शंकर का जीवन और दर्शन :उपन्यास में

देवर्षि कलानाथ शास्त्री


अनेक शताब्दियों पूर्व भारत में अवतीर्ण हुए जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ऐसी कालजयी विभूति हुए हैं, जिन्होंने भारत का इतिहास बदल दिया, जिनकी कथनी और करनी दोनों ने देश पर इतना बडा ऋण छोडा है जिसे चुकाया नहीं जा सकता, ये दोनों युगों तक अमर रहेंगी। कथनी से मेरा तात्पर्य है उनका लेखन, उनका दर्शन, उनका साहित्य, केवलाद्वैत का वह सिद्धांत, उस पर लिखे ग्रन्थ तथा सैकडों वे स्तोत्र जो आज भी जीते जागते लगते हैं। करनी से तात्पर्य है उनका सक्रिय जीवन, समूचे भारत में घूम-घूमकर चारों दिशोंओं में तीर्थों और पीठों की स्थापना और भारतीय धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्रीय एकता के लिए इस धरती की महिमा की प्रतिष्ठा। यह सब एक महापुरुष केवल बत्तीस वर्ष के जीवनकाल में कर डाले तो वह क्या अलौकिक शक्ति नहीं है! अजूबा नहीं है!!
सुदूर दक्षिण, केरल में जन्मा एक प्रतिभाशाली बालक देशभर में घूमता है, मध्यप्रदेश में गोविन्द भगवन्पाद से दीक्षा लेता है, हिमालय में तपस्या करता है, मिथिला में शास्त्रार्थ करता है। चारों दिशाओं म शंख फूँक कर बौद्धों के दबदबे को अलक्षित कर देता है। राष्ट्र की गरिमा का ध्वज फहरा देता है। ऐसा व्यक्तित्व किसे मन्त्रमुग्ध नहीं कर लेगा? तभी तो गत शताब्दियों में शंकराचार्य के जीवन पर विभिन्न भाषाओं में इतना साहित्य लिखा गया है जिसका अभिलेखन अति कठिन है। माधवचार्य जैसे विद्वानों ने ‘‘शङ्करदिग्विजय’’ जैसे महाकाव्य संस्कृत मे लिखे हैं, ‘‘शङ्करजीवनाख्यानम्’’ जैसे अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हैं। हिन्दी में उन पर अनेक जीवनियाँ, ग्रन्थ, उपन्यास लिखे गए हैं। दीनदयाल उपाध्याय का उन पर लिखा उपन्यास प्रसिद्ध है। विद्वद्वर जनार्दन राय नागर ने तो उनके जीवन पर आठ विशाल भागों में उपन्यास लिखा है। संस्कृत की बहुचर्चित और पुरस्कृत फिल्म ‘‘आदिङ्कराचार्य’’ ऐयर साहेब ने बनाकर एक कीर्तिमान रच दिया था। दक्षिण भारत में अनक ऐसे प्रतिष्ठान हैं जहाँ से शङ्करदर्शन के ग्रन्थ प्रकाशित होते रहते हैं। वर्षों पूर्व प्रकाशित ‘‘अद्वैतग्रन्थकोश’’ में शताब्दियों से अद्वैत पर लिखे और प्रकाशित सैकडों ग्रन्थों की जो जानकारी प्रसारित हुई उसे देखकर मैं दंग रह गया था। शंकरदर्शन पर हजारों ग्रन्थ और लाखों पृष्ठ लिखे जा चुके हैं, लिखे जा रहे हैं।
शंकराचार्य का अवदान
क्या थी इस अद्भुत विभूति की कथनी और करनी जिसने देश में युगान्तर ला दिया? इसका आकलन कार्य सरल नहीं है। शंकराचार्य के स्थितिकाल के बारे में ही इतने मत-मतान्तर हैं जितने अन्य किसी महापुरुष के बारे में नहीं सुने गए। इनका काल ईसवी पूर्व छठी शताब्दी से लेकर ईसा की नवीं शताब्दी तक विभिन्न विद्वानों ने बताया है। इस विवाद को न छुआ जाए तो भी इनका हमारे देश को जो अमूल्य अवदान है उसे दो-तीन धाराओं के आधार पर भलीभाँति समझा जा सकता है। वे शताब्दियाँ भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायियों के प्राबल्य की थी। सम्राट से लेकर ग्रामवासी तक बौद्ध के चिंतन के प्रभाव में थे। सम्राट कनिष्क से लेकर कुछ शताब्दियों तक चिंतन में, दर्शन में, समाज में, शासन में, सर्वत्र जैन और बौद्ध मत हावी था। जैन और बौद्ध अनीश्वरवादी दर्शन हैं यह तथ्य सुविदित है। हमारे यहाँ कट्टरता और पूर्वाग्रह के न होने के कारण भारतीय दर्शन सभी प्रकार के दार्शनिक चिन्तनों का समन्वय करके चलता है, सबकी जानकारी रखना, खण्डन-मण्डन करना हमारे बुद्धिजीवी करते रहे हैं, ‘‘वादे वादे जायते तत्त्वबोध’’ उनका मानना रहा है। तभी तो चार्वाक, जैन, बौद्ध, जैसे निरीश्वरवादी और अनात्मवादी दर्शन भी हमारे यहाँ फले-फूले हैं। और तो और, हमारे छह दर्शनों में जो न्याय, वैशैषिक, मीमांसा, वेदान्त, सांख्य और योग गिनाए जाते हैं उनमें वैशेषिक, मीमांसा और सांख्य भी ईश्वर को नहीं मानते। वैशेषिक परमाणुओं से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति मानता है, सांख्य और मीमांसा भी ईश्वर को जगत् का स्रष्टा नहीं मानते। न्याय ईश्वर को मानता है किन्तु उसके भी अनेक आचार्य यह चमत्कारी दलील देते हैं कि ईश्वर संसार का निर्माता है किन्तु ईश्वर का निर्माता कौन है! इसका उत्तर है मानव की बुद्धि अर्थात् जगत को किसी ने अवश्य बनाया होगा इस अनुमान का प्रमाता मानव ही तो है। अस्तु।
शंकराचार्य ने जिस अद्वैत वेदान्त की प्रतिष्ठा गौडपादाचार्य और गोविन्दभगवत्पाद के दार्शनिक प्रस्थानों का विकास करके की उसमें इस देश की माटी की महक को अमिट रखने का भी ध्यान रखा! ईश्वर को न मानकर, आस्था और भक्ति को दूर रखकर केवल दर्शन की भित्ति पर जनमानस को सुरक्षित रखने वाला किला नहीं बनाया जा सकता, यही मानते हुए किसी आराध्य को भी साथ में रखना होगा इसका ध्यान रखा। तभी तो बौद्धों की तरह जगत को मिथ्या और दृश्य वस्तुओं को अनित्य मानने वाले शंकराचार्य ने ‘भज गोविन्दम्’ जैसे शतशः स्तोत्र लिखे, देश के कोने-कोने में पीठों की स्थापना द्वारा आराध्य के मूर्त स्वरूप को भी मान्यता दी। यह समन्वय उनकी अपूर्व देन थी।
दर्शन-सिद्धांत
बौद्ध दर्शन समस्त दृश्य पदार्थों को क्षणिक और शून्य मानता है। बाह्यजगत केवल हमारी प्रतीति मात्र है, हमारे न होने पर जगत् कहाँ रहता है। अतः जगत तो शून्य है, क्षणिक है, हमें लगता है कि हम नहीं तो जगत भी नहीं। इसे ‘‘प्रतीत्यसमुत्पाद’’ सिद्धांत तथा ‘‘दृष्टिसृष्टिवाद’’ कहा गया। जब ये सब पदार्थ हैं ही नहीं, तो हमारी नदियाँ, पहाड, हमारे तीर्थ, हमारा देश सब मिथ्या है, फिर कैसी देशभक्ति, कैसे तीर्थ? कैसी गंगा माता? इस खतरे को शंकराचार्य ने भाँप लिया था कि ऐसी जो मान्यताएँ प्रचलित हो गई हैं उनसे अराजकता फैलेगी। ऐसी ही अराजकता बहुदेववाद से भी फैलेगी। कोई किसी को पूजेगा, कोई किसी को। यद्यपि वेद यह मानते हैं कि सूर्य,चन्द्र, पृथ्वी, इन्द्र, वरुण आदि सभी देवता हैं किन्तु वह बहुदेववाद नहीं है, सिद्धिविशेष के लिए देव विशेष की आराधना ‘‘एकैकाधिदेववाद’’है,।।द्गठ्ठश्ाह्लद्धद्गद्बह्यद्व श्चश्ाद्य4ह्लद्धद्गद्बह्यद्व नहीं है। किन्तु किसी एक ईश्वर की आराधना हम सबको जोडने में सहायक होगी यह धारणा हमारे तत्वचिन्तकों की बन गई थी। इसीलिए वेदान्त ने एकेश्वरवाद को बल दिया, एक ऐसी सत्ता की प्रतिष्ठा का सिद्धान्त स्थापित किया जिसने हम सबको पैदा किया है, सारे जगत् को पैदा किया है। इसका प्रारंभ वेद से ही हुआ किन्तु उसका स्पष्टीकरण वेद के बाद हुआ अतः ‘’वेदान्त’’कहा गया।
यह सिद्धांत उपनिषदों में मिलता है कि किसी एक तत्त्व ने, एक शक्ति ने, समाज जगत को सभी प्राणियों को पैदा किया है, सर्वप्रथम वही शक्ति थी और अन्त में भी वही रहेगी।
‘‘यतो वा इमानि भूतनि जायन्ते, येन जानानि जीवन्ति, यत् प्रयन्ति, अभिसंविशन्ति। तद् ब्रह्म। तद् विजिज्ञासस्व।’’
यह उपनिषद का घंटा-घोष है कि उस शक्ति को ब्रह्म कहा जाता है जो परम पुरुष है, परात्पर शक्ति है। इसी को लेकर बादरायण व्यास ने ब्रह्मसूत्र लिखा। गीता में भी एक ही ईश्वर बताया गया है। इस सिद्धांत की स्थापना देश को मजबूत करेगी। इस दृष्टि से शंकराचार्य ने इन तीनों पर भाष्य लिखे- उपनिषदों पर, ब्रह्मसूत्र पर, गीता पर। इन तीनों को प्रस्थानत्रयी कहा गया। इन पर भाष्य लिखने की जो परम्परा शंकराचार्य ने चलाई वह वेदान्त दर्शन के सभी संप्रदायों ने कायम रखी। शंकराचार्य ने वेदभाष्य नहीं लिखे किन्तु वेद में उल्लिखित गंगा, सरस्वती आदि नदियों को, हिमाचल आदि पर्वतों को और हमें चारों और से रक्षा देने वाले समुद्र को सम्पूर्ण श्रद्धा दी। वे पूरे देश में घूमे और चारों कोनों में चार पीठ स्थापित कर उनमें भारतीय वेदान्त दर्शन और हमारी मान्यताओं की परम्परा की दृढता की व्यवस्था की, शास्त्रार्थ कर उन्होंने बौद्धों को पराजित किया जो ईश्वर को नहीं मानते थे। उन मीमांसकों को भी पराजित किया जो ईश्वर को नहीं मानते थे। शंकराचार्य और मंडन मिश्र का वह शास्त्रार्थ जो जनमानस में भी रचा-बसा हुआ है, जिसमें मंडन मिश्र की पत्नी अभय भारती को निर्णायक बनाने की कथा भी आती है और मण्डन मिश्र के हारने के डर से स्वयं भारती से शास्त्रार्थ में जीतने के लिए शंकराचार्य के किसी राजा के शरीर में प्रवेश करने, और लौटकर शास्त्रार्थ में जीतने की कथा भी आती है। मंडन मिश्र के उनके शिष्य बन जाने की कथा भी आती है, उनके द्वारा मंडन मिश्र को सुरेश्वराचार्य बनाकर एक पीठाधीश बनाने की कथा भी आती है, सुपरिचित है और शंकराचार्य के जीवन पर लिखे काव्यों और उपन्यासों की वह संजीवनी भी बन जाती है।
बौद्धदर्शन और शंकर दर्शन का सूक्ष्म अन्तरः
इस प्रकार संसार को अनित्य और जगत को मिथ्या मानने का सिद्धान्त स्थापित करते हुए भी, दृश्य जगत को माया मानते हुए भी शंकराचार्य ने जगत् के कारण के रूप में जिस ब्रह्म को देखा, जिसकी आराधना की परंपरा चलाई उसने भारतीय सांस्कृतिक चेतना को अमरता प्रदान की अन्यथा पूरा भारत बौद्ध हो गया होता। शंकराचार्य का सिद्धांत है ‘‘श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः। ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नाऽपरः।।’’
‘‘ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव ब्रह्म का ही अंश है, दोनों एक ही तत्त्व है यही अद्वैत है। यह श्लोक सदानन्द यति ने लिखा था जो अमर हो गया। जगत को मिथ्या मानना बौद्ध सिद्धान्त के अनुरूप है अतः शंकराचार्य को ‘‘प्रच्छन्न बौद्ध’’ भी कहा गया। उनके दादा गुरु को भी प्रच्छन्न बौद्ध कहा गया। फिर बौद्धों से हटकर उनकी स्थापना क्या है? वह है ‘‘जगत्कर्तृत्वसिद्धान्त’’। बौद्ध और वैशेषिक, मीमांसक दर्शन आदि जगत् के किसी एक कर्ता को नहीं मानते जिसे ‘‘ब्रह्मा’’ या ‘‘ईश्वर’’ का नाम दिया जा सके। वह काम शंकराचार्य ने किया जिससे आजतक समूचे भारत की श्रद्धा का (ईश्वर की श्रद्धा का) का झरना निरंतर बह रहा है, जिसके कारण कुम्भ मेले भरते हैं जिसमें लाखों करोडों भारतीय शताब्दियों से एकत्रित होकर राष्ट्रीय एकता को भी अमरत्व प्रदान करते हैं और सनातन धर्म को भी सनातनता प्रदान करते हैं। यह है शंकराचार्य की करनी जो उनकी कथनी को अर्थात शंकराचार्य के लिखे बताए जाने वाले असंख्य ग्रंथों, भाष्यों, स्तोत्रों को जीवन्त स्वरूप में विश्व के सम्मुख अमर कर देती है।
उपन्यास में शंकराचार्य की प्रस्तुति
इस देश की अमर विभूति आचार्य शंकर के इस विवरण से स्पष्ट हो गया होगा कि गत अनेक शताब्दियों में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से संबद्ध तथ्यों पर जनश्रुतियों, चमत्कारी मान्यताओं, किंवदन्तियों आदि की अनेक परतें चढ गई थीं। उनकी कथनी और करनी दोनों पुराणाख्यानों के रूप में प्रसारित हो चुकी थीं। समूचे उपाख्यान में कुछ ऐतिहासिक तथ्य थे, कुछ चमत्कारी किंवदन्तियाँ। उनका जीवनाख्यान लिखने वालों के सामने सबसे बडी चुनौती यही होती थी कि वे ऐतिहासिक तथ्यों की पडताल करें या समूचे उपाख्यानों को अभिलिखित करें।
दीनदयाल उपाध्याय जी ने इस चुनौती को सहज रुप से स्वीकार करते हुए मध्यम मार्ग चुना। चूँकि वे अपने उपन्यास ‘‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’’ का कलेवर विशाल नहीं बनाना चाहते थे, प्रत्येक पाठ में शंकराचार्य के उस अवदान से परिचित हो सके जो उन्होंने भारत की राष्ट्रीय एकता को दिया है, इस उद्देश्य से संक्षेप में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को अभिलिखित करना चाह रहे थे अतः उन्होंने शंकर के जन्म से लेकर निर्वाण तक की कथा को सौ-सवा सौ पृष्ठों में समाहित कर दिया और इतिहास की सम्पूर्णता पर विशेष दृष्टि रखी। एक इतिहासकार कुछ प्रचलित किंवदन्तियों का संकेत तो करता है किंन्तु उन पर दो प्रकार से दृष्टिपात करता है। एक मार्ग तो यह है कि वह उन्हें तथ्य न बताकर लाकेमान्यता के रुप में ही चित्रित करे, उसकी तह में जाकर यह परखे कि ऐसी किंवदन्ति क्यो प्रचलित हुई।
उपाध्याय जी ने शंकराचार्य के जीवन से जुडी अनेक मान्यताओं पर दूसरा मार्ग अपनाते हुए अत्यन्त सन्तुलित दृष्टि रखी है। उदाहरणार्थ वह कथा लें, जो यह कहती है कि बालक शंकर संन्यास लेना चाह रहा था किंन्तु उसकी माता अनुमति नहीं दे रही थी। तब उसने यह नाटक किया कि नदी में स्नान करते समय चिल्लाया कि मगर ने उसे पकड लिया है, यदि माता संन्यास की आज्ञा देगी तो वह छोड देगा। इस पर माता ने आज्ञा दे दी। उपाध्यायजी को इस घटना पर विश्वास नहीं है, यह स्पष्ट है किन्तु इसे उद्घृत न करना अधूरापन रहेगा यह भी वे जानते हैं। अतः इस घटना का विवरण देकर उस पर वे प्रश्ा*चिन्ह लगाते हैं और राष्ट्रहित में गृहस्थ का बंधन छोडने का उद्देश्य लेकर चलने वाला मनस्वी बालक ऐसा नाटक कर भी सकता है यह कहकर इस चमत्कारी घटना को नकारते नहीं। ऐसी अनैतिहासिक करिश्मों वाली घटनाओं को भी वे अभिलिखित अवश्य कर देते हैं कि एक गरीब परिवार से भिक्षाटन करते समय उसकी गृहणी ने जब उन्हें केवल एक आँवला देकर अपना दारिद्*य स्पष्ट किया तो उसकी दरिद्रता दूर करने हेतु उन्होंने पडौस के एक धनपति को लज्जित किया और उस सेठ ने उस गरीब ब्राह्मण का घर सोने के आँवलों से भर दिया। यह कथा केवल किंवदन्ती है किन्तु उपाध्यायजी ने इसे भी अभिलिखित किया है।
उपन्यास का शिल्प
उपन्यास की विशेषता यह है कि इसमें शंकराचार्य के जीवन की समस्त घटनाएँ ज्यों की त्यों अठारह परिच्छेदों में अभिलिखित कर दी गई है। उपन्यास की शैली में कथा कहते हुए कथोपकथनों में घटनाओं को बाँधते हुए, आचार्य की जीवनयात्रा कथाप्रवाह की निरन्तरता के साथ बयान की है किन्तु शंकराचार्य का दर्शन किस प्रकार वैदिक दर्शन से भी अलग है और बौद्ध दर्शन से भी, इन दार्शनिक गुत्थियों को भी उन्होंने घटनाओं और कथोपकथनों में निबद्ध कर दिया है।
इस लेख में जैसा प्रारम्भ में सूचित किया गया है, मीमांसा दर्शन जो वैदिक यज्ञ संस्कृति का प्रतिष्ठापक है, आहुतियों से, यज्ञकर्म से देवों को प्रसन्न करना है, जिसके दिग्गज विद्वान् कुमारिल भट्ट और मण्डन मिश्र शंकराचार्य के समय में थे वह ‘एक ईश्वर’ को नहीं मानता पूजा और भक्ति को नहीं मानता। दूसरी ओर बौद्ध दर्शन निरिश्वरवादी तो है ही, वेदों और यज्ञों को भी नहीं मानता। उपन्यास के ग्यारहवें और बारहवें परिच्छेद में इन दोनों दर्शनों के सिद्धांतों को कथोपकथनों के द्वारा समझा दिया गया है और दोनों की बजाय वेदान्त को गुरुतर सिद्ध किया गया है। शंकराचार्य मण्डन मिश्र को समझाते हैं कि मीमांसा भी जिन यज्ञ-यागादि की वकालत करती है वे साधन हैं, साध्य नहीं। परम तत्त्व का स्त्रोत है हमारा साध्य। इन दो परिच्छेदों को पढते ही स्पष्ट होने लगता है कि उपाध्याय जी साहित्य के माध्यम से इन दोनों दर्शनों का प्रत्याख्यान कर शांकरवेदान्त की महिमा समझाने का कार्य भी इस उपन्यास द्वारा कर रहे हैं।
यह सब होते हुए भी समूचा उपन्यास इस केन्द्रीय लक्ष्य पर दृष्टि रखता है कि किस प्रकार शंकराचार्य ने अपनी कथनी और करनी से हमारी राष्ट्रीय एकता को अक्षुण्ण रखने का कार्य किया, इस देश की धरती को उनकी अमर देन किस प्रकार आज भी प्रेरणा दे सकती है यह बात यह उपन्यास स्पष्ट कर देता है।
संस्कृत मूल उद्धृत
शंकराचार्य के जीवन की विविध घटनाएँ संस्कृत के महाकाव्यों तथा अन्य अभिलेखों में जिस प्रकार वर्णित हैं वे उपन्यास में भी सम्मिलित हो जाएँ इसका ध्यान उपन्यासकार ने रखा है। तभी तो कुछ घटनाओं के विवरण के साथ संस्कृत के वे पद्य भी अभिलिखित हैं जो या तो शंकराचार्य के लिखे माने जाते हैं या तत्कालीन पंडित समाज में बहुचर्चित रहे हैं। उदाहरणार्थ उस घटना का विवरण देते हुए जब शंकराचार्य के गुरु गोविन्द भगवत् पाद बदरिकाश्रम गये थे और वर्षा ऋतु में मूसलाधार वृष्टि के कारण नर्मदा में बाढ आ गई थी, उपन्यासकार शंकराचार्य द्वारा की गई बाढ विस्थापितों की पुर्नवास सेवा का तो वर्णन करता ही है, शंकराचार्य कृत नर्मदाष्टक के ९ पंद्य को भी ज्यों के त्यों उद्धृत करता है- ‘‘त्वदीय पादपङ्कजं नमामि देविनर्मदे!’’
(छठा परिच्छेद)
इसी प्रकार समस्त भारत की यात्रा के प्रसंग में शंकराचार्य ने गंगा की स्तुति में जो गंगास्त्रोत लिखे उसके वे पद्य भी ज्यों के त्यों ९वें परिच्छेद में उद्धृत हैं। मण्डन मिश्र से शंकराचार्य का जो शास्त्रार्थ अत्यन्त प्रसिद्ध और बहुचर्चित रहा है उसकी घटना को वर्णन करते हुए भी उपन्यासकार उन बहुचर्चित पद्यों को ज्यों का त्यों उद्धृत करता है जो मंडन मिश्र जैसे उद्भट विद्वान के घर में टँगे पिंजरों में पल रहे तोतों के द्वारा दार्शनिक सिद्धांतों की ध्वनि करने की ह्रदयाकर्षक स्थिति का वर्णन करते हैं- ‘‘स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं कीराङ्गना यत्र गिरो गृणन्ति।’’ आदि।
इस प्रकार यह उपन्यास साहित्य, इतिहास, दर्शन और राष्ट्रभक्ति की विभिन्न धाराओं के संगम का प्रवाह भी प्रस्तुत करता है और जीवनी तथा उपन्यास दोनों के शिल्प का प्रतिनिधित्व कर प्ररेक पठनीय सामग्री भी प्रस्तुत करता है।