दीनदयाल जी के उपन्यास

डा मथुरेश नंदन कुलश्रेष्ठ


दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद किसी विशिष्ट विचारधारा या व्यक्ति विशेष के चिंतन की प्रतिक्रिया में उभरकर सामने नहीं आया। यह उनका विज्ञान के आतंकित कर देने वाले आविष्कारों के भयंकर भौतिकवादी तूफान के बीच भारत की अपनी जडों को पहचान कर सीधे खडे रहने का प्रयास है। कार्ल माक्र्स और सिगमंड फ्रायड की विचाराधारा ने भारत को भी झकझोरा परन्तु जनमानस विचारधारा की अपेक्षा वैज्ञानिक खोजों से प्राप्त दैनिक व्यवहार में उपकरणों के माध्यम से अध्यात्म की ओर से उदासीन होकर भौतिकवाद की ओर उन्मुख हो रहा था। यद्यपि उसमें श्रद्धा के स्थान पर तर्क पर विश्वास बढ रहा था परन्तु फिर भी उसने धर्म को पकड रखा था। उधर केवल सुशिक्षित जगत को प्रभावित करने वाले माक्र्स के दर्शन की तुलना में गांधी जी का दर्शन जनमानस को अधिक प्रभावित कर रहा था जिसके सिद्धान्त माक्र्स से एकदम उलटे थे। उत्पादन के क्षेत्र में टैक्नोलॉजी के महत्त्व पर बल देने वाला विकासवादी माक्र्स जहाँ संघर्ष में विश्वास करते हुए हिंसा के सहारे एक वर्ग को समाप्त करके समानता लाना चाहता था वहाँ गांधी जी ग्राम स्वराज्य में विश्वास करते हुए ग्रामोद्योगों को बढावा देकर प्रतियोगिता और हिंसा के स्थान पर सहकारिता व अहिंसा द्वारा अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करना चाहते थे। दोनों का अन्तिम लक्ष्य एक ही था-राज्य-विहीन विश्व समाज की स्थापना करना। इतिहास गवाह है कि गांधीवाद के विशुद्ध भारतीय, धार्मिक और मानवता के अधिक निकट होते हुए भी टैकनोलॉजी का सामना कर पाना उसके लिए संभव नहीं था। नेहरू जी का औद्यौगीकरण अधिक सफल हुआ। यद्यपि दीनदयाल जी के समय में और उसके कुछ दिनों बाद तक विदेशी यात्राओं से प्रभावित तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवियों पर माक्र्सवादी चिन्तन छाया रहा। जिसका थोडा बहुत प्रभाव आज भी है। परन्तु रूस के पराभव के पूर्व ही यह चिन्तन अपने ही अन्तर्विरोधों से ध्वस्त हो गया। परन्तु आम आदमी वैज्ञानिक उत्पादों के साथ समायोजित होकर भारतीय जीवन जीना चाहता था। प्रत्येक जागरूक व्यक्ति में कोई उपयुक्त मार्ग ढूंढने की इच्छा थी। दीनदयाल जी भविष्य के इस स्वरूप के प्रति सजग थे। उनका वैशिष्ट् है कि वे अपने द्वारा ‘एकात्म मानववाद’ के चिन्तन के रूप में एक समाधान ढूंढ पाये। परन्तु यह दर्शन एक दिन में सहज ज्ञान के रूप में (द्बठ्ठह्लह्वह्लद्बश्ाठ्ठ) फूट पडा हो, ऐसा नहीं है। यह उसके सतत अध्ययन और चिन्तन का परिणाम है। इस चिन्तन की प्रथम कडी के रूप में उनके दो उपन्यास सामने आये- १. सम्राट चन्द्रगुप्त (१९४६) २. जगद्गुरु शंकराचार्य (१९४७)।
सम्राट चंद्रगुप्त
दीनदयाल जी के उपन्यास ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ के पूर्व इस विषय पर तीन ध्यानाकर्षक साहित्यिक कृतियाँ प्राप्त होती हैं-
१. पाँचवी शताब्दी में विशाखदत्त द्वारा लिखित संस्कृत नाटक ‘मुद्राराक्षसम्’
२. द्विजेन्द्र लाल राय द्वारा १९११ में बंगला में लिखा नाटक ‘चन्द्रगुप्त’। और
३. जयशंकर ‘प्रसाद’ द्वारा १९३१ में लिखा गया
नाटक ‘चंद्रगुप्त’।
४. ‘मुद्राराक्षसम्’ में लेखक का उद्देश्य यह है कि यदि राक्षस जैसा राजनीति धुरन्धर एवं स्वामिभक्त व्यक्ति चन्द्रगुप्त का मंत्रित्व स्वीकार कर ले तो चन्द्रगुप्त का राज्य अटल हो जाये और भारत एक शक्तिशाली राजा के अधीन संगठित एवं अखण्ड रूप में आ जाये। नाटक की कथा प्रत्यक्षतः चाणक्य और राक्षस के बीच चलने वाली राजनैतिक चालों को प्रस्तुत करती है और उसी के कारण यह उपन्यास अत्यधिक रोचक बन गया है। उसमें सिकन्दर और सिल्यूकस के प्रसंग सर्वथा अनुपस्थित हैं। नाटक का प्रारम्भ ही चंद्रगुप्त के सम्राट बन जाने के बाद से होता है। कथानक में प्रधानता चन्द्रगुप्त की नहीं चाणक्य की है। उसी को इस नाटक का नायक माना गया है। कुछ विद्वान नामकरण के आधार पर राक्षस को ही नायक मानते हैं। तात्पर्य यह कि इस नाटक का प्रधान कार्य या उद्देश्य राक्षस को चन्द्रगुप्त का मंत्री बनाना है न कि भारत की अखण्डता स्थापित करना और विदेशी आक्रमणकारियों की पराजय का चित्रण करना। यहाँ पराजय राक्षस की है जो एक महत्वपूर्ण राजनैतिक उपलब्धि को उद्देश्य के रूप में प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य दीनदयाल जी के उद्देश्य से बिलकुल मेल नहीं खाता। उन्होंने अपने उपन्यास में राक्षस को बहुत कम महत्त्व दिया है। यह नाटक उच्चकोटि के संस्कृत विद्वानों के अध्ययन का विषय बना रहा। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ और ‘मेघदूतम्’ जैसी कृतियों की तरह लोकप्रिय न बन पाया।
द्विजेन्द्र लाल राय द्वारा १९११ में बँगला में लिखे गए नाटक ‘चन्द्रगुप्त’ में मुख्य कथा चन्द्रगुप्त-चाणक्य-मुरा-नन्द की है। सेल्यूकस, एण्टोगोनस और हेलेन प्रासांगिक कथा के रूप में सामने आते हैं। दोनों कथाएँ समानांतर चलती हैं। समन्वय-बिन्दु चन्द्रगुप्त और हेलेन का विवाह है जो इस उद्देश्य का निर्वाह नहीं कर पाया है। घटना क्षेत्र यूनान अफगानिस्तान और भारत हैं। इस नाटक की कथा में भी चाणक्य का चरित्र इतना प्रधान हो उठा है कि चन्द्रगुप्त का चरित्र उभर नहीं पाया है। नाटककार की दृष्टि इतिहास के साथ-साथ मानव मनोविज्ञान पर भी है। जिसके कारण कल्पना के प्रचुर प्रयोग से कथा में करुणासिक्त स्थल उभर आये हैं। यह नाटक भारत की एकात्मता और अखण्ड साम्राज्य जैसे उद्देश्यों को प्रमुखता प्राप्त नहीं करा सका है और एक चरित्र प्रधान नाटक बनकर रह गया है।
श्री जयशंकर प्रसाद द्वारा १९३१ में लिखित ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक का मूल स्वर यद्यपि राष्ट्रीय है। इसके कुछ गीत भी राष्ट्रवादी स्वर का समाहार करते हैं। एक अखण्ड भारत की स्थापना करना ही इसका भी उद्देश्य है। यह नाटक यूनान और भारत की संस्कृति के संघर्ष को सीधे-सीधे मानी देता है। निश्चित ही यह एक नमन योग्य साहित्यिक कृति है। इसका अपना गौरव है और हिन्दी साहित्य की यह एक चमकती हुई कृति है। नमन योग्य होते हुए भी यह कृति उन उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करती जो दीनदयाल जी को अभीष्ट थे। चार अंको को ४७ दृश्यों में समेटने वाले इस नाटक के १७५ पृष्ठ २४ पुरुष पात्रों और ११ स्त्री पात्रों तथा १३ गीतों को प्रस्तुत करते हैं। कुछ तीन दर्जन से अधिक पात्र हैं। पात्रों के नाम रूप और पारस्परिक सम्बन्धों को समझाने के लिए कम से कम तीन बार इसका पाठ करना आवश्यक है। संस्कृत गर्भित भाषा और मंचन की दृष्टि से उदाहरण इस प्रकार का है कि काशी में जब प्रथम बार इसका मंचन हुआ तो प्रथम अंक की समाप्ति तक नाट्य शाला में तीन ही व्यक्ति दर्शक के रूप शेष रह गए थे- १. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल २. निराला और ३. स्वयं जयशंकर ‘प्रसाद’। इस नाटक में चन्द्रगुप्त की तीन-तीन प्रमिकाएँ हैं- १. मालविका २. कल्याणी और ३. कार्नेलिया। द्विजेन्द्र लाल राय की तरह इस नाटक में भी चाणक्य सुवासिनी की प्रेम-गाथा का स्पर्श है। तात्पर्य यह कि ये दोनों नाटक चन्द्रगुप्त और चाणक्य को केन्द्र में रखने के बाद भी उन उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करते जो दीनदयाल जी को अभीष्ट थे। यदि दीनदयाल जी ने यह दोनों नाटक पढ भी लिए होते तो भी मानसिक ब्रह्मचर्य से युक्त उनकी साहित्यिक मेधा अपने लक्ष्य से भटक नहीं सकती थी।
उपन्यास के मनोगत में दीनदयाल जी ने स्पष्ट लिखा है कि उनके उपन्यास का नायक चंद्रगुप्त है- ‘‘प्रस्तुत पुस्तक में ऐतिहासिक तथ्यों के ढाँचे पर अपनी भाषा का रग चढाकर चन्द्रगुप्त का चरित्र लिखा गया है। नायक की ध्येय निष्ठा ने स्वयं ही इसमें प्राण-प्रतिष्ठा की है।’’ और यह भी कि प्रस्तुति का आधार शुद्ध ऐतिहासिक है। उसमें कल्पना का प्रयोग नहीं किया गया है- ‘‘योरोपियन विद्वानों द्वारा प्रयत्नपूर्वक एवं उनका अन्धानुकरण करने वाले भारतीयों द्वारा अनजाने में फैलाए गए अंधकार को नष्ट करने वाले ऐतिहासिक शोध के सूर्य प्रकाश में देखी हुई यह सत्य घटनाएँ हैं।’’ चन्द्रगुप्त को स्पष्टतः नायक घोषित करने के बाद भी दीनदयाल जी ने चाणक्य के महत्व को कम करके नहीं आँका है। उसे वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानते हैं परन्तु ‘उपोद्घात’ की अन्तिम पक्तियाँ एकदम असन्दिग्ध रूप से घोषणा करती हैं कि इस उपन्यास में सारा ध्यान चन्द्रगुप्त पर केन्द्रित किया गया है- ‘‘राष्ट्र शक्ति के निर्माता चन्द्रगुप्त और चाणक्य में से भुजबल का आश्रय लेकर प्रत्यक्ष पराक्रम करने वाले तथा अन्त में इस शक्ति के केन्द्र स्वरूप संसार में प्रकट होने वाले सम्राट चन्द्रगुप्त का यह पावन चरित्र है।’’ (पृष्ट-१३) सम्पूर्ण उपोद्घात चन्द्रगुप्त के सुशासन की व्यवस्था के विभिन्न पक्षों का विस्तार से वर्णन करता है। चन्द्रगुप्त के साम्राज्य के विस्तार और विश्वव्यापी प्रकृति को उजागर करने पर चाणक्य को छोड जाना उनके लिए संभव नहीं था। चन्द्रगुप्त के सुशासन की आधारशिला चाणक्य का अर्थशास्त्र है जिसके विषय में दीनदयाल जी का मत है- ‘‘आज के विज्ञान के साधनों के न होते हुए भी सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने शासन की आधुनिकतम प्रणालियों का उपयोग किया। यदि हम इसका पूर्ण विवरण जानना चाहते हैं तो हमको सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधान मंत्री, सहयोगी एवं गुरु विष्णु गुप्त कौटिल्य के अपूर्व ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ को पढना चाहिए। इसमें उन सब विषयों का वर्णन है जिनसे कोई राष्ट्र शक्तिशाली बन सकता है। इसमें किसी तत्ववेत्ता की मनः सृष्टि का काल्पनिक सिद्धांत नहीं है वरन् एक सूक्ष्मदर्शी यथार्थवादी विचारक तथा क्रांतिकारी कर्मयोगी के विचार हैं। राष्ट्र के उत्थान-पतन की विवेचना करके स्वयं राष्ट्र-निर्माण करने वाले कूट नीतिज्ञ तपस्वी के अनुभूत प्रयोग हैं। मनोविज्ञान, राननीति और अर्थनीति के वे सिद्धांत हैं जो व्यवहार की कसौटी पर कसे जा चुके हैं।’’ (पृष्ठ-१२)
यह सब लिखने की आवश्यकता इसलिए हुई कि मुद्राराक्षस और चन्द्रगुप्त शीर्षकधारी उपयुक्र्त नाटकों में से तीनों में ही यह प्रश्ा* जटिलता के साथ सामने आता है कि नायक चाणक्य है या चंद्रगुप्त। ‘मुद्राराक्षस’ के तो नामकरण में ही राक्षस शब्द का प्रयोग होने के बावजूद नायक चाणक्य है जबकि चन्द्रगुप्त फल का भोक्ता है। दीनदयाल जी के इस उपन्यास में इस भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं है।
भूमिका, उपोद्घात और मनोगत को छोडकर मूल उपन्यास की कथा १४ खण्डों में विभक्त है। प्रथम सात खण्डों में अलिक्सुन्दर के पराभव तक की कथा है और शेष सात में उसके बाद चन्द्रगुप्त के सम्राट बनने तक की कथा है। प्रथम दो खण्ड कुसुमपुर केन्द्रित हैं जिनमें क्रमशः नन्द की विलासिता और चन्द्रगुप्त की देशभक्ति तथा राक्षस द्वारा उसकी गिरफ्तारी सामने आती है। इसी में चन्द्रगुप्त के जेल से भाग छूटने की सूचना भी सामने आती है। चन्द्रगुप्त के चरित्र की विशेषताएँ इस द्वितीय खण्ड में अभिनव रूप से वर्णित हैं। आगे के दो खण्डों की कथा कुसुमपुर को छोडकर तक्षाशिला पर केन्द्रित हो गई है। जिनमें चाणक्य की राष्ट्र के प्रति चिन्ता, मगध से भाग कर आये चन्द्रगुप्त की उनसे भेट का वर्णन है जिसमें यह सूचना भी मिलती है कि विष्णुगुप्त चाणक्य और राक्षस तक्षशिला में एक साथ पढे हैं और उनमें परस्पर प्रेमभाव है। इन्हीं दो खण्डों में चाणक्य द्वारा यह योजना बनती है कि चन्द्रगुप्त तक्षशिला में रहकर अलिक्सुन्दर की शक्ति कम करेगा, उसके द्वारा जीते गए सभी राज्यों को भडकाकर उसके विरुद्ध सेना तैयार करेगा और चाणक्य मगध जाकर मगध की सेना तैयार कर लौटते हुए अलिक्सुन्दर पर हमला कर उसे दोनों ओर से प्रहार का बिन्दु बनाएगा। विष्णुगुप्त योजना बनाकर चन्द्रगुप्त को तक्षशिला छोड स्वयं मगध के लिए प्रस्थान करता है। पाँचवें और छठे खण्ड की कथा पुनः कुसुमपुर पर केन्द्रित होती है। चाणक्य राक्षस को साथ लेकर नन्द से उसके विलास-कक्ष में भेंट करता है। यह छठा खण्ड राष्ट्र चिन्तन और देशभक्ति से पूर्ण है। नन्द के विलास-कक्ष में ही चाणक्य की प्रतिज्ञा प्रस्तुत की गई है जिसमें प्रसाद द्वारा अपने नाटक में दरबार में कराई गई प्रतिज्ञा की उत्तेजना नहीं है-‘‘राजा (नन्द) के शब्दों ने आर्य चाणक्य की आशा को भंग कर दिया। अपमान भरे इन शब्दों से उनका हृदय बिंध गया। उनका सात्विक क्रोध भडक उठा। उन्होंने अपनी चोटी खोलकर प्रतिज्ञा की कि जब तक नन्द राजा का उच्छेद करके राष्ट्र-हितैषी एवं कर्तव्यनिष्ठ राजा को गद्दी पर नहीं बिठा दूंगा तब तक चोटी नहीं बाँधूगा। नन्द ने इसको ब्राह्मण का प्रकोप समझा और फिर एक बार नर्तकियों के साथ अट्टहास किया।’’ (पृष्ठ ३७-३८)
इस खण्ड में चाणक्य के ये वाक्य चाणक्य के राष्ट्र-चिन्तन और तत्कालीन स्थिति को प्रस्तुत करते हैं- ‘‘आज देश में वीरता है, शूरता है, अपनी स्वतंत्रता के लिए सब कुछ अर्पित करने की शक्ति है, परन्तु यदि कमी है तो बस एकसूत्र की जो सबको बाँध सके। अखिल भारतीय एकछत्र सम्राट् की जो सबको बाँध सके। यदि यह नहीं हुआ तो भारतवर्ष पर यवनों का आधिपत्य हमेशा के लिए हो जायेगा। इस बार अलिक्सुंदर लौट भी गया तो फिर कोई और आक्रमण कर देगा। क्या नन्द इस योग्य है? बोलो राक्षस, तुम ही बोलो।’’ (पृष्ठ ३८) सातवें खण्ड में चन्द्रगुप्त और चाणक्य के प्रयत्नों से अलिक्सुंदर की मृत्यु का वर्णन प्राप्त होता है- ‘‘इस प्रकार चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने मिलकर अलिक्सेन्द्र को न केवल भारत से निकाला ही वरन् निकालते-निकालते उसकी सेना का संहार भी किया और उसे मारने का प्रयत्न भी किया। बैबीलोन जाकर वह मर भी गया परन्तु उसने अपने सेनापति सेलेकस से भारत विजय की अभिलाषा को पूर्ण कराने की प्रतिज्ञा भी करवा ली।’’ (पृष्ठ ४२)
द्वितीयार्द्ध के सात खण्डों में चन्द्रगुप्त तथा नन्द के संघर्ष की कथा और उपन्यास के अन्तिम लक्ष्य चन्द्रगुप्त के राजा बनने तक की घटनाओं से भरा हुआ है। आठवें खण्ड में चन्द्रगुप्त और चाणक्य योजना बनाते हैं। इस खण्ड में पर्वतक का प्रसंग भी आता है। चन्द्रगुप्त जब नन्द से पूर्व पर्वतक से युद्ध करने का सुझाव देता है तो चाणक्य कहता है कि -‘‘नन्द और पर्वतक दो काँटे हैं। काँटे से ही काँटे को निकालना बुद्धिमानी का कार्य है।’’ (पृष्ठ ४५) इसी प्रकार चाणक्य द्वारा पर्वतक की विश्वासघातपूर्वक हत्या करने के सुझाव पर जब चन्द्रगुप्त प्रश्ा* करता है कि ‘‘पर्वतक के साथ इस प्रकार का विश्वासघात कहाँ तक ठीक होगा आर्य! मरे स्थान पर उसी को सम्राट बनने दीजिए एक छत्र साम्राज्य ही तो चाहिए, सम्राट फिर कोई भी क्यों न हो।’’ चाणक्य बडे निर्द्वन्द्व भाव से उत्तर देता है-‘‘पर्वतक जैसा स्वार्थी और महत्वाकांक्षी, फिर वह कितना ही वीर क्यों न हो, सम्राट बनने योग्य नहीं है।....तुम सम्राट बनने न बनने वाले कौन होते हो? आज देश को आवश्यकता है, तो तुम उसकी पूर्ति के लिए सम्राट बनोगे। कल आवश्यकता होगी तो तुम्हें उसके लिए भिक्षुक भी बनना पडेगा।’’ (पृष्ठ ४५-४६) यहाँ चन्द्रगुप्त का यह कथन भी उपन्यास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है- ‘‘पर हाँ, सर्वाङ्गपूर्ण देशभक्ति की कल्पना अभी तक मेरे सामने नहीं आयी थी। आज अवश्य ही मैंने एक नया पाठ पढा है।’’(पृष्ठ ४८)
नये खण्ड में चाणक्य गुप्त रूप से कुसुमपुर पहुंचकर आमात्य राक्षस और सेनापति भागुरायण के मनमुटाव को और अधिक उत्तेजित कर भागुरायण को अपनी ओर मिला लेता है। सामन्त शकटार, जिसके पुत्रों की नन्द ने हत्या करवा दी थी, उनके साथ आकर मिल जाता है। चाणक्य नन्द के पुत्र सुमाल्य के राज्याभिषेक के दिन आक्रमण करने का आदेश चन्द्रगुप्त को भेजता है। इस खण्ड का शीर्षक ‘राज्याभिषेक की तैयारी’, दो अर्थों का संकेत देता है- एक तो सुमाल्य के राज्याभिषेक की तैयारी और दूसरे चन्द्रगुप्त के अभिषेक की तैयारी। दसवाँ खण्ड ‘चन्द्रगुप्त की जय’ प्रत्यक्षतः नंद और सुमाल्य के मारे जाने का वर्णन करते हुए, इस नारे को सत्य सिद्ध करता है परन्तु इसी खण्ड में लेखक आगे की समस्या को भी प्रस्तुत कर देता है- ‘‘पर्वतक मगध का सम्राट बनने की इच्छा से आया था परन्तु विजय के बाद जब उसने चन्द्रगुप्त का घोष सुना तो आश्चर्य चकित रह गया।....वह अपना सहायक खोजने लगा। बाजी जाती देखकर पर्वतक ने अन्त में देश को भी दाँव पर लगा दिया। उसने सेल्यूकस को भारत पर आक्रमण करने के लिए बुलाया।.....पर्वतक वीर होते हुए भी विलासी था....एक दिन चाणक्य ने एक सुन्दर विषकन्या उसके पास भेजी। दूसरे दिन जब पर्वतक की अरथी उसके शिखर से निकली तो सबने जाना कि पर्वतक भी उसी लोक को गया, जहाँ सब को जाना है।’’ (पृष्ठ ५४)
बाद में ११वें और १२वें अध्याय सैल्यूकस के आक्रमण की पीठिका में है जब कि तेरहवाँ खण्ड प्रत्यक्षतः दोनों सेनाओं के युद्ध का वर्णन करता है। छिपकर द्वीप पर एकत्र हुए यूनानी सैनिकों को चन्द्रगुप्त की सेना घेर लेती है। रातभर भारतीय सैनिक शब्दभेदी बाण चलाकर यूनानी सैनिकों को मारते रहते हैं। सूर्योदय पर अपनी सेना को समाप्त देखकर सैल्यूक सन्धि का प्रस्ताव कर अपने चार राज्य देकर हेलेन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर देता है।
अन्तिम खण्ड ‘विष्णु का अवतार’ चन्द्रगुप्त के चरित्र का सीधा-सीधा अख्यान करता है कि वे तीव्र लगन, विलक्षण बुद्धि वाले वीर, साहसी, निस्स्वार्थ देशभक्त, महान विजेता, सुयोग्य शासक, परिश्रमी, धार्मिक और दृढ निश्चयी थे। उपन्यास की अन्तिम पंक्तियाँ हैं- ‘‘उन्हें मुद्राराक्षस ने विष्णु का अवतार तक कहा है। जिस दृष्टिकोण से हमने अपने महापुरुषों और राष्ट्र-निर्माताओं को विष्णु का अवतार माना है, उसी दृष्टि से देखा जाय तो मुद्राराक्षस का कथन किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता।’’ (पृष्ठ ६७)
उपन्यास का कथानक समाप्त हो जाता है परन्तु लेखक संतुष्ट नहीं होता अतः उपसंहार में उसने कुछ बातें कही हैं। उसकी दृष्टि में भारत के इतिहास का वैशिष्ट्य क्षात्रशक्ति और ब्राह्मशक्ति दोनों का एक साथ ऊपर उठकर अत्याचार का विरोध करने में रहा है- ‘‘ दबाकर कुचल डालने वाली आपत्तियों के भार को एक ओर फेंककर जब-जब भारत ने अपना गौरवपूर्ण मस्तक ऊँचा उठाया है तब-तब देश में राष्ट्र की मूलभूत क्षात्र और ब्रह्म शक्तियों का उदय हुआ है। तभी उनके प्रतिनिधि रूप में साथ-साथ वाल्मीकि और रामचन्द्र, व्यास और श्री कृष्ण, याज्ञवल्क्य और जनक रामदास और शिवाजी जैसे दो-दो महापुरुषों का आविर्भाव हुआ है। चाणक्य और चन्द्रगुप्त की भी एक ऐसी ही जोडी थी। इन दोनों की महानता अलग-अलग नहीं आंकी जा सकती।’’ (पृष्ठ ६८) इस उपसंहार में ही लेखक तक्षशिला ओर पाटलिपुत्र का स्मरण इन शब्दों में करता है- ‘‘पाट्लिपुत्र का गत वैभव एवं तक्षशिला के खण्डहर जहाँ एक ओर अपने विगत वैभव की याद दिलाते हैं, वहाँ उस कर्मयोग एवं अक्षुण्ण निष्ठा का भी संकेत देते हैं जिसने उसे यह वैभव प्रदान किया।’’ (पृष्ठ ६९) और इस उपन्यास का अन्तिम वाक्य इस प्रकार है- ‘‘उस भारतभूमि को प्रणाम है जिसने इस महान स्फूर्ति केन्द्र को जन्म दिया।’’ (पृष्ठ ६९)
संक्षेप में ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ उपन्यास के विषय में हमारे निष्कर्ष इस प्रकार हैं ः-
१. अत्यन्त सरल भाषा में लिखा गया इसका कथानक इतने स्पष्ट रूप में नियोजित किया गया है कि प्रारम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फलागम जैसी कार्यावस्थाओं का इसमें सहज ही निर्वाह हो गया है। पात्रों की अत्यल्प संख्या के साथ यह तीव्र गति से अपने उद्देश्य की ओर बढता है। उपकथाओं का इसमें सर्वथा अभाव है।
२. इस उपन्यास का नायक स्पष्टतः चंद्रगुप्त है। यह उपन्यास उसके माध्यम से अखण्ड भारत और उसकी संस्कृति की कल्पना को साकार कर अपने उद्देश्य की पूर्ति में सर्वथा सफल है।
३. उपोद्घात में चंद्रगुप्त को शासन का जो स्वरूप दिया गया है, उसी से स्फूर्त होकर दीनदयाल जी एकात्म मानववादी चिन्तन की ओर प्रवृत्त हुए, जिसमें चाणक्य के अर्थशास्त्र का भी योगदान है।
४. देशपे*म से ओत-प्रोत यह उपन्यास भारत की विलासिता पूर्ण अकर्मण्यता के साथ-साथ भारत की अदम्य वीरता तथा सजग कर्मयोग को प्रस्तुत करता है।
५. यह उपन्यास स्पष्टतः घोषणा करता है कि पर्वतक और अलक्सेन्द्र के युद्ध में पराजय अलक्सेद्र की हुई थी परन्तु महत्वाकांक्षी पर्वतक विजय का लाभ नहीं उठा सका।
६. इस उपन्यास का अंगीरस वीर है जो ‘शब्दभेदी बाण’ खण्ड में अपनी चरम स्थिति पर है।
७. यह उपन्यास सूक्तियों, शाश्वत सत्य को व्यक्त करने वाले वाक्यों और भारतीय इतिहास के चित्रण से भरा हुआ है।
८. यह भारत के गौरव को रेखांकित करने वाली एक ऐसी कृति है जो राष्ट्र के प्रति निष्ठा और देशभक्ति का संदेश देती है।
जगद्गुरु शंकराचार्य
जैसा कि कहा जा चुका है, दीनदयाल जी का दूसरा उपन्यास ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ है जिसकी रचना १९४७ में की गई थी। भारतीय संस्कृति, धर्म और दर्शन में शंकराचार्य का नाम अत्यधिक प्रसिद्ध है और आदर के साथ लिया जाता है। बालकों के लिए ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ लिखने के बाद तरुणों के लिए अपेक्षाकृत अधिक गंभीर और चिन्तनयुक्त तथा पे*रणादायी कृति की आवश्यकता थी अतः दीनदयाल जी ने शंकराचार्य को चुनकर संघ के सिद्धांतों का ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत किया। ‘मनोगत’ में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि शंकराचार्य न तो प्रच्छन्न बौद्ध थे और न ही बौद्ध धर्म के विनाशक। उनकी स्थिति इनके मध्य है। उन्होंने महात्मा बुद्ध को हिन्दू धर्म के अवतारों मं स्थान देकर बौद्धों की केन्द्रापगामी दृष्टि फेर दी। चार धामों की स्थापना का भारतवर्ष की कल्पना को स्पष्टता दी और पंचायतन की नींव डालकर विभिन्न सम्प्रदायों में एकत्व का निर्माण किया।
इस उपन्यास का मूल भाग १८ खण्डों मे विभक्त है। प्रथम तीन खण्डों में शंकर के जन्म, बाल्यकाल और शिक्षा का विवरण देते हुए उनकी दैवी प्रतिभा, अद्भुत सृजन-शक्ति और करुणार्द* प्रकृति का परिचय कराया गया है। शंकर से शंकराचार्य बनने के लिए उनकी आठ वर्ष की आयु ही पर्याप्त थी- ‘‘आठ वर्ष की अवस्था तक शंकर गुरुकुल में रहा। समस्त वेदशास्त्रों में पारङ्गत होने के कारण उनको आचार्य की उपाधि दी गई तथा ‘शिवगुरु’ का शंकर शंकराचार्य हो गया।’’ चतुर्थ खण्ड में लेखक ने शंकर के जीवन के विषय में प्रचलित प्रसिद्ध इस किंवदन्ती को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया है कि माता से संन्यास की अनुमति प्राप्त करने के लिए नदी में ग्राह द्वारा पैर पकडे जाने का नाटक किया था। लेखक की टिप्पणी इस प्रकार है- ‘‘हाँ, एक महान् ध्येय की पूर्ति के लिए शंकराचार्य जैसे राष्ट्र निर्माता दार्शनिक का यह नाटक खेलना कोई आश्चर्य की बात नहीं। इस घटना ने , चाहे सत्य हो या असत्य, हिन्दू समाज का इतिहास बदल दिया।’’ (पृष्ठ २५) आगामी खण्ड में दो ही घटनाएँ प्रमुख हैं- एक तो गोकर्ण तीर्थ में बालापन के सहपाठी विष्णु शर्मा का मिलन और गुरु की खोज में गोविन्दपाद के शिष्यत्व की प्राप्ति; परन्तु इस खण्ड का मुख्य प्रतिपाद्य संन्यास के सत्य स्वरूप की विवेचना है- ‘‘विष्णु! इस संन्यास में अलगाव नहीं अपनाव है, विरक्ति नहीं पे*म है। हाँ, इस पे*म में बन्धन नहीं, आसक्ति नहीं मोह नहीं। इसमें संकुचितता नहीं विशालता है, दुर्बलता नहीं शक्ति है, व्यक्ति के लिए समाज का त्याग नहीं, समाज के लिए व्यक्ति का राग है।’’ (पृष्ठ २९) तात्पर्य यह कि शंकर जिस संन्यास को लेकर चले थे वह एकान्त संन्यास नही था, समाज सेवा का संन्यास था। पाँचवा खण्ड ‘गुरु के सान्निध्य में’ शंकर के गुरु गोविन्दपाद की गुरु-परम्परा को प्रस्तुत करने के बहाने से संक्षेप में भारतीय दर्शन के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत है। छठा खण्ड ‘शिक्षा, माया और संसार’ में अमरकान्त के आश्रम में जनसेवा से युक्त संन्यास का व्यावहारिक स्वरूप सामने आता है और इसी खण्ड में शंकर की सुन्दर रचना ‘नमामि देवि नर्मदे’ प्राप्त होती है। आगामी खण्ड ‘बंधन से मुक्ति’ में वह माता तथा गुरु गोविन्दपाद की मृत्यु के कारण पूर्णतः बन्धन मुक्त हो जाते हैं। यह खण्ड माता की मृत्यु पर अकेले ही आँगन में चिता जलाकर अंतिम संस्कार करने की कथा प्रस्तुत करता है। ध्येय मार्ग पर चलने वाले को उपेक्षा का सामना करना ही पडता है और शंकर को भी करना पडा। ‘मातृस्तुति’ तथा ‘कृष्णाष्टक’ की रचना इन्ही दिनों की देन है।
‘जन जीवन से साक्षात्कार’ उनके काशी जीवन का विवरण है जहाँ उन्होंने दो निश्चय किये- एक तो ध्येय मार्ग पर चलने वाले शिष्यों का निर्माण और दूसरा दिग्विजय अभियान। उन्होंने काशी क्षेत्र में अपने सिद्धांतों का सिक्का जमाया और भारतीय संस्कृति के फैलाव हेतु काशी की केन्द्रीयता पर बल दिया। यद्यपि यह खण्ड उनकी दिग्विजय के निश्चय के बाद समाप्त हो जाता है परन्तु यह सम्पूर्ण खण्ड कार्यकर्ताओं की निष्ठा, आत्मविश्वास, वैचारिकता, राजनैतिक एकता, भूमि के स्थान पर वैचारिक राष्ट्रीयता, राष्ट्र के स्वरूप का परिवर्तन सम्बन्धी विचारों से भरा हुआ है। दिग्विजय खण्ड में शंकराचार्य की काशी और चरणाद्रिगढ की विजय-यात्रा के बाद प्रयाग पहुंचने तक का विवरण है। यह एक ऐसा खण्ड है जिसमें दीनदयाल जी की साहित्यिक प्रतिभा अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँची है। प्रकृति चित्रण, भाषा का आवेग अलंकरात्व, लम्बे वाक्य और मानवीकरण अपनी पूर्ण सीमा पर हैं। शंकर की प्रचार-विधि ओर दिनचर्या के वर्णन में कल्पना-प्रधान भाषा का प्रयोग का शंकर के चरित्र और विचार को अपेक्षाकृत अधिक उदात्त और कल्याणकारी सिद्ध किया है। दीनदयाल जी ने सर्वाधिक बल शंकर के मुख्य विषय भारत की एकात्मता पर दिया है। ‘प्रयाग’ खण्ड में शास्त्रार्थ के उद्देश्य और श्रद्धा की शक्ति पर बल देते हुए, प्रयाग के मूर्धन्य विद्वान प्रतिष्ठापुरी के प्रभाकर की शास्त्रार्थ में पराजय प्रस्तुत करता है।
‘कुमारिल भट्ट’ खण्ड का सीधे-सीधे उपन्यास के कथानक से कोई सम्बन्ध नहीं है परन्तु मण्डन मिश्र पर शास्त्रार्थ में विजय के महत्व को रेखांकित करने के लिए यह खण्ड अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका का निर्माण करता है। आगे के चार खण्ड ‘मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ’ ‘भारती का समाधान’ ‘विविधता में एकता’ ‘राष्ट्र धर्म और सम्प्रदाय’ ‘हिमालय की चोटियाँ पर’ शंकराचार्य की शास्त्रार्थ में दिग्विजय का ऐसा वर्णन प्रस्तुत करते हैं जो एक ओर तो दार्शनिक विचारों से पूर्ण हैं और दूसरी ओर राष्ट्रीयता के परिप्रेक्ष्य में शंकर के जीवन-कार्य को ओजपूर्ण भाषा में सामने लाते हैं। उनके सभी शास्त्रार्थ इस उपन्यास के प्राण हैं जो विकसित हिन्दू आर्य को वैदिक धर्म मानकर वेदान्त की स्वीकृति देते हैं। दार्शनिकता के विचार राष्ट्रीयता के विचार के साथ मिलकर एक रूप हो गए हैं- ‘‘अनेक में एक के अपने प्राचीन सिद्धांत को आचार्य शंकर ही आध्यात्मिक, भौतिक, नैतिक, धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपने अद्वैत के सिद्धांतों का प्रतिपादन करके व्यवहार जगत में लाए। यही सिद्धांत मानव मात्र की शान्ति और कल्याण का कारक होगा।’’ (पृष्ठ १११)
इस उपन्यास के विषय में निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ः-
१. साहित्यशास्त्र की दृष्टि से कुन्तक ने साहित्यकार को दो अधिकार दिये हैं- अविद्यमान की कल्पना और विद्यमान का संशोधन। इस उपन्यास की कथा में प्रथम का उपयोग लगभग नहीं है।
२. दूसरे अधिकार का प्रयोग प्रथमतः किंवदन्तियों को नकारने में और द्वितीयतः शंकर के जीवन कार्य और विचारों को राष्ट्रकार्य के अनुरूप ढालने में किया है।
३. यह उपन्यास भारत की एकात्मता की स्थापना इतने सशक्त, सतर्क और ओजस्वी ढंग से करता है कि बहुवचन वादियों के पास कोई विकल्प नहीं
रह जाता।
४. अपेक्षित गुणों की प्राप्ति की विधि को प्रस्तुत करते हुए कार्यकर्ता के ज्ञान को पूरे बल के साथ स्वीकार करके भी ज्ञान की अपेक्षा उसमें श्रद्धा की आवश्यकता उससे अधिक मानता है।
५. लेखक सभी प्रकार की किंवदन्तियों और अतिशयोक्तियों से बचकर निकला है। अलौकिकता को कोई स्थान न देते हुए शंकर को एक महान मानव के रूप में प्रस्तुत करता है।
६. भाषा और प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से यह एक प्रौढ, आकर्षक परन्तु सरल कृति है। प्रकृति-चित्रण,मानवीकरण, रूपम, अनुप्रास आदि से सम्पन्न है। यथा,
‘‘एक ओर तो भगवान शंकर की जटाओं से स्रवित गंगा की धारा की भाँति शंकराचार्य के मुख से शुद्ध ज्ञानमार्ग की धवल गंगा धारा का प्रवाह था तो दूसरी ओर तमाम तरुपुंज तमाच्छन्न तरनि तनूजा के समान प्राची में सूर्य यज्ञादि पुरस्कर्ता, प्रकाण्ड पण्डित, कर्मकाण्डी मण्डन मिश्र की धूमिल वाणी की नील यमुना धारा प्रवाहित होती थी। इन दोनों के बीच सरस्वती का अवतार भारती उपस्थित थी। इस तीर्थराज त्रिवेणी संगम पर चित्र को निर्मल करने आये अनेक नर-नारी उपस्थित थे।’’ (पृष्ठ ७२)
‘‘त’’ और ‘‘प’’ का अनुप्रास और प्रयाग का सांगरूपक यहाँ बहुत स्पष्ट है। श्ा*ेष का भी एक उदाहरण प्राप्त होता है ः-
‘‘उन दिनों वहां (प्रयाग) सरस्वती का आजकल की भाँति लोप हो गया था।’’ (पृष्ठ ६५)
८. यह उपन्यास अनेक अमूल्य सूक्तियों से
युक्त है ः-
अ. आत्मा की पुकार परमात्मा की वाणी होती है।
(पृष्ठ १३)
आ. शरीर से तो कोई संसार में अमर नह रहता। अमर तो वह है जिसका यश अमर हो। (पृष्ठ १४)
इ. विद्या और बुद्धि से मनुष्य की विलक्षणता प्रकट होती है, उसके विषय में कुतुहल का अनुभव होता है परन्तु श्रद्धा और ममत्व का नहीं। (पृष्ठ १६)
ई. कार्य करने की शक्ति के बिना सहानुभूति प्रदर्शन मन की एक दुर्बलता है तथा शक्ति के होते हुए भी कार्य न करना शक्तिदाता भगवान के प्रति कृतघ्नता है। (पृष्ठ १९)
उ. जब भी प्रेरणा प्रबल हो, विचार-भावनाएँ पवित्र हों, उसी क्षण उसी शुभ अवसर पर पुण्य कार्य में हाथ डाल देना चाहिए। (पृष्ठ २७)
ऊ. बुराई की ओट में कभी-कभी भलाई छिपी होती है। (पृष्ठ ३४)
ए. जिसकी दृष्टि सतत अपने ध्येय पर लगी हुई है, उसे मार्ग की कठिनाइयाँ नहीं सताती। (पृष्ठ ४०)
ऐ. निरन्तर चलते रहने से ही अन्तिम यश की प्राप्ति होती है। (पृष्ठ १०)
ओ. पाप को पुण्य मानकर चलने वाले व्यक्ति को पुण्य मार्ग पर चलाना दुष्कर होता है। (पृष्ठ १०५)
यह उपन्यास भारतीय दर्शन और हिन्दू धर्म के विकास का एक ऐसा संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत करता है जो पाठक के मस्तिष्क पर भारतीयता का गहरा संस्कार डालता है।
विवेचन
इन उपन्यासों में भारत की एकात्मता और अखण्डता तथा एकछत्र साम्राज्य का जो चिन्तन हुआ है, वह एकात्म मानववाद में आगे चलकर दीनदयाल जी द्वारा भारत के संविधान की रचना के मूलभूत आधार पर इस प्रकार प्रश्न उठाता है- ‘‘संविधान भारत के प्रान्त की रचना को मूलभूत मानता है और केन्द्र को राज्यों का समूह मात्र। यह सत्य के विपरीत है। भारत की एकता और अखण्डता की धारणा का विरोधी है। इसमें भारत की जीवमान चैतन्यमयी कल्पना नहीं है। संविधान के प्रथम अनुच्छेद के अनुसार ‘‘इण्डिया अर्थात भारत एक राज्यों का संघ होगा’’, अर्थात बिहार माता,बंगमाता, पंजाब माता, कन्नड माता, तमिल माता आदि माताओं को मिलाकर भारतमाता बनेगी। यह हास्यास्पद कल्पना है। हमने प्रान्तों की कल्पना भारतमाता के अंगों के रूप में की है, अलग-अलग माताओं के रूप में नहीं। अतः हमारा संविधान संघात्मक न होकर एकात्मक होना चाहिए।’’ (एकात्म मानववाद,
पृष्ठ ५६)
‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ में दीनदयाल जी ने चन्द्रगुप्त को मुद्राराक्षस द्वारा विष्णु कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं की है और उसे एक विशिष्ट अर्थ में स्वीकार किया है। वह विष्णु किन अर्थों में है यह ‘एकात्म मानववाद’ में इन शब्दों में व्याख्यायित होता है- ‘‘ईश्वर से भी बडा धर्म है। वह धर्म से चलता है। इसीलिए सृष्टि चलती है, राजा धर्म राज्य के प्रमुख के नाते विष्णु है।’’ (एकात्म मानववाद, पृष्ठ ५९) ‘‘धर्म निरपेक्षता और राज्य एक दूसरे के विरोधी हैं। राज्य तो धर्म राज्य ही हो सकता है, दूसरा नहीं। दूसरे में तो उसके मूल कर्तव्य की ही उपेक्षा हो जायेगी।’’ (वही, पृष्ठ ६१)
‘चिति’ और ‘विराट’ दीनदयाल जी द्वारा प्रयुक्त दो पारिभाषिक शब्द हैं। जिनका एकात्म मानववाद में पर्याप्त विवेचन है। इन दोनों उपन्यासों में ‘चिति’ की चर्चा नहीं है परन्तु ये दोनों उपन्यास अनुभूति के जिस धरातल पर ले जाते हैं वह ‘विराट’ की अनुभूति हैं। ‘एकात्म मानववाद’ के निम*लिखित शब्द इन दोनों उपन्यासों की इसी अनुभूति को शब्दबद्ध करते हैं- ‘‘विराट का राष्ट्र जीवन में वही स्थान है जो शरीर में प्राण का है। प्राण से ही सभी इन्द्रियों को शक्ति मिलती है, बुद्धि को चैतन्य प्राप्त होता है और आत्मा शरीरस्थ रहता है। विराट के आधार पर ही प्रजातंत्र सफल होता है और राज्य बलशाली बनता है। इसी अवस्था से राष्ट्र की विविधता उसकी एकता में बाधक नहीं बनती। भाषा, व्यवसाय आदि तो सब जगह होते हैं किन्तु जहाँ विराट जाग्रत रहता है वहाँ संघर्ष नहीं होते।’’
(पृ. ८४) यह दोनों उपन्यास विराट की अनुभूति कराने में सक्षम हैं- एक राजनीति के माध्यम से और दूसरा संस्कृति और आध्यात्मिकता के माध्यम से।
जीवन और जगत को देखने की दो दृष्टियाँ हैं। एक दृष्टि बहुलतावादी है जो जीवन और जगत के विविधता को प्रशंसनीय दृष्टि से देखकर वैविध्य में आनन्द लेती है, उस सह अस्तित्व के सिद्धांत को मानती है जो आन्तरिक रूप से संघटित न होकर वैचारिक सौन्दर्य बोध और कर्तव्य बोध से उत्पन्न है। दूसरी दृष्टि एकात्मवादी दृष्टि है जो विविधता में निहित एकता का अनुसंधान कर आत्म तत्व के सत् चित् और आनन्द की अनुभूति कराती है, जिसमें वैचारिक आरोपण नहीं आन्तरिक एकात्मक अपनत्व है। दीनदयाल जी का एकात्म मानववाद इसी एकात्मता के अनुसंधान पर आधारित है। उन्होंने इसे सिद्धांतरूप में इस प्रकार स्थापित किया है- जीवन में अनेकता तथा विविधता है किन्तु उसके मूल में निहित एकता को खोज निकालने का हमने सदैव प्रयत्न किया है। यह प्रयत्न पूर्णतः वैज्ञानिक है।....जीवन की विविधता अन्तर्भूत एकता का आविष्कार है और इसलिए इनमें परस्परानुकूलता तथा परस्पर पूरकता है।...विविधता में एकता अथवा एकता का विविध रूपों में व्यक्तिकरण ही भारतीय संस्कृति का केन्द्रस्थ विचार है।’’(पृ. २७) ये वाक्य दीनदयाल जी ने १९६५ में सिद्धांत रूप में कहे थे परन्तु इससे १८ वर्ष पूर्व इसका उदाहरण ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ उपन्यास में इसके रूप में प्रस्तुत कर चुके थे।
और अन्त में केवल इतना ही कि ये दोनों उपन्यास जीवनी विधा के अनेक तत्वों को समेटे हुए है परन्तु ये तिथियों की मृत परिगणना करने वाली कृतियाँ न होकर ऐसे जीवन्त उपन्यास हैं जिनमें तथ्य, राग और विचार संघटित रूप में आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारते हुए रस की सृष्टि करते हैं।