दीनदयाल उपाध्याय के उपन्यासों का ओ न्याप सिक परिवेश व् अंत वर्स्तु

जीतेन्द्र निर्मोही



दीनदयाल उपाध्याय ने साहित्य के रूप में हमें विविध विषयों पर अध्ययन हेतु निबंध-आलेखों की विशद श्ाृंखला दी है जो हमारे साहित्य की थाती है। सृजित कथा साहित्य के रूप में उनके दो उपन्यास ‘‘सम्राट चंन्द्रगुप्त’’ व जगद्गुरु ‘‘श्री शंकराचार्य’’ है। ये उपन्यास हमारे साहित्य की राष्ट्रीय व सांस्कृतिक धरोहर हैं।
दोनों उपन्यास संस्कृतिनिष्ठ, संयत व सहज भाषायी प्रवाह में वर्णात्मक शिल्प विधान में है। ये ऐतिहासिक उपन्यास है जिनकी भाव भूमि पर भारतीयता का विधान खडा हुआ है। दोनों में रूप, रंग वेशभूषा, प्राचीन वैभव, वंश परम्परा संस्कार, भारतीय संस्कृति, देशकाल वातावरण स्पष्ट चित्रित होता है। उनके पात्रों का अपना संघर्ष, मनोद्वन्द्व, हर्ष-विषाद, एकात्मक भाव, भारतीयता का अपना महत्व है। उपन्यासकार दीनदयाल उपाध्याय अपने कथ्य एवं विचारों के साथ दोनों उपन्यासों के रचना कर्म में सफल हुए हैं।
जब इन उपन्यासों की रचना हुई, तब हिन्दी का आधुनिककाल का प्रयोगवाद (१९४३ से १९५३) चल रहा था, पर प्रायोगिक सत्य तो यह है, इस समय आम मनुष्य व आम साहित्यकार की भावभूमि द्विवेदी काल की थी जहाँ संस्कृतिनिष्ठ राष्ट्रीय विचारधारा का भाषा प्रवाह चल रहा था। १५ अगस्त १९४७ को देश आजाद होने के बाद इसी भावभूमि के प्रबल प्रवाह ने जोर पकड लिया था। यह भी सच है कि छायावाद का असर उसके बाद दिखाई देने लगा था, देश के गिने चुने कवि ही प्रयोगवाद के प्रवाह में थे। दीनदयाल उपाध्याय के उपन्यासों पर मैथिलीशरण गुप्त के काल का प्रवाह स्पष्ट दिखाई देता है जहाँ उन्होंने द्विवेदी काल में जयद्रथ वध, भारत-भारती, शकुंतला, पंचवटी, साकेत, यशोधरा, तिलोत्तमा, चन्द्रहास जैसी कृतियाँ दी। इस समय भारत वर्ष के प्राचीन संदर्भों का पुनर्पाठ किया जा रहा था। जयशंकर प्रसाद द्वारा जो चन्द्रगुप्त मौर्य नाटक की रचना की गई वो छायावाद काल की है उसके परोक्ष में यह था कि उन्होंने हमारे प्राचीन वाङ्मय के साथ ऐतिहासिक ग्रंथों का विशद अध्ययन किया था। उस समय के लेखक यही कार्य कर रहे थे, वे भारतीय पौराणिक आख्यानों का ऐतिहासिक संदर्भों के साथ गहन अध्ययन कर रहे थे।
उपन्यास को मानव जीवन की विशद व्याख्या कहा गया है। प्रेमचन्द ने कहा है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव जीवन का चित्रमान समझता हूँ। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसका खोलना उपन्यास का मूल तत्व है’’ वास्तव में उपन्यास की परिभाषा ही यह प्रकट करती है कि उसमें मानव चरित्र हो तथा उपन्यासकार उसके किसी पक्ष पर प्रकाश डाले। उपन्यास कभी लक्ष्यहीन नहीं होते। बहुत से उपन्यासकार अपने लक्ष्य और शिल्प के प्रति संतुलन नहीं रख पाते हैं, लेखक यहाँ लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध होते हुए अपने भाषायी शिल्प के साथ अग्रसर होते हैं और पठनीयता में कहीं भी स्खलन नहीं लाने देते। जिसके फलस्वरूप पाठक की जिज्ञासा उपन्यास के साथ शब्द दर शब्द आगे बढती है और वह उसे पूरा करके ही छोडता है। अतः हम कह सकते हैं उक्त दोनों उपन्यास श्रेष्ठ उपन्यासों की श्रेणी में आते हैं।
दोनों उपन्यासों में लेखक उपन्यास के तत्वों कथावस्तु, चरित्र चित्रण, कथोपकथन, वातावरण, भाषा-शैली के प्रति सजग रहे हैं। दोनों उपन्यासों का परिवेश ऐतिहासिक होने से कथावस्तु का गठन स्वतः ही लेखक की पकड में रहा है। पात्रों का चरित्र चित्रण सुसंयत व भारतीय संस्कृति के अनुकूल है। दोनों उपन्यासों में कथोपकथन की भरमार नहीं है, लेखक लम्बे-लम्बे संवादों से बचा है जिससे कथ्य में सौंदर्य आ पाया है, देशकाल वातावरण की शाब्दिक परंपरा भी समयानुकूल है, दोनों उपन्यासों की भाषा व शैली लगभग एक-सी संतुलित, समयानुसार संस्कृतिनिष्ठ, सहज व पठनीय है। लेखक की त्वरा ने राष्ट्रप्रेम व सांस्कृतिक परिवेश की ऊँचाईयों को छूने का प्रयास किया है, तात्विक विश्लेषण से दोनों उपन्यास अपना प्रभाव छोडते हैं।
‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ उपन्यास की अन्तर्वस्तु
‘‘सम्राट चन्द्रगुप्त’’ को उसकी भूमिका अनुसार बाल उपन्यास विद्वान डॉ. महेश चन्द्र शर्मा द्वारा बताया गया है उपन्यास लेखक की इस पर प्रस्तुत मनोगत उक्ति ‘‘कुछ घटनाओं का वर्णन पाश्चात्य विद्वानों द्वारा दी गई आधुनिक खोजों के आधार पर न होते हुए अपने प्राचीन तथ्यों तथा भारतीय विद्वानों द्वारा दी हुई आधुनिक खोज के आधार पर है’’। यहाँ मुझे सम्राट चन्द्रगुप्त का प्रतिपाद्य प्रस्तुत करना उचित नहीं लगता, हर पढा लिखा व विद्वान समुदाय पूरी कथावस्तु से वाकिफ है, फिर आजकल अधिकांश टी.वी. पर चाणक्य, चन्द्रगुप्त, पाटलीपुत्र आदि से संबधित ऐपीसोड आते ही रहते हैं।
मेरी राय में दीनदयाल उपध्याय द्वारा सृजित ‘‘सम्राट चन्द्रगुप्त’’ एक लघु उपन्यास है, विद्वानों के अनुसार लघु उपन्यास में कथ्य संकुचन की विशेषता होती है तथा पात्रों की संख्या कम होती है। लघु उपन्यास वह कथाप्रधान गद्य विधा है जो कहानी से वृहत् व सामान्य उपन्यास की अपेक्षा लघु कलेवर रखती है। इसमें हमारे प्राचीन वैभव, सांस्कृतिक एकता व राष्ट्रीयता की प्रचुरता है जो शायद लेखकीय दायित्व रहा है। इसमें लेखक अभिव्यंजना के क्षेत्र में मनोभावों को प्रस्तुत करने में सफल रहे है।
जीवन की किसी विशेष भाव की निकटता लेखकीय शिल्प को प्रभावित करती है दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रप्रेम में ओत-प्रोत हैं जिसका प्रभाव उपन्यास पर स्पष्ट दिखाई देता है। वे अपनी रचना में कथावस्तु के साथ चलते दिखाई देते हैं। किसी शिल्पगत चमत्कार से पूर्व उनका भाषा प्रभाव शिष्ट, सौम्य व सरल है यहाँ देखें कि इस उपन्यास में शब्द से आंकिक बोध किस तरह से प्रकट से करते हैं ‘‘राजा के पास दस पद्म रुपया होने के कारण उसका नाम महापद्म नंद पडा था। अपनी उँगली पर इकाई गिनकर देखो ओर सोचो कि कितना था वह महापद्म रुपया! आज अगर दुनियाँ के सब आदमियों को यह रुपया बाँटा जाए तो एक-एक आदमी के पास पचास लाख रुपया होगा और अकेले हिन्दुस्तान में बाँटा जाए तो हममें से हर एक को २.५ करोड मिले। ओह! कितना होगा वह धन और कितने सुखी थे, उस समय के स्वतंत्र हिन्दुस्तान के लोग’’।
लेखक सहज भाव में पाठ से रूबरू होकर राजा नंद के समय के अर्थशास्त्र को यहाँ अवगत करा देता है। यहाँ उस तथ्य को पुष्ट भी किया गया है कि भारत सोने की चिडिया थी। यहाँ १९४७ के समय देश की जनसंख्या व संसार की जनसंख्या का बोध भी है जो उस समय की धनराशि को आम लोगों को बाँटने की गणना के साथ पुष्ट कर दिया गया है। यही कारण है कि उनके तात्कालिक निबधों से उनके द्वारा भारत की पंचवर्षीय योजना व अर्थशास्त्र की जानकारी से अवगत कराया गया है।
इस उपन्यास में भारतीय इतिहास के घटनाक्रम की जानकारी व काव्यमय भाषा का प्रभाव भी देखने को मिलता है जैसे ‘‘आज जो पटना कहलाता है, उस समय इसका नाम कुसुमपुर था, बाद में यहीं पाटलिपुत्र बसाया गया जो बिगडकर पटना हो गया। कुसुमपुर वास्तव में कुसुमपुर था। जैसे भौंरे पुष्प की सुगंध से आकर्षित होकर उसके चारों ओर मंडराते रहते हैं, उसके गौरव के गीत गाते हुए तथा कुसुम के रस का पान कर के अपनी इच्छा को तृप्त करते है।’’
यहाँ लेखकीय भाषा का सौंदर्य शिल्पसौष्ठव व अनुभूति अभिव्यंजना के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है। सम्पूर्ण उपन्यास बाह्य कलाबाजी से दूर सहज कथ्य के प्रवाह में भागीरथी गंगा की तरह प्रवाहित होता है। उपन्यास सृजन के समय लेखक का निरंतर गंभीर चिंतन इसके अद्योपांत हमें अनुभूत होता है। लेखक द्वारा यूरोपीय नामों को संस्कृतनिष्ठ भाव में लिखना अच्छा लगता है। जैसे ऐलेक्जेंडर को अलिक्सुंदर, सेल्युकस को सेलेउक।
उपन्यास के मुख्य पात्र चाणक्य, विष्णु गुप्त, चन्द्रगुप्त, राक्षस, अलिक्सुंदर, सेल्युकस, पर्वतक आदि है। लेखक द्वारा प्राचीन भारत के नगरों व प्रदेशों का बोध कराना अच्छा लगता है, ये समसामयिक भी है, और सांस्कृतिक अवदान भी है जो यहाँ उनके बौद्धिक कौशल का परिचय हमें कराता है।
एक लेखकीय मनोविज्ञान पात्रों की भूमिका, पात्र संयोजन ओर उनके कथोपकथन को उसी तरह नियंत्रित करता है, जैसे कठपुतली वाला अपनी अंगुलियों से कठपुतली के पात्रों का संयोजन करता है।
लेखक इस उपन्यास के प्रारंभ में ही राजा नंद के विलासी काल का वर्णन करते हैं। उसे नर्तकियों से घिरा हुआ माहप्रमादी दिखाते हैं। चाणक्य इस परिवेश से क्षुब्ध है। वो किसी चन्द्रगुप्त की तलाश में है, उन्हें चन्द्रगुप्त मिल जाता है, उसका प्रस्तुतीकरण चाणक्य के मित्र अमात्य राक्षस से उनकी भेंट, नंद का पतन, ऐलेक्जेंडर का भारत में प्रवेश, छोटे प्रदेशों के महानायक के द्वारा ही उसको खदेड देना पर्वतक की सहायता से नंद साम्राज्य पर चढाई कर चन्द्रगुप्त द्वारा सत्ता प्राप्त करना, फिर सेक्यूक्स भारत में प्रवेश के लिये आना सभी संदर्भों में लेखक का कथावस्तु के साथ-साथ चलना प्रभावपूर्ण है। सम्पूर्ण कथाक्रम में लेखक समस्त पात्रों को मनोवैज्ञानिक ढंग से संयोजित कर उपन्यास ‘‘सम्राट चन्द्रगुप्त’’ आगे बढाकर अन्वति तक लाते हैं। ‘‘कृणवन्तो विश्वमार्यम्’’ परम्परा के अंतर्गत लेखक आर्य परम्परा का निर्वाह करते हैं। उपन्यास में चाणक्य संबोधन का उद्धरण देखें ‘‘यह समय सत्य असत्य विचारने का नहीं है वत्स! अपने राष्ट्र का कल्याण और उसकी स्वतंत्रता ही सबसे बडा सत्य है। आज तो इस झूठे सत्य को लेकर अकर्मण्य बनकर बैठ जाओगे, कल समस्त देश पर विदेशी म्लेच्छों का राज्य हो जायेगा। उनके अत्याचार और उनका गोवध, क्या ‘‘यह सत्य होगा’’। (पेज न. २९) लेखक यहाँ भविष्य के प्रति भी सावचेत करा देता है।
समस्त उपन्यास सामाजिक परिवेश में राष्ट्रीय सरोकारों का बोध कराता है गुरु शिष्य, परंपरा, राजा-प्रजा, समाज, कुशल प्रशासकीय क्षमता और समसामयिक कूटनीति। इस उपन्यास से राजधर्म का बोध इस तरह होता है- ‘‘अमात्यवर राजा राष्ट्र के लिए है, न कि राष्ट्र राजा के लिए। यदि अलिक्सुंदर आज तुम्हारा राजा हो जाए तो उसकी भक्ति भी तुम राज भक्ति मानकर करोगे? राजभक्ति वहीं गुण है, जहाँ वह राष्ट्र और देशभक्ति की पोषक हो, अन्यथा वह पाप है। सर्वथा त्याज्य है।’’
सच कहा जाए तो यह उपन्यास का सच भी है। आज की स्थिति में उपन्यास ‘‘सम्राट चन्द्रगुप्त’’ की प्रासंगिकता अपने चरम पर है। यह उपन्यास बताता है, राजा प्रजा का सेवक है, प्रजा उसकी दास नहीं, यही भारतीय जीवन मूल्य है।
उपन्यास के उपसंहार में लेखक ने आर्षवाक्य ‘‘नत्वेवार्यस्य दास्य भाव’’ अर्थात ‘‘आर्य कभी गुलाम नहीं बनाये जा सकते हैं’’, का भाव बोध है। यही हमारी सनातन परम्परा है।
इस उपन्यास रचना का इतिहास महत्वपूर्ण स्त्रोत है। इतिहास को उपन्यास का रूप देना चुनौतीपूर्ण कार्य है वह दीनदयाल उपाध्याय ने किया है। ऐतिहासिक उपन्यास लिखते समय इतिहास की रक्षा के साथ-साथ उपन्यास की कथावस्तु व कलावस्तु की ओर भी ध्यान दिया जाता है, उस जागरूक प्रतिभा का दीनदयाल उपाध्याय ने निर्वाह किया है।
‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ उपन्यास की अन्तर्वस्तु
यह उपन्यास दीनदयाल उपाध्याय को श्रेष्ठ उपन्यासकार के रूप में स्थापित करता है। उपन्यास के तत्वों के निर्वाह करते हुए लेखक ने यहाँ एक श्रेष्ठ उपन्यासकार के रूप में प्रस्तुति दी है। यह ऐतिहासिक उपन्यास ही नहीं वरन् एक महान् संन्यासी का जीवनवृत भी है जो बिना आध्यात्मिक चितंन के नहीं लिखा जा सकता है। इस उपन्यास के सृजन से पूर्व लेखक समस्त पौराणिक आख्यायिकाओं से कमोबेश गुजरता है। इसमें पतंजलि का योग-दर्शन है, जैमिनी का मीमांसा दर्शन, बादरायण वेदांत दर्शन, कणाद का वैशेषिक दर्शन, गौतम का न्यायदर्शन, कपिल का सांख्यदर्शन, चार्वाक का लोकायत दर्शन, जैनों का अर्हत दर्शन, बौद्धों का तथागत दर्शन, उपनिषद, श्रुति प्रस्थान, श्रीमद्भागवत् गीता, स्मृति प्रस्थान, वेदांत सूत्र आदि का उल्लेख किया हुआ है। यह जरूरी भी था कि लेखक जगद्गुरु शंकराचार्य के परिवेश को समझे। इस उपन्यास के प्रतिपाद्य या मूल में एक संस्कृत का श्लोक है जिसका वर्णन ध्येय पथ अध्याय में किया गया हैः-
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुल त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत।।
ये उपन्यास ११८ पेज के १८ अध्यायों में समाहित है। लेखक द्वारा कृति में श्री शंकराचार्य कृत नर्मदा वंदना है, जो हमारी आध्यात्मिक भावभूमि की द्योतक है, जहां हम नदियों की वंदना करते आये हैं।
इस उपन्यास का आधार आध्यात्म है। लेखक अपने विचार कथोपकथन, संवाद के माध्यम से उपन्यास में यूं सामने लाते है ‘‘अधिभौतिक शक्ति को जब अधिदैविक भावना का पुट दिया जाता है तभी आध्यात्मिक दृष्टि उत्पन्न होती है’’।
लेखक ने अध्याय ‘‘मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ’’ में धर्म, वैदिक धर्म, आर्य पद्धति, तत्व ज्ञान, यज्ञ, हवन, पूजा पद्धति कर्मकांड आदि को बताने का यथोचित प्रयास किया है।
जैसे शंकराचार्य का कथन ‘‘परन्तु मंडनाचार्य यज्ञ, हवन, संध्या, उपासना आदि सब मन को शुद्ध करने के, क्षुद्र भावनाओं को निकाल कर मन में उच्च भावनाएँ भरने के साधन मात्र है, वो साध्य तो नहीं है। साधन जीवन नहीं है, साध्य है।’’
इसी प्रकार ‘‘आप सत्य कहते हैं कि मिश्र प्रवर त्याग, आत्माहुति और बलिदान का तो तभी मूल्य हैं, जब वे किसी सत्य की आदर्श की प्राप्ति के
लिए हों’’।
संत तर्क को नर्क बताते हैं, परन्तु इस अध्याय में तर्क से शंकाओं का समाधान किया गया है। लेखक ने शास्त्रार्थ के लिए स्पष्ट किया है कि ‘‘यह शास्त्रार्थ वह था जहाँ दो देशभक्त देश की समस्याओं का हल ढूंढने बैठे थे’’।
इस उपन्यास में स्त्री पात्र भी है और नारी स्वाभिमान भी है, जिसे उपन्यासकार ने बडी कुशलता के साथ सामने रखने की कोशिश की है जब मंडन मिश्र शास्त्रार्थ में शंकर से हार जाते हैं तो उनकी पत्नी भारती शंकराचार्य से शास्त्रार्थ को उद्यत हो जाती है। तब शंकराचार्य कहते हैं ‘‘स्त्री से शास्त्रार्थ नहीं किया जा सकता’’।
भारती का प्रत्युत्तर ‘‘स्त्री हूँ तो क्या करूं आचार्य, स्त्री के क्या विधान नहीं होते हैं? उनके मन में शंका या कुशंकाओ की आँधी नहीं उठ सकती है? उसके पास भी मस्तिष्क है, ध्येय है और हम भी राष्ट्र का अंग हैं, उसका भी राष्ट्र के प्रति दायित्व है और उस दायित्व को निभाने का अधिकार है’’। फलतः शास्त्रार्थ होता है और उसमें भारती हार जाती है। वो अंत में बोलती है, ‘‘आपने सिद्धांत तो ठीक रखे हैं आचार्य किंतु आपकी माया ब्रह्म तथा सर्वात्मैक्य का सिद्धांत संन्यासी के लिए ही सत्य हो सकता है। जो गृहस्थ में है, जो संसार में है, वह न तो आफ नैषकर्म्य के सिद्धान्त को मान सकता है और न ही वेदान्त को अपने व्यवहार में ला सकता है। अतः मुझको इसमें अव्यवहारिकता का दोष नजर आता है।’’
इस कथन के पश्चात् निरुत्तर शंकर अनुभव लेने के लिए तपबल व योगबल से गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिए राजा की मृत देह में प्रवेश करते हैं, इसके बाद छः माह में अपनी देह में लौट आते हैं, इसका उल्लेख उपन्यास में है। यह शंकर के जीवन का सबसे बडा घटनाक्रम था।
लेखक ने विभिन्न अध्यायों के माध्यम से शंकर की सम्पूर्ण देश की यात्रा का वर्णन किया है। बद्ररीकाश्रम में रहकर अपनी माँ द्वारा दी गई धनराशि से बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण कर वहाँ का पुजारी अपने मित्र सुरेश शर्मा को नियुक्त करते हैं, जिनकी पीढी आज भी बदरीनाथ पूजा कर रही है, इसका उल्लेख उपन्यास में है। शंकर द्वारा चारों दिशाओं में चार धाम की स्थापना करना, बौद्ध धर्म के आचार्यों से शास्त्रार्थ, कश्मीर प्रवास, शंकराचार्य की पहाडी आदि का उल्लेख भी कुशलता पूर्वक उपन्यास में किया गया है। अन्त में केदारनाथ से आगे जाकर समाधिस्थ होकर पंचतत्व में विलीन होना अंतिम अध्याय ‘‘महन्त्तत्त्व में विलीन’’ में दिखाया गया है।
कुछ महत्वपूर्ण उक्तियाँ भी उपन्यास को सौन्दर्य प्रदान करती है, जैसे-‘‘शासकों का यही धर्म होता है, अपने शासन की जडें मजबूत करें’’, ‘‘शंकराचार्य जानते थे कि जन-समाज की स्मृति अल्प होती है’’, ‘‘एक ही मार्ग के यात्रियों का एक-दूसरे पर क्रोध कैसा?’’ कृति में शास्त्र की कुछ वर्जनाएँ भी हैं। यह कृति समय-समय पर आये श्लोकों से श्ाृंगारित हुई है।
सच तो यह है कि जब कोई विद्वान उपन्यास का सृजन करता है तो अपना स्व, अपना आत्मज्ञान, उसमें रख देता है, ऐसा इस उपन्यास ‘‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’’ में भी हुआ है। इसके लिए साहित्य जगत दीनदयाल का ऋणी रहेगा।
उनकी भाषा में भागीरथी गंगा जैसा प्रवाह इस उद्धरण से देखा जा सकता है ‘‘तक्षशिला से आचार्य कश्मीर की ओर चले गए। महर्षि कश्यप की भूमि क्रोड में केवल कुसुम क्यारियाँ ही नहीं, काव्य और कला भी क्रीडा करती थी। अपने प्राकृतिक सौंदर्य से जहाँ वह नंदन-कानन को लजाती थी, वहाँ साहित्य और संस्कृति के शुद्ध एवं सरल स्रोत की सुषमा के कारण स्वयं सरस्वती ही विराजती थी’’।
इसी कथन के अन्त में लेखक की भावना ‘‘बिना शारदा का वरदान पाए कौन जगद्गुरु हो सकता है’’। हमारे आध्यात्मिक वैभव एवं चेतना के समग्र भाव को प्रस्तुत करती है।
इस प्रकार ‘‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’’ महत्वपूर्ण एवं कालजयी उपन्यास सिद्ध होता है।