हद से अनहद में जाते एक कवि का हलफनामा

सवाई सिंह शेखावत


सडकवासी राम!
न तेरा था कभी
न तेरा है कहीं
रास्तों दर रास्तों पर
पाँव के छापे लगाते
ओ अहेरी
खोलकर मन के किवाडे सुन
सुन कि सपने की
किसी सम्भावना तक मे नहीं
तेरा अयोध्या धाम।
सडकवासी राम!
सोच के सिर मौर
ये दसियों दसानन
और लोहे की ये लंकाएँ
कहाँ है कैद तेरी कुम्भजा
खोजता थक
बोलता ही जा भले तू
कौन देखेगा
सुनेगा कौन तुझको
ये चितेरे
आलमारी में रखे दिन
और चिमनी से निकलती शाम।
सडकवासी राम!
पोर घिस-घिस
क्या गिने चौदह बरस तू
गिन सके तो
कल्प साँसों के गिने जा
गिन कि
कितने काटकर फेंके गए हैं
ऐषणाओं के पहरुए
ये जटायु ही जटायु
और कोई भी नहीं
संकल्प का सौमित्र
अपनी धडकनों के साथ
देख वामन-
सी बडी यह जिन्दगी
कर ली गई है
इस शहर के जंगलों के नाम।
सडकवासी राम!
-हरीश भादानी
स्वर्गीय हरीश भादानी की कविता ‘सडकवासी राम’ मुझे हद से बेहद में जाते एक कवि का हलफनामा लगती है। अपनी इस कविता में वे रामायण में वर्णित यशस्वी और अवतार की तरह स्वीकृत अयोध्या के परम प्रतापी राजा राम की बजाए सडकवासी राम को तर*ाीह देते हैं। जो अयोध्या-धाम में रह कर नहीं, बल्कि अस्तित्व की बुनियादी प्रतिज्ञा से जुडकर आज भी सडक (जीवन-पथ) पर संघर्ष-रत है। यह कविता एक जन-कवि के जीवन-मूल्यों का एक नायक पर सफल प्रतिरोपण भी है। क्योंकि इतिहास में राम पहले महापुरुष है जो जीवन-दर्शन के नाम पर बिना कोई बयानबा*ाी किए-उच्चतर निकष पर उसे जीकर दिखाते हैं। ‘रम्यन्ति इति रामा’ः जो सार्थक जीवन जीकर दिखाए उस शै का नाम है-राम।’ यही कारण रहा कि जीवन भर ‘गीता’ में उच्च जीवनादर्शों को खोजते महात्मा गाँधी भी अवसान वेला में राम पर ही आकर टिकते हैं।
तीन चरणों में वर्णित इस कविता के पहले चरण में कवित कहता- ‘न तेरा था कभी/न तेरा था कहीं/रास्तों-दर-रास्तों पर/पाँव के छापे लगाते/ओ अहेरी/खोल कर मन के किवाडे सुन/सुन कि सपने की/किसी संभावना तक में नहीं/तेरा अयोध्या धाम। सडकवासी राम!’ अर्थात अस्तित्व की मूल प्रतिज्ञा से नालबद्ध जीवन-पथ के ओ सच्चे सहयात्री सपने की किसी संभावना तक में अयोध्या तेरा धाम (टिक रहने का केंद्र) नहीं हो सकता। जीवन को लेकर बुद्ध ने एक महत्वपूर्ण बात कही है कि ये संज्ञाएँ हैं जो जीवन की स्थिरता का भ्रम पैदा करती हैं, लेकिन क्रियाएं हमें बताती हैं कि जीवन सतत गति का नाम है।’ कवि इस पैरे में कमोबेश इसी स्थापना को दुहराते हुए बताता है कि ‘रास्तों-दर-रास्तों पर/पाँव के छापे लगाते/ओ अहेरी’-जीवन-पथ पर सतत गतिमान और उसके मार्फत उसके असल आशय को चरितार्थ करते ओ युग-नायक ‘खोल कर ‘मन के किवाडे सुन!’ अक्सर बुद्धि के किवाड खोलकर सुनने की सलाह पंडित-जन देते रहे हैं। पर भादानी जी का मनीषी कवि जानता है कि आदमी करता वही है जिसे उसका मन स्वीकारे। इसलिए अपने नायक को वे इसी पथ पर चलने की सच्ची सीख देते हैं।
वैदिक मनीषा का निष्कर्ष है कि मन के धरातल का सोच जब भाव द्वारा अभिप्रेरित और बुद्धि द्वारा नियंत्रित हो, तब निरा स्वार्थगामी नहीं हो सकता। पर जहाँ भाव से पहले बुद्धि है वह सोच कितना ही विस्तार लिए हो, अंततः वह निपट स्वार्थ तक सिमट कर रह जाता है। निपट से आशय यहाँ जीवन की उस ‘प्रेय’ दृष्टि से है जिसमें व्यक्ति चीजों को केवल ‘प्रियता’ (अच्छा लगने) की तात्कालिक दृष्टि से देखता और उस पर अमल करता है। ऐसे में औरों के हित की बात दूर, व्यक्ति स्वयं अपने हित के बारे में भी ठीक से नहीं सोच पाता। जब कि ‘श्रेय’ की दूरगामी दृष्टि में ‘मम’ और ‘इतर’ दोनों का हित समाहित है। कवि इस मान्यता को राम और रावण जैसे नायकों के व्यक्तित्व के मूलभूत अंतर और जीवन के स्तर पर इनके बीच युगों-युगों से चले आ रहे संघर्ष के रूप में देखता है। इसीलिए वह अपने नायक राम (सडक वासी) से कहता है- ‘सोच के सिर मौर ये दसियों दसानन’ (दस माथों वाले लोग) हमेशाा ही अपनी-अपनी लंकाओं में कुम्भजा सीताओं को कैद करते आये हैं। उधर तेरा संघर्ष उस चुरा ली गई जीवनी-शक्ति को खोजने और फिर से पाने का रहा है- अतः तू उसी को खोजने-पाने के लिए प्रयत्नशील रह। इस संधान में तुझे अनथक रहना होगा। तू थक कर उसे स्थगित नहीं कर सकता। गौरतलब तथ्य यह भी है कि इन खल-शक्तियों की अराजकताओं के विरुद्ध बोलने मात्र से कुछ नहीं होता। उन्हें निर्मूल करने के लिए उनके विरुद्ध सतत संघर्ष करना होता है। और *ााहिर है वह संघर्ष महलों में रह कर संभव नहीं। उसके लिए जीवन के विकट-पथ पर आना पडता है। जीवन-शक्ति का जो भी सच्चा खोजी है वह केवल सतत प्रयत्नशीलता के *ारिए ही उन चुरा लिए गए उजले दिनों और अँधेरी रातों को आलोकित करती चिमनियों को फिर से खोज पाता है।
तीसरे और अंतिम चरण में कवि जीवन के निमित्त उस *ारूरी संघर्ष की मियाद का शास्त्रीय सन्दर्भ बताते हमें उसके मार्फत हासिल होने वाले साँसों के कल्पों के बारे में बताता है। जो रामायण और महाभारत दोनों में वर्णित हैं- कि अनैतिकता के प्रतीक रावण को ध्वस्त करने के लिए राम को भी चौदह वर्षों तक निर्वासित होना पडा था। उधर छल-प्रपंच को ही जीवन की सर्वोपरी नीति और अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जाते कौरवों से निपटने के लिए पांडवों को भी चौदह वर्ष का अज्ञातवास भोगना पडा था। उन सन्दर्भों का स्मरण करते हुए कवि अपने नायक से कहता है ‘अस्तित्व-संरक्षण हेतु उस संघर्ष की-आखिर एक सीमा है। वह निस्सीम नहीं है और उसका खात्मा हमेशा जीवन के हक में होता आया है। इसलिए संघर्ष की उस मीयाद को अँगुलियों की पोरों पर गिनने के बजाए तेरी दृष्टि उसके *ारिए हासिल होने वाले साँसों के कल्प पर होनी चाहिए। सच यह भी है कि अस्तित्व-संरक्षण के उस संघर्ष में शत्रु-शक्तियाँ सबसे पहले उसमें सहयोग करने वाले एषणाओं के पहरेदार रहे जटायुवों और उस संकल्प को पुष्ट करते सौमित्रों का संहार करती हैं। तब अंत में जीवन-यज्ञ में एक अकेले वामन को ही समस्त विश्व-वैभव लौटा लाने के लिए जद्दोजहद करनी पडती है। इस तरह जैसे यह कविता अपने विन्यास में अस्तित्व-संरक्षण का समूचा एजेंडा बन जाती है।
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