एक महामनीषी की जीवन यात्रा

सन्निधि शर्मा


सृजन-वीथी
कुछ महापुरुष अपने अलौकिक व्यक्तित्व के कारण युगों-युगों तक याद रखे जाते हैं। वे अपने महान् गुणों, जीवन मूल्यों के प्रति आस्था और तदनुरूप जीवन चरित्र से समाज को निरन्तर पे*रणा देते हैं। कुछ ऐसे भी विलक्षण प्रतिभाशाली होते हैं जो अपने असाधारण कृतित्व के कारण मानव सभ्यता एवं संस्कृति को उच्च शिखर की ओर ल जाते हैं। इनके कृतित्व के कारण इनको युगों-युगों तक याद रखा जाता है। महामनीषी दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसे युगऋषि थे जिनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही समाज के लिए प्रकाशस्तम्भ का कार्य करते हैं, पृथ्वी को निरंतर आलोकित करने वाले सूर्य और चन्द्रमा की तरह। दीनदयाल जी की जीवन-यात्रा को हम दो भागों में बाँट कर देख सकते हैं ः- १. दीनदयाल जी का व्यक्तित्व २. दीनदयाल जी का कृतित्व। व्यक्तित्व के अन्तर्गत उनके जीवनवृत्त तथा कृतित्व के अन्तर्गत उनके कार्यों का उल्लेख होगा, जो कृतिरूप में उन्होंने समाज को दिए।
दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व
पं. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म आश्विन कृष्णा त्रयोदशी संवत् १९७३ तदनुसार २५ सितम्बर १९१६ को जयपुर जिले के धानक्या ग्राम में हुआ था। मथुरा जिले का नगला चन्द्रभान गाँव इनका पैतृक गाँव था, जहाँ इनके पिता श्री भगवती प्रसाद एवं माता श्रीमती रामप्यारी निवास करते थे। भगवती प्रसाद जी जलेसर में सहायक स्टेशन मास्टर थे। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण दीनदयाल जी की शैशवावस्था में ही इनकी माता इन्हें और उनके छोटे भाई को लेकर अपने पिता श्री चुन्नीलाल जी शुक्ला जो जयपुर जिले के धानक्या गाँव में स्टेशन मास्टर थे, के यहाँ रहने आ गई थी।
जब वे अपनी माँ के साथ अपने नाना के घर धानक्या गाँव में रह रहे थे तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। शोक और चिंता के कारण दीनदयाल की मां क्षयरोग से ग्रस्त हो गई। कुछ समय बाद वह भी परलोक सिधार गई। दीनदयाल उस समय सात वर्ष और उनका छोटा भाई शिवदयाल पाँच वर्ष के थे। दोनों अबोध बालकों के लालन-पालन का भार अब इनके वृद्ध नाना चुन्नीलाल शक्ला के कन्धों पर था। किन्तु नियति की क्रूरता यहाँ तक ही नहीं रुकी और दो वर्ष बाद ही उनके नाना चुन्नीलाल भी स्वर्ग सिधार गए। दीनदयाल और उनका छोटा भाई अनाथ हो गए।
दीनदयाल नौ वर्ष के हो गए पर अभी तक उनके अध्ययन की कोई व्यवस्था नही हुई थी। माता-पिता और नाना के निधन के बाद वे अपने मामा राधारमण शुक्ला के पास आ गए जो गंगापुर सिटी में सहायक स्टेशन मास्टर थे। यहाँ वे चार वर्ष रहे और यहाँ के रेल्वे विद्यालय में उनका अध्ययन प्रारम्भ हुआ। पारिवारिक विपत्तियों के कारण उनके अध्ययन क्रम में व्यवधान आते रहे किन्तु अपनी कुशाग्र बुद्धि, एक्राग्रता और परिश्रमी स्वभाव के कारण इन्होंने स्वयं की सर्वश्रेष्ठता को ही प्रमाणित किया। गंगापुर सिटी में आगे पढाई की व्यवस्था नहीं थी अतः १२ जून १९२९ को कोटा के एक स्कूल में उनका प्रवेश हुआ। वे वहाँ ‘सेल्फ सपोर्टिंग हाऊस’ में रहते थे। तीन साल कोटा रहने के उपरान्त वे राजगढ (जिला अलवर) आए। यहाँ उनके मामा के चचेरे भाई नारायण शुक्ल स्टेशन मास्टर थे, दीनदयाल उनके पास दो साल रहे। १९३४ में नारायण शुक्ल का स्थानान्तरण सीकर हो गया तो उन्होंने एक साल सीकर म रहकर दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की। वहाँ से उच्च शिक्षा के लिए पिलानी गए और वहाँ दो वर्ष रहकर सन् १९३६ में इण्टरमीडिएट किया। कष्टमय परिस्थितियों में भी दीनदयाल जी की प्रतिभा कुंद नहीं हुई वरन् और अधिक प्रखरता के साथ प्रकट हुई। दसवीं और इन्टरमीडिएट की परीक्षाओं में उन्होंने पूरे बोर्ड में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर स्वर्ण पदक हासिल किए। इसी वर्ष वे बी.ए. की पढाई के लिए कानपुर गए। यहाँ भी दो वर्ष रहकर एम.ए. की पढाई के लिए आगरा गए। यहाँ राजामण्डी में किराए के मकान में रहे। यहाँ दो वर्ष रहकर १९४१ में वे बी.टी करने के लिए प्रयाग चले गए। इस समय उनकी उम्र २५ वर्ष थी। इसी काल खण्ड में वे सार्वजनिक जीवन की ओर उन्मुख होते चले गए।
सन् १९३७ में दीनदयाल उपाध्याय जब बी.ए. की पढाई के लिए कानपुर गए तब अपने सहपाठी बालूजी महाशब्दे के माध्यम से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्फ में आए और संघ कार्य से जुडते चले गए। इस प्रकार कानपुर के इस विद्यार्थी जीवन से ही पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ हो जाता है।
अपनी पढाई पूरी करने तथा संघ का द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद पण्डित दीनदयाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती प्रचारक बन गए। सन् १९५१ तक उन्होंने उत्तरप्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को फैलाया। १९४२ से १९४५ तक वे लखीमपुर में ही प्रचारक रहे। पहले उन्हें जिले का तथा शीघ्र ही विभाग प्रचारक का दायित्व सौंपा गया। उनकी कार्य सिद्धता, संस्कार क्षमता और बौद्धिक प्रखरता को देखते हुए १९४५ में उन्हें सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश का सहप्रान्त प्रचारक का दायित्व सौंपा गया, जो कि उन्होंने १९५१ तक पूरी निष्ठा के साथ निभाया। संघ के माध्यम से ही वे राजनीति में गए, भारतीय जनसंघ के महामंत्री बने, अध्यक्ष रहे तथा एक सम्पूर्ण राजनीतिक विचार के प्रणेता बने।
उन्होंने संगठनात्मक कार्य के साथ-साथ संघ विचार के प्रसार व लोक शिक्षण के लिए साप्ताहिक व मासिक पत्रिकाएँ प्रारम्भ कीं। उन दिनों संघ में सामान्यतः युवक-विद्यार्थी ही आया करते थे। इन नवयुवकों के लिए संघ विचार को सम्पे*षित करने के लिए उन्होंने दो महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों का प्रणयन किया। १९४६ में ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ और १९४७ ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’।
उनके प्रयत्न एवं प्रेरणा से १९४५ में मासिक ‘राष्ट्रधर्म’ व साप्ताहिक ‘पांचजन्य’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। बाद में ‘स्वदेश’ दैनिक भी चलाया। सरकार ने जब ‘पांचजन्य’ पर प्रतिबन्ध लगाया तो उन्होंने भूमिगत रहते हुए ‘हिमालय’ का प्रकाशन किया, लेकिन जब उस पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया तो उन्होंने प्रतिबन्ध की परवाह न कर, भूमिगत रहते हुए ‘राष्ट्रभक्त’ निकाला। इन पत्र-पत्रिकाओं के प्रत्यक्ष सम्पादक दीनदयाल उपाध्याय कभी नहीं रहे, लेकिन वास्तविक संचालक, सम्पादक व आवश्यकता होने पर उसके ‘कम्पोजिटर’, ‘मशीनमैन’ तथा सब कुछ दीनदयाल उपाध्याय ही थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संविधान लेखन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने धर्म से लेकर राजनीति तक सभी विषयों पर अनेक लेख लिखे जो उनके मौलिक विचारों को प्रकट करते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में एक ऐसे राजनैतिक दल की आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो भारतीय परम्परा और संस्कृति के अनुरूप रहते हुए समसामयिक चुनौतियों का सामना कर सके। भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अप्रैल १९५० में नेहरू मंत्रिमण्डल से त्याग-पत्र दे दिया। त्याग-पत्र के पश्चात डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी एक अखिल भारतीय स्तर का राजनैतिक दल स्थापित करने हेतु सचेष्ट व सक्रिय थे। उनकी कल्पना भारतीय संस्कृति व मूल्यों के आधार पर एक ऐसा राजनीतिक दल संगठित करने के थी जो स्वतंत्र भारत को अपनी विरासत के आधार पर अग्रसर कर सके। इस संदर्भ में अपने देशव्यापी प्रयत्नों के अन्तर्गत उन्होंने श्री गुरु जी से सम्फ किया। गुरु जी ने डॉ. मुखर्जी के आग्रह को सम्मानपूर्वक स्वीकार करते हुए दीनदयाल उपाध्याय को इस कार्य हेतु नियोजित किया।
२१ अक्टूबर १९५१ को नई दिल्ली के राधोमल आर्य कन्या विद्यालय परिसर में राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई एवं इसका प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन २९, ३०, ३१ दिसम्बर १९५१ को कानपुर में सम्पन्न हुआ। नानाजी देशमुख इसके संयोजक थे। इसी अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को दल का अखिल भारतीय महामंत्री बनाया गया। उपाध्याय जी ने यह दायित्व वर्ष १९६७ तक निरन्तर वहन किया। २९ दिसम्बर १९६७ को जनसंघ के कालीकट अधिवेशन में इन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। दीनदयाल जी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मात्र ४३ दिन ही कार्य कर पाए कि क्रूर नियति का वज्रपात हो गया और ११ फरवरी १९६८ की काली रात को उनका पार्थिव शरीर मुगलसराय रेल्वे स्टेशन के पास पडा मिला। दीनदयाल जी १० फरवरी १९६८ को लखनऊ से पटना जा रहे थे। किसी दुर्दान्त हत्यारे ने रात में चलती ट्रेन में उनकी हत्या कर उनके शव को मुगलसराय स्टेशन के पास डाल
दिया था।
श्री उपाध्याय की पार्थिव देह दिल्ली पहुँचने पर उनके दर्शन के लिए जन सैलाब उमड पडा। १२ फरवरी प्रातःकाल राष्ट्रपति श्री जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी, उपप्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई सहित अनेक गणमान्य लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। शाम को दिल्ली के निगमबोध घाट पर श्री उपाध्याय के ममेरे भाई श्री प्रभुदयाल शुक्ल ने उनकी पार्थिव देह को अगि* को समर्पित कर दिया।
इस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय ने सन् १९३७ से १९६८ तक अहर्निश भारतमाता की सेवा की। उनका जीवन पूर्णतया मातृभूमि के लिए समर्पित था।
दीनदयाल उपाध्याय का कृतित्व
दीनदयाल उपाध्याय विलक्षण प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व थे। राजनीतिक दल के नेता के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने नैतिकता, शुचिता, पारदर्शिता और जीवनमूल्यों की रक्षा का कठोरतापूर्वक पालन किया। उनका सम्पूर्ण जीवन सादगी, निरहंकारिता एवं मिलनसारिता से परिपूर्ण था। एक राजनीतिक दल के कुशल संगठनकर्ता के साथ-साथ एक विचारक, प्रखर राष्ट्रभक्त, पत्रकार और लेखक के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए। ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ जैसे पत्रों का प्रकाशन उन्हीं के प्रयत्न एवं प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ। देश को दिशा देने के लिए उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की, लेख लिखे और निरंतर व्याख्यान दिए। उन्होंने भारतीय चिंतन को एकसूत्रित करते हुए ‘एकात्म मानवदर्शन’ का सूत्रपात कर देश के सर्वांगीण विकास के लिए एक वैकल्पिक मार्ग सुझाया। सैंकडों वर्षों की गुलामी से मुक्त हुआ यह देश कैसे एक सुखी, समृद्ध, गौरवशाली और स्वाभिमानपूर्ण जीवन जी सकता है, यही दीनदयाल जी की चिंता थी। देश के सर्वांगीण विकास के लिए उन्होंने जो मार्ग सुझाया वह मार्ग ‘एकात्म मानवदर्शन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दीनदयाल जी ने निम*लिखित पुस्तकों की रचना की-
१. सम्राट चन्द्रगुप्त (किशोरोपयोगी उपन्यास)
२. जगद्गुरु शंकराचार्य
३. राष्ट्र जीवन की दिशा
४. भारतीय अर्थनीति-विकास की एक दिशा
५. दी टू प्लान्स, प्रॉमिसेज, परफार्मेंस एण्ड प्रास्पेक्ट्स
६. एकात्म मानववाद
७. डॉ. हेडगेवार के मराठी जीवन चरित्र का हिन्दी अनुवाद
८. इनके अतिरिक्त उन्होंने अनेक विषयों पर लघु पुस्तिकाओं का लेखन किया था-
हमारा कश्मीर, अखण्ड भारत, महान विश्वासघात आदि।
पुस्तक लेखन के अतिरिक्त दीनदयाल जी ने राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ करवाया। जिसका विवरण निम*ानुसार है -
१. सन् १९४७ में दीनदयाल जी ने राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना की। राष्ट्रधर्म का पहला अंक ३१ अगस्त १९४७ को प्रकाशित हुआ।
२. राष्ट्रधर्म के साथ उन्होंने एक समाचार पत्र प्रारंभ करने का विचार किया और १४ जनवरी १९४८ को पांचजन्य का पहला अंक प्रकाशित हुआ।
३. ‘पांचजन्य’ पर प्रतिबन्ध लगने पर ‘हिमालय’ पत्रिका नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया।
४. जब हिमालय पत्रिका को भी प्रतिबंधित कर दिया तो दीनदयाल जी ने ‘देश भक्त’ नाम से तीसरा समाचार पत्र छापना शुरू कर दिया।
५. अंगे*जी समाचार पत्र आर्गेनाइजर का प्रकाशन
प्रारम्भ किया।
६. इन समाचार पत्रों का वैचारिक दृष्टि से समृद्ध करने के लिए उन्होंने स्तम्भ लेखन प्रारम्भ किए। ‘पांचजन्य’ में ‘पराशर’ और आर्गेनाइजर में ‘पालिटिकल डायरी’ नामक स्तम्भ थे जो बहुत लोकप्रिय हुए।
७. पालिटिकल डायरी के अंतर्गत प्रकाशित लेख बाद में एक पुस्तक के रूप में संकलित कर प्रकाशित
किए गए। इस पुस्तक की भूमिका डॉ. सम्पूर्णानन्द ने लिखी थी।
इस प्रकार महामनीषी पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने विलक्षण व्यक्तित्व एवं सृजनशील कृतित्व के द्वारा भारतीय चिंतन को एकसूत्रित करते हुए एकात्म मानवदर्शन की प्रतिष्ठापना की। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय एक आदर्श मानव, आदर्श देशभक्त और आदर्श राजनेता ही नहीं वरन् एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता के रूप में अविस्मरणीय रहेंगे।