संपादकीय

डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’


यह एक सुखद संयोग है कि भारतीय जन-मन में रचे बसे रामचरित के आह्लदकारी पर्व दशहरा और दीपावली के साथ ही इस कथा के आदि रचयिता वाल्मीकि की जयन्ती भी इसी महिने में आई है। वाल्मीकि रामायण इस धरती पर लिखा गया पहला महाकाव्य है। बृहद्धर्म पुराण में इसे समस्त काव्यों का बीज- ‘काव्यबीजं सनातनम्’ कहा गया है। महाभारत, पुराण, धर्म-इतिहास-काव्यादि सभी प्राचीन ग्रन्थों के मूल में कहीं न कहीं यह आदि काव्य रहा है। विस्मय की बात है कि हजारों वर्ष पूर्व लिखा गया होने के बावजूद यह विश्व का सबसे बडा महाकाव्य है। और इससे भी बडी बात यह है कि प्रारम्भिक महाकाव्य होने पर भी सर्जनात्मकता की दृष्टि से यह आज तक बेजोड है।
डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल कहते हैं कि ‘‘भारत का जो भौतिक संसार है, जो वृक्ष-वनस्पति और पशु-पक्षी हैं, जो पर्वतमालाएं और मेखजाल हैं, उसका सर्वोत्तम दर्पण वाल्मीकि रामायण है। उनके वर्णन के लिए यदि हमें समर्थ शब्दावली की आवश्यकता हो तो वाल्मीकि की शरण में जाना चाहिए।’’ डॉ. अग्रवाल का यह भी मानना है कि वाल्मीकि रामायण को भारत का सबसे महान् लोकवार्ताशास्त्रीय ग्रन्थ मानकर उसका अध्ययन किया जाना चाहिए।
भारतीय वाङ्मय परम्परा में यह पहला काव्य प्रबन्ध है जिसके नायक मनुष्य हैं। इससे पूर्व रचे गये वैदिक वाङ्मय के केन्द्र में मानवेतर अलौकिक सत्ताएं हैं, देव-दानव आदि परोक्ष शक्तियां हैं। किंतु वाल्मीकि का नायक पूर्णतः लौकिक मनुष्य है। कौशल्या के गर्भ से उत्पन्न, दशरथ का पुत्र राम जो शील, शक्ति और मर्यादा का प्रतिमान है, जो अपने स्वयं के पराक्रम
के बल पर महान उपलब्धियां अर्जित करता है, जीवन में सत्य और धर्म की प्रतिष्ठापना करता है। राम के दिव्य-अलौकिक गुणों को देखकर सत्यदृष्टा ऋषियों ने यद्यपि इनमें ईश्वरीय अवतार के दर्शन किये हैं तथापि, अपनी दैहिक उपस्थिति में राम मानवी रुप ही हैं।
वाल्मीकि रामायण की अन्य महत्वपूर्ण विशेषता है, इसका सर्वस्पर्शी सामाजिक सरोकार। इसके पहले अध्याय के अन्तिम श्लोक में वाल्मीकि इस ग्रन्थ की फलश्रुति इस प्रकार लिखते हैं-
पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात्, स्यात्क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात्।
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयात्, जनश्च शूद्रोऽपि महत्वमीयात्।।
(सर्ग 1/1॰॰)
अर्थात् इस ग्रन्थ को ब्राह्मण पढे तो विद्वान् होवे, क्षत्रिय पढे तो राज्य प्राप्त करे, वैश्य पढे तो व्यापार में लाभ होवे और शूद्र भी पढे तो प्रतिष्ठा को प्राप्त होवे। बहुधा ऐसा उल्लेख किया जाता है कि प्राचीन वाङ्मय में शूद्रों को अध्ययन-अध्यापन से वंचित रखा गया था और इन संर्दभों की चर्चा भी बहुत की जाती है। ऐसे में महामुनि वाल्मीकि की यह घोषणा नही भूलनी चाहिए कि वे अकुंठित रुप से शूद्र को भी यह ग्रन्थ पढने का अधिकार प्रदान करते हैं।
रामायण का मूल उद्देश्य एक आदर्श मानव का चरित्र प्रस्तुत करना है। अतः इस कथा का प्रारम्भ श्रेष्ठतम मनुष्य की खोज से होता है। तपस्वी वाल्मीकि मुनिवर नारद से पूछते हैं कि इस समय संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, सत्यवादी, चरित्रवान, आत्मजयी, प्राणिमात्र का हितैषी और जिसके कोप से देवता भी डरते हैं, ऐसा मनुष्य कौन है? ध्यातव्य है कि वाल्मीकि यहां जीते-जागते वर्तमान की बात करते हैं, किसी पुराकथा में छलांग नहीं लगाते।
वे कहते है, ‘‘कोऽन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके..........’’ साम्प्रतम् अर्थात् अभी, इस समय में।
यह विश्व में मानववाद के विचार का पहला बीज पडने की उल्लेखनीय घटना है, जब वाल्मीकि अपनी रामकथा की भूमिका और आधार सुनिश्चित करते हैं। उनकी जिज्ञासा न तो किसी देव, गंधर्व, सुर, असुर के बारे में हैं, न वे किसी अतीत की कथा में रमना चाहते हैं। उनका उद्देश्य अलौकिक चमत्कारों के बल पर कार्यसिद्धि प्राप्त करने की कथा लिखना भी नहीं है। वे तो जीवनमूल्यों से परिपूर्ण ऐसे संवेदनशील मनुष्य का चित्रण करना चाहते हैं जो अपने संकल्प और सामर्थ्य के भरोसे कार्यसिद्धि प्राप्त करता है। वस्तुतः यह भारतीय मानववादी दृष्टि-आदर्श मानव की खोज का विचार- किसी प्रतिक्रिया या प्रतिशोध से उत्पन्न नही हुआ जैसा कि हम मानववाद के पश्चिमी इतिहास में पाते हैं। यह निरंतर साधनारत एक विद्वान् महामुनि और एक तपस्वी के लोकोपकारी संवाद से निपजा हुआ विचार है। वाल्मीकि रामायण का पहला श्लोक इस बात की पुष्टि करता है।
महाकावि वाल्मीकि की दृष्टि कितनी गहरी और यथार्थपरक है इसे हम एक उदाहरण से देखते हैं। ग्रन्थ के आरम्भ में नारद के मुख से राम का परिचय दिलवाते हुए वाल्मीकि राम के शारीर सौष्ठव के बारे में लिखते हैः-
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिंदमः।
आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविऋमः।। (सर्ग 1/10)
अर्थात राम की छाती चौडी है, धनुष बडा है, गले के नीचे की हड्डी मांस से ढंकी हुई है। वे शत्रुओं का दमन करने वाले हैं। उनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी है, मस्तक बडा है, ललाट चौडा है और चाल मनोहर है। इस संक्षिप्त से वर्णन में वाल्मीकि राम का ऐसा रेखाचित्र गढ देते हैं कि वह युगों-युगों तक के लिए राम का स्थाई स्कैच बन जाता है। ‘आजानुबाहु’ की एक ऐसी लीक गाढ देते हैं कि शताब्दियां गुजर गई पर कोई कृतिकार, कोई लेखक, कवि उसे छोडता नहीं। कालिदास, भवभूति, तुलसी, निराला

जैसे महाकवियों से लेकर साधारण रामचरित गायक तक इस ‘आजानुभुज’ शब्द के बिना राम के रुप की कल्पना नहीं कर पाते। आखिर क्या सम्मोहन है इस शब्द में? इस पद को तनिक खोल कर देखते हैं।
रामचन्द्र अपने समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। यह बात शिव का धनुष भंग करने, परशुराम के असाध्य धनुष को चढाने, चौदह हजार सेना के सहित खर-दूषण का अकेले ही वध कर देने, सुग्रीव के बाताये हुए सात तालवृक्षों को वेध देने आदि अनेक प्रमुख घटनाओं से प्रमाणित हुई है। राम का ‘शार्ङ्ग’ नाम का धनुष विश्वविख्यात था। इसीलिए वे शार्ङ्गधर या शार्ङ्गपाणि या सारंगपाणी के नाम से जाने जाते हैं। किसी भी धनुर्धर की श्रेष्ठता की कसौटी यह है कि वह कितने वेग से, कितनी दूरी तक और कितनी फुर्ती से धारा प्रवाह (एक के बाद एक) वाण छोड सकता है। जो धनुर्धारी जितनी चपलता के साथ ऐसा कर सकता है, वह युद्ध में उतना ही अपराजेय रहता है। न्यूटन के गति, बल और त्वरण के प्रसिद्ध नियमों के पचडे में न पडें तो भी यह आसानी से समझा जा सकता है कि धनुष का आकार जितना विशाल होगा उसकी प्रत्यंचा भी उतनी ही लम्बी होगी। चाप जितना वृहदाकार होगा उस पर चढाये गये वाण पर डोरी का तनाव बल भी उतना ही अधिक होगा। चाप पर तनी हुई प्रत्यंचा कमानी का कार्य करती है। इस प्रत्यंचा का तनाव बल ही वाण की गति और दूरी को निर्धारित करता है।
सार यह है कि वाण की प्रहार क्षमता धनुष के आकार पर निर्भर होती हैं। अतः धनुष जितना विशाल होगा उसकी मारक क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी। इस दृष्टि से विशाल धनुष के संचालन के लिए शरीर की आकृति भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। अर्थात् भुजाएं जितनी अधिक लम्बी होगी उतने ही बडे धनुष पर शर-संधान किया जा सकता है। वाल्मीकि के नायक राम आजानुबाहु हैं। अपने समय के सर्वाधिक लम्बी भुजाओं वाले व्यक्ति।

सामान्य मनुष्य की भुजाएं कमर और घुटनों के बीच तक रहती है, किन्तु राम की भुजाएं उनके घुटनों को स्पर्श करती हैं। यही कारण था जो राम को अप्रतिम धनुर्धर बनाता है। रघुवंशियों का वर्णन करते हुए कालिदास भी इस विशेषण को कहने का मोह नहीं त्याग पाते। वे
कहते है -
‘‘व्यूढोरस्को वृषस्कंधो शालप्रांशुर्महाभुजः’’।
अर्थात् विशाल वक्षस्थल, बैलों के जैसे मजबूत कंधे, शाल वृक्ष की तरह खूब लम्बी और बडी भुजाओं वाले...........। तुलसी के ‘आजानुभुज’ के बिना तो ‘शरचापधर’ शब्द ही अधूरा सा लगता है।
यह थी वाल्मीकि की अगाध अर्थपूर्ण और तथ्यान्वेषी दृष्टि। पूरा महाकाव्य वाल्मीकि की ऐसी विलक्षण सर्जनात्मक दृष्टि से विद्ध है।
वाल्मीकि का जीवनबोध कितना संवेदनापूर्ण, दृष्टिसम्पन्न, विशद और नैतिक है, इसका एक प्रसंग बारम्बार याद आता है और रोमांचित कर देता है। संस्कृत साहित्य से नाममात्र का परिचय होने के कारण नहीं जानता कि यह प्रसंग संस्कृत वाङ्मय जगत में कितना महत्वपूर्ण आंका गया अथवा उल्लेखित हुआ है परन्तु कविता को जानने-समझने की उत्कृष्ट इच्छा और तज्जन्य अत्यल्प अनुभव के आधार पर देखता ह तो यह प्रसंग मुझे अवाक कर देता है। ऐसी अर्थगौरव से भरी हुई, भावसंश्लिष्ट और कसी हुई कविता बहुत कम देखने को मिलती है।
प्रसंग अशोक वाटिका का है जहां सीताजी को देखकर हनुमान सोचते हैं कि, ‘ओह ! यही वह सीता है जिसके कारण राम करुणा, दया, शोक और प्रेम-इन चार कारणों से संतप्त होते रहते हैं।’’ वाल्मीकि यहाँ राम के हृदय में चार प्रकार के भावों की उद्भावना करते हैं। वे सीता के प्रति करुणा से भरे रहते हैं। उन्हें सीता पर दया आती है। सीता के लिए वे शोक में डूबे रहते हैं और सीता
से मिलने की कामना में दिन रात तपते रहते हैं। आगे वे इन चारों भावों का सकारण विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि , ‘‘ एक स्त्री खो गई, यह सोचकर उनके हृदय में करुणा भर आती है। वह हमारे आश्रित थी, यह सोचकर वे दया से द्रवित हो उठते हैं। मेरी पत्नी मुझसे बिछुड गई, यह विचार उन्हें शोकाकुल कर देता है और मेरी प्रियतमा मुझसे दूर हो गई, यह भावना उनके हृदय में प्रेम की वेदना जगा देती है।’’
यहाँ वाल्मीकि द्वारा वर्णित राम के संताप के विविध स्वरूप राम के चित्त की परतों को ऐसे खोल कर रख देते हैं मानों कोई कली स्पर्शमात्र से एक-एक पंखुडी के रूप में खुलकर अपना समूचा रूप-सौन्दर्य और गंध लुटाने लग जाए। हम सोच सकते हैं कि वाल्मीकि राम के चरित्र को किस तरह परत-दर-परत गढते हैं। राम की इस करुणा का कारण अपहृत व्यक्ति का स्त्री होना है। यदि वह पुरुष होता, लक्ष्मण, भरत या हनुमान होता तो शायद इतनी गहरी करुणा नहीं फूटती। करुणा के साथ उसके प्रति दया भी है। क्योंकि वह स्त्री हमारे अधीन थी। यदि हमारे अधीन नहीं होती तो, वह स्वाधीन होती तो केवल करुणा होती। यहाँ एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि कोई यदि किसी के भरोसे, सहारे रहता है तो वह एक उत्तरदायित्व से भी जुड जाता है। पराधीन के प्रति दया का यह भाव किस तरह पात्रापेक्षी होता है यह हम अन्यत्र भी महसूस करते हैं। एक ही तरह का संकट यदि एक बच्चे और एक युवक के सामने आ जाए तो हमारी दया की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि कौन हमारे कितने अधीन है। यह मानवीय संवदेना ही है कि जो हमारे जितना अधीन होता है उसके प्रति हम उतने ही दयार्द्र हो उठते हैं।
आगे वे कहते हैं कि वह स्त्री उनकी पत्नी है, अतः वे शोकमग्न रहते हैं। शोक व्यक्तिगत संबंधों से जुडा हुआ भाव है। यह हमारे दैनन्दिन का अनुभव है कि अपरिचित
सैकडों लोगों की मृत्यु की खबर भी हमें उतना विचलित नहीं करती जितना किसी एक परिचित की मृत्यु कर जाती है। संबंध जितने व्यक्तिगत होते हैं शोक भी उतना ही घनीभूत होता है। करुणा जहां व्यक्ति-निरपेक्ष होती है वहीं शोक व्यक्ति-सापेक्ष होता है। करुणा, दया और शोक के भावों की यह उद्भावना मानवीय व्यवहार की सूक्ष्मतम आलोचना है। और अंतिम बात यह कि वह स्त्री जो उनकी पत्नी है और उनकी प्राणप्यारी है, वे उसकी चाहत में प्रेमाग्नि में जलते हैं, विरह में तडपते हैं। अन्त में राम के जीवन के इस निजी पक्ष को भी ध्यान में रखकर वाल्मीकि उनके मर्यादास्वरूप के साथ उनके पुरुषभाव को भी नहीं भूलते हैं। राम के संताप में घुले-मिले ये चारों भाव वस्तुतः मानवीय संवेदना की पराकाष्ठा है। मूल श्लोक इस
प्रकार है -
‘‘इयं सा यत्कृते रामश्चतुर्भिरिह तप्यते।
कारुण्येनानृशंस्येन शोकेन मदनेन च ।।49।।
स्त्री प्रणष्टेति कारुण्यादाश्रितेत्यानृशंस्यतः।
पत्नी नष्टेति शोकेन प्रियेति मदनेन च ।।5॰।।’’
(सुंदरकाण्ड, सर्ग-15)
इधर, इन दिनों रामकथा के जिस तरह के मनमाने कु-पाठ और आत्मघाती विमर्श प्रस्तुत किए जा रहे हैं वह इतने घटिया और विघटनकारी है कि वे इन पाठकर्ताओं की कुत्सित मानसिकता को ही प्रकट करते हैं। कबीर, तुलसी, रैदास, मीरा, रहीम, रसखान, धन्ना, पीपा जैसे संत कवियों से लेकर आधुनिक महाकवियों तक के काव्यनायकों और अभीष्ट पात्रों का चारित्रिक वध किया जा रहा है। भारतीय काव्य-परम्परा के प्रतिनिधि कवियों की जो प्राणनाडियां राम की संघर्ष गाथा से स्पंदित होती हैं उन पर तेजाब उडेला जा रहा है। दूसरी ओर बर्बर अत्याचारियों, दुराचारियों को नायकत्व का चोला चढाया जा रहा है। शताब्दियों से अन्याय, अत्याचार और पाप के प्रतीक
रावण में कुछ लोग अपना नायक तलाशने लगे हैं।
उसे वनवासियों-जनजातियों का प्रतिनिधि सिद्ध किया जा रहा है।
यह घोर आश्चर्य की और उससे भी अधिक क्षोभ की बात है कि उन लोगों को इन आदिवासियों-वनवासियों-पर्वतवासियों के ही बीच के निषादराज, शबरी, जटायु, सुग्रीव, जामवन्त जैसे पात्र कभी आकर्षक और प्रेरक नही लगते। इनका मन शूर्पणखा, खर-दूषण, मेघनाद, कुम्भकर्ण जैसे रक्त-पिपासुओं की नेतृत्व कल्पना में अधिक रमता है। जो पात्र सदियों से सामाजिक समरसता की प्रेरणा देते हैं उन्हें त्यागकर सामाजिक दुराचार को बढावा देने वाले पात्रों के प्रति मोह-ममता उनकी असली मानसिकता को प्रकट करती है। इस विचारमूढों को यह भी नही दिखाई पडता कि यह धर्म-अधर्म, नीति-अनीति, न्याय-अन्याय का एक मूल्यपरक संघर्ष था जिसमें एक और राज्यहीन, सेनाविहीन, संसाधनविहीन, जंगल-जंगल भटकता संघर्षशील किन्तु मर्यादावान पुरुष था तो दूसरी ओर लाखों सैनिकों, सत्ता-संसाधनों से लैस, सोने की लंका का मालिक था, जिसके अन्तःपुर में देश-विदेश से छल-बलपूर्वक हरण करके लाई गई सैकडों स्त्रियां कैद थी।
वस्तुतः जिस आर्य आक्रमण सिद्धान्त को अधिकांश इतिहासकार और पुरातत्वविद् दशकों पूर्व मनगढंत, दुराग्रहपूर्ण और मिथ्या सिद्ध कर चुके हैं, दुर्भाग्य से उसी को आधार बना कर यह प्रपंच रचा जा रहा है। यदि राम-रावण युद्ध के पीछे आर्य-द्रविण सिद्धान्त था तो रावण के बाप, दादा-महर्षि पुलस्त्य और विश्रवा कौन थे? आर्य थे या द्रविण थे? दक्षिण देशवासी बाली-सुग्रीव-हनुमान कौन थे? और तो और अभी हजार वर्ष पूर्व द्रविण देश में उत्पन्न हुए शंकराचार्य कौन हैं? वे आर्य हैं कि द्रविण हैं? आर्यविरोधी हैं या द्रविणविरोधी हैं?
रावण सरीखें असुरों को जनजातीय वनवासियों का संरक्षक प्रतिनिधि बताने वालों को यह भी बताना चाहिए कि ऐसे कौन से जनजातीय वनवासी हैं जिनके नाम रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पनखा, मेघनाद आदि का अनुसरण करते हुए उपलब्ध होते हैं। जबकि राम, रमैया, रामी, रम्मो, रम्मू, रमूडी, सीता, सित्ती, सित्तो, सितूडी, लच्छू, लच्छी, लक्ष्मण, अंगद, सुग्रीव, हनुमान जैसे नाम जनजातियों में आज तक मिलते चले आये हैं।
इधर, इन दिनों कुछ लोग ईलोक (सोशल मीडिया) में रावण के साथ इसलिए सहानुभूति प्रकट करते नजर आते हैं कि वह ब्राह्मणकुलोत्पन्न प्रकांड पण्डित, परमवीर और परम शिवभक्त था। ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते है कि उसके हाथ हजारों सदाचारी-तपस्वियों और शांतिप्रिय अहिंसक आश्रमवासियों के खून से रंगे हुए थे। सीता का हरण भी उसने एक डरपोक चोर की भांति धोखे से किया था।
वस्तुतः यह जातिवादी दंभ का वह घिनौना रुप है जो आज आताताइयों, दुराचारियों और समाजकंटकों में भी स्वजाति देखकर उनके पक्ष में उठ खडा होता है और देश अराजकता का माहौल पैदा करता है।
वाल्मीकि और रामचरित पर इस चर्चा के साथ शम्बूक वध प्रकरण पर विचार करना भी प्रासंगिक होगा। यह प्रकरण वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में वर्णित है। रामायण के अधिकतर अध्येता विद्वानों का यह मत है कि उत्तरकाण्ड मूल रामायण का अंग नहीं हैं। यह किसी परवर्ती कवि की रचना है जो वाल्मीकि कृत रामायण में बाद मे जोडी गयी। बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर और युद्ध नामक काण्डों के क्रम में ‘उत्तर’ शब्द का प्रयोग ही प्रथमदृष्ट्या यह सूचित करता है कि यह उत्तरकालीन सामग्री है अर्थात् बाद में जोडे गये सर्ग। रामायण के अन्तःसाक्ष्य भी ऐसा मानने का पर्याप्त आधार प्रदान करते
हैं। युद्ध काण्ड की समाप्ति पर कवि जिस तरह इस ग्रन्थ का माहात्म्य वर्णन करता है वह यही प्रकट करता है कि यह महाकाव्य पूर्ण हो गया। युद्ध काण्ड के श्लोक संख्या 1॰7 से लेकर अंतिम श्लोक संख्या 125 तक कही गई फलश्रुति ठीक वैसी ही है जैसी ग्रन्थों की समाप्ति पर दी जाती है। इधर बालकाण्ड का प्रथम सर्ग भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है। जब मुनिवर नारद वाल्मीकि को राम के बारे में बताते हैं तो अति संक्षेप में रामकथा भी सुनाते हैं। यह वाल्मीकि का रामकथा श्रवण का पहला अनुभव था। श्लोक क्रमांक 8 से लेकर श्लोक क्रमांक 97 तक कुल 9॰ श्लोकों में नारद इस कथा को इस महाकाव्य की सिनॉप्सिस की तरह बांचते हैं। इसमें भी राम कहानी तो श्लोक क्रमांक 89 तक ही है, शेष श्लोक संख्या 9॰ से 97 तक रामराज्य का वर्णन है। इस प्रस्तावित कथा का अंत इस सूचना से होता है कि ‘‘राम ने नंदिग्राम में भाइयों के साथ जटाएं कटवा कर मुनिवेष त्यागकर, सीता के साथ फिर से राज्य प्राप्त किया।’’
तीसरे सर्ग में जब वाल्मीकि जी रामकथा का प्रतिस्मरण करते हैं तो पुनः रामकथा का संक्षिप्त विवरण मिलता है जिसमें आखिरी में राम के अभिषेक समारोह, सुग्रीवादि की सेनाओं का विसर्जन, अपने राष्ट्र का रंजन और वैदेही का विसर्जन का उल्लेख मिलता है। शंबूक वध जैसी ज्वलन्त घटना का कोई उल्लेख न प्रथमसर्ग में न तृतीय सर्ग में, कहीं भी नही मिलता।
निश्चय ही यह किसी वाक्छली घुसपैठिये की कारस्तानी है जो वाल्मीकि की रामकथा मंदाकिनी में यह अपशिष्ट विसर्जित कर गया। वर्ना, वाल्मीकि के राम ऐसा कदापि नहीं कर सकते। जो वाल्मीकि शूद्र को रामकथा पढने का आह्वान कर उसके महत्व को बढाने का दावा करते हैं उनका राम एक शूद्र का वध महज इसलिए करदे कि वह तपस्यारत था!! निशदराज, शबरी, कोल-किरातादि
वनवासियों के प्रिय राम के लिए ऐसा कृत्य कदापि संभव नहीं था। अपने महाकाव्य की प्रस्तावना में प्रथम सर्ग में वे कहते हैं, ‘रक्षिता जीवलोकस्य.....’ (श्लोक संख्या 13)। उनके राम तो सारे संसार के रखवाले हैं।
तुलसीदास तो कभी स्वप्न में भी नही सोच सकते थे कि उनका राम ऐसा अधर्माचरण करे। वे इस समूचे उत्तरकाण्ड को ही अस्वीकार कर देते हैं। धन्य है तुलसीदास जिन्होंने परम्परा प्राप्त रामकथा को अपने विवेक की छलनी से छान कर रामकथा की पुनर्रचना की। उत्तरकाण्ड उन्होंने भी लिखा, किन्तु अपनी इतिहास दृष्टि, मानवीय संवेदना और सर्जनात्मक विवेक से जांच-परख कर ।
अंत में युवा कवि विवेक चतुर्वेदी की इन पंक्तियों के साथ दीपावली की आत्मीय मंगलकामनाएं ।
‘‘कर देता तू मोहे
ऐसा दिए-सा गेरुआ
भीतर तपूँ मैं
हो बाहर उजाला
नाचे लौ मेरी छम-छम।।’’