एकात्म मानव दर्शन:दीनदयाल उपाध्याय का मोलिक दार्शनिक सिद्धांत, विवेचन और तत्व मीमांसा

प्रकश परिमल



‘ब्रह्मसूत्र’ की गौडपादीय व्याख्या के अन्तर्गत जब भगवान वेदव्यास द्वारा अट्ठारह पुराणों एवं सहस्राधिक उपनिषदों का संकलन किया गया तब ३००० वर्ष ईस्वी पूर्व ‘महाभारत काल’ में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि इतने वृहद् साहित्य को एकजुट करके एक विलक्षण प्रतिभा का जन्म हो चुका है और इस प्रतिभा का पहला ही मंत्र थोथी हो चुकी ‘दैववाद’ की भावनाओं से सर्वथा भिन्न ‘मानववाद’ की भित्ति से ओतप्रोत था। इसे ही हम विश्व का सर्वप्रथम मानववादी मंत्र मान सकते हैं जो इस उद्घोष के साथ विश्वभर में अनुगुंजित हुआ कि ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्’ जिसका अभिप्राय था कि सकल विश्व में मनुष्य से बडा (श्रेष्ठ) अन्य कोई प्राणी नहीं है।
सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि पारस, ईजिप्ट, यूनान, एवं अन्य शेष धर्मराष्ट्रों में अवतरित हुए विचार और दर्शन आदि इस मानववादि धारा के समक्ष नितांत फीके पड जाते हैं। वैसे तो सभी धर्म और सम्प्रदायों में युद्ध और शांति के प्रसंगों से हमारा इतिहास भरा पडा है और कभी न बुझने वाली अगि* की तरह युद्ध और शांति की ये उभय धाराएँ मानव समाज को प्रभावित कर रही हैं और आज तक भी इनका निराकरण हमें नहीं मिला, इसलिए एक कवि ने ठीक ही कहा है- ‘‘जितने भी युद्ध लडे हम हारे हैं, अपने ही घाव हमें क्यों प्यारे हैं। सर ऊँचा कहाँ करें अपनों ही से, अपराधी एक नहीं हम सारे हैं, लज्जित है आज स्वयं संस्कृति समृद्ध; भीतर भी युद्ध आज बाहर भी युद्ध।’’ जब जब भी मानव समाज के लिए विनाश का खतरा पैदा होता है युद्ध की अनिवार्यता बढ जाती है। कला और संस्कृति की धाराएँ अवरुद्ध होने लग जाती हैं। सुप्रसिद्ध कलाकार पाब्लो पिकासो ने इसी को आधार बनाकर ‘गोएर्मिका’ नाम से एक पेटिंग बनाई है। इस पेटिंग में अन्य विकृतियों के साथ मनुष्य को सींग-पूंछ वाले प्राणी के रूप में चित्रित किया गया है। वस्तुतः ऐसे ही विचार और दर्शन युद्ध की विभीषिका में झोंके जाने से बचाते हैं।
दीनदयाल उपाध्याय की दो विलक्षण और गहन विश्लेषणात्मक पुस्तकें ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ के बारे में हैं। ये दोनों ही पुस्तकें पं. दीनदयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन के प्रमुख अध्येता के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इनके अध्ययन से पता चलता है कि उनका अध्ययन का क्षेत्र कितना विस्तृत था। ‘सम्राट चन्दगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ के बारे में किए गए अध्ययन की ये दिशाएँ उन्मुक्त हवाओं की तरह चतुर्दिक बहती हैं, और अन्ततः हिमालय शिखर का स्पर्श करती हैं। जगद्गुरु श्री शंकराचार्य धर्म और दर्शन के प्राचीन आदर्शों को मूर्तिमान करते थे। उनका कहना था ‘‘त्येजेदेकम् कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलम त्येजे ग्रामम् जन तदस्यार्थे पृथ्वीन त्येजेत’’ अर्थात कुल के लिए अपने घर को छोड देना चाहिए और ग्राम के हित के लिए कुल को तज देना चाहिए और जनपद के लिए ग्राम को विसार देना चाहिए और आत्मा के लिए समूची पृथ्वी को छोड देना चाहिए। उनकी पुस्तक में उनके परममित्र पं. विष्णुशर्मा को जब उन्होंने ही बताया कि उनकी माता जी ने उनको संन्यास लेने की आज्ञा दे दी है। तब क्या धु*व की भाँति जंगल-जंगल तपस्या करोगे? नहीं भाई, जंगल नही जाऊँगा, संन्यास का अर्थ संसार त्याग कर तपस्या करना नहीं है। मैंने जगत से संन्यास लिया है जिसका अर्थ कर्म छोडना नहीं। हमारे शास्त्रों में चार आश्रमों का उल्लेख है। इनमें गृहस्थाश्रम सबसे बडा उत्तरदायी है इस आश्रम में रहते हुए भी संन्यास का पालन किया जा सकता है। शंकराचार्य के अनुसार संन्यास समाज की नियमानुकूल व्यवस्था को आगे बढाने के लिए हैं यदि समाज के जीवन के लिए मर्यादा स्थापित करने की आवश्यकता पडे तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की तरह उन मर्यादाओं का पालन करना जरूरी है और यदि मर्यादा उल्लंघन करने की आवश्यकता हो तो श्री कृष्ण की भाँति उसका कठोर मन से संहार करना ही आवश्यक है। इसी तरह अपने प्रतिद्वन्द्वी नन्दन मिश्र से तर्क करते हुए त्याग और बलिदान की भावना के विषय में उनसे सहमत होते हुए उन्होंने शांतिपूर्वक कहा कि त्याग और बलिदान तभी मूल्यवान होते हैं जब वे किसी सत्य और आदर्श की प्राप्ति के लिए किए गए हों, अन्यथा वे हमारी भयंकर भ*ांति को ही बल देते हैं। हुतात्मा के प्रखर प्रकाश से जन साधारण की आँखें क्यों चौंधिया जाती हैं किन्तु वे विचारवान होते हुए भी सूक्ष्मदर्शी नहीं होते। और सत्यासत्य की उलझन में ही फँसे रहते हैं। मण्डन मिश्र का यह कथन उनकी धारणा को बल दे गया। परन्तु इसे आगे बढाते हुए आचार्य शंकर ने कहा आर्यों के वैदिक मार्ग का ही अनुगमन करना चाहिए। उपनिषदों की ध्यान गंगा की धवल धारा आदि श्रोत वेद अनन्त रत्नों के भण्डार और ज्ञान के आगार हैं। गगनचुम्बी गिरिराज की उपत्थिकाओं में तपस्या करते हुए उसके शैल श्ाृंगो के साथ ऊँचा उठते-उठते ज्ञानाकाश को चूमकर जिन वेदान्त सूत्रों की रचना की गई उनके रचियता महर्षि वादरायन उसी आर्थपथ के पथिक ही नहीं थे, मण्डन मिश्र से संवाद करते हुए अपने समकालीन बौद्धों के शून्यवाद और जैनों के स्यादवाद को याद करते हुए उनके अनेकांतवाद की अन्तर्निहित विवादित दृष्टि को खंडित करते थे।
चन्द्रगुप्त मौर्य एक धीर वीर नायक और ध्येय निष्ठा के प्राणप्रतिष्ठापक थे। दीनदयाल उपाध्याय उन्हें समाज की रचनात्मक शक्ति का प्रणेता मानते थे और उनको ही चाणक्य के सम्मिलित प्रयत्नों से अलेक्जेण्डर जैसे आक्रांता को हराकर भारत के क्षेत्र से ही बाहर करने का सुयोग्य प्राप्त हुआ। दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार चन्द्रगुप्त ने अपनी शासन विधि को पाँच भागों में विभक्त कर रखा था। पूर्वाह्न भाग का शासन तो राजधानी पाटलिपुत्र से होता था परन्तु उत्तर में तक्षशिला और कौशाम्बी मध्य भारत में उज्जयनी और दक्षिण में मैसूर जैसे प्रतापी प्रतिनिधि शासक प्रतिबद्ध थे। सम्राट स्वयं समय-समय पर उन साम्राज्यों का दौरा करते थे। भारत में कई बडी सडकें नए फैशन में बनीं, उनके दोनों ओर छायादारा वृक्ष लगवाए जाते थे और थोडी दूरी पर यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ और कुएँ बनाएं भी जाते थे। समूचे भारत में एक कोने से दूसरे कोने तक वाणिज्य जन अपना सामान लाते ले जाते थे। चोरी और डकैती का भय पूर्णतः नहीं था। सुव्यवस्था और सम्पन्नता का कोई सानी नहीं था। न्याय और शासन विभाग का कार्य अलग अलग अधिकारी देखते थे। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं न्याय करते थे। उसके लिए प्रजा का प्रत्येक व्यक्ति सम्राट तक पहुँच सकता था। ज्ञान और विद्या के प्रसार पर सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने विशेष ध्यान दिया। तक्षशिला और नालंदा के विश्वविद्यालय तो चलते ही थे परन्तु समाज और राष्ट्र के हित के लिए प्रश्नों का निर्माण करने के लिए स्थान-स्थान पर विद्वत परिषदें होती थीं। उनमें भागीदार विद्वानों को विशिष्ट पुरस्कार दिए जाते थे। सम्राट चन्द्रगुप्त की शासन व्यवस्था की पश्चिमी विद्वानों ने भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। प्रशंसा की बात है कि विज्ञान के आविष्कारों के कार्य क्षेत्र न होते हुए भी चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन में आधुनिक प्रणालियों का प्रयोग किया। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य उन कतिपय राष्ट्र निर्माताओं में से हैं जिन्होंने पग-पग पर सफलता का वरण किया, इसका श्रेय उनकी अनवरत लगन तथा अध्यवसाय को जाता है। कूटनीति के समस्त दांव-पेच अपने गुरु व मार्गदर्शक चाणक्य से सीखे थे। सम्राट चन्द्रगुप्त स्वयं अत्यधिक परिश्रमी थे। उस परिश्रम से ही उन्होंने विशाल साम्राज्य की स्थापना की। वे एक आदर्श सम्राट महाकुलीन दैव बुद्धि दीर्घदर्शी धार्मिक शासक थे। प्रजा का सुख उनका अपना सुख होता था राष्ट्र की स्वतंत्रता उनके आदर्श बिन्दु थे, इसलिए उनके ही समकालीन विद्वान मुद्राराक्षय ने उन्हें विष्णु का अवतार तक कह दिया था।
उन्नीसवीं सदी प्रारंभ में मानववाद को मुखरित करने वाले मानवेन्द्रनाथ राय नामक एक प्रखर विद्वान हुए जिन्होंने तत्कालीन साम्यवादी राष्ट्र सोवियत रूस में जाकर मानववाद का झण्डा फहराया और सारे संसार में भारतवर्ष की ख्याति फैलाई। इस प्रकार चीन में डॉ. कोटनीस ने लाखों बीमारों का महान संकल्प लेकर इलाज किया। वह मानववाद के सर्वोच्च दृस्टांत के रूप में अविस्मरणीय है। डॉ. राम मनोहर लोहिया के दार्शनिक विचारों से समाजवाद की और स्वतंत्रता की जो नींव पडी, भारत में उसकी चतुर्दिक मान्यता एक अहिंसक क्रान्ति के प्रणेता के रूप में स्वीकार की गई। दीनदयाल उपाध्याय के अग्रज के रूप में डॉ. राममनोहर लोहिया ने लोकसभा के पटल पर सामाजिक अर्थ तंत्र का एक सर्वथा नया विचार रखकर पंडित जवाहर लाल नेहरू को भी चुप करा दिया कि आज भी भारत के आम आदमी की दैनिक कमाई तेरह आना प्रतिदिन की है और चाहे हम अपनी पंच वर्षीय योजनाओं में उसको कितना ही बढा-चढा कर दिखा दें यह तथ्य ‘गरीबी हटाओ’ के विचार मात्र से दबाया नहीं जा सकता।
अब हम एक ऐसे महान विचारक और मौलिक चिंतक दीनदयाल उपाध्याय के विषय में चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने एकात्म मानववादी दर्शन की प्रस्थापना करके विश्व को चौंका दिया। सचमुच में उनकी यह प्रस्थापना विश्व के दार्शनिक विचारों में अपना मौलिक अवदान करती है। उपाध्याय ने लिखा है कि स्वतंत्रता के तुरन्त बाद जब देश का राजनीतिक बौद्धिक जगत पाश्चात्य विचारों से पूरी तरह आच्छादित था और राजनेता भी भारतीय परम्परा के ऋषितुल्य महात्मा गाँधी को भी भुलाते जा रहे थे, राजनीति लोकमान्य तिलक और श्री अरविन्द व स्वामी विवेकानन्द की विचार परम्परा से अपना नाता तोड रही थी, स्वतंत्रता संग्राम भारतीय पुनर्जागरण की विभूतियाँ राजनीति में प्रतिबिम्बित नहीं हो पा रही थीं और राजनैतिक दल पाश्चात्य विभूतियों से अभिभूत हुए जा रहे थे, तब पं. दीनदयाल उपाध्याय ने हस्तक्षेप करते हुए भारतीय प्रजा को झकझोरा तथा आवाहन किया कि हम विदेशी परिस्थिति एवं विदेशी चिंतन में उत्पन्न विचारों का अध्ययन तो करें लेकिन स्वतंत्र भारत की विचारधारा का स्त्रोत तो हमें भारतीय चिंतन में ही मिलना चाहिए। ऐसे ही विचारों के उद्गाता राजनीति के अद्वितीय दृष्टा पं. दीनदयाल उपाध्याय ने दर्शन के क्षेत्र में व्यक्तिवाद और समाजवाद के तात्कालिक विचारों को चुनौती देते हुए ‘‘एकात्म मानववाद’’ का प्रणयन किया। वर्तमान दौर में इसे विचार शून्यता कहें या विचारों की दरिद्रता। परन्तु चिंता और निस्संदेह बढती जा रही है। दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार समाज की संगठित अवस्था ही वस्तुतः स्वाभाविक और सहज अवस्था है। संगठन का अभाव किसी स्वाभाविक अभाव का द्योतक है, क्योंकि बिखरे हुए लोगों के समूह को समाज नहीं कह सकते जैसे कि मिट्टी के अनेक बिखरे हुए कण ईंट नहीं कहलाते उनके जुडने से ईंट की कल्पना की जा सकती है। जैसे कि प्रायः अलग-अलग लकडी के टुकडों को बंडल नहीं कहा जा सकता, उनको जोडने वाली वस्तु ही संगठित बंडल का रूप धारण कर लेती है। विश्व में आज समष्टि की सबसे बडी इकाई ‘‘राष्ट्र’’ है। अतः राष्ट्र की दृष्टि से भी विचार करें तो उसके लिए चार बातों की आवश्यकता होती है। उसकी प्रथम आवश्यकता है देश, भूमि और जन दोनों को मिलाकर बनता है। भूमि ही देश नहीं, किसी भूमि पर एक समाज भी रहता है और वह उस भूमि को माँ के रूप में पूज्य समझे तभी देश मूर्तिमान होता है, जैसे कि दक्षिणी धु*व में कोई नहीं रहता वह देश नहीं है किन्तु भारत में हम सब रहते हैं, हम इसे माँ मानते हैं इसलिए यह देश है। दूसरी आवश्यकता जीने का संकल्प। तीसरी यह कि वहाँ एक व्यवस्था होनी चाहिए जिससे संविधान बनता है। इन्हीं के समुच्चम से राष्ट्र बनता है, राष्ट्र होना ही इसकी चौथी आवश्यकता है। व्यक्ति जब पैदा होता है तो उसका सारा जीवन समाज पर निर्भर होता है। समाज शिक्षा के माध्यम से हर व्यक्ति का निर्माण करता है। समाज में यदि शिक्षा न हो संस्कार न हो और कोई आदर्श न हो तो मनुष्य, मनुष्य नहीं रहता। किन्तु यह आदर्श कर्म से ही फलीभूत होता है। व्यक्ति जितने भी कर्म करता है वे समाज के हित के लिए ही हैं। समाज उसके योगक्षेम की चिंता करता है और यह योगक्षेम केवल कर्म पर आधारित है। ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्’’। कर्म से ही इसकी कुशलता बढती है। माक्र्सवादी कहते हैं कि श्रम के आधार पर ही हमें जीवन के मूल्यों का निर्धारण करना चाहिए। माक्र्स का सारा सिद्धांत इसी आधार पर निर्मित था कि मजदूरों के श्रम से ही मूल्य का निर्धारण होता है। किन्तु मजदूरों द्वारा किया गया श्रम सम्पूर्ण मूल्य पूंजीपति हर लेते हैं। और वे उसे उसका दशांश भी नहीं देते। परन्तु श्रम का मूल्य चुकाने की कोई सीमा नहीं है। हमारे यहाँ पुरुषार्थ चतुष्टय की कल्पना की गई है। पुरुषार्थ में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आते हैं। ये हमारे समाज के सम्पूर्ण स्वरूप को इंगित करते हैं। अर्थ और धर्म एक दूसरे के विपरीत होते हुए भी जीवन की संगति बनाए रखते हैं। कर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, अर्थ के अन्तर्गत दण्डनीति राज्य एवं वार्ता (कृषि) शामिल है। उपज और खेत आदि सभी धर्म पर आधारित है। अर्थ के अभाव के धर्म भी नहीं चलता। ये दोनों एक दूसरे की पूर्ति करते हैं। इसके बाद काम आता है और इसकी भी पूर्ति अर्थ द्वारा ही हो सकती है, लेकिन काम, अर्थ और धर्म के बीच में आता है। हमारी सारी क्रिया-प्रक्रिया काम पर ही आश्रित है। परन्तु ऐसा विचार ठीक नहीं है कि जितना भी उपभोग मेरे निमित्त आवे उतना माँग लू ऐसा नहीं करना चाहिए। मनुष्य की इच्छा अधिकाधिक बढती जाती है, वह कमी पूरी नहीं होती, अस्तु इच्छा शक्ति द्वारा संचालित जीवन समाज निर्माण में सहायक नहीं होता। समाज का निर्माण इन सभी के समुच्चय से ही संभव है। किन्तु हमारी ये रूढियाँ समाज संगठन में बाधक बन जाती हैं। जब भारत स्वतंत्र हुआ तब भी अनेक रूढियां व्याप्त थी जिनसे हम आज भी मुक्त नहीं हो सके। जब रूढियाँ समाप्त होंगी तभी स्वस्थ चैतन्यमयी संस्थाएँ जन्म ले सकेंगी। तभी हमारी आर्थिक दुरवस्था और अन्याय दूर हो सकेंगे। बडे-बडे उद्घोषों और योजनाओं के बावजूद जन जन की अपेक्षाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई हैं उल्टे अव्यवस्था, अनाचार और असंतोष में वृद्धि ही हुई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद उसके प्रथम उद्रेक में देशी राज्यों के विलीनीकरण संविधान निर्माण तथा अर्थ व्यवस्था के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की दिशाओं में चाहे उल्लेखनीय कदम उठाएँ गएँ हैं। किन्तु वह आवेश और उद्रेक पानी के बुलबुलों की तरह शीघ्र ही समाप्त हो गया। यहाँ तक कि इस सामाजिक विकास एवं सामान्जस्य के स्थान पर भी राष्ट्र को सुनिश्चित और सुनियोजित दिशा में आगे बढने का रास्ता ही नहीं मिला। शासक और शोषित विभ्रम और विकृति के शिकार बनकर किंकर्तव्यविमूढ हो गए।
ऐसे समय श्रीमती इन्दिरा गाँधी के द्वारा लगाए गए आपातकाल (एमरजेन्सी) का पूर्वानुमान करते हुए श्री जयप्रकाश नारायण ने समग्र क्रांति का बीडा उठाया। यह बीडा उस दौरान भारतवर्ष में हुए उत्साहित होकर श्री जयप्रकाश नारायाण ने उठाया, यह आन्दोलन पूर्णतः अहिंसक था। जिसने उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक केवल युवाजन ही नहीं अपितु महिलाओं और बुर्जुगों ने करोडों की संख्या में भाग लेकर इसका समर्थन किया। इस आन्दोलन से घबराकर इन्दिरा गाँधी ने न्यायालय में हार जाने के बाद श्री जयप्रकाश नारायण, राजनारायण, जार्ज फर्नाडिस आदि को गिरफ्तार करवा कर जेल भेज दिया। यह देशव्यापि ऐसा आन्दोलन था जिसकी ध्वनि सारे संसार भर में गूंजने लगी और उससे विभिन्न क्षेत्रों में अपने विचार, संस्कार और दर्शन लेकर अनेक महान लोग उत्पन्न हो गए उनमें एक थे डॉ. दीनदयाल उपाध्याय। जिन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा से एक नए दर्शन को जन्म दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके द्वारा सर्वोत्कर्ष और सर्वात्मकतावादी एक दर्शन की धुरी समरसता और सामन्जस्य पर टिकी हुई है। इसमें एक तरफ लोकतंत्र और धर्मराज्य की स्थापना का समावेश है तो दूसरी तरफ स्वतंत्रत आत्माभिव्यक्ति का पुरजोर समर्थन। गाँधी जी के जीवन दर्शन को पासंग में रखकर देखें तो प्रकृति को भी इसमें प्रधानता दी गई है। हम जितने-जितने प्रकृतिस्थ होंगे उतने ही हम अधिक गतिशील होंगे, हमारा राष्ट्र अगर भिन्न समाज का द्योतक है तो उसके लिए भिन्न विचार का होना जरूरी है क्योंकि यह भिन्नता विदेशों से उधार ली हुई नहीं होनी चाहिए। परन्तु जैसा हमने पहले देखा है इन सबके बीच शिक्षा ही हमारी गति को बनाती है। वह हमारे भरण पोषण की गारन्टी भी लेती है। इसलिए निःशुल्क शिक्षा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार रहना चाहिए आदि। यही एकात्म मानववादी दर्शन और तत्व मीमांसा का मूलाधार है।