दीनदयाल उपाध्याय के साहित्य में इतिहास -चेतना

हनुमान सिंह राठोड



भारतीय मनीषा ने इतिहास-लेखन की टेक का सूत्र वाक्य दिया है- ‘नामूलं लिख्यते किंचित।’ इतिहास शब्द का अर्थ भी है- ‘ऐसा ही हुआ।’ किंतु प्रश्न है कि- मूल सत्य होते हुए भी क्या उस पर विषबेल उगाया, कूट-मधु-जाल युक्त मांसभक्षी पादप उगाना अभीष्ट है ? स्वामी विवेकानंद की सम्यक दृष्टि इस संदर्भ में हमारे लिए मार्गदर्शक हो सकती है। परिव्राजक काल में अलवर प्रवास के समय स्वामी जी ने युवकों को इतिहास दृष्टि दी थी-
‘‘अंग्रजों ने हम लोगों के देश का जो इतिहास लिखा है, उससे हम लोगों के मन में दुर्बलता ही आएगी, क्योंकि वे केवल हमारे पतन और अवनति का ही उल्लेख करते हैं, जो विदेशी हम लोगों की रीति-नीति तथा हम लोगों के धर्म और दर्शन से बहुत कम परिचित हैं, वे विश्वसनीय और निष्पक्ष भाव से भारत का इतिहास कैसे लिख सकते हैं ?........अभी वेद, पुराण और भारत के प्राचीन इतिवृत के अध्ययन के लिए कैसे भारतीय इतिहास के अनुसंधान के क्षेत्र में हम लोगों को एक अपने स्वतंत्र पथ का निर्माण करना होगा और उसके सहारे सहानुभूति सम्पन्न एवं यथार्थ तथापि आत्मोद्दीपक भाषा में इस भूमि के इतिहास संकलन को अपने जीवन की साधना के रूप में ग्रहण करना होगा। यह सब हम लोगों का अपना दायित्व है। भारत का इतिहास भारतीयों को ही लिखना होगा। अतएव विस्मृति के सागर से अपनी लुप्त और गुप्त रत्न-राशि के उद्धार के लिए कमर कस लो। किसी बच्चे के खो जाने पर जैसे वह जब तक उसे ढूँढ नहीं लेता, तब तक चैन नहीं लेता, उसी तरह जब तक भारत के गौरवमय अतीत को जन-मन में पुनरुज्जीवित नहीं कर पाते हो, तब तक विश्राम मत करो।’’१
इसी इतिहास दृष्टि से प्रेरित दीनदयाल जी के भाषण, आलेख पाञ्चजन्य, आर्गेनाइजर, राष्ट्रधर्म आदि में छपते थे। इनमें भी संदर्भानुसार भारतीय इतिहास के राष्ट्रीय चेतनापरक तथ्यों का उल्लेख हुआ है, किंतु उनकी पुस्तकाकार कृतियाँ भी हैं। इन कृतियों का दो प्रकार से विभाजन कर सकते हैं- प्राचीन प्रेरक इतिहास का वर्तमान के लिए बोधक भाष्य करते हुए पुनर्लेखन तथा समकालीन इतिहास पर आलोचनात्मक विमर्श। दीनदयाल जी के भाषणों व आलेखों में भी इतिहास-बोध का सिंहावलोकन समीचीन दिशा प्रदान करने में सहायक है। इधर पुस्तकाकार कृतियों के रूप में ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ उनकी प्रथम पुस्तक थी जो वर्ष प्रतिपदा, सं. २००३ (१९४६ ई.) को प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के ‘मनोगत’ में वे लिखते हैं- ‘‘कुछ घटनाओं का वर्णन पाश्चात्य विद्वानों द्वारा लिखे हुए इतिहास से मेल नहीं खाता। प्रस्तुत यह वर्णन कल्पना के आधार पर न होते हुए अपने प्राचीन तथा भारतीय विद्वानों द्वारा दी गई आधुनिक खोजों के आधार पर है।’’३
इस मनोगत से स्पष्ट है कि नवीन खोजों के संदर्भ में भारतीय गौरवपूर्ण इतिहास का पुनर्लेखन होना चाहिए, किंतु अपने प्रथम उपन्यास के लिए उन्होंने चंद्रगुप्त का पात्र ही क्यों चुना ? एक सामान्य बालक की असामान्य प्रतिभा को पहचान कर संस्कारों की भट्टी में आचार्य चाणक्य उसे चक्रवर्ती सम्राट बना सकते हैं, यह प्रसंग बाल, किशोर स्वयं सेवकों के लिए अत्यंत प्रेरक हो सकते हैं, ऐसा विचार सम्भवतया उनके मन में रहा होगा। पुस्तक के उपोद्घात में इसी तथ्य की ओर संकेत है- ‘‘पुण्यभूमि भारत कि विशाल ऐतिहासिक परम्परा में वैभव और पराभव, उत्कर्ष और अपकर्ष के अनेक कालखण्ड मिल सकते हैं। उन्नति और अवनति दोनों में ही उसने अपनी राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत रखा है, दोनों ही स्थितियों में अपनी आत्मा को बलवती बनाया है। पराभव प्राप्त होने पर उसने कालचक्र की गति को भी बदलने वाले उन कर्मठ वीरों को जन्म दिया, जिन्होंने अपनी मनस्विता, स्वाभिमान एवं
नीति-निपुणता के द्वारा राष्ट्रीय आत्मा की सुप्त शक्ति को जगाया।’’४
इस कथन में तत्कालीन परिस्थितियों का भी संकेत है, इतिहास वर्तमान के लिए प्रबोधक होता है। वह काल पराधीनता का काल था, अलक्सेन्द्र से प्रारम्भ बाहरी आक्रमणों की श्ाृंखला एवं उच्छेदन के इतिहास की अंतिम कडी अंग्रजों का उच्चाटन-यज्ञ अर्थात अंतिम स्वाधीनता संग्राम था। वह राष्ट्रीय चेतना ही थी जिसने पराभव में से भी स्वतंत्र्य सेनानियों की श्ाृंखला उत्पन्न करने का आयोजन सम्भव कर दिया। एलक्जेण्डर के विश्व-विजय के अहंकार की तरह ही थी ब्रिटेन की महत्वाकांक्षा-जिसके साम्राज्य में सूरज नहीं ड्रूबता था। चाणक्य ने शून्य में से सृष्टि करके उस महत् अंहकार को जिस प्रकार पराभूत किया, वह आज भी प्रेरक है।
सम्भवतः यही सोचकर दीनदयाल जी ने इस इतिहास- कथा का पुनर्लेखन किया होगा। यह उनके उपोद्घात के वर्णन में भी स्पष्ट है-
‘‘चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने कल्पना के मनोराज्य में जिस विशाल साम्राज्य का मानचित्र खींचा था, उसे एक ने अपनी अजेय शक्ति तथा दूसरे ने अपनी असाधारण प्रतिभा के बल पर प्रत्यक्ष जगत् में प्रकट कर दिखाया। अलिकसुंदर (एलेक्जेण्डर) के आक्रमण का भारत में प्रत्येक स्थान पर विरोध हुआ और देश में इतनी शक्ति थी कि वह पश्चिम के महान् विजेता (?) को पराभूत कर सकी; परंतु फिर भी भारत पूर्णतः शक्तिशाली नहीं था। समाज असंगठित, विश्रृंखलित तथा व्यक्तिनिष्ठ था। ........ पर्वतक (पोरस) की विशाल शाक्ति, जिसने अलिकसुन्दर के छक्के छुडा दिए और उसे मैत्री का हाथ बढाने को विवश किया तथा मगध का अजेय सैन्यबल, जिसकी वीरता और शूरता की कहानियाँ सुनकर ही अलिकसुंदर की सेना हिम्मत हार बैठी, ये दोनों ही वास्तव में राष्ट्रीय दृष्टि से कितनी खोखली थीं, यह चंद्रगुप्त और चाणक्य जानते थे। इसीलिए उन्होंने भारत के दौर्बल्य को दूर करके इसे शक्तिशाली बनाने का बीडा उठाया।’’५
उक्त वर्णन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य का भी संकेत है। अंग्रेजों के विरुद्ध सब लड रहे थे, प्राण-प्रण से लड रहे थे। किंतु व्यक्ति-निर्माण के स्थायी कार्य की ओर सबका दुर्लक्ष्य था। समाज की जिन दुर्बलताओं के कारण देश पराभूत हुआ, उनकी पुनरावृत्ति न हो इसकी व्यवस्था करना सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य है। चंद्रगुप्त और चाणक्य ने अपने समय में यही प्रयत्न किया था। दीनदयाल जी उपसंहार में लिखते है- ‘‘हम सम्राट चन्द्रगुप्त और मंत्री चाणक्य के पीछे देशभक्त चंद्रगुप्त एवं देश भक्त चाणक्य को देखें। साम्राट्य एवं मंत्रित्व तो उनकी परिस्थिति विशेष की स्थिति थी, उनका साधारण स्वरूप, उनकी यथार्थता तो उनके एक भारतवासी एक आर्य, एक हिन्दू के नाते ही जानी जा सकती है। उनको सम्राट् और मंत्री बनने की लालसा नहीं थी। उनकी तो कामना थी, यवनों के चंगुल से भारत भी स्वतंत्रता की रक्षा तथा वह सदैव स्वतंत्रता का उपभोग कर सके, इसके लिए उसे शक्ति सम्पन्न बनना। इसीलिए तो आर्य चाणक्य ने घोषणा की है, ‘‘न स्वेवार्यस्य दास्य भावः’’ (आर्य कभी भी गुलाम नहीं बनाया जा सकता)।’’ इनका नित्य स्मरण क्यों करना ? इसके सम्बन्ध में वे आगे लिखते हैं- ‘‘हम नित्य प्रति महान् राष्ट्र निर्माताओं का स्मरण करते हैं और स्मरण करते हैं उन अगणित हिन्दू वीरों का, जो इन दोनों के हृदय की ज्योति से ज्योतित होकर उस प्रकाश पुंज को प्रकट कर सके, जिसमें भारत के दुःख, दैन्य और दास्य भस्मीभूत हो गए। हम उस महान् संस्कृति एवं समाज को भी आदर के साथ स्मरण करते हैं, जिसने इस महान् स्फूति-केन्द्र को जन्म दिया।
इस कथन के नेपथ्य में मन्तव्य यह स्थापित करना है कि भारत का इतिहास पराजय और दास्य का नहीं, सतत् संघर्ष का है। अल्पकालिक पराभव के दृश्य दिखाई देते होंगे, क्योंकि बाह्य आक्रांताओं की दूषित मनोवृत्ति को बदलना तो सम्भव नहीं, भारत जैसे वैभव सम्पन्न देश पर लुटेरों की गिद्ध न*ार होना अवश्यम्भावी थी, किंतु भारत की वीर प्रसूता कोख ने सदैव वीर पुरुषों की अजस्र श्ाृंखला को जन्म दिया है। यही स्थापित करने का प्रयत्न दीनदयाल जी ने अपनी कृति ‘सम्राट् चन्द्रगुप्त’ में किया है।
राष्ट्र जीवन किसी एक व्यक्ति की कृति या किसी एक काल की व्युत्पत्ति नहीं होती। इसके निर्माण में असंख्य जीवन लगते हैं और समाज की जिजीविषा इसे पल्लवित पुष्पित करती है। राष्ट्र जीवन की इस काल यात्रा के सम्बन्ध में दीनदयाल जी संकेत
करते हैं-
‘‘राष्ट्र का जीवन एक दिन में अथवा दो-चार वर्षों में नहीं बना-बिगडा करता और न कोई महापुरुष ही राष्ट्र जीवन के संस्कारों से पूर्णतः निर्लिप्त होकर अपनी मानसिक, आध्यात्मिक अथवा शारीरिक शक्तियों का विकास करके राष्ट्र जीवन का निर्माण कर सकता है। महापुरुष तो राष्ट्रीय साधना के विग्रह के स्वरूप हैं। वे तो समाज में वर्षों से होने वाली विचार-क्रांति का इष्टफल होते हैं। उनकी अलौकिक शक्ति और ऐश्वर्य, सर्वमुखी प्रतिभा, अखण्ड कर्ममय जीवन तथा सर्वव्यापी प्रभाव को देखकर हमारी आँखें इतनी चौंधिया जाती हैं कि हम उस महापुरुष को उत्पन्न करने वाली जीवनधारा को बिलकुल ही भूल जाते हैं। जिस समाज में वह उत्पन्न होता है, उसका कुछ विचार ही नहीं करते।
......अतः किसी भी महापुरुष को समझने के पूर्व राष्ट्रीय जीवन की इस साधना के स्वरूप को समझना आवश्यक होगा।’’७
भारत की सर्वसमावेशक व अनुकूलन की मनोवृति ने इस पर हुए प्रत्येक आघात से बचा लिया है। यह ऐतिहासिक तथ्य है।
१९४७ में दीनदयाल जी का युवकोपयोगी उपन्यास ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ प्रकाशित हुआ। आचार्य शंकर ने समाज के आंतरिक पतन, कर्मकाण्डों के संजाल तथा बौद्धिक वितण्डावाद के विरुद्ध दिग्विजय का शंखनाद किया। वेदान्त दर्शन के आधार पर एकात्म-दृष्टि का बीजारोपण किया। भारत की विविधता में एकात्मता का बोध कराने के लिए चार धामों की स्थापना, दशनामी परम्परा का प्रारम्भ, पंचायतन पूजा का प्रवर्तन जैसे अनेक समाज सुधार के कार्य किए। उनके कार्यों का वास्तविक मर्म न समझने के कारण कुछ लोग उन्हें बौद्धमत ध्विंसक के रूप में चिह्नित करते हैं तो कुछ प्रच्छन्न बौद्ध कहते हैं। इसी का संकेत करते हुए वे लिखते हैं-
‘‘जन साधारण स्वामी शंकराचार्य को बौद्धधर्म के विनाशक तथा हिन्दूधर्म के संस्थापक के रूप में देखता है, तो कई विद्वानों को उनमें ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ दृष्टिगोचर होता है। सत्यांश दोनों ही चित्रों के पीछे है क्योंकि उनके युग की सम्पूर्ण सहस्राब्दि का इतिहास केंद्रापगामी बौद्ध धर्म तथा केंद्राभिमुखी हिंदू धर्म के पारस्परिक संघर्ष तथा समन्वय का इतिहास है।’’८
मृत्युंजय हिंदूधर्म का मर्म क्या है, इसको दीनदयालजी इस उपन्यास के ‘दिग्विजय यात्रा’ नामक अध्याय में शंकराचार्य जी के मुख से इसको
कहलवाते हैं-
‘‘बंधुवर्ग! आज हममें से प्रत्येक अपने तत्व-सिद्धान्तों का सर्वत्र प्रसार करने को उत्सुक है। पिछले एक हजार वर्ष में अपने धर्म की स्थिति विचित्र हो गई है। उसकी जडों को अनेक प्रकार से खोखला करने का प्रयत्न किया गया है और उसने अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर अपने ऊपर के आघातों को रोका है। हमें अभिमान है कि हमारे धर्म को अंदर और बाहर से कोई नष्ट नहीं कर पाया।’’९
समसामयिक इतिहास पर जिसके स्वयं भी पात्र थे, कुछ पुस्तकें प्रासंगिक हैं- ‘अखण्ड भारत क्यों ?’ (१९५२ में प्रकाशित) तथा १९५३ में प्रकाशित ‘हमारा कश्मीर’ तथा ‘जोडें कश्मीर ः मुखर्जी, नेहरू और अब्दुल्ला का पत्र व्यवहार’। भारत विभाजन तथा कश्मीर ऐसे विषय है जिन पर समकालीन लोगों ने पर्याप्त लिखा है। अखण्ड भारत नियति है, यह होकर रहेगा, ऐसा महर्षि अरविंद ने कहा है। आज भी असंख्य लोग अखण्ड भारत दिवस मनाते हैं। इसकी भूमिका में पं. दीनदयाल जी लिखते हैं- ‘‘पन्द्रह अगस्त हमारी स्वतंत्रता का दिन है। सन् १९४७ को इसी दिन अंग्रेज भारत छोड कर गए। हमारी युग की साध पूरी हुई किंतु अपनी युगों से संजोई हुई थाती को खोकर। ........स्वतंत्रता के युद्ध म हम जीते किंतु संधि में हार गए। भारत की अखण्ड धरित्री खण्डित हो गई।’’१०
अखण्ड भारत के संकल्प की बात २५ मई १९५२ को जोधपुर में भाषण देते हुए कही थी-
‘‘भारत को अखण्ड भू-भाग के रूप देखने का हमारा विचार स्वप्नमात्र न होकर सुविचारित संकल्प होना चाहिए। ........हमारे आधुनिक नेता भारत के निर्मम विभाजन को स्थापित तथा (स्द्गह्लह्लद्यद्गस्र द्घड्डष्ह्ल) मानते हैं पर उनका यह दृष्टिकोण आमूल गलत है। और चाहे कुछ हो, पर उनमें माँ के प्रति ममत्व नहीं। वे इतिहास को भूल हैं, इतना ही नहीं, सच बात तो यह है कि वे इतिहास के ज्ञान से अनभिज्ञ हैं। मुसलमानों के काल में भी इस देश के कई टुकडे हुए थे, लेकिन तात्कालिक नेताओं ने उन टुकडों को स्थापित सत्य नहीं माना और वे अखण्डता के लिए लडते रहे।’’११
दीनदयाल जी लिखते हैं- ‘‘भारत की एकता और अखण्डता की साधना हमने सदा से की है। हमारे राष्ट्र का इतिहास इस साधना का ही इतिहास है। ‘पृथिव्या समुद्रपर्यन्ताया एक राट्’ का उद्घोष करने वाली ऋषियों की मंत्रपूत वाणी की पृष्ठभूमि में ‘नील सिंधु जलधौत चरण तल’ भारत की एकता का साक्षात्कार ही था।’’१२ भारत अखण्ड होगा कैसे ? क्या युद्ध द्वारा ऐसा सम्भव होगा ? अनेक प्रश्न लोग आज भी करते हैं। दीनदयालजी इस सम्बन्ध में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए
लिखते हैं-
‘‘वास्तव में भारत को अखण्ड करने का मार्ग युद्ध नहीं। कारण, युद्ध से भौगोलिक एकता हो सकती है, राष्ट्रीय एकता नहीं। .......आज हम प्रतिज्ञा करें कि भारत को सुदृढ, सबल और शक्तिशाली बनाते हुए इतना महान् बनाएँ कि जो दुर्बलता में हमारा साथ छोड गए हैं, वे हमारे साथ आएँगे। अपने प्रयत्न और परिश्रम से, तप और त्याग से, साहस और साधना से वह दिन लाएँगे, जब सिंधु के किनारे बैठकर हम अपने पूर्वजों का तर्पण कर सकें।’’१३
हम देखते हैं कि चाहे प्राचीन हो या अर्वाचीन, इतिहास के विमर्श में दीनदयाल जी की सनातन व सकारात्मक दृष्टि का समावेश दिखाई देता है। वे निराश, आत्मग्लानि की बात नहीं करते। ‘हमने किया है, हम कर सकते हैं और हम अवश्य करेंगे’ यही भाव उनके लेखन व भाषणों में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।