दीनदयाल : कुछ शब्द चित्र

सुरेन्द्र डी सोनी



डिब्बा दर डिब्बा
टेसन दर टेसन...
काल की रेल में
करते हैं सफर
छोटे-छोटे ब्रह्माण्ड...!

खोटा
सिक्का हो
या खोटा हो
वोट...
चल गया
अगर
भूल से......
तो समझो
गई खुशबू
फूल से...!

पश्चिम...
कैसे चलूँ तुम्हारी राह....
ब्रह्माण्ड तो दूर
व्यक्ति तक आते-आते
टूट जाती है
श्ाृंखला तुम्हारी...!

सुनता रहा
सदियों से
कि मैं उसमें हूँ
और वह है मुझ में....
कौन किस में है
यह प्रश्न तो
उठता तब
जब कोई मैं होता
कोई वह होता...!

देश के साथ
सौंपा था
विश्वास तुम्हें....
देश को लूट सको
इसलिए
पहले विश्वास तोडा तुमने...
हम टूटे हुए
लुटे हुए
अब भी लिख रहे हैं
गाथाएँ तुम्हारी...
अब भी गा रहे हैं
गान गुलामी का...!

उनका नहीं
यद देश
सूट, बूट और टाई
जिनका भेष...
ऐसा न हो
कि जागें तब तक
कुछ भी
न रहे शेष...!

न भूमि
न भीड
न राज्य
न शासन...
राष्ट्र है
इन सबसे ऊपर
एक आत्मा...!

खण्ड-खण्ड होकर भी
बने बैठे हो प्रबुद्ध...
हा
तुम हो
ईश्वर के विरुद्ध...!

सब-कुछ है भारत
सब-कुछ...
पर माँ नहीं है यह
तो है
*ामीन का
एक टुकडा सिर्फ...!
१०
वोट
जो था कभी
लोकतन्त्र की
देहरी पर चढा एक फूल...
हा
कितनी चतुराई से
बना लिया
तुमने उसे
अपनी कुर्सी के
पाये कसने का टूल....
११
स्वप्नदर्शियों की छाती पर
गढना
एक विपक्ष...
वैसे ही
जैसे रमाना धूना
मधुशाला में...
१२
राष्ट्र की सत्ता में
*ारूरी नहीं
कि बहुमत ने
खींच दी जो रेखा
वही है अन्तिम...
राष्ट्र की सत्ता में
बहुमत के आगे
होती है
एक लक्ष्मण-रेखा भी...!
१३
ठीक है
कि तुमने
जीतकर पाई है सत्ता...
ठीक है
कि संख्या में
हो तुम अधिक...
पर ठीक नहीं है
अगर तुम्हारे साथ
नहीं है धर्म...
धर्म के बिना
निष्प्राण हो तुम...
निष्प्राण है तुम्हारी सत्ता...!
१४
धर्म
नहीं है प्रकाशित
सभा से
आसन से
या संख्या से...
धर्म
है प्रकाशित
केवल
राष्ट्र की चिति से...!
१५
अर्थ के प्रभाव
और
अर्थ के अभाव
दोनों से ही
तय है
क्षति धर्म की...
धर्म बचेगा शुभ काम से...
अर्थायाम से!
१६
बा*ाार
एक त्रासदी है...
जहाँ
खत्म हो जाती है भूमिका
पसीने की...!
१७
देश तो तुम्हारा
और बा*ाार दें हम...
गणित
हमें तुमसे अच्छा आता है
लेकिन
हम पढे गलत स्कूल में हैं!
१८
एक फूल
कैसे रह सकता है
स्वाधीन...
बाग ही उसका
हो जब
पराधीन...!
१९
पहले तो
नोचकर छातियाँ
पी गए तुम
दूध सारा...
अब कहते हो
कौन माँ
किसकी माँ....
सुनो...
सिर्फ तुम्हें ही
नहीं जना है माँ ने...!
२०
बनकर
एक पुरातत्ववेत्ता
जड हो जाने से
नहीं बचती संस्कृति...
संस्कृति को चाहिए
जीवन और गति...!
२१
जो डूब रहा है
उसे दोगे अगर डूबने
तो तय है
तुम्हारा भी डूबना...
पंक्ति
अगर होगी
तो कोई
उसके आखिर में भी खडा होगा...!
२२
विवाह में
प्रिय है गुलाबजामुन तुम्हें...
किन्तु अंत्येष्टि में
तुम उसे
देख भी नहीं सकते
सुख
तुम्हारे मन का विषय है मित्र
वस्तु का नहीं...!
२३
भोग
अगर अधिष्ठान है
तुम्हारे मन का
तो तय है
कि प्रिय है तुम्हें हिंसा...
भोगी की मजबूरी है
कि हिंसा को
करे वह जस्टिफाई...
क्या कहते हो
मेरे भौतिकवादी भाई...?
२४
पैर
जंघा
हाथ
मस्तक...
क्या है इनमें कोई संघर्ष
अगर नहीं
तो समझाओ
उन नादानों को...
जो चाहते हैं
देखना
खण्ड-खण्ड
इस देश को...!
२५
ईश्वर
बडे हो तुम
बहुत बडे...
लेकिन
तुमसे भी बडा है धर्म...
धर्म है
तभी हो तुम...
ईश्वर
२६
शिखर पर क्या बैठना
वहाँ तो
बैठते हैं कौवे भी...
नींव ही भली है
माँ
तेरे मन्दिर की...!
द्वारा- श्री प्रेम खण्डेलवाल, एडवोकेट, नया बास, शिव मंदिर,
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