जगद्गुरु शंकराचार्य:व्यतित्व पल्लवन के विविध चरण

कुंदन माली



दीनदयाल उपाध्याय विरचित उपन्यास ‘‘जगद्गुरु शंकराचार्य’’ की अन्तर्वस्तु के मूल तत्व की बात करें तो स्पष्ट हो जाता है कि शंकराचार्य की जीवनी पर आद्धृत उक्त रचना में रचनाकार का मंतव्य शंकर के आचार्य तथा जगद्गुरु बनने की प्रक्रिया तथा इस प्रक्रिया में विभिन्न चरणों में अपना योगदान करने वाले विभिन्न पात्र के देखांकन पर केंद्रित है, और यहाँ इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये कि वैदिक परम्परा, संस्कृति, आध्यात्मिक चिंतन धारा के भाष्यकार के रूप में शंकराचार्य का पल्लवन वस्तुतः मानव मूल्य पर आधारित तर्क-वितर्क, वाद-विवाद-संवाद, खण्डन-मंडन, परीक्षण-परिरक्षण-परख-परिष्कार एवं पूर्णत्व की बहुस्तरीय, बहुकोणीय समय एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया के फलस्वरूप ही होता है। इन पात्रों में शंकर के परिजन तो मात्र माता-पिता तक ही सीमित हैं, जबकि सार्वजनिक-बौद्धिक स्तर पर शंकर के जीवन के अलग-अलग पडावों पर अनेक चरित्र आते हैं, जिनके साथ होने वाले शास्त्रार्थ-संवाद के परिणामस्वरूप वैदिक धर्म तथा परम्परा से जुडे अनेक संशयों तथा सन्देहों का निवारण होकर तत्सम्बद्ध धरातल पर उज्ज्वल तथा स्पष्ट तस्वीर की संभावना साकार होती है। शंकर के पिता शिवगुरू, माता आर्यंबा, विष्णु शर्मा, गोविन्दपाद, गौडपादाचार्य, प्रभाकराचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती, तथा बौद्ध भिक्षुवृंद इत्यादि चरित्र शंकराचार्य के बौद्धिक परिमार्जन का साधन बनते हैं।
शंकर के पिता शिवगुरु का निधन तब हुआ जब शंकर आठ ही वर्ष के हुऐ थे और इसके पश्चात शंकर ने माता की अनुमति लेकर संन्यास ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की- ‘‘माँ! तुम्हारी सदा ही इच्छा रही है कि मैं वैदिक धर्म का उद्धार करूँ, आज्ञा दो कि मैं संन्यास लेकर अपने जीवन के कार्य को प्रारम्भ करूँ’’ (पेज ः २३)। माता ने इस शर्त पर अनुमति दी की माता के मरते समय शंकर उसके पास आ जाएँगे जिसे शंकर ने मान लिया। संन्यास मार्ग पर निकलने की शुरूआत में शंकर का साथ विष्णु ने निभाया तथा दोनों ने साथ मिलकर गुरु की खोज प्रारंभ की। शंकर के गुरु गोविन्दपाद ने उन्हें विधिवत संन्यास कर्म की दीक्षा दी। उन्होंने शंकर को ऐसे संस्कार दिए जो उन्हें धर्म-प्रचार के कार्य में योग्य तथा सक्षम बना सके और ऐसा ही हुआ भी। अपनी बौद्धिक खोज यात्रा के क्रम में शंकराचार्य ने काशी में रहकर दिग्विजय के निमित्त कूच कर दिया तथा काशी से चलकर वे चरणाद्रिगढ आए तथा आगे जाकर प्रयाग में कुछ दिन तक रुके। प्रयाग में शंकराचार्य ने प्रभाकराचार्य को तर्क में हराकर विजय प्राप्त की और अंततः प्रभाकराचार्य उनके शिष्य बन गए यहाँ तक कि उनका समस्त अग्रहार शांकरमत में दीक्षित हो गया। आचार्य शंकर अब मंडन मिश्र से मिलने पहुँचे। शंकर तथा मंडन मिश्र के बीच होने वाले शास्त्रार्थ के बारे में लेखक के शब्दों में- ‘‘उनकी तूणीर में अब तर्क के तीर समाप्त हो चुके थे। शंकर स्वामी की सरस्वती में स्नान करके वे अपनी समस्त शंका-कुशंकाओं का समाधान कर चुके थे।..... अब मंडन मिश्र ने अपने को आचार्य के चरणों में अवनत पाया और आचार्य ने भी आनंदाश्रु बहाते हुए उन्हें अपनाया। राष्ट्र की संवेदना से उनका ह्रदय तो पहले ही पूर्ण था, अब उनको निश्चित मार्ग भी मिल गया। वे शंकर के समान ही संन्यास धारण करके साथ चलने को तैयार हो गये।’’ (पेज ः ८२-८३)।
मंडन मिश्र की पराजय के बाद उनकी पत्नी भारती ने शंकर को शास्त्रार्थ की चुनौती दी लेकिन शंकर ने उनके साथ स्त्री होने को लेकर इसको स्वीकार नहीं किया लेकिन अंततः आचार्य को इसे मानना पडा। भारती ने अंत में उनके साथ असहमति जताते हुए कहा कि- ‘‘जो गृहस्थ है, जो संसार में रहता है, वह न तो आफ नैष्कर्म्य के सिद्धान्त को मान सकता है और न वेदांत को ही अपने व्यवहार में ला सकता है। अतः मुझे इसमें अव्यावहारिकता का दोष दिखाई देता है।’’ (पेज-८६)। तत्पश्चात् आचार्य शंकर ने परकाया प्रवेश करके उससे प्राप्त अनुभव तथा वेदांत के व्यावहारिक स्वरूप को स्पष्ट किया और इसके साथ ही साथ सरस्वती का अंतःकरण भी अब शंकारहित हो चुका था। अब उसने भी अपने पति सहित शंकराचार्य का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया। वेदांत-विजय यात्रा के अंतिम चरण में शंकराचार्य को बौद्ध धर्म के अनुयायियों की चुनौती झेलनी पडी। इन लगों की दृष्टि में शंकराचार्य की धर्मव्यावहारिकता ‘गोरख धंधा’ से अधिक कुछ भी नहीं थी। अंततः शंकराचार्य ने बौद्ध धर्मावलम्बियों की भ*ामक अवधारणओं का समाधान किया, कुछ इस तरह से- ‘‘यदि आपकी बातें वेदों में मिल जाए तो उसमें आपको क्या आपत्ति होनी चाहिए?’’ (पेजः९९)। इस पर प्रकार आचार्य शंकर ने चारों ओर वेदांत परम्परा तथा राष्ट्रीय संस्कृति का उद्घोष निर्विवाद रूप से कर दिया और ‘‘उसम लाखों बौद्धों ने अवगाहन किया।’’ (पेज ः १००)। शंकराचार्य ने विभिन्न धर्मावलम्बियों तथा मत-मतांतरों के अन्तर्गत व्याप्त विभ*मों तथा विविध सम्प्रदायों के समक्ष रखकर इस विशाल राष्ट्र की सनातन परम्परा तथा सांस्कृतिक-आध्यात्मिक समृद्धि की विशेषताओं को लोक-विमर्श के केन्द्र में लाने का महती कार्य सम्पन्न किया।
शंकराचार्य का समस्त जीवन मूलतः और मुख्यतः भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता, राष्ट्रीय भावना तथा वैदिक सांस्कृतिक वङ्मय की चेतना के प्रचार-प्रसार को समर्पित रहा है और जीवन-जग तथा समाज के प्रति उनकी यह समर्पण यात्रा जिन तत्वों, पात्रों तथा परिवेश से प्रभावित, परिचालित तथा सम्पोषित होती रही है वे सब कुल मिला कर भारतीय परम्परा तथा ज्ञान-सम्पदा का पर्याय ही रहे हैं। उक्त कृति में विद्यमान तमाम मुख्य तथा गौण पात्रों के अतिरिक्त चार दिशाओं का परिवेश भी शंकराचार्य के बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण रूप से सहायक रहा है। कहा जा सकता है कि शंकराचार्य का जीवन तथा कर्म समन्वित रूप से भू-भौगौलिक, आध्यात्मिक-सांस्कृतिक, धार्मिक तथा आत्मपरक आयामों पर आद्धृत रहा है। शंकराचार्य की इस अद्भुत चेतना यात्रा में भारतवर्ष के जड-चेतन इत्यादि तमाम कारकों का योगदान रहा है और इस दृष्टि से शंकराचार्य का व्यक्तित्व-विकास किसी एक व्यक्ति का आत्मपरक विकास न होकर एक समूची आध्यात्मिक-सांस्कृतिक परम्परा का संश्लिष्ट तथा समन्वित विकास कहा जाना चाहिए और इस दृष्टि से दीनदयाल उपाध्याय की रचनात्मक दृष्टि अपनी सार्थकता सिद्ध करती है।