूँ क्यों किसी न किसी रूप में प्रतिक्षण शब्द, रंग, आकृति, स्वर, लय, अतीत, छाया और प्रकाश के निकट विनम्रता से रहना मेरे लिए स्वाभाविक रूप से प्रीतिकर है और जीने की एक अपरिहार्य शर्त भी। जब कुछ नहीं भी कर रहा होता हूँ, तो किसी न किसी विधा में करने की सोचता रहता हूँ...ये लगभग स्थाई मिजाज ही बन गया है-इस का किया क्या जाय?
भानु भारवि-याद है, आपकी कविता को स्व. नन्द चतुर्वेदी जी ने कभी ‘मनमोहिनी’ की संज्ञा दी थी। आपकी रचनाओं में सम्मोहन-शक्ति है, किन्तु मेरी राय में कहीं वह आम पाठक के स्तर पर कहीं ‘बौद्धिक व्यायाम’ की अपेक्षा भी करती है, साधारण पाठक के सामने एक बार में उसकी सम्पूर्ण आंतरिक प्रकृति स्पष्ट नहीं हो पाती-क्या ऐसा है, और क्यों है ?
हेमंत शेष-भारवि जी, आम पाठक को तत्काल समझ आ जाने वाली चीज तो शायद अखबार की रपट ही है-साहित्य-लेखन, खास तौर पर कोई कविता, दैनिक अखबार की एक खबर जैसी सपाट और दुखांत हो-ये तो खुद आप भी पसंद नहीं करेंगे...शायद कोई न करे, और इसकी वजह ये है कि साहित्य में कविता की विधा केवल कथ्य की दुनिया ही नहीं, वह शब्द के शिल्प की ‘कला’ भी है केवल सूचना या खबर कविता नहीं है। कविता में भाषिक-नवोन्मेष, प्रयोग-पर्युसुकता, प्रतीकात्मकता, बिम्ब, जीवनानुभव की सघनता के समानांतर जटिल और संश्ा*ष्ट-अभिव्यक्ति के लिए जरुरी आयतन-ये सब गहरे अंतर्गुम्फित हैं और इसी से कविता के पास जाने को अतिरिक्त रूप से एक ‘संस्कारित और स्वाधीन मन’ भी चाहिए। अगर एक उत्सुक पाठक आत्मा से संवाद करने वाले साहित्यिक-शब्द से अपने आप को कुछ अधिक गहरे प्रतिकृत करना चाहे तो शायद कविता ही उसे ये अवकाश सबसे पहले और सब से ज्यादा देती है। मेरा जोर ‘पाठक-संख्या’ की बजाय ‘पाठक-विवेक’ पर है, जो यकीनन विरल तो है-पर सिरे से गैर-मौजूद नहीं (आप द्वारा लिया जा रहा साक्षात्कार भी इसी की ताईद कर रहा है) मैं सहृदय के अनंत इंतजार में बैठे महाकवि भारवि की प्रख्यात उक्ति का मुरीद हूँ...नन्द चतुर्वेदी जी ने मेरे एक काव्य-संग्रह ‘आप को यह जान कर प्रसन्नता होगी’ (२००१) का ‘ब्लर्ब’ लिखते वक्त वक्त शब्द ‘मनमोहिनी’ नहीं ‘मोहिनी’ शब्द लिखा तो जरुर था, पर आप के कहे के अर्थ में नहीं, दूसरे मायने में उनका वाक्य था- ......‘‘हेमंत शेष की कविताओं की विशिष्टता यह भी है कि वे अपनी भाषा को लगातार जानी-पहचानी, विश्वसनीय और अक्लांत रखने की कोशिश करते हैं, मैं उनकी कविताओं की मोहिनी से बंधा हूँ....’’। यहाँ संकेत, कविताओं के प्रति आकर्षण से था- पाठक को भरमाने ललचाने या किसी तरह के रीतिकालीन मोदन से नहीं। मेरा लगभग समूचा लिखना पाठक की दिलचस्पी को निगाह में रखकर या उसे मुदित करने के भाव से किया जाता लेखन है ही नहीं, इसलिए संभव है आपकी उक्त शिकायत कुछ हद तक ‘वैध’ हो भी! पर कवि को पाठक के पास जाने की लोकप्रिय जुगत से उल्टा-मेरा विनम्र प्रस्ताव तो ये है-पाठक को खुद कविता की ओर आना होगा....! मुझे लिखते समय पाठक से असम्प्रक्त हो कर अपनी ही शर्त पर जैसी तबियत हो-लेखन करना है ये बात न जाने कैसे पहले दिन से मेरे अचेतन में एक पत्थर की लकीर बन गयी थी-अब तक उसी लकीर का फकीर हूँ, उस से छुटकारे की कोई
सूरत नहीं।
भानु भारवि-आपकी कविताओं में बिम्बों का विश्ा*ेष्णात्मक-विस्तार है और वे पाठक को ‘सूक्ष्म’ से स्थूल’ की और भी ले जाते हैं-पर कई बार लगता है, आफ यहाँ कविता में वस्तु और रूप को लेकर दुर्भावना के स्तर तक वैषम्य है। आप के कुछ संकलनों की कविताओं के विषय अगर ‘गौण’ हैं तो क्यों? क्या आप भी ऐसा ही अनुभव करते हैं?
हेमंत शेष-भानु जी...आप स्वयं एक कवि-लेखक हैं और यह जानते ही हैं कि छायावाद के बाद आयी कविता ने ‘स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह’ आदि जैसे कई ‘अकादमिक’-प्रत्ययों को कभी का छोड कर कविता को दूसरे कोण से देखने का अवकाश उपलब्ध करवाया था। सौभाग्य से आधुनिक हिन्दी कविता के आज अनेक कोण हैं कथ्य और शिल्प दोनों में अनूठे। अगर मैं कवि हूँ तो मेरे लिए प्रारंभिक प्रतिज्ञा, तो रचना के आधुनिक ‘कविता’ होने का ही है-दूसरा आग्रह है-समकालीन रहते हुए भी अपना मुहावरा खुद बनाने की जिद, कथ्य और रूप-सब बाद की बातें है! कथ्य और रूप अंतर्विन्यस्त अवधारणाएँ हैं और अनन्योआश्रित भी। सामान्यतः उन में मैं पूर्वापर सम्बन्ध नहीं देखता। क्या आपको ताज्जुब होगा-स्वीकारोक्ति के रूप से ही सही, अगर मैं आप से ये कहूँ कि १०३ पेज की मेरी लम्बी कविता ‘कृपया अन्यथा न लें, (१९९८) लिखते वक्त ‘कविता का ‘फॉर्म’ क्या हो’ ये बात पहले दिमाग में आयी और कविता का ‘कथानक’ कविता लिखते-लिखते बाद में ? ये मेरी ४३ पेज की पहली लम्बी कविता ‘जारी इतिहास के विरुद्ध (१९७३) का सर्जनात्मक-विस्तार ही थी, पर भिन्न मुहावरे और अलग कथ्य के साथ। आपका प्रश्न डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष, (वर्तामन अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य अकादमी) की उस कहीं टिप्पणी से सम्बद्ध तो नहीं, जो मेरे २००९ के बिहारी पुरस्कार मिलने के वक्त उन ने एक मोनोग्राफे में लिखी थी-जिसमें लिखा गया था-.....‘‘यहाँ अनन्यता इस बात में है कि हेमंत शेष विषय को पकडते तो नितांत वैयक्तिक रूप से हैं, किन्तु सभी फार्मूलेबाजियों को ध्वस्त करते हुए उनका कवितान्वयन समष्टिपरक भाव में होता है। व्यक्तिपरक प्रक्रिया की समाजपरक परिणति। उनके शब्दों में आभ्यंतर और बाह्य की यही परस्परिकता व्यक्त हुई है।...’’ समीक्षक की स्वाधीनता पर कोई प्रश्न नहीं, पर मैंने कभी कहीं लिखा था-ऐसा कौन सा विषय है जिस पर संसार में अब तक किसी न किसी भाषा में कोई न कोई रचना न लिख दी गयी होगी, इसलिए हर श्रेष्ठ कलाकृति मुझे तो एक बात और सुझाती है-और वह है-‘‘यहाँ से देखो’’। इस सब में ‘देखना’ तो महत्त्वपूर्ण है ही ‘‘यहाँ से देखना’’ ज्यादा महत्वपूर्ण है क्यों कि श्रेष्ठ कविता, विषय चाहे नया हो या पुराना-चीजो के परिपेक्ष्य बदलने का काम करती है, और एक बार चीजो के परिपेक्ष्य बदल जाने के बाद जानी पहचानी, परिचित चीजों भी हमें नए आलोक, नए रूप-रंग, नए आकारों में दिखने लगती हैं। क्या यही साहित्य का असल जादू नहीं है?’’ न रचना केवल रूप से संभव है न केवल कथ्य से-अच्छी कृति तो दोनों का ‘आदर्श’ योग ही होगी! यह भी मानना है संस्कृति के लिए, साहित्य के लिए ‘विचार’ का महत्त्व कहीं ज्यादा है-‘विचारधारा’ का नहीं या बहुत कम....एक छोटा सा स्वायत्त मौलिक विचार, विचार, किसी भी लौह-कपट वाली विशाल रूढबद्ध विचारधारा का सार्थक अतिक्रमण है-जैसे किले की दीवार तोड कर खुद उग आया हो कोई नन्हा सा पौधा!
हेमंत शेष-पर यर्थाथ का रचना से कैसा सम्बन्ध आपकी दृष्टि में होना चाहिए?
जो कुछ मैं देखता हूँ, सुनता हूँ, चखता और सूँघता हूँ-संसार के भौतिक यथार्थ को जान पाने का मेरा एन्द्रिक अनुभव है! असंख्य चेहरे...अजीबोगरीब आवाजें...आश्चर्यजनक जगहें...किस्म-किस्म के स्वाद...विविध टेक्सचर...सबमन के अँधेरे काठगोदाम में फेंके जाते रहते हैं! खोदने-उलीचने की क्रिया में मेरे दिमाग के हाथों को एक पल का चैन नहीं, अगर मैं हूँ-और एक आदमी के रूपाकार में अपने समय, और समकालीन इतिहास में हूँ, तो यह बोध ही मुझे नयी-नयी प्रतिज्ञाओं और जिम्मेदारियों से भर देता है। अगर मैं अपने ही मन में अपनी उपेक्षाओं के बावजूद अपने मनुष्य होने की पहचान एक लेखक के रूप में करता हूँ तो खुद पर उत्तरदायित्व का एक अघोषित कफ्र्यू सा भी लागू करता हूँ कि न मैं शब्द के कला में अराजक हो सकता हूँ, न निहिलिस्ट, प पक्षवादी, न किसी भी वाम या दक्षिणपंथी विचारधारा का बेशर्म भोंपू-मुझे सिर्फ उस रचनात्मक एकांत और एकाकीपन से मतलब है जो मेरे अंदरुनी संसार पूंजीवादी या (नकली) साम्यवादी संसार नहीं। मेरा विनम्र मत है-अगर आप कवि हैं तो आफ ‘तटस्थ’ विवेक को संसार की हर चीज स्वीकार्य होगी-...हर चीज -याने घर की छाछ के साथ ठन्डे परांठे भी और राष्ट्रपति भवन के बेंक्वेट हॉल का राजसी डिनर भी...लेटने को प्लेटफार्म का कडा फर्श हो या पांचतारा होटल का मखमली बिस्तर, वायुयान की उडानें हों या बिना रिजर्वेशन सेकण्ड क्लास में धक्के, वातानुकूलित सुगन्धित कमरे हों अथवा गू-मूत से सनी खुली गली की सडांध एक साथ सब....हर अनुभव काम का है अगर उसे अप्रतिमतापूर्वक, सुसंगत सन्दर्भ में साहित्य की अपनी शर्तों पर कला का रूप दिया
जा सके....
भानु भारवि-तब तो यहाँ यह भी पूछा जा सकता है आपकी ‘रचना-प्रक्रिया’ क्या है?
हेमंत शेष-अगर एक लेखक हैं तो सबसे पहले इसी असुविधाजनक सवाल से आपको दो-चार होना होता है। इस का जवाब ‘दो और दो चार’ जैसा आसान नहीं। रचने की असल ‘प्रेरणाओं’ का कोई साफ नक्शा हाथ लग जाए, तब भी क्या मैं उस के सहारे अपनी भावी-रचना का ठीक-ठीक ठौर-ठिकाना प्राप्त कर सकूँगा? नहीं। बिलकुल नहीं। हर शुरू होने से पहले, बहुत कुछ है अज्ञात, अपूर्वमेय, अँधेरे में डूबा...एक बहुत गहरी बावडी जिसकी सीढियाँ किसी अज्ञात अनंत की ओर उतरती हैं...क्या वहाँ जल है या सिर्फ सूखी खडखडाती निस्तब्धता...कोई नहीं जानता! हर अच्छी रचना, लिखे जाने से पूर्व एक गहरी अपूर्वमेयता का लबादा ओढे रहती है.....काले भारी कम्बल को हटा सकूँ तो कोई आकृति, कोई रूपरेखा दिखे!
केवल एक बुरा लेखक जानता है-उसकी रचना का अंत किन पंक्तियों से होगा। एक रद्दी लेखक, सबसे पहले लिखे जाने वाले उपन्यास या कहानी का शीर्षक सोच सकता है और बाद में उस शीर्षक के आसपास गढ सकता है वह कोई कहानी। सामाजिक-राजनीतिक विषय पर निबंध लेखन में और साहित्यिक रचना में यही अंतर है। पत्रकार की प्रतिभा खबर को जल्दी से जल्दी परोसने में है, घटना के तत्काल बाद उसकी शीघ्रतापूर्वक वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग में। लेखक का काम पत्रकार जैसा नहीं! उसे अपना विवेक और कच्चा माल और क्राफ्ट काम मैं लाना है। अनुभव को पचाना है। सोमरस-निर्माण के बाद की जाने वाली ‘एजिंग’ जैसा है ये सब। उसे दिनों तक अनुभव के घोल और भाषा के तडके को मन की हांडी में रख कर इच्छित सीमा तक खमीर उठाना है। निकालना तब है जब अगर वह पीने और परोसने और स्वाद लेने योग्य हो, तभी! हम अधिकांश ऐसे धीरज से दूर हैं.... मुझे ताज्जुब होता है बिना कोई नरसंहार देखे मैं उस पर कोई कहानी अधिकारपूर्वक कैसे लिख सकता हूँ। मैं उत्तरी धुव पर जाए बिना क्या बर्फीले तूफानों, शून्य से भी पचासों डिग्री नीचे के पारे, रेनडियर या कुत्तों से खींची जाने वाली गाडियों, और बिना दरख्तों वाले असीमित हिम-विस्तारों पर कुछ ‘अधिकृत’ लिख सकूंगा? शायद ईमानदारी से तो नहीं। इसका मतलब यह बिलकुल न निकाला जाय कि रचना में ‘कल्पना’ की कोई जगह नहीं और उसकी कृति में आया हर वर्णन बस व्यक्तिगत-लेखकीय अनुभव का रूपायन ही हो। प्राथमिक अनुभव निस्संदेह कल्पना से चित्रित वर्णन से ज्यादा ‘अधिकृत’, विश्वनीय (‘‘औथेन्टिक’’) तो सदैव रहेगा ही। कल्पनाशीलता और रचना के अंर्तंबंधों पर आगे, यथावसर विाचर करेंगे....यथार्थ हमारे चारों तरफ फैला है। वह तेजी से बदलता है। या कभी कभी लगता है वह नहीं बदला! बरसों से एक सा दृश्य...हमने अपनी इन्द्रियों के जरिये उसे जाना है। इसलिए वह हमारे मन में अचेतन में घर किये बैठा है। उससे छुटकारा मुमकिन नहीं, इसलिए ध्यान से देखें तो रचनाकार की हर ‘फैंटेसी’ के बहुत पीछे, उसकी कल्पना की स्वैर-उडान तक में किसी न किसी वास्तविक ‘यथार्थ’ के बीज ही छिपे मिलेंगे।
भानु भारवि-आपने लम्बे समय तक प्रशासनिक सेवाओं में काम किया था और आप की यायावरी भी वैविध्यपूर्ण रही होगी-आप के निकट कैसा सम्बन्ध रहा है ‘यायावरी’ और साहितय का ?
हेमंत शेष-मैं उस अर्थ में अपने को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि लगभग ३७ बरस सरकारी सेवा में रहा और इस अवधि में राजस्थान को और भी न*ादीक से देखने का मौका मिला-कस्बों और शहरों ही नहीं छोटे-छोटे अनगिनत गाँवों तक को। जहाँ-२ रहा या गया -वहाँ के बारे में रचनात्मक लेखन-कविताएँ तो खैर लिखी ही गयीं....देश का तीन बार लगभग पूरा पूरा भ्रमण भी किया है और मैंने देखा है भारत का खास तौर पर राजस्थान का ग्रामीण-परिदृश्य कितना और किस सीमा तक बदला है-यह सब एक चैतन्य नागरिक और लेखक के लिए बडा मूल्यवान अनुभव है...इतिहास में दिलचस्पी का ये फायदा हुआ कि मैंने जयपुर, टोंक, प्रतापगढ और पुष्कर जैसी जगहों को उनकी ‘सम्पूर्णता’ में देखा और अपने दोस्त की एक पत्रिका के लिए बहुत लम्बे आलेख लिख सका-ये यात्रा-वृत्तांत के बहाने अपने समाज और संस्कृति को और अंरतरंगता से याद करने और जानने की चेष्टा ही थी, पाली, अलवर, सीकर, भरतपुर, गंगानगर अजमेर और कोटा पर पर भी जहाँ-२ नौकरी में रह आया हूँ, इसी तरह ऐतिहासिक सांस्कृतिक दृष्टि से कुछ मौलिक लिखने का बहुत मन है-ये संकल्प बडा है, श्रमसाध्य भी, जाने कब पूरा हो...मेरा विनम्र मत यह है कि भारत के एक अनूठे अद्वितीय प्रदेश-राजस्थान के कुछ महत्वपूर्ण कस्बों नगरों, स्थानों का सही परिप्रेक्ष्य में विस्तारपूर्वक आकलन या तो हुआ ही नहीं है या चलताऊ , फौरी ढंग से उनके बारे में यहाँ-वहाँ सामग्री बेहद उथले रूप में बहुत कुछ तितर-बितर रूप में पढने-सुनने में आती है। यह एक किस्म का गहरा और चिंताजनक सांस्कृतिक-निर्वात है। यदि कोई जगह किसी भी मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक कारण से अपने समृद्धतर अतीत की अनेक उत्कृष्टताओं के कारण शोध और अनुसन्धान का अवकाश आज भी किसी अनुसंधानकर्ता लेखक को दे सकती है तो फिर चाहे उसका वर्तमान उसका आज चाहे कितना भी विपन्न सामान्य-सा क्यों न नजर आता हो-उस जगह के बारे में जानना हर उस भारतीय नागरिक का अलिखित कर्तव्य है जो अपनी पुरातात्विक संपदा के प्रति जरा सा भी आकर्षक या आदर भाव मन में रखता हो। आजकल मैं वही करने की फिराक में हूँ....
‘अनुष्टुप’, १३, गायत्री नगर, सोडाला, जयपुर-३०२००६