राष्ट्र के भोतिक और संस्कृतिक उत्कर्ष के भावक:दीनदयाल उपाध्याय

प्रो. कृष्ण कुमार शर्मा


‘दीनदयाल उपाध्याय’ नाम राष्ट्रीय चिन्तन से जुडे पाठकों के लिए अपरिचित नहीं है। वे उन कतिपय धन्य लेखकों में से एक हैं जो अपने राष्ट्र की समस्याओं से अपनी प्रतिबद्धता मानते हैं और उनके समाधान अपने देश की समृद्ध परम्पराओं में तलाशते हैं। जब आज के समाज में व्याप्त अनुशासनहीनता, अकर्मण्यता, भीरूता को देखते हैं तो उनकी दृष्टि चन्द्रगुप्त जैसे नायक की ओर जाती है। जब वे आज की धार्मिक असहिष्णुता, स्वार्थपरता, अवसरवादिता देखते हैं तो उनकी दृष्टि जगद्गुरु शंकराचार्य की उदारता, विनम्रता, दृढता, विद्वता, कर्मठता और निर्भीकता की ओर जाती है। दीनदयाल जी आयातित दार्शनिक विचारधाराओं, अस्तित्ववाद, क्षणवाद आदि ऋणात्मक मूल्यों को स्वीकार नहीं करते। वे सदैव उच्चतर मूल्यों के पक्षधर रहे हैं। पन्द्रह खण्डों में फैला उनका साहित्य उनके उदात्त किन्तु व्यावहारिक सोच का साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
सन् १९५० के लगभग जयशंकर प्रसाद के नाटकों के संदर्भ में गुरुमुख से सुना था कि प्रसाद जी ने ऐतिहासिक कथानकों को अपने नाटकों का विषय बनाया है और इन कथानकों का समय भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण कालखंड रहा है। देश की रक्षा के लिए जीवन का उत्सर्ग करने के लिए सन्नद्ध, समुद्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, अजातशत्रु जैसे वीर और चाणक्य, राक्षस जैसे राजनीति-कुशल विद्वान प्रसादजी के नाटकों के पात्र हैं जिनका मातृभूमि प्रेम और स्वाभिमान आज भी प्रासंगिक है, नहीं, और भी प्रासंगिक है। अंग्रेजों के राज्यकाल में नवयुवकों में राष्ट्रीय भाव जगाने के लिए, भारत की अतीत गौरवशाली परम्परा को पुनः स्मृत कराना एक साधन है। जब देश पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से आक्रान्त हो रहा हो, जब हममें मातृभूमि की स्वतंत्रता के प्रति आग्रह न हो, अपनी भाषा के प्रति प्रेम न हो, तब एक जागरूक और देश के लिए प्रतिबद्ध रचनाकार प्राचीन गौरव को स्मरण करा कर वर्तमान में आत्मगौरव को जगाने का महत् प्रयत्न करता है।
मैं राजनीति की बात नहीं करता, संस्कृति की बात कहता हूँ क्योंकि संस्कृति अक्षुण्ण रह सकी तो राजनीति तो स्वयं रास्ते पर
आ जाएगी।
भारत राष्ट्र के लिए निष्ठापूर्ण समर्पित व्यक्तित्व-निर्माण के लिए, चन्द्रगुप्त और चाणक्य तथा समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में निबद्ध करने के लिए जगद्गुरु शंकराचार्य जैसे महापुरुष दीनदयाल उपाध्याय जी को उपयुक्त प्रतीत हुए। चन्द्रगुप्त और चाणक्य एक-दूसरे के पूरक थे। पहला अप्रतिम शक्ति का विग्रह और दूसरा बुद्धि और चातुर्य का असाधारण प्रतिरूप। चौबीस सौ वर्ष पूर्व भारत राष्ट्र छोटे-छोटे गणराज्यों में विभक्त था। पंचनद प्रदेश में पर्वतेश्वर जिसे उपाध्याय जी ने पर्वतक कहा है और पूर्व में मगध जिसका शासक धनानंद था। एलेक्जेंडर को अलिक्सुंदर (प्रसाद जी ने अलक्षेन्द्र कहा है।) सेल्यूकस को सेलेउक तथा मेगस्थनीज को मेगस्थने कहा है- ये नाम शायद उनकी निर्मिति हैं। मूल बात यह है कि चाणक्य और चन्द्रगुप्त के राष्ट्रीय प्रयत्नों के कारण ही भारत एक अजेय शक्ति के रूप में संगठित हुआ था।
सम्राट चन्द्रगुप्त का प्रारम्भ सर्जनात्मक संरचना से हुआ है- ‘‘जिस काल का हम वर्णन कर रहे हैं, तब से अब तक पृथ्वी सूर्य के चारों ओर लगभग ढाई ह*ाार चक्कर लगा चुकी है और इसी की भाँति भारत का भाग्य चक्र भी न मालूम कितनी बार घूम
चुका है।’’१
मगध के शासक का नाम महापद्म नंद इसलिए पडा था कि उस के पास दस पद्म रुपया था। दीनदयाल का उद्देश्य मगध के राजा का ऐश्वर्य बतलाना ही नहीं है, वर्तमान भारत की आर्थिक दशा की ओर संकेत करना भी है-
‘‘आज तो हिन्दुस्थान में लखपति ही गिनती के हैं फिर करोडपतियों का तो पूछना ही क्या! बाकी तो हमारी सालभर की आमदनी कुल ५६ रुपया है।’’३
रेखांकित वाक्य का अर्थ है- ‘करोडपति बहुत कम थे या नहीं थे’।
मगध राज्य की राजधानी थी- कुसुमपुर। यही आज पटना के नाम से जानी जाती है। वैसे ‘पटना’ शब्द ‘पाटलीपुत्र’ शब्द से विकसित है। नंदवंश के अन्तिम राजा का नाम धनानन्द था। इसके शासनकाल में स्थिति एकदम विपरीत हो गई थी। धनानन्द विलासी, कायर और स्वार्थी था किन्तु उसका मंत्री राक्षस (उपाध्याय जी ने ‘राक्षस’, मंत्री कात्यायन का ही उपनाम कहा है।) ब्राह्मण था, वह विद्वान और नीतिकुशल था, स्वामिभक्त और राज्यभक्त भी था।
सोद्देश्य रचनाओं की, खासकर जब ऐतिहासिक व्यक्तियों पर आधारित हों, की बडी विशेषता है- चयन। रचनाकार उन्हीं प्रसंगों को अग्रप्रस्तुत करता है जो उसके मन्तव्य को व्यक्त करने में सक्षम हों। दीनदयाल जी ने लिखा है- ‘‘नंदवंश का अन्तिम राजा विलासी हो गया। राजकाज में उसका मन जरा भी न लगता था। वह अपना सारा समय नाच-गान, आमोद-प्रमोद तथा रँगरलियों में व्यतीत करता। कभी वंसतोत्सव धूमधाम से मनाने में रुपया पानी की तरह बहाया जाता तो कभी होलिकोत्सव पर प्रजा का धन बुरी तरह फूँका जाता। राजा अपने को प्रजा का मालिक समझने लगा था। ऐसे व्यसनी राजा को किसी की नेक सलाह भी अच्छी नहीं लगती है। वह तो केवल अपने खुशामदियों के ही वश में रहता है, जो उसकी जी हुजूरी करते हैं।’’४ उपर्युक्त अनुच्छेद में खुशामदियों के वशीभूत रहने वाले राजा के प्रति दीनदयाल जी की तिरस्कार वृत्ति (रूश्ाश्ास्र) उजागर है।
परिस्थितियाँ भी व्यक्तित्व को जन्म देती हैं, धनानन्द की विलासिता, उसके प्रति प्रजा की घृणा, विद्रोह की भावना और तज्जनित आक्रोश ने ही चन्द्रगुप्त सरीखे व्यक्ति को सँवारा। वह एक साधारण सैनिक के पद से उठकर सम्राट के पद तक पहुँचा था। चन्द्रगुप्त के व्यक्तित्व- वर्णन में दीनदयाल जी के हृदय में प्रतिफलित आदर और गौरव की वृत्ति झलकती है-
‘‘उसमें देश-प्रेम कूट-कूट कर भरा था। अपने आस-पास के लोगों में उसका बडा आदर था। उसके साथी उसे बडी श्रद्धा से देखते थे। उसने अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग में बडी निपुणता प्राप्त कर ली थी। कर्म करें। इस सबसे बढकर उसके पास एक और बडी चीज थी उसके हृदय की दृढता, उसकी निर्भीकता, उसका आत्मविश्वास।’’५
एक-सी संरचना वाले सरल वाक्यों का आवर्तन-लेखक के मन में प्रवाहित भावधारा को अकुंठ रूप में व्यक्त करता है, प्रत्येक उपवाक्य में एक नवीन सूचना, जैसे आलंबन की सभी विशेषताओं को उन्मुक्त कर देने को उत्सुक है कि कुछ रह न जाए। चन्द्रगुप्त के गुणों से अभिभूत होने की वृत्ति क्रमशः निकल पडने को आकुल प्रतीत होती है। कथ्य और अभिव्यक्ति एक हो गये हैं।
चन्द्रगुप्त की दूरदृष्टि को इंगित करने के लिए कहे गये वाक्य देखें-
‘‘अरे नहीं विनयमित्र! शत्रु उनसे एक साथ कहाँ लडेगा और यहाँ के राजा लोग यह कहाँ समझते हैं कि पडोसी के राज्य पर हमला है तो हम भी वहीं जाकर शत्रु का सामना करें। जो दुष्ट प्रकृति के हैं, वे तो पडोसी पर आपत्ति आई देखकर प्रसन्न होंगे और जो जरा सज्जन हैं, वे अपने राज्य को बचाने की फिक्र करेंगे, परन्तु जाकर दूसरे की सहायता नहीं करेंगे।’’६ चन्द्रगुप्त ने कहा।
इस अनुच्छेद में संयुक्त और मिश्र उपवाक्यों का आयोजन है। यह चिन्तन की भाषा है। चन्द्रगुप्त की दूरगामी सोच को व्यक्त करती है। चन्द्रगुप्त की दृढता को प्रकट करता है यह वाक्य-
‘‘भारतवर्ष गुलाम? नहीं कभी नहीं!’’७ उसने सरोष पर दृढता से कहा।
‘दृढता’ पद का तो वाच्यतः प्रयोग है किन्तु ‘नहीं’ पद का आवर्तन इस दृढता की सघनता का व्यंजक है। इसी दृढता की परिणति ‘‘हम मगध का राजा ही बदल देंगे।’’
‘‘भैया चन्द्रगुप्त हमारे महाराज होंगे।’’८ उपवाक्य हैं, यही भविष्य के सूचक भी। वास्तव में यही कृतिकार की भावना भी है।
राजभक्त मंत्री राक्षस को चन्द्रगुप्त और उसके सैनिकों की भावना जानकर क्रोध आया, उसने धनानन्द को सूचना दी, दसों सैनिक बंदी बना लिये गये। चन्द्रगुप्त को मृत्युदंड सुनायाा गया। प्रजा किंकर्तव्यविमूढ थी। उसके लिए जैसे शूरवीर चन्द्रगुप्त आवश्यक था वैसे ही नीतिकुशल मंत्री राक्षस भी अपेक्षित था। चन्द्रगुप्त बंदीगृह में अधिक दिन नहीं रहा। रचनाकार कहता है- ‘‘सोता हुआ नन्द स्वप्न में चीख उठा और उधर उसकी पहुँच से दूर चन्द्रगुप्त के रूप में उसकी मृत्यु अट्टहास कर रही थी।’’९ यह नन्द के भविष्य का संकेत है।
दीनदयाल उपाध्याय ‘मानो’ संरचना के भी अभ्यस्त प्रतीत होते हैं। जो नहीं है उसके होने की सम्भावना ‘मानों’ संरचना के द्वारा व्यक्त की जाती है, वह वस्तुतः होती नहीं। तक्षशिला विश्वविद्यालय के स्नातक, फिर वहीं आचार्य का कार्य करने वाले चाणक्य की आकृति का यह वर्णन दृष्टव्य है- ‘‘विधाता ने जहाँ उसको मेधा शक्ति खुले हाथों दी थी, वहाँ शरीर सौन्दर्य देते समय अपना हाथ खींच लिया था। उसका रंग काला था, मानो हृदय और मस्तिष्क में स्थान न पा सकने के कारण अज्ञानांधकार बाहर निकलने का प्रयास कर रहा हो।’’१०
एक उदाहरण और देखें-
‘‘संध्या समय लाल-लाल सूर्य अस्ताचल की ओर भागा जा रहा था, मानो पश्चिम की ओर पीठ दिखाकर भागते हुए शत्रु की पीठ पर लगा हुआ विशाल रक्तव्रण हो।’’११
दीनदयाल उपाध्याय ने आंभीक की यवनों के साथ दुरभिसंधि, अश्वकों की मरणांतक हार, पर्वतक (पर्वतेश्वर) की पराजय और फिर सिकंदर से मित्रता आदि घटनाओं को संक्षेप में कह दिया है। यवनों के अत्याचार का वर्णन भी दो अनुच्छेदों में समेट दिया है।
चाणक्य का चरित्र परम्परागत ही है। वह सत्य-असत्य के प्रपंचों में नहीं पडता। उसकी धारणा है ‘‘अपने राष्ट्र का कल्याण और उसकी स्वतंत्रता ही सबसे बडा सत्य है। आज तो इस झूठे सत्य को लेकर अकर्मण्य बनकर बैठ जाओगे, कल समस्त देश पर विदेशी यवन म्लेच्छों का राज्य हो जाएगा, उनका अत्याचार और उनका गोवध क्या यह सत्य होगा। जाओ, यही सत्य है और इसे करो। मैं तब तक मगध जाता हूँ और अलिक्सुंदर के स्वागत की तैयारी
करवाता हूँ।’’१२
उपाध्याय निस्स्वार्थ देशप्रेम को श्रेयस्कर और सर्वोच्च मानते थे, उनके द्वारा रचित ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ इसी भावना का प्रतीक है। आज के भारतीय नवयुवकों में यही भाव संप्रेरित करना दीनदयाल उपाध्याय की हार्दिक कामना थी। वे लिखते हैं- ‘‘चन्द्रगुप्त को धनानंद ने फाँसी की सजा दी थी, परन्तु फिर भी वह नहीं चाहता था कि यवनेश अलिक्सुंदर मगध पर आक्रमण करे। कितना उत्कृष्ट तथा सुलझा हुआ था उसका देशप्रम। और यही देशप्रेम है- किसी भी व्यक्ति की बहुमूल्य निधि।’’१३
चन्द्रगुप्त से संबद्ध नाटक भी है, उसमें राक्षस को चाणक्य का प्रतिद्वंद्वी और स्वार्थी ही चित्रित किया गया है, परन्तु उपाध्याय जी की इस रचना में चाणक्य उसे अपना मित्र और देशभक्त कहते हैं। चाणक्य मगध गये, राक्षस से भेंट की और दोनों दूसरे ही दिन धनानंद से मिले। किन्तु नर्तकियों से घिरे, मदिरापान से उन्मत्त बने धनानंद ने चाणक्य का तो तिरस्कार किया ही, राक्षस के साथ भी उचित व्यवहार नहीं किया। तब चाणक्य का चोटी खोलकर प्रतिज्ञा करने का प्रसंग आता है। राक्षस ने चाणक्य को समझाने का प्रयत्न किया, राजद्रोह की दुहाई दी। इस प्रसंग का भाषिक विन्यास कथ्य के अनुरूप है। विलासी नंद के अपमानजनक कथन, चाणक्य का क्रोध सभी कुछ जीवंत हो उठे हैं, (देखें पृ. ३६-३९) इस प्रसंग में चाणक्य का कथन-
‘‘अमात्यवर! राजा राष्ट्र के लिए है, न कि राष्ट्र राजा के लिए। यदि अलिक्सुंदर आज तुम्हारा राजा हो जाए, तो उसकी भक्ति भी तुम राजभक्ति मानकर करोगे? राजभक्ति वहीं गुण है, जहाँ वह राष्ट्र और देशभक्ति की पोषक हो, अन्यथा वह पाप है, सर्वथा
त्याज्य है।’’१४
इतिहास साक्षी है चन्द्रगुप्त का उद्देश्य तो उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम समस्त भारत को एक सूत्र में बाँधना था और यह उसकी महानता है कि बारह वर्ष की अल्पायु में ही एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करके उसने अपना लक्ष्य प्राप्त किया। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में आदर्श सम्राट के गुणों का निर्देश किया है। लगता है ऐसा करते समय चन्द्रगुप्त ही उनकी दृष्टि में था। दीनदयाल जी ने सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की विजयों, उनका साम्राज्य-निर्माण, उनकी सफल शासन प्रणाली तथा प्रजाहित के कार्यों की दृष्टि से उन्हें भारत ही नहीं विश्व के सफल शासको में उच्च स्थान दिया है। अपने गुणों के कारण वह तरुणों का आदर्श बन सकता है। नौजवान पीढी के चरित्र-निर्माण हेतु वह अत्यन्त उपयुक्त आदर्श पात्र है। चन्द्रगुप्त की दृष्टि में देश-प्रेम देशभक्ति है- ‘‘मैंने देश के सामने अपने स्वार्थों को कोई महत्त्व नहीं दिया है। पर हाँ, सर्वांगपूर्ण देशभक्ति की कल्पना अभी तक मेरे सम्मुख नहीं आई थी। आज अवश्य ही मैंने एक नया पाठ पढा है।’’१५ यह पाठ चन्द्रगुप्त ने चाणक्य से पढा।
कृति की भाषा को मानक हिन्दी कहना उपयुक्त होगा, तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक है किन्तु कथ्य की माँग के कारण उचित है। मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग प्रसंगानुकूल है, ये भी सामान्य बोलचाल के हैं, कुछ यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं-
१. बाल बाँका न होना (पृ. २३)
२. आस्तीन का साँप होना (पृ. ४०)
३. अभी तो सेर में पूनी भी नहीं कती है (पृ. ४४)
४. मुँह में पानी भर आना (पृ. ५७)
५. मन के लड्डू चूर होना (पृ. ६१)
६. सिर मुँडाते ही ओले पडना (पृ. ६१)
७. पाँव उखडना (पृ. ६३) आदि।
८. होनहार बिरवान के होत चीकने पात (ज.शं.पृ. १४)
९. काठ मार जाना (ज. शं. पृ. १७)
१०. मेरे मन कछु और है विधना के कछु और (ज.शं.पृ. २०)
एक खास बात की ओर इंगित करना अप्रासंगिक न होगा। सम्राट् चन्द्रगुप्त विषयक इतर साहित्य में चन्द्रगुप्त को धीरललित नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जयशंकर प्रसाद के नाटक में चन्द्रगुप्त, कल्याणी के प्रति भी झुकता है, मालविका के प्रति भी। यहाँ तक कि चाणक्य को कहना पडता है ‘छोकरियों से बातें करने का समय नहीं है मौर्य’।
दूसरी बात, इस कृति में चमत्कारपूर्ण घटनाएँ नहीं हैं, इत्तेफाक भी नहीं हैं। सपाट कथानक, एकदम अपने उद्देश्य के प्रति उन्मुख, निरर्थक घटनाओं से मुक्त यह कृति अपने संदेश में सफल है। ‘सम्राट् चन्द्रगुप्त’ रचना भारत की भौतिक एकता की ज्ञापक है, परन्तु भौतिक एकता ही से सब कुछ नहीं सधता, वह तो बाह्य रूपाकार है, उसका मूल तत्व तो उसका सांस्कृतिक पक्ष है। सांस्कृतिक उदात्तता और भौतिक सभ्यता का समन्वय ही किसी राष्ट्र को महान् बना सकता है।
सांस्कृतिक दृष्टि से राष्ट्र को संपन्न बनाने के लिए दीनदयाल जी को एक और चरित्र की आवश्यकता थी। और उन्होंने ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ की रचना की। जगद्गुरु शंकराचार्य में वे सभी गुण थे जो किसी राष्ट्र को महत्ता के शिखर तक पहुँचा सकते हैं। उनकी प्रतिभा, सहज तर्क शक्ति, निर्भीकता, त्यागमयी जीवन शैली और विनम्रता ने उनके समय में व्याप्त दार्शनिक और धार्मिक द्वन्द्वों का शमन किया। इन वितण्डावादों का ‘एकात्म मानवतावाद’ में समाहार किया।
‘एकात्म मानववाद’ का ऐसा प्रस्तोता, सम्पूर्ण हिन्दू राष्ट्र को एक सूत्र में संगठित करने की उत्कट भावना से संपे*रित ऐसा रचनाकार इस युग में दुर्लभ है। दीनदयाल उपाध्याय के लिए मातृभूमि भूखण्ड मात्र नहीं है, साक्षात् साकार मूर्ति है जिसे वे प्रत्येक जन के हृदयपटल पर अंकित देखने के अभिलाषी थे। उनके विशाल साहित्य के एक-एक शब्द में यह अभिलाषा मुखर है ही, ‘सम्राट् चन्द्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ में उनकी हार्दिक आकांक्षा के बीज दृढता से सन्निहित हैं। उनके विचार, भाव, हृदयगत आवेग अपने उपयुक्त भाषा शैली में सहज रूप में व्यक्त हुए हैं। भाषा शैली की यह समर्थ सहजता तभी आती है जब विचार और भाव जनित आवेग रचनाकार के व्यक्तित्व के अंग बन जाते हैं। उपाध्याय जी ने जो भी लिखा वह ऊ पर से ओढा हुआ नहीं वरन् यह तो उनके गूढ चिन्तन और राष्ट्र के प्रति चिन्ता से उद्भूत है। अपने प्रारम्भिक लेखन में उनकी दृष्टि सम्राट् चन्द्रगुप्त और जगद्गुरु शंकराचार्य पर ही क्यों गई- इसका स्पष्टीकरण उन्होंने स्वयं किया है-
‘‘आज भारत के इतिहास में क्रान्ति लाने वाले दो परुषों की याद आती है। एक वह कि जगद्गुरु शंकराचार्य सनातन धर्म का संदेश लेकर देश में व्याप्त अनाचार को समाप्त करने चले थे और दूसरा वह कि जब अर्थशास्त्र की धारणा का उत्तरदायित्व लेकर संघ राज्यों (ऋद्गश्चह्वड्ढद्यद्बष्ह्य) में बिखरी राष्ट्रीय शक्ति को संगठित कर साम्राज्य की स्थापना करने चाणक्य चले थे।’’ ग्रन्थ (सिद्धान्त और नीति की प्रस्तावना से उद्धृत)
रचनाकार का सर्जनात्मक आवेग उसे ऐसे पात्र की खोज करने को प्रेरित करता है जिसमें उसका आवेग, उसका सोच साकार हो सके। ऐसे पात्र के इतिहास सम्मत तथ्यों में वह अपनी धारणाओं का मणिकांचन योग कर रचनात्मक सार्थकता का संतोष पाता है।
उपाध्याय जी चाणक्य और चन्द्रगुप्त के युग का सादृश्य आज भी अनुभव करते हैं- उन्होंने लिखा है- ‘‘आज....तीसरा महत्त्वपूर्ण प्रसंग आया है, जब कि विदेशी अवधारणाओं के प्रतिबिंब पर आधारित मानव संबंधी अधूरे व अपुष्ट विचारों के मुकाबले विशुद्ध भारतीय विचारों पर आधारित मानव कल्याण का सम्पूर्ण विचार ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में उसी सुपुष्ट भारतीय दृष्टिकोण को नए सिरे से सूत्रबद्ध करने का काम हम प्रारम्भ कर रहे हैं।’’ (वहीं) दीनदयाल जी ने भारतीय दृष्टिकोण को नए सिरे से सूत्रबद्ध करने के लिए ‘सम्राट् चन्द्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ को अपनी औपन्यासिक कृतियों में केन्द्रबिन्दु के रूप में चुना। स्वयंसेवक के नाते जिस निष्ठापूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना था, इसके लिए चन्द्रगुप्त तथा प्रचारक के नाते जीवन व्रती तैयार करने के लिए जगद्गरु शंकराचार्य।’’१६ इन दोनों में दीनदयाल उपाध्याय के साहित्यकार व्यक्तित्व का रचनात्मक आवेग अपनी सार्थकता पाता है। सत्तर वर्ष पूर्व लिखी गई इन रचनाओं की मूल्यवत्ता आज पहले से अधिक प्रतीत होती है।
जगद्गुरु शंकराचार्य का समय बौद्ध धर्म के पतन का युग था। बौद्ध धर्म सदाचार के स्थान पर अनाचार फैला रहा था। बौद्धों को आश्रय देने वाले निर्बल हो रहे थे। सत्ता का मोह बौद्धों को भी हो गया था। भारतीय बौद्धों ने तो अपने-पराये का विवेक भूलकर विदेशियों-विरोधियों को निमंत्रित किया। ‘‘प्रखर राष्ट्रीयता का पोषक हिन्दू समाज इसे सहन न कर सका और कुमारिल भट्ट द्वारा प्रज्वलित चिनगारी शंकराचार्य के रूप में दावानल बनकर प्रकट हुई।’’१७ शंकराचार्य ने सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने का श्लाघ्य प्रयत्न किया था।
सुदीर्घ कालावधि को पार कर उपाध्याय जी शंकराचार्य से जैसे साक्षात्कार कर रहे हैं-
‘‘समस्त संसार को माया समझने वाले शंकर ने न जाने कितने दिन इन बाढ पीडितों की सेवा में बिताए। आश्रमवासी कहते, हमको इस सबसे क्या प्रयोजन? हमको तो परम सत्य का अनुसंधान करने में और परब्रह्म का साक्षात्कार करने में अपना समय बिताना चाहिए। परन्तु शंकर जानते थे कि परम सत्य क्या है? आकाश में चाहे कुसुम खिल जाये, परन्तु वहाँ भगवान के दर्शन नहीं हो सकते। उसके लिए तो नीचे पृथ्वी पर ही अपने आस-पास, अपने देशवासियों के हृदयों को ही टटोलना पडेगा। आर्त की पुकार में जिसको भगवान की वाणी नहीं सुनाई देती, उसके कान भगवान के शांत स्वर को नहीं सुन सकते। दुर्बल और दुःखी की आत्मा को जो नहीं पहचान सकता, वह सर्वात्मा का क्या दर्शन कर सकेगा?’’१८
प्रथम भेंट में ही गौडपादाचार्य (शंकराचार्य के गुरु गोविन्दपाद के भी गुरु) समझ गये थे ‘‘.......कि उसके (शंकराचार्य) पास अपने देश और धर्म की दशा देखकर रोने वाला हृदय भी है तथा उसी हृदय में उन्हें इस दशा को दूर करने की एक अत्यन्त प्रखर आकांक्षा भी दिखाई दी।’’१९
देश और धर्म की दशा पर रोनेवाला तथा इस दशा को दूर करने का संकल्प लेने वाला हृदय पं. दीनदयाल उपाध्याय के पास भी था। आचार्य गौडपाद ने यह कथन शंकराचार्य के लिए कहा और आधुनिक युग या कहें स्वातंत्र्योत्तर युग में यह बात दीनदयाल उपाध्याय के लिए भी सत्य है।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने संन्यासी के सच्चे अर्थ को जाना था, हृदयंगम किया था। संसार के दुखों से निरपेक्ष रहकर ब्रह्मचिन्तन तें लीन रहना संन्यास नहीं है। एक प्रसंग है- पर्वतों में भीषण वर्षा होने के कारण नर्मदा नदी के जल ने महानाश का दृश्य रच दिया। तब समस्त संसार को माया प्रतिपादित करने वाले जगद्गुरु ने न जाने कितने समय बाढग्रस्त जन की सेवा की। वे इस सत्य से अवगत थे कि दुखी और निर्बल की आत्मा को पहचान कर ही सर्वात्मा का दर्शन सम्भव है। इस सिद्धान्त का निर्वाह जगद्गुरु जीवन पर्यन्त करते रहे। श्री गोविन्दगुरु को यह विश्वास हो गया था कि जगद्गुरु शंकराचार्य ने सर्वात्मैक्य की स्थिति प्राप्त कर ली है। विचार करने की बात है, आज के युग में कितने महानुभाव दीन-दुखियों की पीडा को समझने का प्रयत्न करते हैं? बी. पी. एल. का वस्तुतः कितना निर्वाह और उससे कितनों का भला हो रहा है? यह सब जानते हैं। इस समय जगद्गुरु का सर्वात्मैक्य सिद्धांत कितना प्रासंगिक है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। उपाध्याय जी ने जगद्गुरु शंकराचार्य के चिन्तन का सोदाहरण विवेचन कर, इसकी महत्ता और प्रासंगिकता को उजागर किया है। इस प्रकार के चरित्र को प्रस्तुत कर दीनदयाल जी ने अपनी दूरदृष्टि और सामयिक आवश्यकता को सिद्ध किया है।
जगद्गुरु आचार्य शंकर के जीवन में गौडपादाचार्य के सान्निध्य में व्यतीत हुई चार वर्ष की अवधि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई। हिमालय से उन्होंने बहुत कुछ सीखा-विशालता, दृढता, अपने धर्म की उज्ज्वलता। हिम के समान ही स्वच्छ और शीतल जीवन बिताने की सद्पे*रणा का प्रेरक स्रोत सम्भवतः नगाधिराज हिमालय ही था। उपाध्याय जी का निम्नोद्धृत कथन उनकी तत्वग्राही दृष्टि का प्रमाण है-
‘‘हिमाद्रि की इस मूक देशभक्ति को देखकर शंकर श्रद्धा से उनके सामने झुक गया और शायद उसी क्षण अपने जीवन में आपत्तियों और कष्टों की चिन्ता न करते हुए तिल-तिल गलकर देश की सेवा करने का व्रत लिया।’’२० आज के नेताओं और नवयुवकों को जगद्गुरु श्री शंकराचार्य के जीवन से क्या कुछ भी सीख नहीं लेनी चाहिए?
दीनदयाल उपाध्याय ने ‘राष्ट्र, धर्म और सम्प्रदाय’ शीर्षक से एक अध्याय में लिखा है- जब जगद्गुरु तक्षशिला पहुँचे तो शास्त्रार्थ के लिए आतुर और कृतसंकल्प बौद्ध विद्वान तैयार बैठे थे। वे स्वयं को तर्कनिष्णात समझते थे। उनका विश्वास था कि वे अपनी वाकपटुता से शब्दों का अनर्थ करके किसी को भी परास्त करते हैं- जगद्गुरु शंकराचार्य को भी। किन्तु जगद्गुरु उनके वाग्जाल में फँसने वाले नहीं थे, वे शब्दजाल की अपेक्षा व्यवहार को वरीयता देते थे। उनका दृढ विश्वास था कि कर्मण्यता तर्काश्रित होने से उद्भूत नहीं होती वरन् वह तो भावनाश्रित होती है। शब्दाडंबर तो मनुष्य को कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय-विवेक को भुला देता है। बौद्ध विद्वानों को भरोसा था कि वे आचार्य शंकर को अपना अनुगामी बना लेने में सक्षम सिद्ध होंगे। आचार्य शंकर के व्यक्तित्व और प्रभाव से परिचित होते हुए भी वे अपनी कल्पना में उन्हें परास्त कर देने का स्वप्न देख रहे थे। शास्त्रार्थ का प्रारंभ एक बौद्ध भिक्षु ने ही किया। वह कहने लगा- ‘‘आचार्य शंकर इस दुःख से भरी दुनिया में यदि शांति का कोई मार्ग हो सकता है तो वह भगवान बुद्ध का ही मार्ग हो सकता है, जीव हिंसा से दूर रहिए, सेवा का आदर्श अपने सामने रखिए, वैदिक कर्मकांड के पचडे में पडकर अपने नैतिक जीवन को गर्हित न कीजिए तथा ‘संघं सरणं गच्छामि’, ‘बुद्धंसरणं गच्छानि’, ‘धम्मं सरणं गच्छामि’ का उच्चारण करके निर्वाण पद के अधिकारी बनिए।’’ उत्तर में आचार्य शंकर ने विनम्रतापूर्वक बुद्ध की महानता को स्वीकारा, उन्हें भगवान कहा पर साथ ही यह भी जोड दिया- ‘परन्तु तनिक सोचो तो भिक्षु श्रेष्ठ, क्या आज हम उनके आदर्श का पालन कर रहे हैं? उनकी आत्मा की पुकार क्या आज हम सुन पा रहे हैं?.........आज तो मालूम होता है, उनकी भावना हमको छू भी नहीं गई है। हम अपनी इन आँखों से शक और हूणों के अत्याचार नहीं देखते? इन पाशविक कृत्यों को देखकर हमारा हृदय क्यों नहीं रोता? सूनी आँखों में क्या अपने इन बंधुओं के दुःख के लिए दो आँसू भी शेष नहीं रहे? एक अन्य भिक्षु ने कहा- ‘‘आचार्य आप चाहते हैं कि बौद्ध धर्म का विश्व में प्रसार न हो, जंगली और असभ्य जातियों को सभ्यता का पाठ नहीं पढाना चाहिए?........क्या शक और हूणों के जीवन को हमने प्रकाशित
नहीं किया?’’२१
आचार्य शंकर का उत्तर था- ‘‘यही तो भ्रम है आपका।’’ ‘‘शक और हूण बौद्ध धर्म में इसीलिए दीक्षित नहीं हुए कि उन्हें बौद्ध धर्म प्रिय था अथवा उन्हें भगवान बुद्ध से प्रेम था या वे अपने जीवन को आलोकित करना चाहते थे। किन्तु उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनी राजनीति के चुंगल में फँसाया। उनके बौद्ध धर्म स्वीकार करने पर तुमने समझा कि वे अपने हो गये, परायों को खूब अपनाओ, कौन रोकता है तुम्हें? किन्तु पराये अपने बनें तब न और फिर तुमने उनको अपनाया है या उन्होंने तुमको अपनाकर देश बन्धुओं से दूर करने का प्रयत्न किया है? इसी अपनेपन के कारण तो तुम उनके अत्याचारों में सहयोग देते रहे। कनिष्क ने बौद्ध धर्म का संस्कार भी किया और साथ ही भारत की स्वतंत्रता का गला भी घोंटता रहा। तुमने एक को देखा पर दूसरे की ओर ध्यान देना तो दूर रहा उल्टे उसकी सहायता ही की।’’ ‘‘वे जानते हैं कि यदि भारतवर्ष की प्राचीन परम्परा जीवित बनी रही, उसकी सामाजिक व्यवस्था बनी रही तो यह सदैव के लिए हमारे चंगुल में नहीं रह सकेगा। इसके विपरीत स्वतंत्रता की चाह को समाप्त करने का सबसे सरल मार्ग है- राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता का विनाश। आप उनके हाथ की कठपुतली बनें तथा सब प्रकार से इस
देश की व्यवस्था और परम्पराओं को नष्ट करने का प्रयत्न किया।’’२२
भारत राष्ट्र की प्राचीन परम्पराएँ नष्ट नहीं हुई, आज भी भासमान हैं और इसका श्रेय है शकारि विक्रमादित्य को, नागवाकाटकों को, यशोवर्मन और हर्ष को। यह स्थिति अंग्रेजों के काल में भी बनी। भाईचारे का नारा देकर हमारे देश की धरती को हडपने का षडयंत्र करने वाले चीन की भी वही मंशा है। दीनदयाल उपाध्याय जगद्गुरु शंकराचार्य के वक्तव्यों के सहारे आज के नवयुवकों और राजनीतिज्ञों को सावधान भी करते हैं और कटु सत्य से अवगत भी कराते हैं।
आचार्य शंकर ने कहा था बुद्ध और बौद्धों के सत्य सिद्धांत किसी को भी अमान्य नहीं हैं। भगवान बुद्ध सबके लिए पूज्य हैं। दुनिया के दुखों से सभी मुक्त होना चाहते हैं। जो पूजा-अर्चना बौद्ध करते हैं, वह तो भक्तिभाव के लिए हर किसी को आवश्यक है। बौद्धों और हिन्दुओं में भेद कहाँ है? फिर बौद्ध भी तो हिन्दू हैं, फिर शास्त्रार्थ कैसा?
बौद्ध स्वयं को हिन्दुओं से पृथक मानते थे, आज भी सिख, जैन आदि स्वयं को हिन्दू कहलाना पसंद नहीं करते। जगद्गुरु शंकराचार्य के द्वारा ‘हिन्दू’ कहा जाने पर बौद्ध भिक्षु उत्तेजित होकर बोले- ‘‘क्या कहा- हम बौद्ध नहीं हिन्दू हैं।’’ तब आचार्य ने दृढतापूर्वक कहा-
‘‘हाँ आप हिन्दू हैं और बौद्ध भी, आप हिन्दू हैं और वैष्णव भी, आप हिन्दू हैं और शैव भी, आप सब कुछ हैं।’’ बौद्ध आचार्य शंकर के इस कथन में उलझ कर रह गये, तब आचार्य बोले- स्नेहपूर्वक कहा- ‘‘आप इस पुण्यभूमि हिन्दुस्थान के निवासी आर्यों की संतान हैं, प्राचीन परम्परा को मानने वाले हैं, राम और कृष्ण की संतान हैं, अतः हिन्दू हैं। भगवान बुद्ध की आत्मा का आपने साक्षात्कार किया है, अतः बौद्ध हैं। विष्णु के अवतार भगवान बुद्ध के पुजारी होने के नाते वैष्णव हैं और राष्ट्र के शिव की आराधना आपको शैव भी बनाएगी।’’२३ एक भिक्षु के यह कहने पर कि आप तो वेदों की बातें बता रहे हैं। आचार्य शंकर का उत्तर था- ‘‘यदि आपकी बातें वेदों में मिल जाएँ तो उसमें क्या आपत्ति होनी चाहिए?’’ वे हँसकर बोले ‘‘प्राचीनता के गौरव के लिए तो लोग तरसते हैं और आप अपने गौरव को नष्ट करने पर तुले हुए हैं।’’
हतप्रभ बौद्धों ने कहा- ‘‘नहीं आचार्य। हम कुछ नहीं करना चाहते।’’ आचार्य शंकर ने कहा- ‘‘प्राचीनकाल से हम सब एक ही प्रवाह के जलकण रहे हैं, उस सरिता का ही नाम आर्य है, हिन्दू है। वही हमारा गौरव चिह्न है, मान-सम्मान का दाता है, आइए इसी के लिए हम अपनी सम्पूर्ण शक्तियाँ समर्पित करें। भगवान ने सदैव हमारी रक्षा की है, हमारे समाज का पालन किया है, इसको जीवन शक्ति का दान दिया है। राजकुमार सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त करके ईश्वरीय स्वरूप का साक्षात्कार किया और अपने सदुपदेश से इस पुरातन समाज को पुनः पल्लवित किया। वे निश्चित ही भगवान विष्णु के अवतार थे, आइए हम सब उनको
नमस्कार करें।
भगवान बुद्ध ने ‘गया’ में आत्म साक्षात्कार किया था। आचार्य ने ‘गया’ को तीर्थ स्वरूप कहा। आचार्य शंकर के वक्तव्य के समाप्त होने पर चारों ओर ‘हिन्दू की जय’, ‘भगवान बुद्ध की जय’, ‘वेदों की जय’ वाक्य गूंजन लगे।
इस प्रकार भारत की समन्वयात्मक संस्कृति का एक और सोपान खुला। स्वामी शंकराचार्य ने किसी भी देवता का खंडन नहीं किया। किसी की श्रद्धा पर चोट नहीं की। श्रद्धा तो किसी की महत्ता की स्वीकृति है। इसलिए उन्होंने श्रद्धा का आधार, उसके केन्द्र को बदल देने का कार्य किया। उनके अनुसार अनेक देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा अनंत परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है और अनके उपासना पद्धतियों के मूल में उस अनंत दयालु परमात्मा के प्रति कृतज्ञता की भावना है। बाह्यतः प्रतीत होने वाली अनेकता-भिन्नता आभासिक है। अष्ट गणपतियों की स्थापना, द्वादश ज्योतिर्लिगों की स्थापना भारतभूमि को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न था। शाक्त, शैव, वैष्णव, गाणपत्य आदि सब एक ही शक्ति के उपासक हैं। वह शक्ति ही राष्ट्रपुरुष है, उसी सहस्रानन, सहस्रबाहु, सहस्रपाद, सहस्राक्ष राष्ट्रपुरुष की भिन्न-भिन्न स्वरूप में अर्चना की जाती है। लोग अपनी श्रद्धा के आधार को न छोडते हुए ही जीवन की विशालता से लक्ष्य की उच्चता और व्यवहार की उच्चता से जुड गये। इस प्रक्रिया में आचार्य शंकर ने सम्पूर्ण जन समुदाय को ऊपर उठाया। जीवन में पवित्रता का समावेश हुआ। हिन्दू संस्कृति का मूल तत्व यह सर्वव्यापी सहिष्णुता ही है। शंकराचार्य ने ऐसा प्रबंध करना आवश्यक समझा जिससे जन समुदाय में एकत्व की भावना युगों तक बनी रहे। इसी विचार से प्रत्येक की श्रद्धा के केन्द्र ‘मठ’ की स्थापना की। यह ‘मठ’ आधुनिक अर्थ में नहीं वरन् ‘‘समाज के सच्चे सेवक, देश के कर्णधार, ज्ञानी, विद्वान, निस्स्वार्थी, निस्पृही तथा दृढसंकल्पी कार्यकताओं को शिक्षित करके सम्पूर्ण देश में भेजने वाले स्थान के रूप में ‘मठ’ था।’’२४ माना जाता है कि उन्होंने कांची में प्रथम ‘मठ’ स्थापित किया था। किन्तु उनके द्वारा स्थापित श्ाृंगेरी मठ ही विख्यात है और सुरेश्वराचार्य प्रथम मठाधीश। सुरेश्वराचार्य मिथिला के थे। उत्तर में स्थापित जोशी मठ का अचार्य दक्षिण का ब्राह्मण था। यह सब भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने के लिए किया गया था।
आचार्य शंकर के व्याख्यान वाग्जाल नहीं होते थे, वे जनता जनार्दन के सम्मुख आत्मनिवेदन करते थे। जगन्नाथपुरी में उन्होंने गोवर्धन मठ की स्थापना की। यहाँ से निकले संन्यासी उसी भावना से भरे थे जिससे कांची और श्ाृंगेरी मठ से निकले संन्यासी होते थे। फिर अपने एकत्व के संदेश का उद्घोष उन्होंने द्वारकापुरी में किया। द्वारकापुरी से फिर आचार्य उत्तर की ओर बढे राजा पुरु, सम्राट् चन्द्रगुप्त और चाणक्य की कर्मस्थली में कतिपय स्वार्थी लोगों के कारण आक्रमणकारियों का तांता लगा रहता था। अभी तक आचार्य शंकर ने हिन्दुत्व में एकत्व निर्माण करने, उन्हें संगठित करने तथा उनकी शक्ति को संचित करने का कार्य किया था, अब बाह्य शत्रुओं की ओर ध्यान देना उन्हें आवश्यक लगा।
आचार्य शंकर ने भारतीय एकता और आत्मा की सत्यता का उद्घोष कश्मीर में भी किया। वे दृढव्रती थे, उनकी धारणा थी कि भगवान ने यह शरीर कार्य को पूर्ण करने के लिए दिया है। कार्य के स्थान पर शरीर को महत्त्व देना तो भगवान की इच्छा का विरोध होगा। दीनदयाल उपाध्याय ने चन्द्रगुप्त और शंकराचार्य को अपनी प्रथम दो कृतियों का केन्द्र बनाकर समय की गति को पहचाना है और समुचित समाधान किया है। उपाध्याय जी के विचारों से, उनके चिन्तन से पूर्णतः अवगत होने के लिए उनके समग्र वाङ्मय से गुजरना आवश्यक है तभी उसमें निहित औदात्य और उसकी सामयिक प्रांसगिकता का बोध सम्भव है। उपाध्याय जी का लेखन मात्र सैद्धान्तिक नहीं है उसकी व्यावहारिकता सिद्ध है और यही उनके लेखन की शक्ति है।