दीनदयाल यही कहते हैं

रमेश कुमार शर्मा


कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
जो समाज का है अंतिम नर उसका घर सच में वन-गोचर
सकल जीव-स्वर में उसका स्वर, निरखे सदा विहग, मृग, तरुवर
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
नित विकास के दृश्य दिखाते वन-गोचर धरती उजाड कर
वहां सडक-घर हैं जहां कभी ऋषियों ने रोपे थे तरुवर
प्रश्न व्यवस्था से करते हैं दीनदयाल विनत नयविदवर
वनजीवी हो या गोपालक, किस बंजारे ने चाहा घर?
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
वहीं वास करती दुर्गा माँ जहाँ सिंह भरते हुंकारे
सिंहों संग लगाते आये भक्त सदा माँ के जयकारे
वनविहीन यदि शक्तिपीठ हों क्या दर्शन रेलों से जाकर
दीनदयाल यही कहते हैं वन है माँ के भक्तों का घर।
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
बारह ज्योतिर्लिंग परिक्रमा से भी क्या फल मिलने वाला
नहीं रहेंगे नंदीश्वर यदि नंदीकुल ही गया निकाला
जहाँ मुक्त गौ-वृषभ विचरते वहीं वास करते मुक्तेश्वर
दीनदयाल यही कहते हैं, गोचर है शिवभक्तों का घर।
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
कभी हुए थे निष्कंटक वन, हर्ष मना था किष्किन्धा में
तब प्रचंड वानर-कंठों से, जय श्री राम गुंजा लंका में
वानरकुल पर हो तरुछाया वहीं विराजित होते रघुवर
दीनदयाल यही कहते हैं तरुछाया ही वैष्णव का घर।
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
जब भारत में वन-गोचर थे हिल्लोलित बहती थीं नदियाँ
पानी की क्या बात करें हम, गोरस की बहती थीं नदियाँ
तब रुपये से भयकंपित थे ब्रिटिश पौंड अमरीकी डॉलर
दीनदयाल यही कहते हैं, ऋत है अर्थशास्त्रियों का घर।
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
जीवों के एकात्म भाव से बना धरातल का ऋत सुन्दर
कूजन करती यहाँ कोकिला तो चिंघाड रहे हैं कुंजर
विहगों के सुन्दर नीडों से सजे द्रुमों से शोभित भूधर
दीनदयाल यही कहते हैं, भूधर है सब जीवों का घर।
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
स्वागत है तकनीकी युग का, हो विकास प्रतिवासर, प्रतिक्षण
किन्तु न हो एकात्म रूप जीवों पर घातक विकट आक्रमण
कण, जल, वायु जीव जो पाते वही ग्रहण करता अंतिम नर
दीनदयाल यही कहते हैं, रक्षित हो अंतिम नर का घर।
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?
कहीं यंत्रवत् भागदौड में उजड न जाये जगजीवन धन
नहीं वर्ग संघर्ष अपितु एकात्म-सरसता ही है जीवन
एक आत्मा सब जीवों में चाहे कीडा हो या कुंजर
दीनदयाल यही कहते हैं, नहीं व्यष्टि, सबका समष्टि घर
कब किसने मांगा ऐसा घर, पत्थर वाला पत्थर-सा घर?