जगद्गुरु श्री शंकराचार्य : एकात्ममानव दर्शनकी पूर्व पीठिका

डा उमेश कुमार सिंह


जगद्गुरु श्री शंकराचार्य पर यह उपन्यास श्रीमान् दीनदयाल जी उपाध्याय द्वारा युवाओंं के लिए लिखा गया। इस लेखन के लिए प्रेरणास्रोत रहे श्रीमान भाऊराव जी देवरस। सन् १९४७ में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ। अठारह अध्यायों मं बँटा यह उपन्यास जगद्गुरु श्रीमद्शंराचार्य के जीवन का सर्वांगपठन तो है ही पं. दीनदयाल जी के एकात्ममानव दर्शन की पूर्व पीठिका भी है। अठारह का संयोग परम्परा का संयोग है। महाभारत और गीता के साथ यहाँ भी वहीं दृष्टि दिखेगी। जिस वैचारिक धरातल की नींव यहाँ दिखाई देती है वहीं आगे उनके जीवन में प्रकट होती है। शंकराचार्य का कथान्यास पढ तो ऐसा प्रतीत होता है मानों चलचित्र चल रहा हो। इसकी एक विशेषता यह भी है कि यह उस काल की विषयवस्तु को लेता है जिसमें भारतीय बौद्धों ने सत्ता के लोभ में अपने पराये का विवेक खो दिया था।
पं. दीनदयाल जी लिखते हैं, ‘‘इस दावानल ने हिंदू धर्म के अंदर-बाहर चारों ओर उगने वाले झाड-झंखाड को भस्मसात कर दिया। इस अग्नि में तपकर हिन्दू धर्म पहले से अधिक तेजस्वी बनकर कुंदन के रूप में निखर आया। धर्म की रक्षा हुई। देश की रक्षा हुई। स्वामी शंकराचार्य ने बुद्ध को हिन्दू धर्म के अवतारों में स्थान देकर बौद्धों की केन्द्रापगामी दृष्टि फेर दी। फिर घर-घर में देश का गुंजन प्रारंभ हो गया।
शंकराचार्य ने इतना ही नहीं तो समस्त हिन्दू-राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने एवं उसे संगठित करने का प्रयास किया। देश के चारों कोनों पर चार धामों के प्रति श्रद्धा केंद्रित करते हुए उन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष की, मातृ-भू की मूर्ति जन-जन के हृदय पर अंकित कर दी। पंचायतन का पूजन प्रांरभ कर विभिन्न संप्रदायों को एक दूसरे के आराध्य देवों के प्रति केवल सहिष्णुता का भाव ही नहीं तो सभी देवताओं के प्रति अपने इष्टदेव के माध्यम से वहीं श्रद्धा एवं आदर का भाव व्यक्त करने को प्रेरित किया, इसके अनुसार प्रत्येक पाँचों देवताओं विष्णु, शिव, शक्ति, गणपति और सूर्य की पूजा करता है। अपनी श्रद्धा के अनुसार अपने इष्टदेव को बीच में तथा चारों ओर अन्य चार देवताओं को रखकर पूजन करने की उसे छूट है। चार धामों के समान ही उन्होंने समाज को धर्म मार्ग पर नियंत्रित एवं अनुशासित रखने के लिए चार शंकराचार्यों की अध्यक्षता में भारत के चारों कोनों में चार मठ स्थापित किए।’’
शंकराचार्य की कथा यहाँ लगभग समाप्त हो जाती है। किन्तु यहाँ से दो कथाएँ एक साथ निकलती हैं। एक श्रीमद्शंकराचार्य की तो दूसरी पं. दीनदयाल जी उपाध्याय की। यहाँ दोनों का विहंगावलोक और उसमें अवगाह्न करते हुए अपने अन्दर के राष्ट्र का बोध प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे।
शिवगुरु सब प्रकार से साधन सम्पन्न हैं किन्तु बढती आयु के साथ संतान की चिंता सताती है। विदुषी भार्या आर्यंबा की सूनी गोद देख कर विचलित होना स्वाभाविक था। आर्यांबा अपना मन पडोस के बाल हरि देव में इतना लगा देती है कि जब उसके पिता सोमदेव उसे विद्यालय भेजने की तैयारी करते है तो आर्यांबा कह उठती है, ‘‘भैया सोमदेव! हरि अभी तो छोटी ही है, एकाध वर्ष और खेलने-खाने दो न! फिर गुरुकुल तो जाना ही है।’’ यह माता का पुत्र-अभाव था जो स्थलान्तरित हो रहा था। अब जरा सोमदेव के मुख से कहलाया पं. दीनदयाल जी का यह कथन देखें, ‘‘आजकल तो जितनी छोटी आयु में हो सके, उतने में ही बालक को गुरु के पास भेज देना चाहिए। चारों ओर नास्तिकवादी बौद्धों तथा वाममार्गियों का प्रभाव इतना बढता जा रहा है कि यदि छोटी आयु में ही वैदिक धर्म के भले संस्कार न पडे तो कुमार्ग पर बह जाने का डर रहता है। न जाने कब इन वेद विरोधियों का नाश होगा?’’ यह दीनदयाल जी का काल बोध है। जरा आज की परिस्थिति को देखें, हम अबोध बच्चों को पहली सीढी से ही कान्वेंट स्कूलों में, वेद विरोधी संस्थानों में डाल कर वाममार्गियों एवं यूरोसेन्ट्रिक प्रभाव में कैसे ढकेल रहे हैं। यह चिंता दीनदयाल जी को १९४७ में है।
वातावरण को प्रस्तुत करते हुए जिस दृश्य को दीनदयाल जी उपस्थित करते हैं, ‘उषा भगवान मरीचिमाली का साथ छोडकर इस दंपती की सेवा करने में अपना अहोभाग्य समझती। उनका आनन तेजपुंज से परिवेष्टित हो चमक उठता। दोपहर को तप्तांशु उनके साथ तप करने की होड लगाते, परंतु शिवगुरु और आर्यंबा के तप के सामने उनका तप फीका पड जाता, हारकर लज्जा से लाल-मुँह किए अंतरिक्ष की ओट में भाग जाते। रात्रि को चंद्रोदय होता, मानो भगवान शशिभाल ही कृष्ण बाघंबर ओढे भक्तों की रक्षा को आए हैं। रातभर भगवती गिरिजा-नंदिनी आँसू बहाती तथा भगवान शिव अट्टहास कर उठते। उमा के आँसू ओस कड बनकर गिर पडते तथा भगवान् का हास्य पूर्वाकाश पर छा जाता। कई दिनों तक यही क्रम चलता रहा। भगवान् चंद्रभाल के चंद्र की कलाएँ घटने लगीं, कला-रहित कलानाथ की कल्पना ने ही उनको विकल कर दिया। उन्हें इस ब्राह्मण दंपती की तपस्या के सामने झुकना पडा’। उसमें भाषा और शैली का सौन्दर्य छायावादी प्रसाद से भी आगे दिखती है। अद्भुत प्रभावकारी।
दीनदयाल जी शीघ्र ही अपने ध्येय की ओर वापस आते हैं, वे लिखते हैं, ‘‘हिन्दू धर्म की महानता का ज्ञान रखने वाले शिवगुरु ने भावी बालक के जन्म के पूर्व से समस्त संस्कार यथाविधि किए। वह जानता था कि मनुष्य का जीवन संस्कारों पर अवलंबित है। उसके जीवन की लालसा पूर्ण होने वाली थी, उसमें वह असावधानी कैसे करता और फिर उन्होंने देश और समाज के लिए एक सर्वज्ञ पुत्र की याचना की थी, उसको सर्वज्ञ बनाने में अपनी ओर से कोर-कसर वे कैसे रखते।’’ बालक के नाम संस्कार को देखें, ‘‘भगवान शंकर का वरदान जानकर शिवगुरु ने उसका नाम शंकर रखा।’’ एक सदगृहस्थ की संतान के प्रति दृष्टि, नामकरण, संतति का अर्थ स्पष्ट है।
याशोदा, कौशल्या की तरह आर्यंबा ने शिशु शंकर के लालन-पालन में अपने आप को भुला दिया। बालक के जन्मदिन मनाने की कामना में दीनदयाल जी क्या देखते हैं, ‘‘एक वर्ष बाद अब्दपूर्ति मनाई गयी।..बडे बूढों ने अमर होने का आशीर्वाद दिया।..सचमुच शंकर आज अमर है। जब तक संसार में हिन्दू जाति जीवित है, तब तब शंकर का नाम जीवित है और हिन्दू जाति को तो शंकर ने समन्वय की संजीवनी पिलाकर अमर ही कर दिया है।..शंकर ‘एक श्रुतिधर’ था।’’ यह जन्मदिन मनाने की सार्थकता आज के लिए संदेश है।
बालक शंकर के माध्यम से दीनदयाल जी का मनुष्य के प्रति चिंतन क्या है, ‘‘शंकर केवल विद्या और बुद्धि में ही नहीं बढा-चढा था, परंतु उसका स्वभाव इतना मीठा था कि जो कोई उससे एक बार मिलता, वह उसी का बन जाता था।..विद्या और बुद्धि से मनुष्य की विलक्षणता प्रकट होती है, उसके विषय में कोतूहल का अनुभव हो सकता है परंतु श्रद्धा और ममत्व का नहीं..उसके लिए तो काम केवल बुद्धि के बल पर नहीं बल्कि हृदय के बल पर हुए हैं।’’
पाँच वर्ष की आयु में उपनयन पश्चात शंकर गुरुकुल गया। लौकिक विद्या के साथ ही वेदों तथा वेदांगों का अध्ययन किया। उसी समय ‘बालबोध संग्रह’ नामक ग्रंथ लिख डाला। दीनदयाल जी के शैली की विशेषता है कि वे शंकराचार्य के प्रत्येक ग्रंथ का समयानुकूल परिचय कराते चलते हैं, जो सम्भवतः अन्यत्र उपलब्ध होना सहज नहीं है। जो सरकारें के प्रत्येक ग्रंथ का समयानुकूल परिचय कराते चलते हैं, जो सम्भवतः अन्यत्र उपलब्ध होना सहज नहीं है। जो सरकारें आज वेद, वेदांगों का पाठ्यक्रम बना रही हैं उन्हें उसका स्तर क्या हो, इस उपन्यास से समझना चाहिए।
शिक्षा के प्रति दीनदयाल जी की दृष्टि यहाँ देखी जा सकती है, ‘‘गुरुकुलों की शिक्षा-पद्धति आज से भिन्न थी। जब राष्ट्र स्वतंत्र होता है तब शिक्षा उसके वास्तविक उद्देश्यों के अनुसार बालक की सुप्त शक्तियों का विकास करके समाज का चैतन्यपूर्ण घटक तथा योग्य नागरिक बनाने के लिए ही दी जाती है। उस शिक्षा में समाज से संबंध-विच्छेद नहीं होता, अपितु पग-पग पर समाज का हमारे ऊपर कितना ऋण है, उसके प्रति हमारा क्या कर्तव्य है, यह याद दिलाई जाती है।’ दीनदयाल जी सजग हैं, उनके हृदय की पीडा और शिक्षा से अपेक्षा, ‘‘परतंत्र राष्ट्र के विद्यार्थियों के समान अपने समाज में अलग वर्ग बनाने वाले, समाज से भिन्न हो, उसके प्रति अश्रद्धा रखने वाले, परकीय भावनाओं से ओत-प्रोत विनय रहित, मानसिक दासता से जकडे हुए विद्यार्थी उस समय नहीं होते थे। अपने मस्तिष्क को विदेशियों के हाथ बंधक रखने के कारण जिनकी विचार शक्ति का दिवाला निकल गया है, स्वार्थी तथा आदर्शहीन जीवन ने जिनके हृदय के रस को शुष्क कर दिया है, जिनकी भावनाओं को काठ मार गया है तथा वेदना कुंठित हो गई है, आलस्य का साम्राज्य देखकर जहाँ से पुरुषार्थ, उद्योग तथा कर्मण्यता कूच कर गये हैं, ऐसे विचारशून्य, भावनाहीन, कर्म-रहित विद्यार्थी उस समय नहीं होते थे।’’ ‘उस समय नहीं होते थे’, यह कथन सब कुछ कह देता है।
अभावग्रस्तता में भिक्षा में आँवला देती, याचक को संतुष्ट न कर सकने से रोती माता के वेदना का उपाय क्या हो सकता है। शंकर की मनःस्थिति को दीनदयाल जी ने स्पष्ट किया, ‘‘यह तो ग्रह्मचारी था, स्वयं भीख माँगकर अपना जीवन निर्वाह करता था, परंतु जानता था कि मन भिखारी अथवा निर्धन नहीं था।’’ समाधान की दीनदयाल जी की अद्भुत शैली, ‘‘शंकर तो धनी लोगों के दरवाजे पर बहुत कम जाता था।....आज! शंकर ने ‘भिक्षां देहि’ की पुकार भी नहीं लगाई थी कि वह धनी व्यक्ति भिक्षा लेकर उपस्थित हो गया।’’ दीनदयाल जी की सामाजिक संवेदना शंकर के माध्यम से, ‘‘जो अपने समाज के लोगों को अपना नहीं समझता, जिसके हृदय में अपने लोगों के लिए प्रेम नहीं, ममता नहीं, उसका अन्न खाकर क्या धर्म वृत्ति उत्पन्न हो सकेगी?’’ सेठ ने कहा, ‘बटुकवर, मैं तो अपने को समाज का एक अकिंचन सेवक ही समझता हूँ।’ शंकर का उत्तर दीनदयाल जी सेवा दृष्टि, ‘‘जिसके बगल में इतना निर्धन परिवार हो, वह स्वयं सुख और वैभव की गोद में खेलकर भी अपने को समाज सेवक कहे, अपने धर्म की दुहाई दे, यह कैसी विडंबना है?’’ आज के उच्च अट्टालिकाओं में रह रहे समाज सेवकों के लिए यह संदेश पर्याप्त नहीं है?
दीनदयाल जी की आकाँक्षा शंकर के चिन्तन में, ‘‘वे (शंकर) सोचते कि यदि मनुष्य को एक दिन मरना ही है तो वह कीडे-मकोडों की भाँति क्षुद्र, स्वार्थ से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करके क्यों मरे? इस जीवन को तथा छोट-छोटे सुखों को ही सर्वस्व एवं सत्य समझने के कारण मनुष्य उनके पीछे पडा रहता है तथा एक दिन जब इस नाशवान शरीर को छोडना पडता है तब उसको दुःख होता है। इससे अच्छा तो यही है कि महान् ध्येय को लेकर सत्य मार्ग पर जीवन भर बढते चले जाएँ तथा उसी ध्येय के लिए जब जीवन को समाप्त करने की आवश्यकता पडे, तब शांति के साथ, हर्ष के साथ वह भी करने को तैयार रहें, जैसे कि साँप अपनी रक्षा के लिए केंचुल धारण करता है तथा एक दिन उसी के हेतु केंचुल को छोड देता है।’’
माता को आश्वासन के बाद शंकर आज संन्यासी था। ध्येय सामने था, ‘‘त्यजेदेकं कुलस्यार्थ ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।’ असीम श्रद्धा तथा भगवान् का एकमात्र सहारा ही उनका बल था। ‘अच्युताष्टक’ के साथ गोविन्दपाद के आश्रम की ओर बढ गये। गोकर्ण की यात्रा में मित्र विष्णु शर्मा से संवाद देखें, ‘मैंने संन्यास ले लिया है, विष्णु। माता जी ने आज्ञा दे दी है।’ विष्णु, ‘तो क्या धु*व की तरह जंगल में जाकर तपस्या करोगे?’ शंकर का उत्तर दीनदयाल जी के भावी जीवन का ध्येय वाक्य था, ‘नहीं भाई, जंगल में नहीं जाऊँगा। संन्यास का अर्थ संसार को छोडकर वन में तपस्या करना नहीं है। मैंने कर्म संन्यास लिया है, जिसका अर्थ कर्म छोडन नहीं, कर्म करना, देश और धर्म के कर्म करना है, जो सत्य हैं तथा मनुष्य को कर्म फल-बंधन में नहीं बाँधते।...इस संन्यास में अलगाव नहीं अपनाव है, विरक्ति नहीं शक्ति है, व्यक्ति के लिए समाज का त्याग नहीं, समाज के लिए व्यक्ति का राग है।’
पं. दीनदयाल जी की अद्वैत की अवधारणा, ‘शंकर के नाम साथ अद्वैत तथा वेदांत का इतना अटूट संम्बन्ध जुड गया है कि शंकर को ही वेदांत तत्त्वज्ञान का जन्मदाता समझने लग गए हैं, किन्तु इसको संसार के समक्ष प्रकट करने वाले महर्षि बादरायण थे। महर्षि बादरायण के काल में वैदिक धर्मावलंबियों में तीन तत्त्वज्ञान मुख्यतया प्रचलित थे-कणादि का वैशेषिक दर्शन, गौतम का न्याय दर्शन तथा कपिल का सांख्य दर्शन। इसके अतिरिक्त अवैदिक मतावलंबियों ने भी अपने-अपने दर्शनों का प्रतिपाद किया था। उनमें तीन-चार्वाक का लोकायत दर्शन, जैनों का अर्हत् तथा बौद्धों का तथागत दर्शन बहुत प्रसिद्ध हैं।....शेष अवैदिक दर्शनों में नैतिकता का स्थान तो बहुत ऊँचा था किन्तु अपनी परंपरा के प्रति पूर्ण दुर्लक्ष्य था।’ वे आगे और स्पष्ट करते है, ‘महर्षि बादराण ने देखा कि जितने भी देश में मत चल रहे थे, वे न तो श्रुति-सम्मत थे और न स्मृतियाँ उनका पोषण करती थीं।...बुद्ध को वैदिक धर्म से घृणा हो गई थी और पलतः उन्होंने अपने अहिंसा प्रधान धर्म का उपदेश दिया।’ दीनदयाल जी इससे निकलने का मार्ग बताते हुए कहते हैं, ‘धर्म महर्षि बादरायण ने जिस तत्व का प्रतिपाद किया, वह इन दोषों से परे था। उपनिषद्, वेदांत सूत्र तथा गीता अपने धर्म की प्रस्थानत्रयी के नाम से विख्यात हैं। धर्म के प्रत्येक आचार्य ने इसका सहारा लेकर ही अपने-अपने मत का प्रतिपादन किया है। उपनिषद् श्रुति-प्रस्थान, श्रीमद्भागवातगीत, स्मृति-प्रस्थान तथा वेदांत-सूत्र न्याय-प्रस्थान कहलाते हैं।’
शंकर और भारतीय वैदिक गुरु-शिष्य शुकदेव मुनि को इसकी शिक्षा दी। शुकदेव ने भी शंकराचार्य की भाँति बचपन में ही संन्यास ले लिया था। वे जीवन-पर्यंत इस वेदांत प्रधान वैदिक धर्म का ही प्रचार करते रहे। बदरिकाश्रम में उन्होंने अनेक शिष्यों को इसकी शिक्षा दी तथा महर्षि बादरायण के बेदांत-सूत्रों का एक परिवर्द्धित एवं परिमार्जित संस्करण तैयार किया। शुकदेव के ‘उपवर्ष’ तथा ‘गौडपाद’ दो मुख्य शिष्य हुए। ..गौडपाद दक्षिण भारत के रहने वाले थे। ..उन्होंने पतंजलि से पाणिनीय व्याकरण पर एक महाभाष्य की रचना की थी। उनके विद्यार्थियों की संख्या बढते-बढते एक सहस्र हो गई। इतने विद्यार्थियों को एक साथ पढाना असंभव था, अतः उन्होंने एक ऐसे यंत्र का आविष्कार किया, जिसके सहारे वे सब विद्यार्थियों को एक साथ पढा सकते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को चेता दिया था कि कोई उस यंत्र में हाथ न लगाए; किंतु एक चंचल शिष्य ने कोतूहलवश उनकी अनुपस्थिति में उस यंत्र का उसको ज्ञान तो था नहीं, अज्ञानवश उसका हाथ कुछ ऐसे स्थान पर पडा कि एकाएक बडा भारी विस्फोट हुआ और क्षण भर में ही वे एक सहस्र विद्यार्थी भस्मीभूतहो गए।
अपने एक सहस्र विद्यार्थियों के विनाश और अपने परिश्रम की निष्फलता पर शोक करते हुए वे खडे थे कि सामने से अपने शिष्य गौडपद को आते हुए देखा। महर्षि के मुख पर हर्ष और विषाद का रेखाएँ खिंच गईं। गौडपाद अपने सहपाठियों की भस्मी देखकर रो पडा। .. उसका मन काँप गया, क्योंकि वह बिना गुरु की आज्ञा के वर्ग छोडकर चला गया। अनुशासन भंग के इस दोष के कारण वह मन-ही-मन जला जा रहा था। उसका साहस नहीं हो रहा था कि वह आँखें उठाकर महर्षि की ओर देखे। गौडपाद दृष्टि नीचे किए नीचे किए चुपचाप खडा था। महर्षि पतंजलि ने धीरे-धीरे स्वर में कहा, ‘‘गौडकर! तुमने अनुशासन भंग करके पाप किया है, उसका प्रायश्चित्त तुमको करना ही होगा। बुराई की ओट में कभी-कभी भलाई छिपी रहती है। जाओ, किसी योग्य शिष्य को ढूँढकर महाभाष्य पढाना। जब तक तुम किसी को पढाओगे नहीं, तब तक महाभाष्य तुमको याद रहेगा।
गुरु को प्रणाम करके क्षुब्ध मन से गौडपाद वहाँ से चला गया। घूमते-घूमते अंत में उज्जयिनी (उज्जैन) के निकट उसको एक व्यक्ति मिला। उसको देखकर गौडपाद का मन बरबस ही उसकी ओर खिंच गया। उन्हें विश्वास हो गया कि यही व्यक्ति है, जिसकी वह इतने दिनों से खोज कर रहा है। उसका नाम चंद्र शर्मा तथा पूर्व भारत का रहने वाला था। गौडपाद ने उसको व्याकरण पढाया। अपनी थाती उसे सौंपकर उसने एक अपूर्व शांति का अनुभव किया। भगवत गोदिपादाचार्य से उसने विदांत की शिक्षा ली। शंकर ने वेदांत की शिक्षा को ग्रहण करके केवल अपने शिष्यों को पढाकर ही संतोष नहीं किया अपितु अपने समस्त जीवन को व्यवहार में प्रकट करते हुए संपूर्ण राष्ट्र को इस मंत्र से अभिमंत्रित कर दिया। कर्म संन्यास ग्रहण करके शंकर उनके आश्रम में रहने लगा।’’
नर्मदाष्टक रचना का हेतु और शंकर का सेवाभाव दीनदयाल जी की दृष्टि से देखें, ‘‘विद्युत की तीक्ष्ण परंतु क्षण भर में नष्ट होने वाली प्रकाश-रेखा दिखती, लोगों की आँखें चकाचौंध हो जातीं और फिर जोरों से वर्षा प्रारंभ हो जाती। धीरे-धीरे दिए हुए ज्ञान के समान धीरे होने वाली वर्षा से पृथ्वी की प्यास बुझती है, उसकी उत्पादक शक्ति बढती है, कृषि की वृद्धि होती है और जनता को आनंद होता है। परंतु ग्रहण करने वाले की ग्रहण शक्ति का अनुमान लगाए बिना दिया हुआ दान जैसे दुःख का कारण होता है, वैसे ही आस-पास की भूमि अथाह जलराशि को ग्रहण न कर पाई। उसने उठाकर नर्मदा में फेंक दिया। वह भी ओछे नर की भाँति उबल पडी, कुलाँचें मारकर भागना शुरू किया। मालूम होता था कि तटवासियों का सर्वनाश ही कुलाँचें मार रहा हो। नर्मदा का जल क्षण-क्षण बढता जाता था और तटवासियों के जीवन की आशा शनैः शनैः क्षीण होती जाती थी। मेघरज तो प्रलय-दुर्दिन के समान रुकने का नाम ही नहीं लेते थे। शांतिकाल में जीवन देने वाली नर्मदा की भगवान् रुद्र के समान तांडव कर उठी। ....वर्षों में दी हुई संपत्ति को नर्मदा एक आवेश में लूटकर ले गई।....उसके साथ नर-नारी, मानो मृत्यु की इस भीषणता में भी उनका धन का मोह न छूटा हो और अभी भी उसके पीछे भागे जाते हों। अनेकानेक गउएँ पानी के ओघ पडकर अपने प्राणों को बचाने की निष्फल चेष्टा करतीं ओर तरंगों की चपेट में आहत होकर जीवन खो बैठतीं। उनके आकाशभेदी भीषण रंभण को नर्मदा अपने भीषणतम रब में दबाने का प्रयत्न करती, परंतु जिनके कान हैं, वे तो उसे सुन ही लेते। आकाश भी फटता तो जरूर, परंतु दुष्ट नर की भाँति अनुनय-विनय, आक्रोश और आर्तनाद सुनकर और अधिक क्रोध को निकालता हुआ मृत्यु की वृष्टि करता। हाँ, आक्रोश को सुनकर शंकराचार्य का हृदय-पट भी मानों विदीर्ण हुआ जाता था। उनको अपने आश्रम में बैठा रहना कठिन हो गया। ....समस्त संसार को समझने वाले शंकर ने न जाने कितने दिन इन बाढ पीढितों की सेवा में बिताए। आश्रमवासी कहते, हमको इस सबसे क्या प्रयोजन? हमको तो परम सत्य का अनुसंधान करने में और परबह्म का साक्षात्कार करने में अपना समय बिताना चाहिए। परंतु शंकर जानते थे कि परम सत्य क्या है?...आश्रमवासियों के साथ वे पीडितों की सेवा में जुट गए। जब महापुरुष किसी कार्य को हाथ में लेता है तो प्रकृति की दुर्दांत शक्तियाँ भी उसके सामने झुक जाती हैं। उन्होंने यह नर्मदाष्टक बनाकर नर्मदा की स्तुति की, जिससे उसका क्रोध भी शांत
हो गया।’’
‘‘बदरिकाश्रम में ब्रह्मनिष्ठा में लीन भगवान् गौडपादचार्य से गौविंदपाद ने शंकर का परिचय कराया। उन्होंने देखा कि उसके पास अपने देश और धर्म की दशा को देखकर रोने वाला हृदय भी है तथा उसी हृदय में उन्ह इस दशा को दूर करने की एक अत्यंत प्रखर आकांक्षा भी दिखई दी। वे जानते थे कि शंकर अहंकार अदि दुर्गुणों से कोसों दूर है, परंतु फिर भी उन्होंने उसे अपने पास और चार वर्ष रखा, स्वयं उसको शिक्षा दी तथा दोषों को बनी-बीनकर निकाल फेंका। बर्फीली चट्टानों की उज्ज्वलता में उसने अपने धर्म की उज्ज्वलता कोक देखा।’’ राष्ट्रसेवा व्रती की दीनदयाल जी की यह कल्पना सहज ही समझी जा सकती है।
उपनिषद एवं प्रस्थानत्रयी का भाष्य प्रारंभ, शंकराचार्य ने गौडपादाचार्य से उनकी मुंडकोपनिषद-कारिका पर भाष्य लिखने की आज्ञा माँगी। आज्ञा मिलते ही सरल एवं सरस भाषा में भाष्य लिखा कि गौडपादाचार्य उसको देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने उसी समय शंकराचार्य से वेदांत-प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखने को कहा। शंकराचार्य ने षोड्श भाष्यों की रचना की। चार वर्षों की छोटी सी अध्ययन अवधि में इतने भाष्य लिख डालना अत्यंत आश्चर्य की बात है।
प्रसन्न भगवत गौडपादाचार्य शंकर को अपने गुरु एवं परमगुरु शुक और महर्षि बादरायण के दर्शन कराने के लिए कैलास पर्वत पर ले गए। वेदांत के आदि प्रणेता के दर्शन करके शंकर ने अपने आपको धन्य समझा और उसी समय ‘धन्याष्टक’ की रचना की। शंकर की साधना का यह संदेश दीनदयाल जी ने व्रतियों की दृढता के लिए और परम्परा के परिचय के लिए दिया है।
भारत के चारों धामों और सर्वपंथ समन्वय की आज की उपादेयता एवं प्राशंगिकता को दीनदयाल जी शंकर के माध्यम से बताते हैं। अग्नि शर्मा, ‘‘यह धन है, जो माता आर्यंबा ने तुम्हारे पास भेजा है। वे अपने अंतिम साँसें गिन रही हैं।’’ उस धन का शंकराचार्य क्या करते? वह संपत्ति राष्ट्र की थी। अतः उन्होंने बदरिकाश्रम में ही उस धन से श्री बदरीनाथ का मंदिर बनवाया। १३,००० फीट की ऊँचाई पर हिमालय की उपत्यका में आज भी यह भव्य मंदिर खडा हुआ है और इसके साथ ही वह विशाल हिंदू-राष्ट्र भी खडा हुआ है, जिसकी नींव शंकर ने इस मंदिर के साथ रखी थी।...जिन कांचन पात्रों में भगवान् का भोग लगाया जाता है, वे शंकराचार्य के लिए हुए हैं तथा आज तक अग्नि शर्मा के वंशज ही इस मंदिर में पूजा करने के अधिकारी हैं।’’
माता के स्नेह से वंचित दीनदयाल जी का मातृदेवोभव का भाव शंकर के माध्यम से, ‘‘बदरिकाश्रम से कालटी लगभग १,८०० मील दूर है। उस समय रेल नहीं थी, हवाई जहाज नहीं थे, संपूर्ण मार्ग पैदल ही चलना था।...उनके पैर जमीन पर नहीं पडते थे। जमीन छूने में भी समय लगता है न? वे उडे जा रहे थे। भगवान की कृपा से माता के अंतिम दर्शन कर सके। दौडकर अपनी माता के चरण पकड लिए। वे भूल गए थे कि वे संन्यासी हैं, सर्ववंद्य हैं। नहीं, भूले नहीं थे। वे जानते थे कि कितने ही बडे क्यों न हो जाएँ, माता के लिए तो वहीं शंकर है और फिर माता माता ही है, सर्वदा आदरणीय है, पूज्य है। माता आर्यंबा ने उसको गले से लगा लिया। हर्षातिरेक से उसके आँसू निकलने लगे।’’ दीनदयाल जी भागीरथी परंपरा आज भी अभीष्ट है, ‘‘शंकराचार्य ने माता की खूब सेवा-शुश्रुषा की। नदी में नित्य नहाने लगे।’’ दीनदयाल जी भागीरथी परंपरा आज भी अभीष्ट है, ‘‘शंकराचार्य ने माता की खूब सेवा-शुश्रुषा की। नदी में नित्य नहाने वाल आर्याम्बा को चिंताकुल देखकर शंकराचार्य ने कहा, ‘माँ, तुम चिंता क्यो करती हो? अब तम तुम नदी तक जाती थीं, अब नदी तुम्हारे पास आएगी।’’ आर्यंबा कुछ भी नहीं समझ पाईं, परंतु उन्होंने अपने पुत्र की बात पर विश्वास कर लिया, क्योंकि वह जानती थीं कि शंकराचार्य में अलौकिक शक्ति है। ‘‘नहीं, बेटा नहीं, नदी पर मत जा, नदी में ग्राह है।’’ आर्यंबा ने घबराकर कहा। शंकराचार्य हँस दिए और बोले, ‘‘वह तो मर चुका माँ! अब मुझे फिर संन्यास थोडे ही लेना है?’’
शंकराचार्य नदी पर गए एक मटका पानी भरा और नदी में कुछ बल्ल्यिों का बेडा इस प्रकार बाँध दिया कि नदी का प्रवाह पलट गया। माता आर्यंबा ने उस दिन घडे के पनी से स्नान किया। परंतु लोगों को यह रहस्य कहाँ मालूम था, वे तो शंकराचार्य के अतिमानुषी कार्य के संबंध में तरह-तरह की चर्चा करने लगे। ‘‘श्ंकर! तू धर्म का ज्ञाता है। देश भर में धर्म का प्रचार करने वाला है। तनिक मुझे भी तो कुछ धर्म बता। मरते-मरते तो शांति मिले।’’
दीनदयाल जी आर्यांबा के माध्यम से कहलाते हैं कि शास्त्रों की बातें जन सामान्य के लिए कैसे बने। द्वैत से अद्वैत को समझाते शंकराचार्य ने ‘तत्त्वबोध’ की रचना की। सब कुछ सुनकर माता आर्यंबा ने कहा, ‘‘ये तो ऊँची बातें हैं, शंकर! देश के सब लोग इन बातों को समझ सकेंगे? मुझे तो कुछ भगवान् कृष्ण के विषय में ही बता।’’
संन्यासी और दाहसंस्कार। ‘‘कुल-कुटुंब के लोग बिगड गए और आर्यंबा का शव उठाने तक में सहायता नहीं दी। परंतु दृढनिश्चयी, दृढप्रतिज्ञ, निर्भीक एवं अपने अंतःकरण में प्रतिष्ठापित सत्य के समक्ष संसार की चिंता न करने वाले शंकराचार्य ने स्वयं एकाकी ही संपूर्ण संस्कार विधिवत् किए। अपने घर के आँगन में ही चिता रचकर अपनी बलिष्ठ भुजाओंं से उठाकर शव को चिता पर रखा और वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए अग्नि संस्कार किया। उसी समय उन्होंने ‘मातृस्तुति’ नाम की की कविता रची।’’ संत ज्ञानेश्वर का स्मरण यहाँ सहज है।
गोविंदपाद अंचेत अवस्था में हैं सुन अमरकांत की ओर दौड पडे। एक मास में अमरेश्वर पहुँच गए। प्रिय शिष्य शंकर की वाणी सुनी, आँखें खोल, ॐ का उच्चारण करते-करते वे महाप्रयाण कर गए। यहाँ से कर्तव्यपथ का प्रवाह प्रारंभ। काल और परिस्थिति के अनुसार करणीय संकेत यहाँ दीनदयाल जी शंकराचार्य जी के माध्यम से बताना चाहते हैं, ‘‘शंकराचार्य में अपने राष्ट्र और समाज के प्रति माता का स्नेह था तो चतुर चिकित्सक की भाँति शास्त्र का ज्ञान भी था। प्रथम तो अवैदिक तथा पुरानी परंपरा को नष्ट करने वाले बौद्ध आदि धर्म और दूसरे, उपर्युक्त धर्मों के कारण प्रतिक्रियास्वरूप अथवा वैदिक धर्म की रक्षार्थ उत्पन्न धर्म, प्रथम श्रेणी के मतों की अराष्ट्रीय प्रवृत्तियाँ जहाँ उनके हृदय को दुःखित करती थीं, वहाँ उनको इस कारण भी दुःख होता था कि दूसरी श्रेणी के अंतर्गत राष्ट्रीय वृत्ति वाले लोग भी संपूर्ण श्रेष्ठ परिस्थिति का आकलन किए बिना ही कुछ-न-कुछ करते हुए केवल अपनी-अपनी डफली लेकर अपना-अपना राग ही नहीं अलाप रहे हैं, वरन् अपना ही राम सुनाई दे, वहीं मधुर है, ऐसा समझकर दूसरे का मुँह बंद करने में तथा उनकी अपनी डफली फोडने में भी व्यर्थ ही अपनी शक्ति को गँवा रहे हैं।’’
‘‘भगवान् बुद्ध से लेकर अब तक (सातवीं सदी) १,००० वर्ष में समाज पर पडे हुए संस्कारों की अवहेलना करके कुछ एकदम उल्टी गंगा बहाने का प्रयत्न करते हुए वैदिक युग लाने का स्वर्ण-स्वप्न देख रहे हैं; तो कुछ इन संस्कारों को ही सर्वस्व समझकर गंगा में लिखने वाले गंदे नाले को ही गंगा समझकर उसी में डुबकी मारकर पुण्य प्रसाद लूटने के भ्रम में पडकर आत्म-प्रवंचना कर रहे हैं। अतः उन्होंने निश्चय किया कि प्रथम तो द्वितीय श्रेणी वालों को, जिनमें कि इस राष्ट्र के कल्याण की भावना है, जो ऋषि-मुनि प्रणीत वैदिक धर्म पुनरुद्धार की कामना करते हैं, उनको एक मार्ग पर लाया जाए, उनको संगठित करके उनमें एकसूत्रता निर्माण की जाए और इसके बाद आज भ्रम से जो अपनी प्राचीन परंपरा से टूटकर दूर जा गिरने के कारण अराष्ट्रीय वृत्तियों के शिकार बन गए हैं, उनकी अराष्ट्रीय वृत्ति दूर करके उनको अपने में मिलाया जाए। उनके कार्य की योजना बन चुकी थी, आंदोलन की रूपरेखा निश्चित थी। एक बार ध्येय और मार्ग निश्चित हुआ कि निष्ठापूर्वक लगन से कार्य करने वाले को ध्येय की ओर अग्रसर होने में देर नहीं लगती। उसकी जीवन-नौका फिर न तो शंका-कुशंका के भँवर में गोता खाती है और न विरोधियों के उठाए हुए झंझावात में डगमगाती है। ज्ञानमय श्रद्धा की पतवार उसको संपूर्ण भँवरों से बचाती है, आत्मविश्वास का पाल उठाते हुए तूफान में भी उसकी गति को बढाया ही है।’’ स्वतंत्रता के बाद हमारे इसी दृष्टि की अपेक्षा दीनदयाल जी
करते हैं।
वैचारिक युद्ध जीतने की दीनदयाल जी की नीति जो यहाँ दी जा रही है, स्तुत्य तो है ही अनुकरणीय भी है। जरा इसे शंकराचार्य के माध्यम से ठीक से समझने का प्रयत्न करें, ‘‘श्री काशी (वाराणसी) क्षेत्र म अधिक उपयुक्त और कौन सा स्थान हो सकता था? काशी युग-युग से भारत का सांस्कृतिक केंद्र रहा है। भारत की आत्मा ही काशी में निवास करती है, यह कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। बडे-बडे दिग्गज पंडितों का वहाँ सदा ही जमघट लगा रहता था। दूर-दूर से विद्याध्ययन के निमित्त विद्यार्थी यहाँ आते थे और गुरु के आश्रम में बारह-बारह, पंद्रह-पंद्रह वर्ष रहकर अपने-अपने यहाँ लौटते थे।
भगवती भागीरथी के किनारे जहाँ एक ही नहीं, दस-दस अश्वमेध करके चतुरंत भारत के एकछत्र साम्राज्य की घोषणा की गई हो, वहां उसी दशाश्वमेध घाट पर इन मिटते हए साम्र*ाज्यों तथा भारत की एकता के प्रश्न पर अवश्य ही विचार किया होगा। वहाँ यदि उन्होंने निर्णय किया हो तो क्या आश्चर्य कि बिना सांस्कृतिक एकता चाहिए। सांस्कृतिक एकता हुई तो फिर राजनीतिक एकता के लिए प्रयत्न करने वाले वीर जन्म ले सकते हैं। सांस्कृतिक एकता होते हुए राजनीतिक भिन्नताएँ भी राष्ट्र का गला नहीं घोंट सकतीं। उसके शरीर को चाहे कृश कर दें, परंतु आत्मा को नष्ट नहीं कर सकतीं। आत्मा यदि बली रही तो वह स्वयं शरीर को चिंता कर लेगी, वहाँ बैठे-बैठे मांधता, भरत, रघु, राम, युधिष्ठिर, कौटिल्य, चंद्रगुप्त पुष्यमित्र, शातकर्णि, शिवनाग, भारशिव, वाकाटक, प्रवरसेन, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य आदि के दिग्विजय के दृश्य एक के बाद एक उनकी आँखों के सामने बने चलचित्र की भाँति निकल गए।
राष्ट्र का स्वरुप भी सुरसरि के समान प्रतिक्षण परिवर्तनमय प्रवाहित होता है। इस परिवर्तन को रोकने की चेष्टा करना राष्ट्र को रुके हुए पानी के समान गंदा और कीटाणु परिपूर्ण बनाना है। उसी प्रकार इसे स्रोत के साथ संबंध-विच्छेद भी इसके जीवन-रस को शुष्क करने का प्रयत्न है। वे चाहते थे, हिंदू राष्ट्र और हिंदू धर्म सनातन स्रोत उसी प्रकार अजस्र प्रवाहित रहे, उसमें कहीं अवरोध न आए, परिवर्तन तो होते ही रहते हैं। किंतु उन नाम-रूपात्मक परिवर्तनों की ओट में हम अटल सत्य का, राष्ट्र की सच्ची आत्मा का दर्शन कर सकें। इस अवसर पर उन्होंने गंगास्तोत्र की रचन की, जो कि उनकी भावनाओ ंका स्पष्ट व्यक्तीकरण है। ....प्रस्थानत्रयी पर तो उनका भाष्य पूर्व प्रसिद्ध हो चुका था। काशी के पंडितों में उनके भाष्य की खूब चर्चा होने लगी। कमल अपने खिलने का कभी ढिंढोरा नहीं पीटता, कहीं विज्ञापन नहीं निकलवाता। उसका काम खिलना है, भौंरे स्वयमेव उसके आस-पास मँडराने लगते हैं। महापुरुष को भी अपने नाम का डंका नहीं बजवाना पडता।... ‘‘अब कितने दिनों तक काशी में ही बैठे रहेंगे आचार्य?’’ एक दिन चित्सुख ने कहा, ‘काम तो संपूर्ण भारत में करना है। चारों ओर से धार्मिक अनाचार के समाचार बढते ही जाते हैं।’ ‘‘धैर्य रखो विष्णु!’’.. वे बोले, ‘‘आंदोलन के अनुकूल शक्ति के संचित हुए बिना आंदोलन छोडकर असफलता और निराशा मोल लेना चाहते हो? सब धर्मों का समन्वय करना है, तदनुसार शक्ति भी संचित होनी चहिए।’’
समाज का एकात्मबोध बिना तत्व और व्यवहार में एकता लाये सम्भव नहीं, दीनदयाल जी के इस संदेश को चांडाल और शंकर प्रसंग के माध्यम से समझना होगा, ‘‘चांडाल एकदम मुडा तथा शंकराचार्य से बोला, ‘सर्वात्मैक्य तथा अद्वैत की बातें करना तथा व्यवहार में भेदभाव दिखलाना यह कौन सी रीति है, आचार्य? यह आडंबर कैसा? क्या मैं समझूँ कि आपका संन्यास, दंड और कमंडलु सब ढोंग है। और फिर आप आप किसको दूर हटने को कह रहे हैं? शरीर को? वह तो नश्वर है। मेरे और आफ शरीर में क्या अंतर है? एक से अवयव हैं, अंतर्वाह्य रचना एक सी ही है। इस पर भी शरीर सत्य नहीं माया है। उसके धोखे में पडकर अभेद का नाम लेकर भेद की सृष्टि कर रहे हैं? यदि आत्मा को आप दूर हटने को कह रहे हैं तो आत्मा तो सबके शरीर में एक है और फिर वह तो साक्षी है, निर्लेप है, उसको किसी का संग नहीं व्यापता। वह क्या किसी के छूने से अपवित्र हो सकती है?’’
अपने शिष्य की भूल पर बडा पश्चात्ताप हुआ और उसी समय उन्होंने ‘मनीषपंचक’ नाम से विख्यात पाँच श्लोकों की रचना की। उस चांडाल को अपना गुरु कहा। इतना ज्ञान रखने वाला चांडाल तो मानों सर्वज्ञ शंकर की ही प्रतिमूर्ति हो। कितना निरहंकार तथा विनम्र था शंकराचार्य का स्वभाव। छोट-से-छाटे को भी वे अपनाने को तैयार रहते थे। उनसे सीख लेते थे और उसे आदर देते थे। इसीलिए तो कहा है, ‘‘विद्या ददाति विनयम्।’’
शंकराचार्य के दिग्विजय की घोषणा से दीनदयाल जी का संकल्प, ‘‘महर्षि कौटिल्य ने जिस राष्ट्र मंदिर की नींव रखी थी तथा जिसका निर्माण इतने दिनों से अनेक आत्मविजयी, ऋषि-मुनि, दिग्विजयी सम्राट्र, कवि, कलाकार, साहित्यिकार, स्मृतिकार, पुराण के रचयिता तथा धर्मशास्त्रों के प्रणेता करते चले आ रहे हैं। आज उस मंदिर में राष्ट्रपुरुष की मूर्ति स्थापित करके उसे अभिमांत्रित करना है।’’
‘‘स्वामी शंकराचार्य ने अपनी दिग्विजय के निमित्त कुच कर दिया। किंतु वे संपूर्ण भारत में जन-आंदोलन करने को निकले थे। इसीलिए जनता को आकर्षित करने के लिए, उस प्रभाव जमाने के लिए ठाठ-बाट तथा सज-धजकर चलने की आवश्यकता थी। अपने आंदोलन को सफल बनाने के लिए यह साज शंकराचार्य ने सजाया, सब सााधन सामग्री जुटाई किंतु स्वयं इन सबसे अलिप्त थे। उनको छत्र, चँवर और अस्त्र-शस्त्र से क्या प्रयोजन? उन्होंने तो वैराग्य का कवच पहन रखा था। ज्ञान की ढाल धारण कर रखी थी, प्रस्थानत्रयी ही उनके शस्त्र थे और शिष्य वर्ग ही उनकी सेना। और यह सेना गंगा के किनारे-किनारे गाती जाती थी।’’ संसाधनों में अलिप्तता का यह राजसत्ता के लिए दीनदयाल जी का संदेश है।
पंथों के समन्वय के बिना देश को एकात्म करना सम्भव नहीं। ‘‘रामेश्वरम् में शिव की प्रतिष्ठा और उपासना करके समुद्रोत्तरण और लंका विजय करने वाले राम और राम का नाम लेकर हलाहल का पान करने वाले शिव में विरोध कैसा? सती के शव के कंधों पर रखकर भारत भ्रमण करने वाले शिव और दूसरे जन्म में भी शिव का वरण करने की इच्छा से घोर तपस्या करने वाली गिरिजा में कैसा अंतर? ये सब तो एक ही हैं। जो वैष्णव है, वह शैव है और वही शक्ति भी है। एक की पूजा और दूसरे का विरोध; भला यह कैसे चल सकता है, इसलिए स्थान-स्थान पर पंचायतन की पूजा करने का आदेश दिया है।’’
‘‘शंकराचार्य भी अपने दलबल सहित आगे को बढते; सूर्य भी उनके पीछे-पीछे चलता; आचार्य के आगे रहने की धृष्टता कैसे करता। इसीलिए आचार्य मध्याह्न को वृक्षों की छाया के रुक जाते; सूर्य को अपने कर्तव्यकर्म में बाधा न आए, इसीलिए आगे जाने को मार्ग दे देते। वृक्ष अपनी छाया को चारों ओर से समेटकर स्वामी शंकराचार्य के चरणों में अर्पित कर देते अथवा इतने बडे महापुरुष के अपने यहाँ आगमन पर संकोच के कारण छोटा-छोटा अनुभव करते थे। यही था उनका दैनिक कृत्य।’’ राष्ट्रहितार्थ त्यागी को चरैवेति का संदेश।
‘‘एक दिन उनका एक शिष्य अक्षयवट को देखने गया। यह वटवृक्ष सृष्टि के आदि काल से अपने स्थान पर खडा हुआ था। प्रलय के समय समग्र सृष्टि के नष्ट हो जाने पर भी वटवृक्ष इसी प्रकार बना रहा था। मार्कंडेय ऋषि ने उस समय इसी पर आश्रय लिया था। उस वटवृक्ष के नीचे उसने कुष्ठ रोग से पीडित एक व्यक्ति को देखा। उसका समस्त शरीर श्वेत हो गया था। शिष्य ने उसको आत्महत्या से रोका और शंकराचार्य के पास ले आया, क्योंकि उसको विश्वास था कि आचार्य उसको अवश्य ही चंगा कर देंगे। लोग उसको देखकर दूर भागने लगे; शिष्य को बुरा-भला कहने लगे कि किस बला को मोल ले आए। किंतु आचार्य ने सहर्ष उसका स्वागत किया। स्वयं उसकी सेवा सुश्रूषा की, औषधोपचार किया। उसका नाम ‘उदंक’ रखा तथा उसे अपना शिष्य बना लिया।’’ सेवा ही ईश्वर आराधना है। प्रयाग के निवास काल में ही उनकी भारती यमुनाष्टक, प्रयागाष्टक, लक्ष्मी-नृसिंह, पंचरत्न तथा वेदसार शिवस्तोत्र नामक कविताओं के रूप में प्रकट हुए।
दीनदयाल जी लिखते हैं, ‘‘प्रयाग में शंकराचार्य ने एक बडी विजय पाई, जिसका वर्णन किए बिना शंकराचार्य की प्रयाग यात्रा का वृतांत अधूरा ही रह जाएगा। यह विजय श्री प्रतिष्ठानपुरी के प्रभाकराचार्य के ऊपर। प्रतिष्ठानपुरी गंगा के नाम तट पर बसी हुई है तथा प्राचीन काल में सोमवंशी राजाओं की राजधानी थी। प्रतिष्ठानपुरी में कुमारिल भट्ट का शिष्य प्रभाकराचार्य रहता था। प्रभाकर कहने को तो कुमारिल भट्ट का शिष्य था; किंतु उसने कर्मकांड में भी अपना नया ही मार्ग निकाल रखा था। कर्मकांड को वह जीवन का सार सर्वस्व समझता था। स्वामी शंकराचार्य स्वयं उसके पास गए। शंकराचार्य को जीतकर शिष्य बनाने, वहाँ स्वयं ही हारकर शिष्य बन गए। यही नहीं, उसका समस्त अग्रहार शांकरमत में दीक्षित हो गया।
प्रभाकर के पृथ्वीधर नाम का एक पुत्र था। पाँच वर्ष की अवस्था से ही बोलना-चलना बंद कर दिया था। योगी की भाँति शांत चित्त से बैठा रहता था। प्रभाकर ने अनेक प्रयत्न किए, औषधोपचार करवाए, किंतु कोई परिणाम नहीं हुआ। स्वामी शंकराचार्य ने देखा कि पृथ्वीधर में समझ और ज्ञान का अभाव नहीं है, शंकराचार्य ने उससे अत्यंत आत्मीयता से बातें कीं। बालक तो प्रेम का भूखा होता है, वह हृदय की पहचान जानता है। अतः इनके निकट आ गया। आचार्य ने धीरे-धीरे सरल प्रश्न करते हुए उसके मन की गूढ बातों को निकाल लिया। मालूम हुआ, उसके मन में तो वेदांत के गूढ सिद्धांत पहले से ही जमे बैठे हैं। उसको भला इतने घोर कर्मकांडी के घर में कैसे शांति मिलती? शंकराचर्य के सामने अपना हृदय खोलकर उसने शांति लाभ किया। शंकरचार्य ने उसको अपना शिष्य बना लिया तथा ‘हस्तामलक’ नाम दिया। क्योंकि उसका संपूर्ण ज्ञान हाथ में रखे हुए आँवले के समान सुस्पष्ट था।’’ मनुष्य को केवल वाद से ही नहीं जीता जा सकता। पूरे परिवेश को समझने और निदान देने से कैसे परिवर्तन आता है। अंहकार में पिता-पुत्र को वात्सल्यभाव से दूर कर देता है परिणाम समझते ही शंकराचार्य उपाय कर संवेदनाओं को जीत लेते हैं। व्यक्तिनिर्माण की कला को यहाँ दीनदयाल जी ने उजागर किया है।
देश की विपरीत वैचारिक परिस्थिति में सूत्र ढूँढने का अनोखा तरीका दीनदयाल जी ने शंकर के माध्यम के माध्याम से रखा, ‘‘बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, शूरसेन आदि प्रांतों में बौद्धों को उखाड फेंकने का श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता था तो वह कुमारिल भट्ट को ही। उन्हीं के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप चारों ओर फिर वैदिक धर्म का बोलबाला हो रहा था। फिर भी वैदिक धर्म अभी भी जनता का धर्म नहीं बन पाया था। उन्होंने संपूर्ण भारत में घूम-घूम कर बौद्ध धर्म के प्रतिक्रियास्वरूप कर्मकांड का प्रतिपादन करना आरंभ कर दिया। नास्तिकवाद हाहाकार कर उठा।’’ आचार्य बोले, ‘‘कुमारिल का शिष्य मंडल मिश्र मिथिला में रहता है। वह बडा विद्वान् है। यदि उसका सहयोग प्राप्त होगा तो पूर्व मीमांसावादी सब लागों का सहयोग प्राप्त हो जाएगा। वहीं आजकल उनका मुखिया है। अब यहाँ से मिथिला चलना होगा।’’
विद्वान और प्रज्ञावान के कार्य में कैसा अन्तर होता है, मंडन मिश्र और शंराचार्य तथा भारती के संवाद से समझना होगा। ‘‘मंडन मिश्र उस समय श्राद्ध कर्म कर रहे थे। श्राद्ध के समय किसी भी संन्यासी की उपस्थिति वर्ज्य है। अतः इस नवागंतुक एवं अपरिचित संन्यासी को बिना पूछे-ताछे ही अंदर आया देखकर उनकी त्योरियाँ चढ गईं। उन्हें क्या मालूम था कि उनके युग का सबसे महान् व्यक्ति उनके सामने खडा है। उनको क्रुद्ध देखकर स्वामी शंकर ने शांत एवं मृदुल शब्दों में कहा, ‘‘क्षमा कीजिए मिश्र! एक ही मार्ग के यात्रियों का एक-दूसरे पर क्रोध कैसा?’’
‘‘कैसा एक मार्ग संन्यासी?’’ मंडन मिश्र ने न समझने के कारण कुछ खीजते हुए घृणा मिश्रित स्वर में कहा, ‘‘एक तो बिना पूछ गृह में प्रवेश किया और ऊपर से यह पहेली बुझौवल?’’
मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने, जो स्वयं विदुषी थी, मध्यस्थ का आसन ग्रहण किया। उस समय ऐसा प्रतीत होता था मानो महिष्मती ही तीर्थराज प्रयाग बना हुआ था।
पहले स्वामी शंकराचार्य ने ही कहा, ‘‘मिश्र प्रवर! आज की देश की दशा आपसे छिपी नहीं है। यह बात सत्य है कि भट्ट पादाचार्य कुमारिल ने अपना जीवन-सर्वस्व इस धर्म की सेवा में लगा दिया; जीवन का एक-एक क्षण वैदिक धर्म की पुनः स्थापना और वेद विरुद्ध धर्मों के खंडन में ही बिताया। आओ, हम दोनों मिलकर इन राष्ट्र विरोधियों को समाप्त करें; संपूर्ण भारतवर्ष में हिंदू धर्म का प्रचार करें तथा भट्टपाद के अधूरे कार्य को पूरा करें, उनकी आत्मा को शांति दें।’’
मंडल मिश्र बोले, ‘‘वेद विरोधी धर्म का तो नाश होना ही चाहिए तथा वैदिक धर्म की स्थापना भी होनी चाहिए। आफ पंचायतन के देवताओं का और आफ वेदांत का उसमें स्थान कहाँ है, आचार्य?’’ परंतु मंडनाचार्य! ‘‘यज्ञ, हवन, संध्या, उपासना आदि सब मन को शुद्ध करने के, क्षुद्र भावनाओं को निकालकर मन में उच्च भावनाएँ भरने के साधन मात्र हैं, वे साध्य तो नहीं हैं। साधन जीवन नहीं है, ध्येय ही जीवन है।’’ शंकर आगे बोलते रहे, ‘‘नदी का मार्ग नदी की इच्छा पर नहीं, धरातल की समतलता पर निर्भर है। हाँ! उसका एक ध्येय, उसके जीवन की प्रवृत्ति उसका धर्म समुद्र से मिलना है, उसे कोई रोक नहीं सकता नहीं सकता। यदि किसी ने रोकने का प्रयत्न भी किया, तो उस दुर्मूढ को नष्ट पडेगा। हमारे राष्ट्रीय जीवन का भागीरथी प्रवाह भी पिछली सहस्राब्दी म वैदिक जीवन के हिमालय से नीचे उतरकर पौराणिक जीवन के मध्य देश की समतल भूमि पर इधर-उधर चक्कर लगाता हुआ समुद्र की ओर आगे बढा है। आज गंगा की गडगडाहट न सुनाई दे, तो दुःख मनाने का कारण नहीं है, शांत कल-कल ध्वनि भी गंगा की है। पिछले हजार वर्ष में अपने बदले स्वरूप के कारण हमको भय खाने का कोई कारण नहीं है। शिशु की सुकुमारता का स्थान यदि युवक की बलिष्ठ कठोरता ने ले लिया हो, तो न तो बालकपसन की कोमलता के लिए रोने का कारण है और बाह्योपकरणों से उसे उत्पन्न करने की आवश्यकता है। ह*ाार वर्षों में हमने जिन प्रवृत्तियों का विकास किया है, वे न तो नष्ट की जा सकती हैं और न उनको नष्ट करने की आवश्यकता ही है।
प्रजापति दक्ष के यज्ञ में स्वाभिमान की रक्षा करने के निमित्त आत्माहुति देने वाली सती के शव के अंग-अंग आज संपूर्ण भारत में यत्र-तत्र बिखरे पडे हैं। शाक्तों के उन तीर्थ स्थानों पर आज भी, जिनकी आँखें हैं, वे दक्ष प्रजापति के यज्ञ की उठती हुई ज्वाला देख सकते हैं। उन ज्वालाओं से प्रकट माता की मूर्ति के सम्मुख किसका मस्तक नहीं झुक जाएगा। बौद्ध धर्म की आराष्ट्रीय प्रवृत्तियों को इन्हीं राष्ट्रीय कल्पनाओं ने रोका है, मंडनाचार्य! इनको छोडकर राष्ट्र का कल्याण कैसे हो सकेगा?’’
स्वामी शंकराचार्य रुके। मंडन मिश्र मन से सुन रहे थे। आचार्य ने फिर कहना प्रारंभ किया, ‘‘यदि हमारा यह विकास परकीयों के अनुकरण स्वरूप होता, हमारी आत्मनिर्भरता, आत्माभिमान और आत्मविश्वास को नष्ट करने वाला होता, हमारे अंदर आत्मगौरव को प्रज्जलित न करता, प्राचीन परंपरा को छिन्नविच्छिन्न करता तथा अराष्ट्रीय प्रवृत्तियों का जनक होता तो हम इसको समूल उखाड फेंकते, इसका तनिक भी मोह न करते, किंतु यह तो अपने पूर्वजों की परंपरा को ही पुष्ट करने वाला है, पूर्वजों के द्वारा वपन किए हुए बीज ने ही वृक्ष का रूप धारण किया है।’’
किंवदंती तो यह है कि स्वयं महर्षि जैमिनि ने प्रकट होकर शंकराचार्य के मत की पुष्टि की। अब मंडन मिश्र ने अपने को आचार्य के चरणों में अवनत पाया और आचार्य ने ीाी आनंदाश्रु बहाते हुए उन्हें अपनाया। राष्ट्र की संवेदना से उनका हृदय तो पहले ही पूर्ण था, अब उनको निश्चित मार्ग भी मिल गया। वे शंकर के समान ही संन्यास धारण करके साथ चलने को तैयार हो गए।
‘‘आचार्य, अपने मेरे पति का तो मुँह बंद कर दिया है किंतु अभी आपने उनको पूर्णतया नहीं जीता है। पत्नी पति की अर्धांगिनी होती है, जब तक आप मेरे साथ शास्त्रार्थ करके मुझे परास्त नहीं कर देते, तब तक तो उनका आधा भाग अविजित होने के कारण वे प्रतिज्ञानुसार संन्यासी नहीं हो सकते।’’
‘‘आपने सिद्धांत तो सब ठीक रखे हैं आचार्य; किंतु आपका माया, ब्रह्म तथा सर्वात्मैक्य का सिद्धांत संन्यासी के लिए ही सत्य हो सकता है। जो गृहस्थ है, जो संसार में रहता है, वह न तो आफ नैष्कर्म्य के सिद्धांत को मान सकता है और न वेदांत को ही अपने व्यवहार में ला सकता है।’’ किंवदंती तो यह कहती है कि भारती से विदा होकर वे जंगल में आए तथा वहाँ अपनी आत्मा को अपने शरीर से बाहर निकालकर एक मृत राजा के शरीर में प्रवेश कराया। मंडन मिश्र उनके अनेक शिष्य अब शंकराचार्य के साथ थे किंतु अब मंडन मिश्र ‘सुरेश्वराचार्य’ थे।
यहाँ दीनदयाल जी की दृष्टि स्पष्ट है। बिना बाह्याडम्बर और मतभेदों को समाप्त किए राष्ट्र के चिति की रक्षा सम्भव नहीं। दीनदयाल जी ने दिखाया कि ‘‘स्वामी शंकराचार्य ने किसी भी देवता का खंडन नहीं किया। लोगों की श्रद्धा को नष्ट नहीं किया। श्रद्धा तो दैवी गुण है, उसको नष्ट करना एक सद्गुण को नष्ट कर देना है। अतः उन्होंने श्रद्धा को नष्ट करते हुए केवल श्रद्धा का केंद्र बदल दिया। शाक्त, शैव, वैष्णव, गाणपत्य, आदित्योपासक आदि सबके सब एक एक ही शक्ति के उपासक हैं, उसी सहस्रान, सहस्रबाहु, सहस्रपाद, सहस्राक्ष राष्ट्रपुरुष की भिन्न-भिन्न स्वरूप में पूजा करते हैं।’’ यही आज अपेक्षित है।
राष्ट्र की एकात्मता में मठों का निर्माण। ‘‘दक्षिण का भ्रमण करते-करते स्वामी शंकराचार्य काँची पहुँचे। काँची को दक्षिण का काशी कहा गया है। उत्तर की भाँति दक्षिण की, वह भी संस्कृति का केंन्द्र रही है। यह केवल संस्कृति और धर्म का ही केंद्र नहीं था, अपितु सब प्रकार से धन-धान्य से भी परिपूर्ण थी। अतः उन्होंने समाज को स्फूर्ति देने वाले उसके जीवन-स्रोत-स्वरूप, प्रत्येक की श्रद्धा के केंद्र ‘मठ’ की स्थापना करने का विचार किया-मौजें मारने वालो महंत तथा चाटुकार चेलों की रंगस्थली नहीं, अपितु समाज के सच्चे सेवक, देश के कर्णधार, ज्ञानी, विद्वान्, निस्सवार्थी, निस्पृही तथा दृढ-निश्चयी कार्यकर्ताओं को शिक्षित करके संपूर्ण देश में भेजने वाले स्थान के रूप में उन्होंने मठ स्थापित किए। कहते हैं कि कांची में ही उन्होंने पहला मठ स्थापित किया था। किन्तु उनका स्थापित श्ाृंगेरी मठ ही अधिक विख्यात है तथा आज तक चला आ रहा है सुरेश्वरचार्य को उन्होंने श्ाृंगेरी का सबसे पहला मठाधीश नियुक्त किया। दक्षिण को ज्ञान की दिशा देने वाला, उनको धर्म का पाठ पढाने वाला, उनको धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था देने वाला उत्तर का मिथिला का ब्राह्मण सुरेश्वराचार्य हुआ। और उत्तर में जोशी मठ का आचार्य दक्षिण का ब्राह्मण नियुक्त किया गया। जीवन के एक-एक क्षेत्र में उन्होंने भारत की इस एकता को बनाए रखने का कितनी सावधानी से प्रयास किया था।......जिस प्रकार श्ाृंगेरी और काँची में दक्षिण के लिए मठ की स्थापना की थी, उसी प्रकार जगन्नाथपुरी में भी पूर्व-प्रदेशों के मार्ग-दर्शन के निमित्त गोवर्धन मठ की स्थापना की। यहाँ से उसी भावना से प्रेरित होकर संन्यासी निकलते थे, जैसे श्ाृंगेरी मठ से निकलते थे, और इसीलिए तो दक्षिण और पूर्व एक ही रंग में रंग गए।..द्वारकापुर से आचार्य फिर उत्त की ओर चल पडे। अत्यंत भयानक मरुस्थल भी उनका मार्ग न रोक पाया। तप्तांश के उत्तप्त ताप से मरुकणिकाएँ लाल हो उठतीं, किंतु आचार्य शंकर शांत चित्त से अपने पैर बढाए जाते। शीत और ताप के प्रभाव से वे ऊँचे उठ चुके थे। अभी तक तो केवल हिंदुत्व में एकत्व निर्माण करने का, उनको संगठित करने का तथा अपनी शक्ति संचित करने का ही काम किया था। अब अंतर शक्ति के निर्माण के बाद बाह्य शत्रुओं की ओर ध्यान देना आवश्यक हो गया।’’
दीनदयाल जी जब शंकर और बौद्धों के साथ शंकराचार्य का विमर्श लिखते हैं कि स्वामी शंकर ने कहा,‘‘भगवान् बुद्ध मेरे ही पूर्वज थे। उनकी सहृदयता, मानव कल्याण की भावना, समाज के दुःख दूर करने की उत्कंठा, अपने ध्येय के लिए कठिन-से-कठिन जीवन व्यतीत करने की तैयारी, उनका तप, वैराग्य, शांत तथा जिज्ञासु वृत्ति किसके लिए अनुकरणीय नहीं होगी। वे तो हमारे राष्ट्र के महापुरुष थे।...‘‘धैर्य रखों युवक,’’ स्वामी शंकराचार्य ने कहा, ‘‘परायों को खूब अपनाओं, कौन रोकता है तुम्हें? किंतु पराये अपने बनें तब न। ‘‘उसने जो कुछ किया, एक धर्मप्रेमी के नाते किया। उसमें राजनीति की टाँग क्यों अडाते हैं, आचार्य?’’ धर्मभिक्षु ने कहा!....‘‘यह उसका धर्मप्रेम ही था, जो अश्वघोष को बलपूर्वक पाटलिपुत्र से पकडकर लाया? शासक का कोई धर्म नहीं होता, भिक्षवर,’’ आचार्य शंकर ने आगे कहा, ‘‘उसका तो एक ही धर्म है कि अपने शासन की जडें म*ाबुत करना और उसके लिएही वह सब प्रकार से प्रपंच रचता है। उसी के निमित्त इन शासकों के ये प्रपंच थे। वे जानते हैं कि यदि भारतवर्ष की प्राचीन परंपरा बनी रही, उसकी सामाजिक व्यवस्था बनी रही तो यह सदैव के लिए हमारे चंगुल में नहीं रह सकेगा। इसके विपरीत स्वतंत्रता की चाह को समाप्त करने का सबसे सरल मार्ग है- राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता का विनाश।......शंकर स्वामी ने शांत भाव से फिर कहा, ‘‘आफ सत्य सिद्धांत किसी को अमान्य नहीं हैं। भगवान् बुद्ध हमारे भी पूज्य हैं; दुनियाके दुःखों से हम भी तरना चाहते हैं; आपकी पूजा अर्चा तो भक्तिभाव के लिए प्रत्येक को आवश्यक है। ‘‘क्या कहा, हम बौद्ध नहीं, हिंदू है!’’, एकाएक कुछ भिक्षु बोल उठे। तर्कों को शांति मिली। आचार्य की विजय-कहानी चारों ओर फैल गई। राष्ट्रीयता की एक लहर उठी, उसमें लाखों बौद्धों ने अवगाहन किया, अपने मन के मैल को, संकुचित अराष्ट्रीय प्रवृत्तियों को धो डाला। अब उनका हृदय स्नेहपूर्ण तथा स्वच्छ था। भारत की समन्वयात्मक संस्कृति की पुस्तक का एक नया परिच्छेद खुल गया। घर से रूठकर गए हुए बालक को आज स्वामी शंकराचार्य पुनः घर में ले आए। कितना हर्षपूर्ण रहा होगा वह दिन। आचार्य शंकर भी उनका अपने मत में दीक्षित किए बिना कैसे रहने देते? जब तक मस्तिष्क में विकार है, तब तक शेष शरीर के हृष्ट-पुष्ट होने से ही काम नहीं चलता और काश्मीर भारत का प्राकृतिक दृष्टि से ही नहीं, ज्ञान और विज्ञान की दृष्टि से भी मस्तिष्क ही था। मुझे लगता है कि शंकराचार्य के लिए दीनदयाल जी के यह शब्द अपने व्यवहार के थे, ‘‘वे शब्दों के पीछे नहीं थे, व्यवहार के पीछे थे। सूखे तर्क का उन्होंने कभी सहारा नहीं लिया।’’ यही दीनदयाल जी का व्यक्तित्व था जो यहाँ उभर कर आता है।
शंकराचार्य कश्मीर में कुछ दिन रहे। जिस स्थान पर रहे, वह ‘शंकराचार्य की पहाडी’ के नाम से अभी तक प्रसिद्ध है। किंतु केवल एक पहाडी को ही शंकराचार्य की पहाडी कहना भूल होगी, क्योंकि जिस-जिस जगह उनके चरण गए, वह उनका है, भारत का है और वे चरण आसिंधु-सिंधु भारत के कण-कण में मानसरोवर से निकली ब्रह्मपुत्र जब तिब्बत की पहाडियों में अपना वास्तविक स्वरूप भूलकर साँपी बन गई तो वह शिव के ज्ञान की थाती को भी शुद्ध न रख सकी। फलतः तिब्बत के तंत्रवाद से मिश्रित शाक्तवाद पूर्व में प्रचलित हुआ। उसमें ज्ञान की शुभ्र ज्योत्स्ना नहीं थी किंतु अज्ञान की हरीतिमा छिपी हुई थी। आचार्य शंकर के तत्त्व बुद्धि-ग्राह्य और तर्क-सम्मत होने पर भी वे नहीं समझना चाहते थे। क्योंकि समझने से उनके स्वार्थ और नेतृत्व पर आघात होता था। धर्म की हाड में जिन दुराचारों को व्यवहार में लाया गया था, उनके संस्कार जीवन पर पड चुके थे। इच्छाशक्ति इतनी निर्बल हो गई थी कि वह दुर्वृत्तियों पर विजय पाने में असमर्थ थी। ऐसे समय में अपने दुराचारों को धर्मोचित और न्यायोचित ठहराने का दुराग्रह करना ही दुर्वृत्तियों पर विजय पाने में असमर्थ थी। ऐसे समय में अपने दुराचारों को धर्मोचित और न्यायोचित ठहराने का दुराग्रह करना ही अपने ऊँचे पद और नेतृत्व को बनाए रखने का एकमेव मार्ग रह गया।
आचार्य शंकर बच तो गए किंतु अभिनव गुप्त उनको अपने मार्ग से हटाना ही चाहता था। उसने अनेक विधियाँ करके उनका अहित करने का प्रयत्न किया। प्राग्ज्योतिष के जलवायु का भी आचार्य के बलिष्ठ शरीर पर प्रभाव पडा, और उनको भगंदर आचार्य को यह मान्य नहीं था, क्योंकि अभी प्राग्ज्योर्तिष में उनका कार्य पूरा नहीं हुआ था। ‘‘भगवान् ने यह शरीर विशेष कार्य को पूर्ण करने के लिए दिया है, ‘‘उन्होंने कहा, ‘‘कार्य के स्थान पर मैं शरीर की चिंता करने लगूँ तो भगवान् की इच्छा के विरुद्ध होगा।’’ दीनदयाल जी के भावी घटनार्थ क्षण यहाँ दिखाई देते हैं।
यद्यपि महनीय हिमाद्रि की गुफाओं से गुप्तम ज्ञान को खींचकर लाने के स्थान पर उन्होंने वहीं ज्ञान अपने मानस की गहन गुत्थियों को सुलझाकर प्राप्त किया था, किंतु इससे उनको संतोष नहीं होता था। हिमालय उनको जीवन भर बुलाता रहा था, अब भावना के इस प्रकार के मार्ग में कर्तव्य आडे नहीं आता था। अतः उन्होंने बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान कर दिया।
दीनदयाल जी लिखते हैं, ‘‘भारतीय राष्ट्र जीवन में भगवान् कृष्ण के पश्चात् उनका ही आविर्भाव राष्ट्र की मूलभूत एकता को व्यावहारिक स्वरूप देने में समर्थ हुआ। भगवान् कृष्ण ने गीता के द्वारा भिन्न-भिन्न विचार-धाराओं में एकात्मता निर्माण करने का प्रयत्न किया तथा राष्ट्र की इस एकात्मता को धर्मराज युधिष्ठिर के चतुरंत साम्राज्य के रूप में स्थापित किया। आचार्य शंकर ने यद्यपि धर्मराज के समान किसी राजनीति महापुरुष को भारतीय एकता का प्रतीक नहीं बनाया किंतु राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एकता का निर्माण करके तथा उस एकता के संस्कारों को डालने वाली परंपरा को पुष्ट करके जो सांस्कृतिक जीवन की एकात्मता को शक्ति दी है।
आर्चाय शंकर के सिद्धांत और प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भारतवर्ष एक ओर तो रूढिवादी कर्मकांड और दूसरी ओर नास्तिकवादी जडवाद के गर्त में गिरने से बच गया। आचार्य शंकर ने भारतवर्ष का उद्धार किया, हम भी अपने इस महान् राष्ट्र पुरुष के प्रति इससे अच्छी कौन सी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं कि उनके इस एकत्व के सिद्धांत को अपने जीवन में लाकर पुनरपि भारतवर्ष को उन्नत एवं वैभवशाली बनाएँ। बतीस वर्ष की आयु में इतना महान् कार्य करने वाले आचार्य शंकर के अखंड कर्ममय जीवन से हमारे जीवन को भी कर्म की स्फूर्ति प्रदान हो तथा अपने पुरुषार्थ, निश्चय, निष्ठा और त्याग के बल पर अद्वैत के सत्य सिद्धांतों के द्वारा संपूर्ण संसार को सच्ची शांति का सुख देकर उन्हें जगद्गुरु के वास्तविक पद पर
आसीन कराए। यही है, उनका पुण्य स्मरण एवं उनकी सच्ची पूजा।’’
शंकराचार्य उपन्यास दीनदयाल जी की वह कृति है जो भारतीय आध्यात्मिक चेतना को विस्तार करते हुए राष्ट्रजीवन को समुन्नत करता है। वह राष्ट्रसाधकों के लिए दीनदयाल जी के मानसिक सूत्र को शंकर के माध्यम से उद्घाटित करता है।
सम्पादक-साक्षात्कार, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, संस्कृति भवन, बाण गंगा चौराहा, भोपाल-३