राजनीतिक आय-व्यय

दीनदयाल जी द्वारा व्यंग्यात्मक शैली


दीवाली के मौसम पर उद्योग में लगा हुआ प्रत्येक व्यक्ति अपना आय-व्यय देखता है, पुराना खाता ठीक करता है, जाँच-पडताल करके बंद कर देता है तथा आगे के लिए नया खाता खोलता है। इससे उसे अपनी सच्ची स्थिति का ज्ञान हो जाता है कि उसको कितना लेना-देना है। अपनी इस स्थिति और पूँजी का अंदाजा लगाकर ही अगले वर्ष का कारोबार और उसका विस्तार निश्चित किया जाता है। इसी के आधार पर नई योजनाएँ बनाई जाती हैं।
राजनीतिक क्षेत्रों में हमने उद्योग आरंभ किया। उसके आय-व्यय का निरीक्षण करना भी बीच-बीच में आवश्यक है। हमारे नीतिज्ञ भी कह गए हैं कि-
कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहः।।
अर्थात हमको बार-बार इस बात का विचार करना चाहिए कि कौन सा देश है? कौन मित्र हैं? काल क्या है? हमारा आय-व्यय क्या है? हम कौन हैं तथा हमारी शक्ति क्या है? इन बातों का निरंतर विचार करने वाला ही सदा विजयी एवं सफल होता है। आइए, हम भी इन बातों पर विचार करें अथवा वाणिज्य-शब्दावली में कहें कि अपने आय-व्यय का निरीक्षण करें।
भारतवर्ष का कारोबार बहुत पुराना है। दुनिया में सब लोग अच्छी तरह व्यापार करना नहीं जानते थे, तब से भारत में उद्योग चल रहा है। अपनी उत्पत्ति तथा उनकी विशेषताओं के लिए वह बहुत दिनों से प्रसिद्ध रहा है, इसलिए इसकी साख बहुत ही मूल्यवान रही। बहुत दिनों तक तो ज्ञान, विज्ञान, कला और कौशल आदि की उत्पत्ति पर एकाधिकार रहा और इस कारण वह दुनिया में सबसे अधिक धनवान ही नहीं, प्रतिभावान भी समझा जाता था। व्यापार में ‘एक बात’ इसका गुण था, जिसे इसने सत्य का ट्रेडमार्क दे रखा था, सहिष्णुता इसकी दूसरी विशेषता थी। इधर कुछ सदियों से कारीगरों और प्रबंधकों में मनमुटाव तथा भेदभाव होने के

कारण इसकी साख गिर गई और वह विदेशिय के हाथ में भी चली गई, जिसने इसकी मशीनों को नष्ट करने और उनमें आमूल परिवर्तन करने का प्रयत्न किया। फलतः उत्पत्ति भी गिर गई तथा इनके स्टैंडर्ड में भी फर्क आ गया।
कुछ वर्षों से इसका प्रबंध अपने हाथ में लेने की कोशिश हो रही थी। और वह प्रयत्न १५ अगस्त, १९४७ को सफल हुआ। तब से तथा उससे कुछ वर्ष पहले से भी कुछ कम रूप में इसका प्रबंध इंडियन नेशनल कांग्रेस लि. की स्थापना सन् १८८५ में हुई थी पहले तो यह एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी थी, किंतु बाद में यह पब्लिक हो गई। इसके संचालक (ष्ठद्बह्म्द्गष्ह्लश्ाह्म्) बीच-बीच में बदलते रहे हैं। अपने हाथ में प्रबंध लेने के पूर्व इसके डायरेक्टरों का कहना था कि हिंदुस्थान के शासन में बहुत सी बुराइयाँ हैं। यहाँ अत्याचार और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। कामगारों की बुरी हालत है, उन्हें भर पेट रोटी नहीं मिलती और न बदन ढकने को कपडा। अगर उनके हाथ में प्रबंध आ गया तो वे सबको सुख, शांति, सम्मान और वैभव देंगे तथा दीनता और भुखमरी दूर हो जाएगी। अब प्रबंध उनके हाथ में है। यह आनंद की बात है। परंतु आज तक का आय-व्यय शेष सबके सामने है।
आय-व्यय पत्रक
(अधिक श्रावण कृष्ण १४, वि.स.ं २००४ से कार्तिक शुक्ल १०, संवत् २००५ तक)
आय
१. भारत से अंगे*जों की विदाई तथा भारतवर्ष को औपनिवेशिक स्वराज्य की प्राप्ति।
२. प्रांतो एवं केंद्र में कांगे*स सरकार की स्थापना। कांगे*स के ही मंत्री, गवर्नर आदि की नियुक्ति तथा बडी-बडी तनख्वाहें।
३. कांगे*स का बोलबाला।

४. होम गार्ड्स, प्रांतीय रक्षा दल तथा कांगे*स सेवादल का निर्माण।
५. देशी रियासतों का भारतीय संघ में समाहार।
६. हैदराबाद समस्या का हल।
७. विदेश-विभाग से संबंधित अनेक लोगों की विदेशों में राजदूत के नाते नियुक्ति।
८. कांगे*स के लोगों को पेंशन आदि सुविधाएँ।
९. पौंडपावना।
व्यय
१. भारत का विभाजन, पूर्ण स्वराज्य के आदर्शों का त्याग तथा देश में अंगे**ा विशेषज्ञों एवं कारीगरों
का आगमन।
२. पंजाब, सिंध, सीमा प्रांत और बंगाल में लाखों हिंदुओं की हत्या, लूटमार, अगि*कांड आदि की दुर्घटनाएँ।
३. निर्वासितों की समस्या, पाकिस्तान में करोडों की
संपत्ति जब्त।
४. पाकिस्तान को पचपन करोड रुपए का दान।
५. गांधी जी की हत्या।
६. संपूर्ण देश में पकड-धकड।
७. महाराष्ट्र आदि प्रांतों में लूटमार, अगि*कांड की घटनाएँ तथा अन्य प्रांतों में संघ के स्वयंसेवकों के विरुद्ध सब प्रकार के प्रदर्शन।
८. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अवैध घोषित करके निस्वार्थ देशभक्ति एवं संगठन की भावना पर आघात।
९. प्रांतीय रक्षा दल, होम गार्ड आदि पर अत्यधिक व्यय एवं उसके द्वारा आपसी पार्टीबाजी।
१०. कश्मीर समस्या।
११. प्रजामंडलों के तुष्टीकरण का प्रत्यन।
१२. कम्युनिस्ट उपद्रव।
१३. हैदराबाद में हिंदुओं पर अत्याचार तथा तज्जनित हानि।
१४. लाखों रुपयों का अतिरिक्त खर्च।
१५. अफ्रीका में भारतीयों की दुर्दशा।
१६. संयुक्त राष्ट्र संघ में अफ्रीका के प्रश्न पर भारत की हार।
१७. सुरक्षा समिति के चुनाव को नौ बार लडकर यूक्रेन के पक्ष में नामजदगी वापिस लेना।
१८. सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वार काश्मीर कमीशन की नियुक्ति और उसका रुख।
१९. गोवा की भारत विरोधी नीति।
२०. नवीन कर (बिक्री कर आदि) मुद्रास्फीति, कम उपज, हडतालें।
शेष
महँगाई, बाढ, अन्न की कमी, घूसखोरी, भ्रष्टाचार, प्रांतीयता, सांप्रदायिकता, कांगेसीयता, जनसुरक्षा कानून, धारा १४४, कंट्रोल पक्षपात, अंसतोष, पार्टीबाजी।
१. यह व्यय सब भागीदारों की राय से होना
चाहिए था, किंतु संचालकों ने राय न लेकर अनियमितता की।
२. इसके संबंध में अभी तक कुछ निश्चित नहीं हुआ, डर है कि यह भावना डूब न जाए। हिसाब बहुत ही अस्त-व्यस्त रूप में रखा गया है, अतः गबन आदि की बहुत कुछ संभावना है, इसीलिए बैलेंस शीट पूरी नहीं मिली है।
घिसाई
सत्य और अहिंसा, चरित्र, अनुशासन, योग्यता, भारतीयता।
पाञ्चजन्य, नवंबर ११, १९४८
साभार: दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाङ्मय


महात्मा गांधी के विचारों का अनुसरण कर विनोबा, जयप्रकाश नारायण और राजगोपालाचारी ने ट्रस्टीशिप का विचार सम्मुख रखा है। यह हिंदू जीवन-पद्धति के अनुसार ही है। यह एक ऐसा विचार है, जो समाजवादी और गैर-समाजवादी दोनों ही समाजों के लिए समान रूप से उपयोगी हो सकता है। पर यदि हम पाश्चात्य-यंत्र प्रणाली का अंधानुकरण करते रहे तो पूँजीवाद या समाजवाद दोनों ही न हमारी संस्कृति का संरक्षण कर सकेंगे और न हमारे सम्मुख उपस्थित समस्याओं का समाधान ही कर सकेंगे। हमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सैद्धांतिक सभी मोरचों पर इस यंत्रवाद का सामना करना पडेगा। हमें धर्मराज्य, लोकतंत्र, सामाजिक समानता और आर्थिक विकेंद्रीकरण को अपना लक्ष्य बनाना होगा। इन सबका सम्मिलित निष्कर्ष ही हमें एक ऐसा जीवन-दर्शन उपलब्ध करा सकेगा, जो आज के समस्त झंझावातों में हमें सुरक्षा प्रदान कर सके। आप इसे किसी भी नाम से पुकारिए, हिंदुत्ववाद, मानवतावाद अथवा अन्य कोई भी नया वाद, किंतु यही एकमेव मार्ग भारत की आत्मा के अनुरूप होगा और जनता में नवीन उत्साह संचारित कर सकेगा। संभव है, विभ्रांति के चौराहे पर खडे विश्व के लिए भी यह मार्गदर्शक का काम कर सके।