वैचारिक थाती सहजने का गंभीर प्रयास

इष्टदेव



कुल पंद्रह खंडों में छपे दीनदयाल उपाध्याय वाङ्मय का बीते साल अक्टूबर में लोकार्पण हुआ था। दीनदयाल साहित्य एवं एकात्म मानवदर्शन के प्रखर अध्येता डॉ. महेश चंद्र शर्मा के संपादन में आया यह वाङ्मय एकात्म मानवदर्शन के सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक दर्शन से साक्षात कराने के साथ ही दीनदयाल उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनजाने पहलुओं से भी पाठक समुदाय को परिचय कराता है। इसमें राजनीतिक व्यवस्था एवं अर्थव्यवस्था के मूल राष्ट्रीय स्वरूप आदि महत्वपूर्ण विषयों के सांगोपांग विवेचन के साथ-साथ समसामयिक विषयों पर सुस्पष्ट एवं निर्भीक टिप्पणियाँ भी हैं। पढते हुए ऐसा लगता है जैसे सामने उस काल विशेष का सामाजिक-राजनीतिक वृत्तचित्र चल रहा हो। एक ऐसा वृत्तचित्र जो आपको बार-बार सिंहावलोकन के लिए प्रेरित करता है। भारतीय राष्ट्रवाद को उसके सही संदर्भों में समझने का अवसर देने वाला यह संकलन हमारी वैचारिक थाती हो सहेजने का एक स्तुत्य प्रयास है। कहना न होगा कि हम भारतीयों में यह दृष्टि कम ही पाई जाती है और दृष्टि अगर हो भी तो इसे कार्यरूप में परिणत करने की प्रवृत्ति तो अत्यल्प है। इस लिहा*ा से संपादक डॉ. शर्मा सहित पूरा संपादक मंडल साधुवाद का पात्र है।
दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित स्वंयसेवक और भारतीय जनसंघ के नेता थे। वे अपनी सूझबूझ, संवेदनशीलता, अध्ययनशीलता, व्यवहारकुशलता और अथक परिश्रम के कारण आदर्श के रूप में देखे जाते थे।
जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी कहा करते थे कि अगर मुझे दो दीनदयाल मिल जाएँ तो मैं भारतीय राजनीति की दिशा बदल दूँगा। मुखर्जी की यह बात दीनदयालजी ने बिना दूसरा दीनदयाल मिले ही सत्य सिद्ध करके दिखा दी। उन्हें राजनीति में संस्कृति का दूत कहा जाता है। इसका कारण केवल यही नहीं कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भारतीय जनसंघ में आए थे और भारतीय संस्कृति के सुधी अध्येता थे। अपितु यह भी है कि वह मूलतः संस्कृतिकर्मी थे। इसका पता उनके साहित्य से चलता है। उनके द्वारा रचे गए साहित्यिक-सांस्कृतिक निबंधों, उपन्यासों और व्यंग्य के अलावा कविता भी वाङ्मय में शामिल की गई है।
संपूर्ण वाङ्मय में दीनदयाल जी की कुल १२ पुस्तकें शामिल हैं। इसके अलावा उनके द्वारा समय-समय पर लिखे गए लेख, दिए हुए व्याख्यान, वक्तव्य, प्रेस वार्ताएँ, कुछ पत्र और पत्रकारों के लिए इंटरव्यू भी समेटे गए हैं। दो ऐसी पुस्तकें भी परिशिष्टों में ली गई हैं जिनके लेखक तो दीनदयाल जी नहीं हैं, लेकिन उनके जीवन और कार्यों से इनका सीधा संबंध जुडा है। परिशिष्ट सभी खंडों में हैं और परिशिष्टों में वही सामग्री ली गई है जो दीनदयालजी की लिखी या बोली हुई नहीं है, लेकिन उस कालखंड की राजनीतिक दशा-दिशा का ऐसा चित्र उपस्थित करती है, जिससे पाठक को तत्कालीन समाज और भारतीय राजनीति को समझने में मदद मिले। भले वह छोटी-छोटी घटनाओं के समाचारों के रूप में ही क्यों न हो। पाठक की इसी सुविधा के मद्देन*ार पहले से चौदहवें खंड तक हर खंड के प्रारंभिक भाग में एक पाठ ‘वह काल’ रखा गया है। पंद्रहवें खंड में ‘वह काल’ की जगह
‘अवसान’ है।
खंडों की संरचना की बात करें तो सभी खंड तीन भागों में विभाजित हैं। पहला भाग पूर्वपाठ है। इसमें समर्पण, जिस विभूति को खंड समर्पित किया गया है उनका परिचय, संपादकीय, भूमिका, वह काल, वाङ्मय संरचना और अनुक्रमाणिका है। दूसरा भाग मुख्य पाठ का है, जिसमें दीनदयाल जी की उपलब्ध पुस्तकें, लेख वक्तव्य, साक्षात्कार आदि हैं। अंतिम भाग परिशिष्ट और संदर्भिका का है। संदर्भिका सामान्यतः हिंदी की पुस्तकों में नहीं होती, लेकिन इसमें इसे जोडकर पाठकों के लिए अधिक सुविधाजनक बना दिया गया है। पहले, छठे और अंतिम खंड में पूर्वपाठ की संरचना थोडी भिन्न है। पहले खण्ड के पूर्वपाठ में अन्य सामग्री के अलावा दीनदयाल जी के प्रारंभिक जीवन का परिचय भी है। वहीं पंद्रहवें खण्ड में ‘वह काल’ की जगह ‘अवसान’ है। पंद्रहवें खंड में परिशिष्ट वाला भाग काफी बडा है। कालखंड के नाम पर ‘विविध’ संज्ञा से अभिहित यह खंड वस्तुतः दीनदयाल जी के निधन के बाद का है। परिशिष्ट में उनके असामयिक निधन के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में छपे संबंधित समाचार हैं।
वाङ्मय के पहले खंड में किशोरों के लिए लिखे गए दीनदयालजी के दो ऐतिहासिक उपन्यास हैं- ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य’। इनमें एक तरफ तो लेखक की कल्पनाशीलता और साहित्यिक प्रतिभा देखते ही बनती है, वहीं यह भी ध्यातव्य है कि ऐतिहासिक तथ्यों को कतई नजरअंदाज नहीं किया गया है। ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ जैसे व्यक्ति के जीवन पर लिखते हुए भी उनका दृष्टिकोण पूर तरह वैज्ञानिक है। श्री शंकराचार्य के रचे श्लोक और स्तोत्र अवश्य दिए गए हैं, पर न तो स्तोत्र के पाठ मात्र से किसी चमत्कार की बात है न ही परकाया प्रवेश की। नर्मदा की बाढ और उससे फैली महामारी के समय वे उनकी सामाजिक संगठन की क्षमता और सेवाकार्य की बात करते हैं तो सांसारिक अनुभव के लिए राज्य संचालन के सदर्भ में एक राजा से समझौते की। इसी खण्ड में दीनदयाल जी के दो पत्र भी हैं। एक तो उनके मामा श्री नारायण शुक्ल के और दूसरा ममेरे भाई बनवारीलाल शुक्ल के नाम। ये दानों पत्र उनके निजी जीवन और पारिवारिक संघर्ष की साफ तसवीर पाठक के सामने रखते हैं। एक तरफ तो ‘भविष्य सुरक्षित कर देने वाला कोई पेशा’ चुन लेने के बजाय परिव्राजक का जीवन अपना लेने पर उनके शुभचिंतकों की चिंता इनसे जाहिर होती है और दूसरी ओर राष्ट्रकार्य के प्रति दीनदयाल जी की दृढ प्रतिज्ञा और निष्ठा। एक दूसरे का नजरिया न समझ पाने से आपसी मनमुटाव भी साफ दिखता है। इसके आलावा दो व्यंग्य लेख हैं- ‘१४४’ और ‘राजनीतिक आय-व्यय’। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, ‘१४४’ धारा १४४ पर केंद्रित है। इसकी प्रासंगिकता स्पष्ट करने के लिए इस लेख से यह उद्धरण ही काफी है, ‘‘अंग्रे*ा चले गए किंतु उनका कानून बाकी है और साथ ही धारा १४४ भी बाकी है। आए दिन अखबारों में कहीं-न-कहीं धारा १४४ लागू करने की घोषणा पढ सकते हैं। एक अवधि समाप्त होते ही दूसरी लग जाती है और दूसरी के बाद तीसरी। कुछ स्थान पर तो अधिका*रयों ने यह नियम ही बना रखा है कि धारा १४४ बराबर लगाए रखना चाहिए। इसलिए अब कोई जानने का प्रयत्न नहीं करता कि धारा १४४ लागू है अथवा नहीं, क्योंकि वह मान लेता है कि लागू होगी ही।’’१
पहले खंड में दीनदयाल जी की १९४२ से लेकर १९५० तक की रचनाएँ ली गई हैं। कालखंड की दृष्टि से देखें तो यह सबसे बडे अंतराल को समेटता है। इसमें भी बडा अंतराल समेटता है वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का लिखा ‘वह काल’। ‘आशाओं का अंधकार में लोप’ शीर्षक यह विवेचनात्मक लेख स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम और स्वतंत्र भारत के आरंभिक दौर के राजनीतिक इतिहास का जैसा सूक्ष्म दृष्टिसंपन्न और तटस्थ विश्लेषण प्रस्तुत करता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। मात्र २१ पृष्ठों में जितना कुछ समेटा जा सका और जितने तर्कपूर्ण ढंग से एक-एक तथ्य रखा गया है, वह किसी उपलब्धि से कम नहीं है। यह खंड माधव सदाशिव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ को समर्पित है और उनका परिचय संघ के वरिष्ठ प्रचारक. एवं बहुभाषाविद लेखक-अनुवाद रंगा हरि ने लिखा है। खंड की भूमिका सरसंघचालक मोहन भागवत ने लिखी है। इसके परिशिष्ट में केवल एक पाठ है- भारत के पुण्यक्षेत्र। कम शब्दों में ५१ शक्तिपीठों, सप्तपुरियों, द्वादश ज्योतिर्लिंगों, चार धामों, सात पवित्र नदियों, वेदों, शास्त्रों, पुराणों, अष्ट विनायक, प्रमुख सूर्य मंदिरों आदि का संक्षिप्त परिचय देने की दृष्टि से यह
संग्रहणीय है।
दूसरा खंड तीन वर्षों का है- १९५१, १९५२, और १९५३। इसमें दीनदयाल जी की दो पुस्तकें हैं- ‘अखंड भारत क्यों’ और ‘हमारा कश्मीर’। ‘अखंड भारत क्यों’ के सातवें अध्याय ‘विभाजन के सामाजिक व आर्थिक दुष्परिणाम’ से एक उद्धरण देखिए, ‘‘आर्थिक दृष्टि से विभाजन ने देश को भारी धक्का पहुँचाया है। आज की विषम परिस्थिति इसी का परिणाम है। ‘शस्य श्यामल मातृभूमि’ विभाजन के कारण ही भिखारी बनी है।......पटसन, कपास और जूट की अधिकांश पैदावार पाकिस्तान में होती है। भारत और पाकिस्तान दोनों की दुरवस्था का चित्र सहज आँका जा सकता है, जब यह तुलना करें कि इनकी मिलों का ९२ प्रतिशत भारत में है। जूट के अभाव में कलकत्ते की मिलें बंद होती हैं तथा मजदूर रोता है। बाजार के अभाव में पूर्वी बंगाल का किसान अपने नेताओं को कोसता है। दोनों राज्यों के बीच किया हुआ कोई भी व्यापारिक समझौता अभी तक भलीभाँति नहीं चल पाया है।’’२ १९५२ में कही गई इस बात की प्रासंगिकता अब तथ्यों सहित स्पष्ट है। इसके अंतिम अध्याय में वह स्पष्ट करते हैं, ‘‘वास्तव में भारत को अखंड करने का मार्ग युद्ध नहीं, कारण युद्ध से भौगोलिक एकता हो सकती है, राष्ट्रीय एकता नहीं। अखंडता भौगोलिक ही नहीं, राष्ट्रीय आदर्श भी है। देश का विभाजन दो राष्ट्रों के सिद्धांत तथा उसके साथ समझौते की प्रवृत्ति से हुआ। अखंड भारत एक राष्ट्र के सिद्धांत पर मन, वचन और कर्म से डटे रहने से सिद्ध होगा।’’३ विरोधियों की बनाई छवि और वास्तविकता का अंतर इससे समझा जा सकता है।
तीन वर्षों का यह दौर जम्मू-कश्मीर को लेकर पूरे देश में भयावह अन्तर्द्वन्द्व का दौर है। एक तरफ राज्य की जनता थी, जो स्वंय को भारत का अभिन्न अंग मानती थी और दूसरी ओर वे स्वार्थी तत्त्व जो जनमत को कुचल कर अपना अलग अस्तित्व बनाने पर तुले थे। दुर्भाग्य से हमारा शासन स्वार्थी तत्वों की मंशा को समझने में नाकाम रहा और नतीजा यह हुआ की आम जनता को न चाहते हुए भी ऐसे तत्त्वों के सामने समर्पण करना पडा। ‘भ्रम और भटकाव के साल’ शीर्षक ‘वह काल’ में वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल कौल लिखते हैं, ‘‘बात यह थी कि शेख अब्दुल्ला की नीतियों के विरुद्ध जम्मू में आक्रोश भडक उठा। यों तो प्रजा परिषद का गठन १९४७ में ही हुआ था, लेकिन आंदोलन के मार्ग पर चलने की विवशता उसके सामने शेख के अलगाववादी रुझान के सार्वजनिक हो जाने के बाद ही पैदा हुई।’’४ सरकार के दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाते हुए ‘हमारा कश्मीर’ में दीनदयाल जी कहते हैं, ‘‘किंतु मालूम होता है कि पं. नेहरू गलत कदम को वापस लेने के लिए तैयार नहीं। २१ जून के पत्रकार सम्मेलन में उन्होंने कश्मीर को एक पृथक इकाई माना है तथा उसके आत्मनिर्णय के अधिकार को भी स्वीकार किया है। साथ ही सुरक्षा समिति को दिए गए वादों पर डटे रहने का वचन दिया है। हम अपने किसी वादे को तोडना नहीं चाहते, किन्तु सुरक्षा परिषद् ने कश्मीर प्रश्ा* को न्याय और पक्षपात रहित दृष्टि से सुलझाने की कोशिश नहीं की। पाकिस्तान को आक्रमणकारी घोषित करने के बजाय उसको भारत ही के समान मुकदमे का एक फरीक मानकर समझौते की कोशिश की जा
रही है।’’५
इसके परिशिष्ट वाले हिस्से में एक पुस्तक ‘जोडें कश्मीर ः मुखर्जी-नेहरू और अब्दुल्ला का पत्र व्यवहार’ शामिल है। यह वस्तुतः अंगे*जी में दीनदयाल जी द्वारा प्रकाशित की गई ‘इंटीग्रेट कश्मीर ः मुखर्जी-नेहरू एंड अब्दुल्ला करेस्पॉडेंस’ का अनुवाद है। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, यह पुस्तक तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के साथ डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के पत्रव्यवहार का संकलन है। जम्मू आंदोलन पर केंद्रित ये पत्र ऐतिहासिक महत्व के हैं। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को समर्पित इस खंड में समर्पण परिचय डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निर्देशक अनिर्बाण गांगुली और भूमिका विख्यात इतिहासकार देवेंद्र स्वरूप ने लिखी है।
तीसरे खंड म १९५४-५५ की कृतियाँ हैं। इसमें संकलित पुस्तक ‘‘टैक्स या लूट?’’ में दीनदयाल जी के विचार ध्यातव्य हैं, ‘‘अतः राज्य को इस प्रकार संपत्ति अपहरण का तब कोई अधिकार नहीं है, जब तक वह यह सिद्ध न कर दे कि उसका उद्देश्य फिजूलखर्ची कम करके पूरा नहीं हो सकता। आज आवश्यकता तो इस बात की है कि शासन का खर्चा कम किया जाए, क्योंकि यह भार बहुत अधिक बढ गया है।’’६ दूसरी पुस्तक ‘बेकारी की समस्या और उसका हल’ में वे भारत में बढती बेराजगारी की समस्या के कारणों का विश्लेषण ही नहीं करते, अपितु समाधान के उपाय भी सुझाते हैं। परिशिष्ट वाले भाग में एक और किताब शामिल है ‘कश्मीर के मोर्चे पर’। पत्रकार रामशंकर अगि*होत्री की इस किताब की प्रस्तावना दीनदयाल उपाध्याय ने ही लिखी है। यह कश्मीर के संबंध में प्रजा परिषद द्वारा चलाए गए आंदोलन का पूरा ब्योरा है। गोवा मुक्ति के लिए सत्याग्रह के नायक जगन्नाथ राव जोशी को समर्पित इस खंड के लिए जोशी जी का परिचय वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सांसद बलवीर पुंज ने लिखा है। भूमिका दिल्ली विधानसभा में मुख्य कार्यकारी पार्षद रहे डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा और ‘वह काल’ संविधानविद ब्रजकिशोर शर्मा ने
लिखा है।
चौथा खंड १९५६-५७ का संकलन है। ‘उजागर होते अंतर्विरोध’ शीर्षक ‘वह काल’ में पं. जवाहरलाल नेहरू की टिप्पणियों को जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र कहते हैं, ‘‘उनके राजनीतिक दावों और आर्थिक वास्तविकताओं के बीच का अंतर्विरोध दशक के अंतिम वर्षों में उजागर होने लगा था। १९५१ में प्रथम पंचवर्षीय योजना का शुभारंभ करते समय उन्होंने आश्वासन दिया था कि अब से विदशों से अनाज का आयात नहीं किया जाएगा। लेकिन यह सच्चाई थी कि अगस्त १९५६ से अमरीका से पी.एल. ४८० के अंतर्गत जो समझौता किया गया, उसमें १०६७ करोड का गेहूँ खरीदना पडा, जबकी पूरी प्रथम योजना दो हजार करोड रुपये की थी। लेनिन के प्रशंसक और फेबियन समाजवादी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जहाँ सामूहिक सहकारी खेती, औद्योगिक विकास, राष्ट्रीयकरण और बिजली उत्पादन के पक्षधर थे, वहीं कृषि उत्पादन को लेकर उनकी उदासीनता आलोचना के केन्द्र में थी। १९५६-५७ के वर्ष में जब चार हजार आठ सौ करोड की दूसरी पंचवर्षीय योजना शुरू हुई थी, उस समय भारत में विदेशी पूंजी निवेश और विदेशी व्यापार के क्षेत्र में भुगतान संतुलन की स्थिति बेहद खराब हो गई थी। भारत की आर्थिक मदद करने के लिए विश्व बैंक को १९५८ में एक सहायता कोष स्थापित करना पडा था।’’७ इसमें कोई पुस्तक नहीं है। प्रजा परिषद् के संस्थापक पं. पे*मनाथ डोगरा को समर्पित इस खंड के लिए डोगरा जी का परिचय जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री डॉ. निर्मल सिंह और भूमिका रंगा हरि ने लिखी है। ‘पाञ्चजन्य’ और ‘ऑर्गनाइजर’ में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे विचारवीथी और वीकली डायरी जैसे स्तंभों में दीनदयाल जी ने राज्य पुनर्गठन, भाषा संबंधी राजनीति, औद्योगिक नीति, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, अर्थ व्यवस्था, कश्मीर के पृथक संविधान जैसे समसामयिक विषयों पर अपने विचार बिना किसी लाग-लपेट के पूरी स्पष्टता से रखे हैं।
वर्ष १९५८ के दो खंड बने ह। पाँचवे खंड में सामसामयिक विषयों पर दीनदयाल के लेखों के अलावा उनकी एक पुस्तक ‘भारतीय अर्थनीति विकास की एक दिशा’ भी है। शिक्षाविद और जनसंघ के नेता रहे आचार्य देवा प्रसाद घोष को समर्पित इस खंड में समर्पण परिचय ऑर्गनाइ*ार के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा है। भूमिका हिमालय प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने लिखी है। ‘संक्रमण का समय’ शीर्षक इसके ‘वह काल’ में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री रह चुके के. एन. गोविन्दाचार्य का मत है, ‘‘भारत का राजनीतिक प्रभुवर्ग भारत को रूस के नक्शेकदम पर डालने का ही विचार मानने लगा और भेडचाल के तहत समाजवाद अनके अर्थों में प्रयुक्त किया जाने लगा। भारत सत्ता प्रतिष्ठान उपनिवेशवादी रंग में ही रंगा था। भारत को यूरोप के न*ारिये से देख रहा था। भारत की ताकत को कमजोर और यूरोपीय व्यवस्था को अंधाधुंध लादने की कोशिश को ही विकास का रास्ता समझ रहा था। भारत की परंपरा, भारतीय समाज में परिवार संस्था की ताकत का न उसे अनुमान था, न ही समझ’’८ इस विडंबना को दीनदयाल जी ने अपने लेख ‘‘भारतीय आर्थिक संकट की भूमिका’’ में इस प्रकार रेखांकित किया है, ‘‘द्वितीय पंचवर्षीय योजना खटाई में पडी हुई है और अब बहुत से लोग विचार करने लगे हैं कि उसमें काट-छाँट की जाए, उसका काल बढाया जाए अथवा उसका पुनर्निर्धारण किया जाए। किंतु क्या यह आर्श्चयजनक बात नहीं है कि इन्हीं लोगों ने योजना को समस्त आर्थिक व्याधियों की अचूक औषधि धोषित किया था? योजना आयोग ने ही नहीं, अर्थशास्त्रियों की समिति ने, मंत्रिमंडल ने, संसद ने, राज्य सरकारों तथा राज्य विधानमंडलों ने, राष्ट्रीय विकास परिषद् ने, कांग्रेस कार्यसमिति तथा कांगे*स अधिवेशन ने और यहाँ तक कि समाजवाद पर आस्था रखने वाले सभी राजनीतिक दलों ने एक आवाज से योजना के बारे में घोषित किया था कि इससे कम में विचार किया ही नहीं जा सकता। निसंदेह कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने योजना के आकार और प्रकार के विरुद्ध आवाज उठाई थी, किंतु उन्हें जन्मजात निराशावादी तथा प्रतिक्रियावादी घोषित कर उनकी आवा*ा को दबा दिया गया, उनकी चेतावनियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।’’९ श्रमिकों के संबंध में दीनदयाल जी के विचारों को ‘भारतीय अर्थनीति विकास को एक दिशा’ पुस्तक के इस उद्धरण से समझा जा सकता है, ‘‘यह आश्चर्य का ही विषय है कि आजकल की संयुक्त पूँजी कंपनियों में एक शेयर होल्डर तो, जो बहुधा किसी उद्योग से लाभांश के अतिरिक्त और कुछ संबंध नहीं रखता, स्वामित्व के अधिकार का उपयोग करे और जो मजदूर उस कारखाने में बराबर काम करता है, वास्तविक रूप से कलों को सक्रिय बनाता है तथा जिसकी पूरी जीविका उस उद्योग के भले-बुरे पर निर्भर है, सदैव ही परायापन अनुभव करता रहे। निस्पृहता की यह भूमिका ठीक नहीं। अतः आवश्यक है कि अंशधारी के साथ मजदूर को भी स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हों तथा उसे लाभ प्रबंध में भागीदार बनाया जाए। इस प्रकार श्रमिकों के प्रतिनिधि संचालक मंडल में रहेंगे।’’१० अगर इस विचार को अमल में लाया जा सके तो उद्योगों में स्वामी-श्रमिक संबंधों की सारी कटुता अपने आप समाप्त हो जाए।
इसी वर्ष का होने के नाते छठे खंड में ‘वह काल’ नहीं है। इसमें केवल एक पुस्तक है- दो योजनाएँ ः वायदे, अनुपालन, आसार। यह दीनदयाल जी की अंगे*जी में लिखी गई मल पुस्तक ‘द टू प्लांस ः प्रॉमिसे*ा, परफॉमेंस, प्रॉस्पेक्ट्स’ का हिन्दी अनुवाद है। पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं के आलोचनात्मक विश्लेषण पर केंद्रित यह पुस्तक दीनदयाल जी की अर्थदृष्टि समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। श्रमिक नेता दत्तोपंत ठेंगडी को समर्पित इस खंड के लिए समर्पण परिचय राजकुमार भाटिया ने लिखा है और भूमिका अर्थशास्त्री डॉ. बजरंग लाल गुप्ता ने।
संघ के पूर्व सरकार्यवाह भाऊराव देवरस को समर्पित सातवाँ खंड १९५६ का है। इसमें कोई पुस्तक नहीं है। तिब्बत पर चीन के आक्रमण, नेहरू की चीन संबंधी नीति, अंगे*जीपरस्तों की कुटिल चालों, सहकारिता कृषि और तत्कालीन राजनीतिक संकट जैसे समसामयिक विषयों पर दीनदयाल जी के विचारोत्तेजक लेख हैं। समर्पण परिचय अच्युतानंद मिश्र, ‘वह काल’ वरिष्ठ लेखक-पत्रकार डॉ. नंदकिशोर त्रिखा और भूमिका विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री चंपत राय ने लिखी है।
आठवाँ खंड वर्ष १९६० का है। यह खंड उत्तर प्रदेश जनसंघ की पहली महिला उपाध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर सत्याग्रही हीराबाई अय्यर को समर्पित है। उनका परिचय ब्रजकिशोर शर्मा ने लिखा है। भूमिका संघ के पूर्व सह सरकार्यवाह मदनदास ने लिखी है। यह वह समय है जब चीन भारत पर आक्रमण की भूमिका बनाने लगा था। ‘दिशाहीनता और संकट का समय’ शीर्षक ‘वह काल’ में दीनदयाल शोध संस्थान के प्रधान सचिव अतुल जैन ने हमारे नीति नियंताओं में व्याप्त दिग्भ*म का संकेत देते हुए स्पष्ट किया है, ‘‘चीनी आक्रमण का प्रश्न देश के सामने सबसे तीव्रता के साथ खडा था। सरकार जनता को इस बात पर विश्वास में नहीं ले रही थी कि वह चीन के साथ क्यों और किस मुद्दे पर बातचीत कर रही है। पूरे देश में इस बात को लेकर आक्रोश था कि सरकार चीन के साथ दृढतापूर्वक क्यों नहीं पेश आ रही है। उलटे जब भी भारत सरकार बातचीत की पेशकश करती, चीन एक इलाके पर अपना दावा जता देता था। ऐसी स्थिति में पंडित नेहरू ने चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई को भारत आने का निमंत्रण देकर देश की जनता को भौंचक्का कर दिया।’’११ दीनदयाल जी के लेखों में यह बात बार-बार आई है कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के प्रति जैसी गंभीरता और कूटनीतिक कुशलता की आवश्यकता है, हमारे नीति-नियंताओं में उसका घोर अभाव दिखाई देता है। ‘एक वैकल्पिक चीन नीति की आवश्यकता’ शीर्षक लेख में वह कहते हैं, ‘‘यदि चीन के साथ हम कूटनीतिक संबंध समाप्त करना उचित नहीं समझते तो कम-से-कम चीनी दूतावास पर वैसे प्रतिबंध तो अवश्य ही लगा देने चाहिए जैसे चीन में भारतीय दूतावास पर लगाए गए हैं। चीन द्वारा सन् ५४ की संधि के उल्लंघन को ध्यान में रखते हुए हमें तिब्बत पर चीनी प्रभुत्व के संबंध में की गई संधि को भी समाप्त कर देना चाहिए। चीन आक्रमण के खतरे से पीडित समस्त दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन करने की दिशा में भी पग उठाना आवश्यक है।’’१२ इस बात का महत्व और दीनदयाल जी की दूरदर्शिता आज और भी साफ ढंग से समझी जा
सकती है।
सन् १९६१में विभिन्न अवसरों पर दीनदयाल जी द्वारा लिखे गए लेखों एवं उनके वक्तव्यों का संकलन नवें खंड में है। यह दीनदयालजी के साथी रहे सुंदर सिंह भंडारी को समर्पित है। भंडारीजी का परिचय साहित्यकार डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष ने लिखा है। भूमिका संघ के सरकार्यवाह सुरेश भय्याजी जोशी और ‘वह काल’ बलबीर पुंज ने लिखा है। सामाजिक, आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर सरकार की विफलताएँ और उनका सूक्ष्म विश्लेषण इस खंड के लेखों का मूल स्वर है। इसमें शामिल दो लेख खास तौर से गौरतलब हैं- ‘प्रेम नगर का खूनी स्कूल’ और ‘चीनी आक्रमण से ध्यान हटाने के लिए शुरू हुआ सांप्रदायिक सियार रोदन’। इनमें पहला जानकारी की दृष्टि से एक विस्फोटक लेख है। वैश्विक कूटनीति और उसमें दूसरे देशों में अस्थिरता फैलाने के लिए अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों, जिनमें प्रायोजित जनांदोलनों से लेकर हत्याएँ तक शामिल हैं, पाठक को अवाक कर देता है। जब-तब सिर उठाने वाली हिंसक कार्रवाइयों और उन आतंकवादी प्रवृत्तियों को बहुत ही चालाकी से जनांदोलन साबित करने में जुट जाने वाले बुद्धिजीवियों के परदे के पीछे का सच समझने के लिए इसी लेख से एक उदाहरण द्रष्टव्य है- ‘‘अफ्रीकन जातियों के उठाव के पीछे किसी-न-किसी बलशाली किंतु अदृश्य शक्ति का हाथ होगा, ऐसा संशय पूर्वी अफ्रीका के ब्रिटिश गुप्तचर को अनेक वर्ष पूर्व ही हुआ था। उस विभाग ने गुप्त रीति से उसका पता लगाना भी प्रारम्भ कर दिया तथा माऊ-माऊ आंदोलन के कारण इस विभाग को पूर्ण विश्वास भी हो गया था। इस आंदोलन में सैंकडों गोरे और दस हजार से अधिक माऊ-माऊ मारे गए थे। इसके नेता जामो केनियाता को ७ वर्ष का दंड भी मिला था......मासोपोल के गुरिल्ला के पास रशियन निर्मित ऑटोमेटिक पिस्तौल मिले। १९५८ के दिसम्बर में इन गुरिल्ला ने गोना के पास एक स्टेट पर हमला किया, उसमें अनेक गुरिल्ला मारे गए और विलियम पला
नाम का लुलुआ जाति का एक गुरिल्ला पुलिस के
हाथ लगा।१३
दसवें खंड में अधिकांश लेख मतदाता परिष्कार विषयक हैं। ‘आपका मत’ श्ाृंखला के इन लेखों में चुनावी प्रक्रिया, उसमें राजनीतिक दलों की भूमिका और वस्तुस्थिति, मतदाताओं की बेचारगी, चुनावी नारों और मुद्दों, राजनीतिक दलों के छल-प्रपंच में फँसने की विवशता जैसे कई मसले उठाए गए हैं। यही वह समय है जब भारत ने चीनी आक्रमण का दंश झेला। चीन के युद्धविराम प्रस्ताव पर केंद्रीय लेख ‘चीनी प्रस्ताव का एक्स-रे’ में इस खतरे के प्रति दीनदयालजी की दृष्टि ध्यातव्य है, ‘‘कुछ ऐसे शांतिकामी हो सकते हैं, जो चाहेंगे कि एशिया के दो महान देशों के बीच युद्ध टालने की गर्ज से भारत को यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए, भले ही यह कितना भी अपमानजनक हो। उन्हें यह बताने की आवश्यकता है कि चीन यहीं नहीं रुकने जा रहा है। उन्होंने जो भी हडपा है, यदि हम उन सभी का समर्पण कर दें तो भी आगे वे और की माँग करेंगे। बीते इतिहास के अतिरिक्त ऊपर से निर्दोष से दिखने वाले इस युद्धविराम वक्तव्य के बिलकुल अंत में यह बात स्पष्ट हो जाती है।’’१४ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद को समर्पित इस खंड के लिए समर्पण परिचय पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने लिखा है। भूमिका संघ के सहसरकार्यवाह
डॉ. कृष्ण गोपाल और ‘वह काल’ वरिष्ठ पत्रकार बनवारी ने लिखा है।
ग्यारहवें खंड में एक पुस्तक ‘सिद्धांत और नीतियाँ’ है। सन् १९६४ में आई इस पुस्तक में भारतीय जनसंघ के राजनीतिक दर्शन के साथ-साथ उसके सिद्धांतों और नीतियों का जिक्र है। इसमें शामिल ‘कुछ धारणाएँ’ श्ाृंखला के लेखों में दीनदयाल जी अपनी विदेश यात्राओं के अनुभवों का जिक्र करते हैं। इसमें उनका मुख्य प्रतिपाद्य दूसरे देशों में भारत संबंधी धारणा है। कश्मीर समस्या, चीन के आक्रमण और पाकिस्तान के विश्वासघाती एवं आक्रामक रवैये पर केंद्रित लेख भी ऐतिहासिक महत्व वाले हैं। भाषाविद् एवं प्राच्यविद् डॉ. रघुवीर को समर्पित इस खंड के लिए समर्पण परिचय साहित्यकार राजीव रंजन गिरि ने लिखा है। भूमिका स्वामी गोविन्ददेव गिरी और ‘वह काल’ सांसद डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने लिखा है।
बारहवाँ खंड १९६५ का है। इसी साल पाकिस्तान के साथ भारत का युद्ध हुआ। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारत ने यह युद्ध जीता, लेकिन जो संधि हुई वह भारत के लिए कतई उपादेय नहीं रही। इसमें शामिल पुस्तिका ‘विश्वासघात’ में इस युद्ध विराम समझौते पर गंभीर प्रश्ा* उठाए गए हैं। दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित दर्शन ‘एकात्म मानववाद’ पर उनके द्वारा बंबई (अब मुंबई) में दिए गए चार व्याख्यानों की श्ाृंखला और इसी विषय पर राष्ट्रधर्म में प्रकाशित एक लेख भी है। संपादक मंडल को उपलब्ध दीनदयालजी की एकमात्र कविता, जो भैयाजी दाणी के देहावसान पर लिखी गई थी, से इस खंड का आरंभ होता है। सन् १९६५ का यह संकलन संघ के पहले गृहस्थ प्रचारक प्रभाकर बलवंत भैया जी दाणी को समर्पित है। दाणीजी का परिचय दिल्ली प्रांत के सहसंघचालक आलोक कुमार ने लिखी है। भूमिका बिहार के तत्कालीन महामहिम राज्यपाल (अब भारत के महामहिम राष्ट्रपति) रामनाथ कोविंद ने लिखी है और ‘वह काल’ साहित्यकार सीतेश आलोक ने।
सन् १९६६ के कृतित्व का संकलन तेरहवें खंड में है। इसमें लेखों-वक्तव्यों के अलावा दो पुस्तकें भी हैं। पहली ‘वचनभंग ः ताशकंद घोषणा की शव परीक्षा’ और दूसरी ‘अवमूल्यन ः एक बडा पतन’ ‘दूरगामी परिवर्तन वाला वर्ष’ शीर्षक इसके ‘वह काल’ में वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव लिखते हैं, ‘‘देश पिछले साल अगस्त-सितम्बर में पाकिस्तान के साथ युद्ध में जीतने की खुशी, सकारात्मकता और गर्व से अब भी आविष्ट था। सन् १९६२ में चीन से अपमानजनक पराजय के बाद १९६५ में पाकिस्तान को जमकर मजा चखाने के अनुभव ने देश का आत्मविश्वास और मनोबल खूब बढा रखा था। छोटे कद के सरल, शुद्ध देसी आदमी लगने वाले पौने दो साल पुराने प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जवाहरलाल नेहरू की विराट छाया से अपने को मुक्त करके, अपने बारे में सारी आशंकाओं को दूर करके देश को पाकिस्तान से युद्ध में निर्णायक जीत दिलाई थी।........इस पृष्ठभूमि में साल शुरू होते ही कल्पनातीत तुषारापात हुआ। ताशकंद में शास्त्री जी की अकस्मात् ह्रदयघात से मृत्यु हो गई।’’१५ दीनदयाल जी स्वयं अपने लेख ‘आखिर वे उसके शहीद योद्धा को घर ले आए’ में लिखते हैं, ‘‘शायद शास्त्री उस वक्त वापस लौट आना चाहते थे। लेकिन सोवियत रूस ताशकंद की बैठक का निष्फल होना झेल नहीं सकता था, इसीलिए शायद रूसी प्रमुख कोसिजिन ने भारत पर दबाव बनाना शुरू किया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की जिम्मेदारी बनती है कि वे सबमें विश्वास पैदा करें। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि शास्त्री जी को मजबूरी में अपने हस्ताक्षर करने पडे। आखिर वे कौन से दबाव थे, जिनके आगे देश को झुकना पडा? जो समझौता हुआ, वह पूरी तरह पाकिस्तान प्रस्ताव की नकल है, शास्त्री जी ने कोसिजिन की बात मान ली। लेकिन शायद यह उनके लिए बहुत ज्यादा था। वे इसे बरदाश्त नहीं कर पाए। कोसिजिन ने भारत की कीमत पर अपने लिए नाम कमाया। हमने इसके लिए लाल बहादुर शास्त्री की कीमत दी।’’१६ जैसा की शीर्षक से ही स्पष्ट है ‘वचनभंग ः ताशकंद घोषणा की शव परीक्षा’ में ताशकंद घोषणा के एक-एक बिन्दु का सूक्ष्म विवेचन करते और इसे भारतीय अस्मिता के विरुद्ध बताते हुए अंत में इसे ठुकरा देने की माँग की गई है। दूसरी पुस्तक ‘अवमूल्यन ः एक बडा पतन’ में बढती महँगाई और भारतीय रुपये की गिरती कीमत का विश्लेषण है। जनजीवन और अर्थव्यवस्था पर इसके तात्कालिक और दूरगामी परिणामों की ओर भी स्पष्ट संकेत किया गया है। इसकी भूमिका उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने लिखी है। ऋषिकल्प मनीषी नानाजी देशमुख को समर्पित इस खंड के लिए समर्पण परिचय देवेंद्र स्वरूप ने लिखा है।
जना कृष्णमूर्ति को समर्पित चौदहवां खंड १९६७ का है। इसी साल दीनदयाल जी भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए। ‘कांग्रेस के प्रभुत्व का अवसान’ शीर्षक ‘वह काल’ में वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने लिखते हैं, ‘‘अमरीका अपने पब्लिक लॉ-४८० (पीएल-४८०) के तहत भारत को लाल गेहूँ के रूप में कर्ज देता था। वहाँ से जहाज आता और राशन बाँटता। उस दौर में भारत को दो करोड टन से अधिक अनाज का आयात करना पडा था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक समेत कुछ यूरोपीय देश भारत का ‘भीख का कटोरा’ भरते थे। महँगाई चरम पर थी। यह सोवियत मॉडल पर बनी जवाहरलाल नेहरू की तीन पंचवर्षीय योजनाओं के एकांगी स्वरूप की नाकामी की मुनादी थी।’’१७ विकेंद्रीकरण की बात तो देश में बार-बार की जाती रही, पर यथार्थ इसके विपरीत रहा। इसका नतीजा है विकास के नेहरू मॉडल की विफलता। दीनदयाल जी इसके मूल निहित गलती की ओर संकेत करते हैं, ‘विकेन्द्रीकरण की विडंबना’ में, ‘‘विकेंद्रीकरण की मौलिक इकाई है- व्यक्ति और कुटुंब। व्यक्ति के प्रयत्नों तथा कुटुंब के सहारे और स्वामित्व के द्वारा सभी व्यापक रूप से विषमता अथवा शोषण की संभावनाएँ नहीं उत्पन्न हो सकती हैं। ये प्रवृत्तियाँ तो तब बलवती हुई, जब व्यक्ति इन मर्यादाओं से आगे निकलकर सामूहिक संस्थाओं और निगमों के द्वारा अधिकाधिक शक्ति का स्वामी बनता गया। अतः साधारणतया उत्पादन का आधार व्यक्ति या कुटुंब होना चाहिए। हमें ऐसी प्रणाली को अपनाना पडेगा, जिसमें हम कुटुंब को इकाई बना सकें। उद्योगों में कुटीर और छोटे-छोटे उद्योग, जो घर में ही चलाए जा सकते हों, हमारे व्यापक औद्योगीकरण का कार्यक्रम हो सकते हैं। हाँ, इनमें हम अच्छी से अच्छी मशीनों और बिजली का उपयोग कर सकते हैं।’’१८ कृष्णमूर्ति जी का परिचय ला. गणेशन और भूमिका गुजरात के महामहिम राज्यपाल ओम प्रकाश कोहली ने लिखी है।
गाँधीवादी विचारक और इतिहासकार धर्मपालजी को समर्पित पंद्रहवें खंड के संपादकीय में संपादक डॉ. महेश चंद्र शर्मा लिखते हैं, ‘‘कालक्रमानुसार उपलब्ध सामग्री तो चौदह खंडों में समाहित हो चुकी है। यह पंद्रहवाँ खंड क्या है? वस्तुतः संकलित सामग्री में ऐसी भी समाग्री थी, जिनका कालक्रम ज्ञात नहीं हो सका तथा दीनदयालजी की मृत्यु के बाद कुछ अप्रकाशित सामग्री विविध पत्र-पत्रिकाओं में तथा पुस्तक रूप में प्रकाशित हुई। इस उपलब्ध सामग्री की मूल लेखन-तिथि इन प्रकाशनों में उपलब्ध नहीं है,अतः विविध शीर्षकांकित इस खंड का प्रणयन हुआ है।.........दीनदयाल जी की मृत्यु के बाद उनके दो वरिष्ठ सहयोगियों श्री भानुप्रताप शुक्ल तथा श्री रामशंकर अगि*होत्री ने ‘राष्ट्रजीवन की दिशा’ नाम से एक पुस्तक संपादित की। सामान्यतः इसके सभी अध्याय दीनदयालजी द्वारा दिए गए संघ शिक्षा वर्गों के बौद्धिक वर्गों को संपादित करके बनाए गए हैं। लकिन इनमें तिथि व स्थानों का कहीं उल्लेख नहीं है।’’१९ इस लिहाज से तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर ऐसा लगता है कि दूसरे खंडों में शमिल किए गए बौद्धिक वर्गों का वैसा कसा हुआ संपादन नहीं हो पाया है जैसा कि पंद्रहवें खंड के वर्गों का हुआ है। एक बात अवश्य है कि उनमें दीनदयाल जी की वक्तृत्व शैली की स्पष्ट झलक मिलती है, जो शायद संपादकीय कसावट के नाते इन लेखों से गायब हो गई है।
ध्यान रहे, वर्ष १९६८ में १० फरवरी को रहस्यम परिस्थितियों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का निधन हो गया था। उनका निर्जीव शरीर मुगलसराय रेलवे स्टेशन के यार्ड में पाया गया था। पुलिस और सीबीआई जाँच के बावजूद इस रहस्य से परदा आज तक नहीं उठ पाया। इस पर ‘अवसान’ में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय पहले दीनदयाल जी के ही एक लेख ‘प्रेग नगर का खूनी स्कूल’ की ओर ध्यान दिलाते हैं, ‘‘उस लेख में तथ्यों सहित वर्णन था कि किस तरह कम्युनिस्ट अपने राजनीतिक मंसूबे को पूरा करने के लिए हत्या के तौर-तरीकों की ट्रेनिंग का बाकायदे स्कूल चला रहे हैं। वह लेख एक चेतावनी थी उनके लिए जो कम्युनिस्ट खेल को जानना और विफल करना चाहते थे। क्या उस चेतावनी को सरकार, समाज और बौद्धिक वर्ग ने सुना? ऐसा नहीं लगता।’’२० आगे वह उन परिस्थितियों को स्पष्ट करते हैं जिनमें दीनदयाल जी का निर्जीव शरीर पाया गया।
तमाम कसरतों के बावजूद इस रहस्य से परदा नहीं उठ सका तो नहीं उठ सका। रामबहादुर राय इस पर प्रश्न भी उठाते हैं, ‘‘यह सच है कि महानता का उम्र से कोई सीधा नाता नहीं होता। उसका नाता तो ज्ञान और गुण के वैभव से होता है। जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय में था। उन्हें जो मानते हैं, वे भी और जो नहीं मानते थे वे भी, यह तो सभी जानते हैं कि उनकी निमर्म हत्या हुई। जिसके वे कहीं से भी पात्र नहीं थे। लेकिन लठैत बन हत्यारे भला इसे कैसे जानें! वे तो हत्या का धंधा कर रहे थे। जो उन्हें इस्तेमाल कर रहे थे, वे ही षड्यंत्रकारी थे। वे ही षड्यंत्र के सूत्रधार थे। उन्होंने भरसक कोशिश की कि उनके निधन को मामूली दुर्घटना साबित कर दिया जाए। इसमें वे सफल नहीं हुए। लेकिन षड्यंत्र पर परदा डालने में वे अवश्य सफल हो गए। यह जितना सच है, उससे ज्यादा गहरा रहस्य आज भी बना हुआ है कि हत्या के षड्यंत्रकारी आखिरकार कौन थे? केंद्र में सरकारें आई और गईं, लेकिन इस रहस्य का भेद जानना शेष है। क्या यह भेद जाना जा सकेगा?’’२२ इसके परिशिष्टों में दीनदयाल जी के निधन पर कई समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के अलावा महत्वपूर्ण संस्मरण भी हैं। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और तत्संबंधी न्यायिक निर्णय भी इसमें शामिल हैं।
लेखों के साथ विशिष्ट संदर्भों के क्रम में दी गई पाद टिप्पणियाँ काफी महत्वपूर्ण हैं। ये संदर्भ को स्पष्ट करने में सहायक हैं। कहीं-कहीं तथ्यगत भूलें और प्रूफ की अशुद्धियाँ खटकती हैं। अनुक्रमाणिका प्रत्येक खंड के पहले हिस्से के अंत में दी गई है, जो कई स्तंभों के बाद मिलती हैं। यह इच्छित विषय की तलाश को पाठक के लिए कठिन बनाती है। यद्यपि परंपरा यही है, लेकिन ऐसे गंभीर प्रयास के मामले में परंपरा तोडी जा सकती थी। अंगे*जी की पुस्तकों में कंटेंट अब प्रायः आरंभ में ही दिया जाता है। छोटी-मोटी त्रुटियों के बावजूद कुल मिलाकर यह एक चिरस्मरणीय प्रयास और संग्रहणीय संकलन है। यद्पि इसे ही दीनदयाल जी के कृती व्यक्तित्व की इतिश्री मान लेना भी भूल होगी। जैसा कि संपादक डॉ. महेश चंद्र शर्मा पहले खंड के संपादकीय में स्वंय स्वीकार करते हैं, ‘‘पचास वर्ष के लंबे कालखंड तथा प्रसिद्धिपराङ्मुखी प्रवृत्ति का ऐसा मेल हुआ कि जितना हमने संकलित किया है, उससे ज्यादा सामग्री अनुपलब्ध है। आगे कोई अनुसंधानपूर्वक उसे खोजेगा या खोज पाएगा कि नहीं, यह तो नहीं मालूम, लेकिन जितना संकलित करना संभव हुआ, वह तो समष्टि को लोकार्पित हो जाए, इसी आकांक्षा के साथ अधूरेपन से ही क्यों न हो, इस खंड की सामग्री सँजाई गई है।’’२३ यह केवल पहले ही नहीं, सभी खंडों के संदर्भ में सच है। अपने महत्वपूर्ण व्यक्तियों कि स्मृति को सँजोने के संदर्भ में जब हम पश्चिम की प्रवृत्ति से इस बात को मिलाकर देखते हैं तो लगता है कि अपनी ही थाती के प्रति उदासीनता की हमारी दृष्टि और वैचारिक मताग्रहों के नाते अपनी ही विभूतियों के प्रति उपेक्षा का भाव कितना हानिप्रद है। क्या यह हमें अपने ही पूर्वजों के अनुभवों से वंचित नहीं करती, जिनसे हम लाभ उठा सकते थे।