दीनदयाल उपाध्याय ; एक साहित्यकार

प्रो.परमेन्द्र दशोरा



१० फरवरी, १९६८ मध्य रात्रि में देश के राजनैतिक क्षितिज पर तेजी से उभरने वाले नक्षत्र की निर्मम हत्या की गई एवं मुगल सराय स्टेशन पर रेलवे की बॉगी में उनका शव प्राप्त हुआ वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। वे केवल एक राजनीतिक पार्टी के अखिल भारतीय अध्यक्ष ही नहीं थे अपितु राजनैतिक चिंतक, कर्मयोगी, पत्रकार, दार्शनिक एवं साहित्यकार होने के साथ-साथ अत्यन्त ही सरल एवं मृदुल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनके दार्शनिक एवं राजनीतिक चिंतन तथा अवदान पर प्रचुर जानकारी उपलब्ध है किन्तु एक साहित्यकार के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय को योग्य पहचान नहीं मिल पाई। यह इसलिए भी नहीं मिल पाई कि एकात्म मानववाद जैसे सुदृढ दर्शन, आर्थिक नीतियाँ, संगठनात्मक शक्ति, निर्भीक एवं मूल्य आधारित पत्रकारिता एवं लोकसंग्रही गुण सभी लोगों के मन-मस्तिष्क पर इतना प्रभाव डाल चुके थे कि उनके द्वारा रचित ललित साहित्य की ओर सामान्यतः लोगों का ध्यान नहीं गया।
दीनदयाल जी के निबंधात्मक साहित्य एवं उनके द्वारा विभिन्न अवसरों पर, बैठकों में, सार्वजनिक सभाओं में, प्रेस वार्ताओं में दिए गए उद्बोधन जो उनकी वैचारिक परिपुष्टता, पैनी दृष्टि एवं युक्तियुक्त विश्लेषण के साथ संपादित की गई वे निः संदेह एक अमूल्य पूँजी है। सन् १९४६ में उनके द्वारा लिखा गया लघु उपन्यास ‘‘सम्राट चन्द्रगुप्त’’ तथा सन् १९४७ में लिखा गया लघु उपन्यास ‘‘जगत गुरु शंकराचार्य’’ उन्हें एक साहित्यकार के रूप में स्थापित करता है। ललित साहित्य के रूप में उनकी दोनों कृतियाँ क्रमशः बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था के लोगों पर भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, उज्ज्वल परम्परा, नैतिक आदर्श एवं भारत की एकता तथा अखण्डता को सुदृढ एवं सुनिश्चित करने की प्रेरणा देने वाले महानायकों सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य तथा जगत गुरु शंकराचार्य पर आधारित हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का साहित्यकार के रूप में दर्शन करना, वह भी ललित साहित्यकार के रूप में, केवल इन दो उपन्यासों के आधार पर प्रथम दृष्टया कठिन तो लगता है किन्तु किसी रचनाकार के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह अनेक रचनाओं का निर्माण करे। रचनाओं की संख्या एक पक्ष हो सकता है किन्तु रचना का उद्देश्य, उसकी गुणवत्ता उसकी ग्राह्यता, उसकी संप्रेषणीयता एवं समाज के
लिए उसकी उपादेयता निः संदेह बडा फलक प्रदान करती है।
कहा जाता है कि समाज को चौबीसा अक्षरा गायत्री मंत्र प्रदान करने वाले महर्षि विश्वमित्र ने केवल एक ‘‘गायत्री मंत्र’’ समाज को दिया और वे महर्षि के रूप में समाज में आज भी सम्मान पाते हैं। ‘‘उसने कहा था’’ कहानी के लेखक चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ ने जीवन में केवल तीन कहानियाँ लिखीं और वे हिन्दी साहित्य में ‘‘उसने कहा था’’ कहानी के कारण अमर साहित्यकार हो गए। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘‘भारत-भारती’’, रामधारी सिंह दिनकर की ‘‘परशुराम की प्रतीक्षा’’, अमृतलाल नागर की ‘‘मानस के हंस’’, हरिवंशराय बच्चन की ‘‘मधुशाला’’ इत्यादि अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ साहित्यकार अपनी किसी एक कृति के कारण प्रसिद्ध हो गए हैं। ऐसे में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के दो उपन्यासों का अगर निष्पक्ष आकलन किया जाये तो पंडित जी किसी भी दृष्टि से एक श्रेष्ठ साहित्यकार से कम सिद्ध नहीं होते हैं।
पंडित जी द्वारा रचित इन पुस्तकों को भाषा की दृष्टि से देखे तो पंडित जी ने बडे ही विवेक से इन पुस्तकों की रचना में योग्य भाषा का उपयोग किया है। हिन्दी में उपलब्ध बाल एवं किशोर साहित्य मनोरंजन प्रधान होते हुए संस्कार एवं जानकारी प्रदान करने का प्रयास करते हैं। ऐसे साहित्य से बालकों को जानकारी जरूर मिलती है, संस्कार पक्ष भी ग्रहण किया जा सकता है किन्तु पंडित जी ने बालकों के औसत स्तर में उन्नयन हो सके, भाषा में शब्द प्रयोग उचित हो एवं पाठक पुस्तक पढने के उपरांत यह कह सके कि उसका भाषा से परिचय प्रगाढ हुआ है, यह प्रगाढ परिचय शनैः शनैः बालकों एवं किशोरों को उच्च कोटि के संस्कारों की रचना पढने, समझने एवं उनका आनन्द ले पाने के लिए सहज बना देता है।
उन्होंने बाल साहित्य के लिए सम्राट् चंद्रगुप्त पात्र चुना। इस पुस्तक को पढ कर कोई भी बालक भारत के अतीत के प्रति गौरवान्वित अनुभव करते हुए मन में यह विश्वास जगा सकता है कि धुन के पक्के युवक अपनी बुद्धि एवं सामर्थ्य के बल पर किस प्रकार से सम्पूर्ण समाज का नेतृत्व करते हुए सिद्ध करते है कि भारत को कभी गुलाम नहीं बनाया जा सकता।
पुस्तक में चाणक्य का चरित्र उन तपःपूतों के रूप में उभर कर आता है जो वैयक्तिक हित-अहित से ऊपर उठ कर राष्ट्रीय हित-अहित को ध्यान में रखते हैं तथा जिन्होंने राष्ट्र के निर्माण में घनानंद के मंत्री, राक्षस तथा घनानंद को परास्त करने के बाद जिस प्रकार से घनानंद के मंत्री को ही उसकी योग्यता, क्षमता
और निष्ठा के आधार पर चन्द्रगुप्त का मंत्री नियुक्त किया था।
किसी भी बालक में संस्कार निरूपण के लिए जिस प्रकार के चरित्र की आदर्श रूप में स्थापना की जानी चाहिए वैसा ही चरित्र पंडित जी ने चन्द्रगुप्त का उभारा है। पूर्ण आत्मविश्वास, योग्य योजना, राष्ट्रभक्ति, तर्कशक्ति एवं लोकसंग्रही इन सब के साथ-साथ मार्गदर्शक तथा गुरु में पूर्ण विश्वास। चाणक्य से भेंट के पूर्व मन में कई शंकायें लिए किशोर चंद्रगुप्त चाणक्य से मिले। वहाँ आचार्य चाणक्य उनके प्रत्येक प्रश्न का अत्यन्त ही गंभीरता से एवं युक्ति से उत्तर देते हुये चन्द्रगुप्त का आकलन करते हैं। साथ ही चन्द्रगुप्त भी चाणक्य का योग्य आकलन करते हैं। जिस भाषा एवं सहजता से लेखक ने उनके वार्तालाप को व्यक्त किया है वह अत्यन्त प्रभावी है।
भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि साहिष्णुता जिस तरह से बनाए रखते हुए योग्य शासन संचालन किया एवं सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में आबद्ध किया उससे सम्राट् चंद्रगुप्त की जगह, ‘देशभक्त चन्द्रगुप्त’, ‘सम्पूर्ण समाज के प्रतिनिधि चन्द्रगुप्त’ इस प्रकार से उनका संबोधन अधिक उपयुक्त रहता।
इस पुस्तक में दूसरे महत्वपूर्ण चरित्र आचार्य चाणक्य का चरित्र भी जिस तरह से उभर कर आता है वह किसी भी बालक को अपने मार्गदर्शक, अपने गुरु, अपने अभिभावक में क्या देखना चाहिए? तथा उसके प्रति प्रगाढ विश्वास हो किस तरह से देश एवं समाज के लिए स्वयं के व्यक्तित्व निर्माण मंह उसका निरूपण हो यह चित्रण भी उपाध्याय जी ने बडी कुशलता से किया है।
अनेक प्रकार के सद्गुणों से बालकों का परिचय सहजता से किस प्रकार कराया जाए, इसका एक सफल प्रयोग इस पुस्तक में करते हुए उन्होंने ‘‘सम्राट् चंद्रगुप्त’’ एक उत्कृष्ट साहित्यिक रचना की है जिसे एक लघु उपन्यास की संज्ञा दी जा सकती है।
दीनदयाल उपाध्याय की दूसरी पुस्तक ‘‘जगत गुरु शंकराचार्य’’ तरुणों के लिए लिखा गया दूसरा उपन्यास है जो देश एवं समाज के लिए एक राष्ट्रसेवक कार्यकर्ता के रूप में अपना सर्वस्व त्याग कर कार्य करने के लिए प्रेरणा देने वाला उपन्यास है। सम्पूर्ण भारत की तात्कालीन स्थिति एवं धर्म के नाम पर फैल रहे अनाचार, बौद्ध धर्म का सहारा लेती निर्बल, केन्द्रीय राज्य व्यवस्था, सत्ता का सुख भोगने वाले बौद्ध तथा देश की ऐसी परिस्थिति का लाभ उठाकर विदेशी आक्रमणकारी भारत को राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से छिन-भिन्न करने की स्थिति में आ गए उस समय सम्पूर्ण देश को एकता के सूत्र में बाँध कर चारों दिशाओं में श्रद्धा का केन्द्र स्थापित करने वाले, पंचायतन पूजन के माध्यम से विभिन्न मत-मतान्तरों में साम्य बैठाते हुए वैदिक धर्म की ध्वजा को फहराने वाले, प्रकाण्ड विद्वान, सरल हृदय, संस्कृति के अग्रदूत जगतगुरु शंकराचार्य को मुख्य पात्र बनाकर लिखा गया उपन्यास है। यह उपन्यास सम्राट् चन्द्रगुप्त की तरह प्रामाणिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं राष्ट्रवादी चिंतन के साहित्यिक प्रकटीकरण का उदाहरण है। जिस भाषा लालित्य के साथ बालक शंकर के जन्म की पृष्ठभूमि, उनके माता-पिता की मनःस्थिति, जन्मोपरांत पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं बालक शंकर की विलक्षण प्रतिभा को अभिव्यक्त करते हुए शंकर के संन्यास का संकल्प पंडित जी ने किया है, वह भुलाया नहीं जाता।
शंकराचार्य उपन्यास किशोर एवं युवा मन पर व्यक्तिगत स्वार्थ सुख एवं साधन की आकांक्षा से हटकर संपूर्ण समाज के लिए चिंतन करते हुए किस प्रकार से अपने बाल्यकाल से ही भावी जीवन की दिशा एवं क्रियाविधि निश्चित करने वाले व्यक्ति का आख्यान है। सामान्य पाठक को प्रथम दृष्टया यह लेखकीय कल्पना अथवा अतिरंजना प्रतीत हो सकती है किंतु स्वयं शंकर का जीवन जिसने अल्पायु में ही समूचे, भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में बाँधकर भारतीय संस्कृति की अपराजेय क्षमता को स्थापित किया तथा भारतीय दर्शन की विश्वव्यापकता का प्रगटीकरण करते हुए भारतीय मूल के विभिन्न मत-मतान्तरों में ऐक्य स्थापित किया वह बडा सहज हैं। एक लघु उपन्यास में किसी उदात्त चरित्र को स्थापित करते हुए वैचारिक पुष्टता प्रदान करना एवं चार धाम, बारह ज्योतिर्लिंग, विभिन्न मठ इत्यादि का सांस्कृतिक महत्व युवाओं एवं किशोरों के जीवन में पे*रणा प्रदान कर सके, ऐसा रचनाकर निस्संदेह श्रेष्ठ साहित्यकार की श्रेणी में ही आएगा। परिव्राजक शंकर किस तरह से समाज के वंचित, पीडित एवं दुखी लोगों के प्रति करुणा एवं सद्भावनापूर्ण व्यवहार रखता था, संन्यास लेने के लिए शंकर द्वारा अपनी माँ के सम्मुख नदी में ग्राह्म द्वारा शंकर का पैर पकडने का प्रकरण और माँ द्वारा शंकर को जीवन की रक्षा हेतु उसे संन्यास की अनुमति प्रदान करना जिस सरल भाषा में सहजता से पंडितजी ने व्यक्त किया है उससे निश्चित रूप से उनके व्यक्तित्व की सरलता एक साहित्यकार के रूप में प्रकट होती है।
बौद्ध धर्म के अनुयायियों तथा कालान्तर में आई बौद्ध धर्म में व्याप्त बुराइयों का प्रतिकार करने शंकर निकले, किंतु स्वयं ने शाक्य मुनि अर्थात् गौतम बुद्ध के प्रति अपना श्रद्धा भाव बनाए रखा यह इस पुस्तक से स्पष्ट होता है जिसका सीधा संदेश श्रेष्ठ मुनि या श्रेष्ठ तपस्वी गौतम बुद्ध का विरोध नहीं अपितु बौद्ध धर्म में आईं बुराइयाँ एवं उसके कारण भारत के विघटन को रोकना, उसके लिए संपूर्ण देश में अपने स्वभाव, ज्ञान, विनम्रता सहिष्णुता इत्यादि सद्गुणों के आधार पर सभी को साथ लेकर एक सांस्कृतिक भारत के पुनर्निर्माण के कठिन कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने तथा आने वाले हजारों वर्षों तक भारतीय संस्कृति का परचम फहराता रहे, विश्व बंधुत्व की भावना जाग्रत रहे, यह जिस सरलता से दृढ निश्चय के साथ शंकराचार्य ने किया उसे इतनी ही सरलता से उद्देश्य विशेष के साथ पुस्तक रचकर उपाध्याय जी ने किया है।
सुदूर दक्षिण से लेकर पूर्व-पश्चिम, उत्तर में कश्मीर तथा उत्तर पूर्व में कामरूप तक की दिग्विजयी यात्रा करते हुए शंकराचार्य जी ने जिस समर्पण के साथ राष्ट्रीय एकता के लिए सफल प्रयत्न किया उसे पुस्तक में बडे स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है। शंकराचार्य ने मात्र ३२ वर्ष की आयु में अपने पुरुषार्थ निश्चय एवं त्याग के बल पर संपूर्ण भारत को कर्म की स्फूर्ति प्रदान करते हुए सनातन वैदिक धर्म को, वेदान्त को स्थापित किया तथा उनके द्वारा प्रदान की गई प्रस्थानत्रयी जिसमें गीता, ब्रह्मसूत्र एवं उपनिषद सम्मिलित हैं उनके आधार पर भारतीय जीवन दर्शन तथा विविधता में एकता का समेत स्वर उच्चारित किया, उससे उन्हें जगद्गुरु के रूप में हम भारतीय अपने हृदय में स्थापित करें यही उनके प्रति सच्ची सेवा होगी।