दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति में

बलवीरसिंह करुण


कालपुरुष ने कालरात्रि भी
सिरजी संग भोर के
मन्वन्तर से पहले के कुछ
किस्से नये दौर के
भारतभूषण स्वंय सो गये
सूतल नार जगाते
निर्धन का इकतारा गूँगा
हुआ लोरियाँ गाते
दिनकर और निराला ने भी
थक समेट ली लीला
अश्रु नीर से वागीशा का
आँचल अब तक गीला
दीनदयाल नाम का तारा
टूटा उसी कडी में
मुगलसराय हो गया चर्चित
पल में, प्रहर, घडी में
जहाँ देश का नव दधीचि था
चिर निद्रा में सोया
भारत माँ ने एक अनूठा
रत्न जहाँ पर खोया
धृति, कृति और सुमति का पावन
पुंजीभूत, विरल सा
राजनीति के पंकिल सर में
हँसते श्वेत कमल सा
वह व्यक्तित्व नरोत्तम निश्छल
सचमुच था ऋष्योत्तम
इससे भी आगे था वह कुछ
उसे कहो देवोत्तम
उसके पद-चिह्नों पर चलकर
किसने कीर्ति कमाई
किसने कब-कब नाम भुनाया
किसने आँख चुराई
किसने था वह रत्न चुराया
कौन दण्ड का भागी
आज तलक भी पूछ रही है
वे पटरियाँ अभागी
जिनके पास उतार धर गया
था वह अपना चोला
जिनकी साक्षी में था अन्तिम
‘राम-राम’ वह बोला
तब से अब तक राजदंड यह
कई करों में आया
कई-कई माथों के हिस्से
राजमुकुट भी आया
किसने हत्यारे खोजे या
चिन्ता की कारण की
सबको फिक्र रही मुकुटों की
अथवा सिंहासन की
कडवा सच कह सकने वाली
कलमें गिनती की हैं
राजमहल को सच सुनने की
आदत नहीं रही है
आप जहाँ हो उपाध्याय जी
जिस सुरलोक सदन में
प्रभु के पास कि सूर्य चन्द्र के
या अन्यत्र भुवन में
वहीं ठीक हो सुखी सुरक्षित
जालों जंजालों से
धूर्त अँधेरों की साजिश से
विष डूबी चालों से
हमको तो इस खाण्डव वन में
ही जीना जलना है
चिता दहन के अन्तिम पल में
किसे स्मरण करना है
पोर-पोर थक गया उमर भर
अगि* मन्त्र दोहराते
राष्ट्रवाद का शंख फूँकते
सोया शौर्य जगाते
हम आते हैं तुम्हें खोजने
उस निस्सीम निलय में
संहारों में उगे सृजन में
या फिर महाप्रलय में
जहाँ कहीं हो स्वीकारो बस
विनत प्रणाम हमारा
भ*मित श्रमित जग के पथिकों का
बने रहो ध*ुव तारा ।