राष्ट्रधर्म और मानव धर्म की गौरवगाथाओ द्वारा भारतीयत्व से साक्षात्कार

डा. नवीन नंदवाना



भारत के स्वर्णिम अतीत को आधार बनाकर हिंदी के कई रचनाकारों, विचारकों और चिंतकों ने अपनी कलम चलाई है। हिंदी साहित्य के इतिहास में तो एक दौर ऐसा आया जब साहित्यकारों ने किसी न किसी इतिवृत्त को आधार बनाकर साहित्य की विविध विधाओं में लेखन किया है। मैथिलीशरण गुप्त का स्मरण किया जाए तो उनके द्वारा रचित महाकाव्यों व खंडकाव्यों में भारत व यहाँ की संस्कृति की सतरंगी छविछटा विद्यमान दिखाई पडती है। ‘जयद्रथ वध’, ‘भारत भारती’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘जयभारत’ में हम भारत के गौरवशाली अतीत को देख सकते हैं। जयशंकर प्रसाद ने तो भारत के इसी इतिहास को आधार बनाकर ‘चंद्रगुप्त’,स्कन्दगुप्त और ‘ध*ुवस्वामिनी’ जैसे कई नाटकों की रचना कर पाठकों को भारतीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं परिचित कराते हुए हमारे स्वर्णिम अतीत का गौरवगान किया है। इस तरह का महत्त्वपूर्ण कार्य केवल हिंदी रचनाकारों ने ही नहीं बल्कि भारतीय विचारकों, चिंतकों और राजनेताओं ने भी किया। जब हम भारतीय विचारकों, चिंतकों आदि का स्मरण करते हैं तो कई नाम हमारी स्मृति में आते हैं। उनमें स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, महर्षि अरविंद, महात्मा गाँधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय आदि प्रमुख हैं।
दीनदयाल उपाध्याय जी ने अपने विचारों व चिंतन को विशेष रूप से अपने लेखों व निबंधों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है। उनके निबंध साहित्य का अध्ययन कर हम उनकी चिंतन दृष्टि व गंभीर विषयों पर भी सहज विश्लेषण क्षमता से परिचित हो सकते हैं। श्री भाऊराव देवरस की प्रेरणा से उन्होंने ललित साहित्य लेखन की दिशा में भी अपनी कलम चलाई। और इस सबके पीछे उद्देश्य था कि नई पीढी के बालकों को भारतीय इतिहास के साथ-साथ संस्कृति व मानवीय मूल्यों का बोध कराया जा सके। एक ही रात में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘चंद्रगुप्त’ नामक बाल उपन्यास की रचना कर अपने लेखन कौशल और संस्कृति चिंतन का परिचय दिया। इसी प्रकार उन्होंने एक उपन्यास ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ भी लिखा। साहित्यिक विधाओं को लेकर किये गए लेखन में उनकी ये दोनों विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं। ‘‘स्वयंसेवक के नाते जिस निष्ठापूर्ण व्यक्तित्व का जीवन निर्माण करना था, इसके लिए ‘सम्राट चंद्रगुप्त’, तथा प्रचारक के नाते जीवन व्रती तैयार करने के लिए ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ औपन्यासिक कृतियों का दीनदयाल जी ने सृजन किया। उनके भीतर का साहित्यकार इन कृतियों से परिलक्षित होता है।’’१ स्वयं दीनदयाल उपाध्याय ने इन महापुरुषों के योगदान का स्मरण करते हुए लिखा है कि- ‘‘आज भारत के इतिहास में क्रांति लाने वाले दो पुरुषों की याद आती है। एक वह कि जब जगद्गुरु शंकराचार्य सनातन बौद्धिक धर्म का संदेश लेकर देश में व्याप्त अनाचार को समाप्त करने चले थे और दूसरा वह कि जब ‘अर्थशास्त्र’ की धारणा का उत्तरदायित्व लेकर संघ राज्यों में बिखरी राष्ट्रीय शक्ति को संगठित कर साम्राज्य की स्थापना करने चाणक्य चले थे। आज इस प्रारूप को प्रस्तुत करते समय वैसा ही तीसरा महत्वपूर्ण प्रसंग आया है, जब कि विदेशी अवधारणाओं के प्रतिबिंब पर आधारित मानव संबंधी अधूरे और अपुष्ट विचारों के मुकाबले विशुद्ध भारतीय विचारों पर आधारित मानव कल्याण का संपूर्ण विचार ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में उसी सुपुष्ट भारतीय दृष्टिकोण
को नए सिरे से सूत्रबद्ध करने का काम हम प्रारंभ कर रहे हैं।’’२
‘सम्राट् चंद्रगुप्त’ नामक बाल उपन्यास बालकों का दिशाबोध करने में अपनी महती भूमिका निभाता है। यह भारतीयता की भावना से बालमन को अवगत कराने में सक्षम है। दीनदयाल उपाध्याय जी अपनी इस रचना के संबंध में लिखते हैं कि- ‘‘प्रस्तुत पुस्तक में ऐतिहासिक तथ्यों के ढाँचे पर अपनी भाषा का रंग चढाकर चंद्रगुप्त का चिरित्र लिखा गया इै। नायक की एक ध्येय निष्ठा ने स्वयं ही उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की है। कुछ घटनाओं का वर्णन पाश्चात्य विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास से मेल नहीं खाता है। प्रस्तुत वर्णन कल्पना के आधार पर न होते हुए भी अपने प्राचीन तथ्यों तथा भारतीय विद्वानों द्वारा दी हुई आधुनिक खोजों के आधार पर है। जिनके लिए यह पुस्तक लिखी गई है, उन्हें सब प्रकार ऐतिहासिक तथ्यों के वन में भ्रमण कराने की आवश्यकता नहीं है। इतना जानना पार्याप्त है कि यूरोपीयन विद्वानों द्वारा प्रयत्नपूर्वक एवं उनका अंधानुकरण करने वाले भारतीय विद्वानों द्वारा अनजाने में फैलाए हुए अंधकार को नष्ट करने वाले ऐतिहासिक शोध के सूर्यप्रकाश में देखी हुई ये सत्य घटनाएँ है।’’३
उपाध्याय जी का यह बाल उपन्यास इस बात को भलीभाँति दर्शाता है कि पुण्य भूमि भारत ने अपने विशाल अतीत में वैभव व पराभव के कई कालखंड देखे हैं। उत्कर्ष और अपकर्ष का दौर बराबर चलता रहा है। प्रत्येक सम-विषम स्थितियों में भारत ने अपनी आत्मा को बलवती रखते हुए अपनी राष्ट्रीय व सांस्कृतिक चेतना के दीपक को आँधियों में भी सदैव प्रज्वलित रखा है। भारत-भू ने सदैव उन कर्मठ वीरों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी नीति-निपुणता और स्वाभिमान के जरिये भारतवासियों को जागृत करने का सार्थक प्रयास किया है। अपनी इस रचना में उपाध्याय जी ने भारत के आज से लगभग २४०० वर्ष पुराने उस घटनाक्रम को वाणी प्रदान की है जिसमें कि चंद्रगुप्त और चाणक्य ने मिलकर अपनी नीतियों और पौरूष के बल पर न केवल अलिक्सुंदर को भारत से बाहर जाने पर विवश किया बल्कि संपूर्ण भारत में एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर संपूर्ण विश्व के सम्मुख एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
चंद्रगुप्त की अजेय शक्ति और चाणक्य की असाधारण प्रतिभा के बल का लौहा विदेशियों ने भी माना और उनको इसी कारण भारत से बाहर भागने को मजबूर होना पडा। चंद्रगुप्त के साम्राज्य का सुसंगठन और वैभव प्रशंसनीय है। इस बात कि प्रशंसा न केवल भारतीयों ने बल्कि विदेशीयों ने की है। ज्ञान-विज्ञान, व्यापार, स्वच्छता, सुनियोजन, जन हितैषी कार्य, संपन्नता और शिक्षा आदि के क्षेत्रों में चंद्रगुप्त का साम्राज्य समृद्ध था। जिस स्वच्छता और सुनियोजन की बात आज की सरकारें करती हैं, वैसा ही सुनियोजन हम आज से शताब्दियों पहले के भारत में देख सकते हैं। ‘‘भारत में कई बडी-बडी सडकें मौर्य शासन में बनीं। उनके दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाए गए थे। तथा थोडी-थोडी दूर पर यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशालाएँ और कुएँ बने थे। भारत के एक कौने से दूसरे कौने तक वणिकवर्ग निर्भय होकर अपना सामान ले जाते थे। चोरी और डाके का भय पूर्णतः जाता रहा था। नगर में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे। इतना ही नहीं, किसी की चोरी होने पर राजकर्मचारी उसका पता न लगा सकें तो राज्य-कोष से उसकी क्षति पूरी कर दी जाती थी। सत्य तो यह है कि जब सब प्रकार की सुव्यवस्था और संपन्नता थी, तब कोई चोरी जैसे गर्हित, शास्त्रनिषिद्ध, लोकविघातक एवं लोकनिंद्य कर्म की ओर प्रवृत्त ही क्यों होता? राज्य में न्याय और शासन-विभाग का कार्य अलग-अलग अधिकारी देखते थे। न्याय के सामने सब समान थे। यहाँ तक कि राजपुत्र को भी, यदि वह दोषी हो तो दंड दिया जाता था। समाज विघातक कार्यों के लिए तो बहुत कठिन दंड दिया जाता था। सम्राट् चंद्रगुप्त स्वयं न्याय करता था। इसके लिए प्रजा का प्रत्येक व्यक्ति सम्राट् तक पहुँच सकता था।’’४ इस कथन से हम भारत के गौरवशाली और वैभवपूर्ण व न्यायपूर्ण व्यवस्था को जाने सकते हैं! दीनदयाल उपाध्याय का यह उपन्यास बालकों को भारतीय इतिहास के इसी गौरवशाली अतीत को समझाने में सक्षम है।
यह गाथा है वैभवशाली मगध की जिसकी राजधानी कुसुमपुर (पाटलीपुत्र या वर्तमान पटना) थी। महापद्मनंद के वंशज बडी अच्छी तरह से साम्राज्य कर रहे थे। उनकी कार्यप्रणाली में जनहित के भाव प्रमुख रूप से विद्यमान थे। वे अपने को प्रजा का स्वामी नहीं सेवक मानकर उनके कल्याण के कार्य में संलग्न रहते थे। किंतु इस नंद वंश का अंतिम सम्राट् घनानंद अपने वंश की परम्परा से विपरीत निकला। वह विलासी था। यह एक सौभाग्य ही था कि उसका मंत्री कात्यायन उपनाम राक्षस बडा ही विद्वान था। वह स्वामिभक्त व राजभक्त था। वह भी नंद वंश के इस हाल पर दुखी रहता था। ऐसे राजा के प्रति प्रजा की निष्ठा में भी नितप्रति कमी आती जा रही थी। ऐसे तमस भरे माहौल में चंद्रगुप्त उन्हें एक प्रकाशपुंज की भाँति लगा। सैनिकों व जनता ने अब उसे अपना राजा मान लिया। राजा घनानंद यह जानकर आग बबूला हो गया। ‘‘उसने आज्ञा दी कि चंद्रगुप्त को फाँसी लगा दी जाए। चंद्रगुप्त को मृत्यु का डर नहीं था। वह वीर था, वह जानता था कि देश के लिए मरने का सौभाग्य थोडों को ही मिलता है। वह कोई अपने लिए सम्राट् थोडे ही बनना चाहता था। वह तो भारत को यूनानियों से बचाने के लिए तथा भारत में फिर से शांति स्थापित करने के लिए काँटों के मुकुट को ग्रहण कर रहा था। परंतु उसको इस बात का दुख अवश्य था कि वह इस अन्यायी राजा के हाथों मारा जाएगा, पर देश की रक्षा न कर सकेगा।’’५ किंतु परिस्थितियों से बचकर चंद्रगुप्त बच निकलता है।
अलिक्सुंदर ने भारत में प्रवेश किया और मजबूर होकर उसे पर्वतक के सम्मुख मित्रता का हाथ बढाना पडा। आचार्य चाणक्य शीलभद्र को अपनी नीतिकुशलता का प्रयोग करते हुए ऐसे समाचार फैलाने का संदेश देते हैं जिससे कि अलिक्सुंदर की सेनाओं में हताशा फैले। चाणक्य नीति में कुशल थे। अपनी इसी कुशलता का परिचय देते हुए चाणक्य कहते हैं कि- ‘‘यह समय सत्य-असत्य के विचारने का नहीं है, वत्स! अपने राष्ट्र का कल्याण और उसकी स्वतंत्रता ही सबसे बडा सत्य है। आज तो इस झूठे सत्य को लेकर अकर्मण्य बनकर बैठ जाओगे, कल समस्त देश पर विदेशी मलेच्छों का राज्य हो जाएगा; उनका अत्याचार और उनका गोवध, क्या यह सत्य होगा।’’६ इस प्रकार अपनी नीति कुशलता का परिचय देते हुए आचार्य चाणक्य यहाँ राष्ट्र प्रेम व उसकी स्वाधीनता को प्रमुखता देते हैं। आचार्य चाणक्य नंद के वहाँ पहुँचकर उसे राष्ट्रधर्म का भान कराते हैं किंतु नंद उन्हें सबके सम्मुख अपमानित करता है। इस अपमान पर चाणक्य अपनी शिखा खोलकर प्रतिज्ञा करते हैं कि जब तक नंद वंश का उच्छेद कर किसी योग्य राजा को इस साम्राज्य की गद्दी पर नहीं बैठा दूँ तब तक यह शिखा नहीं बाधूँगा। वे राक्षस की देशभक्ति और राजभक्ति को जानते हैं। वे उसे संदेश देते हैं कि- ‘‘राजा राष्ट्र के लिए है, न कि राष्ट्र राजा के लिए। यदि अलिक्सुंदर आज तुम्हारा राजा हो जाए, तो उसकी भक्ति भी तुम राजभक्ति मानकर करोगे? राजभक्ति वहीं गुण है, जहाँ वह राष्ट्र और देशभक्ति की पोषक हो, अन्यथा वह पाप है, सर्वथा त्याज्य है।’’७ इस प्रकार चाणक्य पूरा प्रयास करते हैं कि विदेशी आक्रमणकारियों का भारत पूरी तरह संगठित होकर विरोध करे और यवनों को भारत से बाहर खदेडे। चाणक्य को लगता है कि राजा का व्यसनी होना देश के लिए घातक है और ऐसे राजा का अंत करना अपने लिए नहीं राष्ट्र के लिए जरूरी है। चाणक्य चंद्रगुप्त को देश का नायक बनने के लिए तैयार करते हैं। वे उसे कहते हैं कि- ‘‘चंद्रगुप्त तुम भूल रहे हो। तुम्हारा व्यक्तित्व अभी मिटा नहीं है। तुम अपने लिए नहीं, भारत के लिए सम्राट बनोगे। चंद्रगुप्त सम्राट् नहीं होगा, परंतु भारत सम्राट् चंद्रगुप्त होगा। पर्वतक जैसा स्वार्थी तथा महत्त्वाकांक्षी, फिर वह कितना ही वीर क्यों न हो, सम्राट् बनने के योग्य नहीं है। भारत का सम्राट् तो निस्स्वार्थ वृत्ति से संयम एवं दृढतापूर्वक जनता की सेवा करने वाला व्यक्ति चाहिए। भगवान ने तुमको ये गुण दिए हैं, पर तुम भूल से उन्हें अपना समझ बैठे हो। वे देश के हैं, और देश का अधिकार है कि तुम उनका उचित उपयोग करो। तुम सम्राट् बनने और न बनने वाले कौन होते हो? आज देश को आवश्यकता है तो तुम उसकी पूर्ति के लिए सम्राट बनोगे, कल आवश्यकता होगी तो उसी के लिए तुम्हें भिक्षुक भी बनना पडेगा।’’८ इस प्रकार आचार्य चाणक्य राजा के कर्तव्य के साथ-साथ समय पर राष्ट्र के प्रति देशवासियों के कर्तव्य का भी संदेश देते हैं।
सेल्यूकस के आक्रमण के समय नंद का मंत्री रह चुका राक्षस भी सेल्यूकस के दूत का विरोध करता है। सेल्यूकस का आक्रमण एक प्रकार से वरदान सिद्ध हुआ। इसने सभी राष्ट्रवासियों को एकता के सूत्र में बाँध दिया। संपूर्ण भारत एक स्वर में बोलने लगा और एक इशारे पर काम करने लगा। यह जान गए कि- ‘‘संपत्ति में देश का साथ न देने वाला क्षमा किया जा सकता है, परंतु विपत्ति में शत्रु के साथ मिलकर देशद्रोह करने वाला तो दूर रहा, देश का साथ न देकर चुप बैठने वाला भी क्षमा नहीं किया जा सकता।’’९ चंद्रगुप्त की वीरता और कर्तव्यनिष्ठा तथा आचार्य चाणक्य की मेधा और नीति के सम्मुख सेल्यूकस को संधि करने को मजबूर होना पडा। उसने फिर भारत पर आक्रमण न करने की प्रतिज्ञा की साथ ही अपनी पुत्री हेलन का विवाह भी सम्राट् चंद्रगुप्त से करवा दिया। उसका दूत मेगस्थनीज कई वर्षों तक चंद्रगुप्त के दरबार में रहा। चंद्रगुप्त की इसी वीरता और राष्ट्र प्रेम का स्मरण करते हुए दीनदयाल उपाध्याय लिखते हैं कि- ‘‘सम्राट् चंद्रगुप्त अपने काल के एक महान् विजेता भी थे; परंतु अपनी विजय के मद में मत्त होकर उन्होंने शत्रु के प्रति कभी क्रूरता का बरताव नहीं किया। हिंदू संस्कृति की अमूल्य निधि सहिष्णुता को उन्होंने कभी नहीं छोडा। परंतु सहिष्णुता, दया और मैत्री के बडे-बडे शब्दों के मायाजाल में फँसाने वाले शत्रु की दाल भी उन्होंने नहीं गलने दी। विजय के पश्चात् न तो अलिक्सुंदर के समान उन्होंने विजित राजा का निर्दयतापूर्वक वध करवाया और न पर्वतक के समान विजयी होने पर भी विजित के चुंगल में फँसे। सेल्यूक को हराकर उससे उन्होंने मैत्री की, परंतु अपने देश के हित और गौरव को भी आँच नहीं
आने दी।’’१०
इस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय का यह बाल उपन्यास हमारी बाल पीढी का दिशाबोध करता है। यह देश के आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और बौद्धिक सर्वांगीण उन्नति को दर्शाता है। साम्राज्य की सुंदर व्यवस्था को दर्शाते हुए सम्राट के परिश्रमी व दक्ष व्यक्तित्व को भी अभिव्यक्ति देता है। यहाँ हम चंद्रगुप्त के आदर्श सम्राट के स्वरूप को भी देख सकते हैं। इस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय जी यह उपन्यास सरल व सहज भाषा में हमारी पीढी का दिग्दर्शन करने में अपनी महती भूमिका निभाता है।
दीनदयाल उपाध्याय ने ‘जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य’ नाम से एक और उपन्यास की रचना की। यह उपन्यास विशेष रूप से भारत के तरुणों को दिशाबोध प्रदान करने के उद्देश्य से रचा गया। उपन्यास के प्रारंभ में ‘मनोगत’ शीर्षक से उपाध्याय जी लिखते हैं कि- ‘‘शंकराचार्य ने इतना ही नहीं तो समस्त हिंदू-राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने एवं उसे संगठित करने का प्रयास किया। देश के चारों कोनों पर चार धामों के प्रति श्रद्धा केंद्रित करते हुए उन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष की, मातृभूमि की मूर्ति जन-जन के हृदय पर अंकित कर दी।’’११ इस रचना के माध्यम से उपाध्याय जी ने जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य के जीवन व उनके द्वारा सम्पन्न महनीय कार्यों से हमें परिचित कराया है। जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य जी के अवदान को हम इस उपन्यास के माध्यम से भली प्रकार से जान सकते हैं। ‘‘सचमुच शंकर आज अमर है। शरीर से तो संसार में कोई अमर नहीं रहता। अमर तो वही है, जिसका यश अमर है। जब तक संसार में हिंदू जाति जीवित है, तब तक शंकर का नाम जीवित है और हिंदू जाति को तो शंकर ने समन्वय की संजीवनी पिलाकर अमर ही कर दिया है।’’१२
जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य ने देश को एक ऐसे समय दिशाबोध प्रदान किया जब इस बात की देश को सख्त आवश्यकता थी। उन्होंने वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार का बीडा उठाया और अपने इस दायित्व का निर्वहन भी भली प्रकार से किया। संन्यासी होकर भी उन्होंने कर्म का पथ अपनाया। ‘‘नहीं भाई, जंगल में नहीं जाऊँगा। संन्यास का अर्थ संसार को छोडकर वन में तपस्या करना नहीं है। मैंने कर्म संन्यास लिया है, जिसका अर्थ कर्म छोडना नहीं, कर्म करना, देश व धर्म के कर्म करना है, जो सत्य हैं तथा मनुष्य को कर्मफल-बंधन में नहीं बाँधते।’’१३ वास्तव में शंकराचार्य के हृदय में अपने देश, धर्म व समाज के प्रति सच्चा स्नेह था। वे इन सबका कल्याण चाहते थे। गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा, शिष्यों के प्रति असीम स्नेह और प्रत्येक देशवासी के कल्याण की कामना उनके हृदय में सदैव विद्यमान थी। इन सब बातों को भी यह उपन्यास भली प्रकार से उद्घाटित करता है। अपने मत के प्रचार के लिए, प्रत्येक भारतीय को सही मार्ग बताने के लिए उन्होंने देशभर की यात्रा की। चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित किए। समन्वय की विराट चेष्टा उनमें थी। तभी तो- ‘‘शैव उनको साक्षात् शंकर का अवतार मानते तो वैष्णव उनमें विष्णु की छटा देखते। सभी देवी-देवता एक ही परम ब्रह्म के रूप हैं यही लोगों को वे बताते थे। रामेश्वरम् में शिव की प्रतिष्ठा और उपासना करके समुद्रोत्तरण और लंका विजय करने वाले राम और राम का नाम लेकर हलाहल का पान करने वाले शिव में विरोध कैसा? सती के शव को कंधों पर रखकर भारत भ्रमण करने वाले शिव और दूसरे जन्म में भी शिव का वरण करने की तीव्र इच्छा से घोर तपस्या करने वाली गिरिजा में कैसा अंतर? ये सब तो एक ही हैं। जो वैष्णव है, वह शैव है और शक्ति भी वही है। एक की पूजा और दूसरे का विरोध; भला यह कैसे चल सकता है।’’१४ इस प्रकार उपाध्याय जी अपने इस उपन्यास के द्वारा जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य जी के सम्पूर्ण जीवन के विविध पक्षों से पाठकों को परिचित कराते हुए आज के समाज व राष्ट्र के सुदृढ निर्माण में उनका योगदान किस प्रकार बहुपयोगी सिद्ध हो सकता है, इस बात से भी परिचित कराया है। दीनदयाल उपाध्याय जी जगद्गुरु के योगदान का स्मरण करते हुए लिखते हैं कि- ‘‘उन्होंने समाज के भिन्न-भिन्न मत, तत्त्व और संप्रदायों की मूलभूत एकता को जिस प्रकार तर्क-शुद्ध और आकर्षक रुप में रखा तथा उनके द्वारा राष्ट्र की समस्याओं को जिस निष्पक्षता से सुलझाया, वह उन्हीं के लिए संभव था।’’१५ उनकी टीकाओं के माध्यम से उन्होंने समाज के सम्मुख खडे प्रश्नों को सरल, सहज भाषा में उत्तर देने का प्रयास किया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि शंकराचार्य का योगदान राष्ट्र की मूलभूत एकता को व्यावहारिक रूप देने में समर्थ हुआ।