राष्ट्र की स्वंत्रता ही सबसे बड़ा सत्य है

डा उदयप्रताप सिंह


दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन संस्कृति, राष्ट्र और समाज के अंतिम पायदान पर खडे व्यक्ति तक पहचने का सेतु है। राष्ट्राराधन के अनन्य भक्त, चमत्कृत कर देने वाली प्रतिभा से सम्पन्न उपाध्याय जी का जीवन दर्शन सांस्कृतिक भारत का प्रतिरूप लगता है। २०वीं शती में देश के प्रति चिंतन करने वाले दो प्रकार के मनीषियों का प्रादुर्भाव हुआ था। एक वे थे जो विदेश में उच्च अध्ययन कर देश सेवा का व्रत लेते हैं और दूसरे वे हैं जो अपने देश में ही शिक्षा ग्रहण कर देश की आत्मा-संस्कृति का प्रत्याख्यान करते रहे हैं। दोनों का उद्देश्य देश की अस्मिता की सुरक्षा और राजनीतिक आजादी प्राप्त करने का आग्रह रहा है। इस पंक्ति में मदन मोहन मालवीय, गाँधी, तिलक, नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद और चित्तरंजन दास का नाम आता है। इन मनीषियों ने भारतीयों के उत्पीडन से सम्बंधित अनेक नियमों-विधि विधानों का प्रबल प्रयोग सडक से न्यायालय तक किया। कई में इन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। ऐसे जननायकों में भारतीय चिंतन का प्रभाव तो था ही पर जो देसी संस्कृति की छाप, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, स्वामी दयानंद बहुत कुछ अर्थों में तिलक महाराज और महात्मा गाँधी में दिखाई पडती है, उसका समर्थ नायकत्व पं.दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में दिखाई पडता है। इन सभी मनीषियों की प्रेरणा स्त्रोत आर्य परम्परा ही रही है। इसलिए इस पंक्ति के विद्वानों ने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक स्वाधीनता पर विशेष बल दिया था। इनका विश्वास था कि मात्र राजनीतिक आजादी द्वारा राष्ट्र के समक्ष शासन तंत्र के अतिरिक्त सांस्कृतिक निधियों का अभाव खटकता ही रहेगा। राष्ट्रभक्ति का भाव कम और सत्ता की बागडोर सँभालने की इच्छा अधिक होगी। न ढंग से अपना तंत्र होगा और न लोकतंत्र ही।
दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन ऋषि परम्परा का चिंतन है। ‘वयं राष्ट्रे जागृयामः, कृणवंतो विश्वमार्यम्, आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः, मा कश्चिद् दुख भागभवेत्, सर्वे भवन्तु सुखिनः, नत्वेयं आर्यदास्य भावः’ की सांस्कृतिक चेतना उनके चिंतन की विशेषता रही है। उपाध्याय जी साहित्यकार कम विचारक और चिंतक अधिक रहे हैं। राष्ट्रभक्ति को जगाने में वे एक ऐसे संगठन से प्रतिबद्ध रहे हैं जहाँ राष्ट्र को देवता के रूप में प्रतिस्थापित करने का प्रयत्न होता है। उनकी दृष्टि में राष्ट्र भौगोलिक सीमाओं में बँधा अथवा एक शासक द्वारा शासित भूखण्ड नहीं होता, वह तो ईश्वर प्रदत्त एक ऐसा पवित्र स्थल होता है जहाँ एक मन के लोग एक साथ निवास करते हैं, जिस भूमि पर रहते हुए लोगों में सुख-दुख सहने का एक भाव होता है, परमसत्ता की प्रार्थना का एक वातावरण होता है, उच्च से निम्न व्यक्ति के जीवन जीने का एक दर्शन होता है, परस्पर प्रीति और प*म होता है, एक व्यक्ति द्वारा अर्जित पूँजी में पूरे परिवार का सहभाग होता है। जैसे मुख द्वारा किए गए भोज्य पदार्थ से शरीर के सभी अंग अपना पोषक तत्व प्राप्त कर लेते हैं, जहाँ सबमें सबकी आत्मा, सबमें सब का योग हो, जहाँ ‘‘मुखिया मुख सो चाहिये खान-पान में एक। पालइ-पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।’’ का भाव हो वहीं दीनदयाल के चिंतन का मार्ग खुलता है। यही उनके एकात्म मानववाद का सार है और यही उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रबल चेतना है। कहना है कि इन्हीं स्त्रोतों से उनके साहित्य का उत्स निकलता है। अतः उसमें देश, संस्कृति और स्वर्णिम अतीत की भास्वर रेखाएँ अपना बिम्ब बनाती हैं। उनका अतीत तब और दमक उठता है जब उसे वे आजाद भारत के नए संस्करण से जोड देते हैं अथवा स्वतंत्रोन्मुख भारत की मूल पहचान ‘स्वत्व निज भारतगहे’ की चेतना से सम्बद्ध कर देते हैं। ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ की मौलिकता इन्हीं भावों से सम्बद्ध है। उनकी रचनाओं में संस्कृति, परम्परा, राष्ट्रभक्ति और स्वर्णिम अतीत का ऐसा परिपाक बनता है जिसके स्वाद में प्राचीनता का अनुभव होता है पर पथ्य आधुनिक रोगों के निदान में दिखता है।
उपाध्याय जी ने अपने जीवन काल में अनेक पुस्तकों की रचना की। इनमें ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ और ‘एकात्म मानववाद’। वैसे तो उनके वैचारिक और विश्लेषण परक वक्तव्यों की संख्या हजारों में है पर रचना के रूप में उक्त तीन पुस्तकें ही चर्चित हैं। साहित्य के निकष पर प्रथम दो पुस्तकें ही परीक्ष्य हैं। ‘चंद्रगुप्त’ और ‘शंकराचार्य’ इतिहास के जिस मोड पर खडे हैं वहाँ से भारत का वैभव झाँकता है। एक में भौतिक सम्पतियों का अम्बार लगा हुआ है, कलाओं का लोकविश्रुत रूप में फैला हुआ है तो दूसरे में सांस्कृतिक भारत की मनीषा झाँकती है। राजनीतिक भारत के सबसे बडे निर्माता चंद्रगुप्त हैं और सांस्कृतिक भारत के महत्तम पुनरुद्धारक श्री शंकराचार्य हैं। चंद्रगुप्त में बिखरे पर शक्तिशाली भारत को एकजुट करने की बेमिसाल संगठन शक्ति है और साम्राज्य में बदलने का अद्वितीय पराक्रम है। शंकराचार्य सांस्कृतिक दूत हैं। वे जैन-बौद्ध-आजीवकों में विकसित स्वच्छंदता को सनातन धर्म में बदलने की अद्भुत कला जनाते हैं। एकात्म मानववाद में विश्व की अनेक विचारधाराओं में व्याप्त मनुष्य के अधूरे स्वप* को एक सैद्धांतिक स्वरूप दिया गया है।
‘सम्राट चंद्रगुप्त’ एक रात में लिखी गई रचना है। इसका उद्देश्य नई पीढी को स्वर्णिम अतीत की झलक और राष्ट्रभाव के प्रबल स्फुरण का दर्शन कराना रहा है। भारत के इतिहास को रोचक शैली में प्रस्तुत करने का यह एक अनूठा प्रयोग है। पर इस प्रयोग की प्रतिपूर्ति में एक रात का समय कितना छोटा है? इस रचना में इतने प्रसंगों की सर्जना लक्ष्यपूर्ण प्रस्तुति और अत्यंत साफ-सुथरी भाषा लेखक के वर्षों के अध्ययन को मूर्तिमंत कर दिया है। यह समझा जा सकता है कि कोई भी विचारपूर्ण रचना, इतिहास सम्मत विश्लेषण और युगीन संदर्भ का उल्लेख एक रात की बाँहों में समाने वाली वस्तु नहीं, भले ही यह एक रात में लिखी गई हो पर इसके निर्माण की प्रक्रिया वर्षों पुरानी लगती है। ‘चंद्रगुप्त’ में दो ही पात्र देश को एक नया आयाम प्रदान करते हैं। चाणक्य और चंद्रगुप्त। चंद्रगुप्त का शौर्य और संगठन, चाणक्य की बुद्धि और देश भक्ति के ताने-बाने में पूरी रचना की बुनावट हुई है। विष्णुगुप्त चाणक्य और मगध का अमात्य राक्षस तक्षशिला में सहपाठी रहे हैं। पर दोनों की प्राथमिकताएँ अलग अलग हैं। एक मगध राज्य का अमात्य बन सत्ता का सुख भोगता है और दूसरा कुटिया में बैठकर राष्ट्रचिंतन करता है। अमात्य में भी राष्ट्रनिष्ठा भरी हुई है, पर चाणक्य के व्यक्तित्व पर की गई टिप्पणी कितनी सार्थक और साहित्यिक है-‘‘विष्णु गुप्त अत्यंत मेधावी और प्रखर बुद्धि का था। परंतु विधाता ने उसे मेधा शक्ति खुले हाथों से दी थी, वहीं शरीर सौंदर्य देते हुए अपना हाथ खींच लिया था। उसका रंग काला था, मानो ह्रदय और मस्तिष्क में स्थान न पा सकने के कारण अज्ञानांधकार बाहर निकलने का प्रयास कर रहा हो।’’ इन पंक्तियों में दीनदयाल उपाध्याय के साहित्यिक सूत्र खोजे जा सकते हैं। भारत का अतीत कितना समृद्धशाली था। उसकी एक झलक कुसुमपुर (पटना) के वर्णन में देखी जा सकती है- ‘‘कुसुमपुर वास्तव में कुसुमपुर ही था। जैसे भौंरे पुष्प की सुगंध से आकर्षित होकर उसके चारों तरफ मँडराने लगते हैं, उसका गुणगान को गुंजन करते हैं, उसके गौरव के गीत गाते हैं तथा कुसुम के रस का पान करके, अपनी इच्छा को तृप्त करते हैं...इसी प्रकार देश विदेश के राजदूत भी इस राजा के दरबार में उपस्थित होना अपना सौभाग्य समझते थे।’’
किसी समाज या राष्ट्र की जय-पराजय उसकी जिजीविषा को समाप्त नहीं कर सकती हैं। ढाई हजार वर्ष पूर्व भारत में भी ऐसी परिस्थितियाँ आई होंगी। छोटे-छोटे सैकडों राज्यों में बँटे भारतवर्ष की ताकत यूनान से होने वाले आक्रमणों के प्रतिकार के लिए अपर्याप्त थी। अतः चाणक्य की बौद्धिक व्यूहरचना और चंद्रगुप्त के अपरिमित पराक्रम ने भारतवर्ष को संगठित कर एक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। इसका जीवंत वर्णन पुस्तक में उपन्यास जैसा बाँधता है। पुस्तकीय तथ्यों से ज्ञात होता है कि भारतवर्ष की अनेक नीतियाँ, कला, साहित्य, पराक्रम, संस्कृति और जीवन शैली अद्वितीय रही है। ‘चंद्रगुप्त’ में देश के उन बुद्धिजीवियों को समुचित उत्तर भी मिला है जो श्रेष्ठता का प्रतिमान यूरोप इत्यादि बाहरी देशों में ही देखते रहे हैं। चंद्रगुप्त की सुसंगठित और सुदृढ शासन व्यवस्था की प्रशंसा यवन भी करते हैं। पाटलिपुत्र, तक्षशिला, कौशांबी, उज्जयिनी और महिशर (मैसुर) उपखण्डों में शासन की नीति इतनी सुदृढ थी कि वर्तमान भारत से दुगुने क्षेत्रफल वाले भारत में प्रवेश करने की किसी विदेशी की हिम्मत नहीं थी। राजमार्गों का निर्माण, उच्चकोटि की स्वच्छता, शांति और सम्पन्नता, न्याय का शासन सम्राट तक जन समान्य की पहुँच, तक्षशिला और नालंदा जैसे दो बडे शिक्षा केन्द्रों की व्यवस्था और तमाम प्रकार के उच्च जीवनादर्शों से परिपूर्ण थी चंद्रगुप्त की राज्य व्यवस्था। चाणक्य के बुद्धिकौशल, राष्ट्रभक्ति और देश की समृद्धि के सिद्धांतों ने एवं चंद्रगुप्त की पराक्रमशीलता और निःस्वार्थ भाव से शासन की जिम्मेदारी ने एक समर्थ भारत का नक्शा बना
दिया था।
देश की रक्षा के लिए किए गए चाणक्य के अनेक प्रयास विफल हो जाते हैं, वह धनानंद के दरबार में अपमानित भी किए जाते हैं, पर राष्ट्र के प्रति उनकी चिंता स्वतंत्र भारत के लिए कितनी प्रेरणास्पद है कहना कठिन। मगध साम्राज्य के अमात्य राक्षस और आचार्य चाणक्य के बीच होते संवाद प्राचीन भारत की राष्ट्र भक्ति और निष्ठा को उजागर कर जाते हैं। आचार्य चाणक्य अमात्य राक्षस से प्रश्न करते हैं ‘‘अमात्यवर, राजा राष्ट्र के लिए है न की राष्ट्र राजा के लिए। यदि अलिकसुंदर आज तुम्हारा राजा हो जाए तो उसकी भक्ति भी तुम राजभक्ति मानकर करोगे? राजभक्ति वही गुण है, जहाँ वह राष्ट्र और देश भक्ति की पोषक हो, अन्यथा वह पाप है, सर्वथा त्याज्य है।’’ चाणक्य की दृष्टि में राष्ट्र की रक्षा किसी भी नागरिक का पहला कर्तव्य है। न इससे बडा कोई धर्म है, न इससे बडी कोई बुद्धिमत्ता और न इसके बराबर कोई शास्त्र है। इसकी रक्षा के लिए असत्य भाषण (अपवाह) भी किसी सत्यवचन से बढकर है। यवन अलिकसुंदर की सेना मगध साम्राज्य को आत्मसात करने के लिए लालायित है। आचार्य चाणक्य ने शिष्य शीलभद्र से कहा कि यवन सेना में यह बात फैला दी जाए कि मगध की सेना अजेय है। वहाँ के हाथी, घोडे बहुत विशाल व बलशाली हैं। लोगों में बडी एकता है। अमात्य राक्षस मनुष्य नहीं राक्षस जैसा बलशाली है। राजा के पराक्रम का कहना ही क्या? यह कहकर अलिकसुंदर के सैन्यबल को हतोत्साहित किया जाए। शीलभद्र ने यहाँ सत्य-असत्य का प्रश्न खडा कर दिया। राष्ट्रभक्त चाणक्य कुपित होकर कहते हैं-‘‘यह समय सत्य और असत्य के विचार करने का नहीं है वत्स।....जाओ यही सत्य है और इसे करो। मैं तब तक मगध जाता हूँ और अलिकसुंदर के स्वागत की तैयारी करवाता हूँ। ऐसा स्वागत होगा जैसा कहीं नहीं हुआ होगा।’’
दीनदयाल उपाध्याय की दूसरी पुस्तक ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ है। शंकराचार्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना के आदित्य हैं। भारत की जनता का मिजाज धर्म संबलित है। यहाँ राष्ट्र भूखण्ड नहीं आस्था की भूमि है। ईश्वर द्वारा प्रदत्त सबसे बडा उपहार है। हम उसके पुत्र और वह हमारी माता है। इसका महत्व स्वर्ग से भी बढकर है। संस्कृति विहीन राष्ट्र प्राणप्रतिष्ठा विहीन प्रस्तर मूर्ति है। आचार्य शंकर इस तथ्य को भली भाँति जानते थे। अतः वैदिक सांस्कृतिक चेतना के पुनरुद्धार में उन्होंने अपना जीवन ही अर्पित कर दिया। जैनियों-बौद्धों और अन्यान्य प्रकार के सम्प्रदायों ने वैदिक किंवा सनातन धर्म पर भ*म-भय और भयावहता का एक मोटा आवरण डाल दिया था। इसकी निंदा तो करते ही थे- इसे कालबाह्य भी बात चुके थे। विद्वानों का मत है कि भारत की गुलामी का मुख्य कारण अवैदिक धर्मों का विस्तार ही रहा है। नास्तिकता की भावना, युद्धादि में हिंसा का विरोध, कर्मकाण्ड की निरर्थकता और बहुदेववाद से संबंधित इतना वितण्डा खडा कर दिया गया कि जनता की चित्तवृत्ति सनातन प्रवाह से पराङ्मुख होती चली गई।
आचार्य शंकर ने धर्माधर्म की इन विसंगतियों को अपने तर्क-वितर्क, वाग्वैभव और वैदुष्य से शांत कर मानव कल्याण के लिए पुनः सनातन धर्म के मार्ग पर चलने का आह्वान किया था। इस निमित्त उन्होंने सम्पूर्ण भारत की यात्राएँ की, जैनियों-बौद्धों और अन्य सम्प्रदायों के आचार्यों से तर्क-वितर्क कर वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की। धर्म की इस दिग्विजयी यात्रा में उन्होंने न कहीं कटुता पनपने दी और न कहीं बौद्धादि सम्प्रदायों का तंबू ही उखाड फेंका। इसीलिए कतिपय विद्वान् उन्हें प्रच्छन्न बौद्ध कहने लगे, पर वैदिक परम्परा से निकले चिंतन को उन्होंने पुनः उन्हीं ऋचाओं में अभिमंत्रित कर राष्ट्र का बहुत बडा कल्याण किया। यदि उनका आविर्भाव इतिहास के इस मुहाने पर नहीं हुआ होता तो न जाने आगामी पीढियाँ किस सांस्कृतिक चेतना की अनुगामिनी बन गई होती। बहुत सीधे-सरल शब्दों में आचार्य शंकर ने धर्म, संस्कृति और अध्याम की बातें सामान्य जन तक पहुँचाई। उपाध्याय जी ने उनकी इस व्यावहारिक ऋजुता और शास्त्र संबंधी व्यावहारिकता को जीवन में उतारने की कला को अद्भुत बताया है- ‘‘वे शब्दों के पीछे नहीं थे, व्यवहार के पीछे थे। सूखे तर्क का उन्होंने कभी सहारा नहीं लिया। इसलिए नहीं कि वे तर्क करना नहीं जानते थे अथवा उनके सिद्धांत तर्कसम्मत नहीं थे किंतु इसलिए कि कर्मण्यता का पौधा तर्क की मरुभूमि में नहीं, किन्तु भावना की उपत्यका में लहलहाता है, शब्दों का जंजाल तो व्यवहार को किंकर्तव्यविमूढ बना देता है। अतः शब्दाडंबर से वे कोसो दूर रहे।’’
केरल से चलकर देश के चारों कोनों पर उन्होंने मठों की स्थापना ही नहीं की, अपितु धर्म के चार लोकों का सृजन कर दिया। केरल, तमिलनाडु, आंध*, कर्नाटक के लोग काशी, मथुरा, वृंदावन, केदारनाथ इत्यादि स्थलों पर उन्हीं देवों की आराधना करते हैं जिन्हें स्थानीय लोग भी पूजते हैं। केरल का लेखक हिमालय और उत्तराखण्ड का लेखक जब केरल का वर्णन करता है तो पंडित जी संस्कृति की इसी चेतना पर रीझ जाते हैं। राष्ट्रीय एकता के ये भाव संस्कृति मार्ग से ही प्रवेश करते हैं। शंकराचार्य की उदारता में बौद्धों के धर्म सिद्धांत भी समाहित हैं पर राष्ट्रीयता और देश की सुरक्षा के प्रश्ा*, बौद्धों की आत्मधाती अहिंसा को वे निरर्थक व निष्प्रयोजन बताते हैं। बौद्ध भिक्षु से तर्क-वितर्क करते हुए कहते हैं-‘‘भगवान मरे ही पूर्वज थे। उनकी सीहृदयता, मानव कल्याण की भावना, समाज के दुःख दूर करने की उत्कंठा अपने ध्येय के लिए कठिन से कठिन जीवन व्यतीत करने की तैयारी, उनका तप, वैराग्य, शीत तथा जिज्ञासु वृत्ति किसके लिए अनुकरणीय नहीं होगी...पर आज तो मालूम होता है कि उनकी भावना हमें छू भी नहीं गई है। हम अपनी इन आँखों से शकों और हूणों के अत्याचार नहीं देखते? इन पाशविक कृत्यों को देखकर हमारा हृदय क्यों नहीं रोता? सूनी आँखों में क्या अपने इन बंधुओं के दुःख के लिए दो आँसू भी शेष नहीं रहे।’’
पं. दीनदयाल की दृष्टि इन रचनाओं में दो बिंदुओं पर अधिक केन्द्रित की गई है। पहला राष्ट्रभक्ति, संगठन की महत्ता और दूसरा विराट सांस्कृतिक चेतना। एक के प्रतिनिधि चाणक्य और चंद्रगुप्त हैं तो दूसरे के जगद्गुरु श्री शंकराचार्य। सांस्कृतिक परम्परा में ऋषियों का चिंतन और संतों की पुकार है तो राष्ट्रभक्ति में पराक्रमशाली यौद्धाओं का यशोगान। पण्डित जी का विश्वास है कि किसी भी राष्ट्र को राष्ट्र तभी कहा जा सकता है जब उसमें शौर्य पराक्रम, आत्मबल हो और साथ ही संस्कृति की बहती वेगवान धारा हो। भारत इसका प्रतिनिधित्व सहस्त्रों वर्षों से कर रहा है। आचार्य का बुद्धि कौशल और पराक्रमी का शौर्य ही राष्ट्र की रक्षा कर सकता है। इसीलिए वाल्मीकि और रामचंद्र, व्यास और श्री कृष्ण, याज्ञवल्क्य और जनक, रामदास और शिवाजी, चंद्रगुप्त और चाणक्य का युग्म उनकी पुस्तकों का निहितार्थ बन गया है।