दीनदयाल उपाध्याय के उपन्यास का कथ्य एवं शिल्प

डा चमन लाल गुप्त


दीनदयाल उपाध्याय जी को एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही अधिकतर जाना जाता है जिन्होंने भारतीय जन संघ के राष्ट्रीय सचिव के नाते उसे एक वैचारिक अधिष्ठान भी दिया और संगठनात्मक स्थिरता भी प्रदान की। उन्होंने १९४० में ‘चन्द्रगुप्त’ और १९४७ में ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ शीर्षक से दो लघु उपन्यास भी लिखे थे, इस पर विद्वानों का ध्यान कम गया क्योंकि उनके विराट राजनीतिक व्यक्तित्व ने उनके साहित्यकार को दृष्टि से ओझल कर दिया। इन दोनों उपन्यासों को ऐतिहासिक उपन्यास कहा जा सकता है क्योंकि दोनों के नायक ऐतिहासिक महापुरुष हैं। चन्द्रगुप्त ने चाणक्य के साथ मिलकर राष्ट्र को विदेशियों से मुक्त ही नहीं किया बल्कि भारत की राजनीतिक एकता की नींव भी रखी। इसी प्रकार आदि शंकराचार्य ने आठवी शताब्दी में भारत के सांस्कृतिक पतन और बिखराव को देखा, समझा और उसे रोकने का उपयुक्त सफल प्रयास किया। भारत की सांस्कृतिक एकता के पक्षधर इस योद्धा-संन्यासी के अद्भुत व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति दीनदयाल उपाध्याय सहज ही आकर्षित हुए क्योंकि जिस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वे समर्पित कार्यकर्त्ता थे उसका वैचारिक अधिष्ठान बहुत कुछ ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर टिका है जिसे आदि शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से अपने समय में स्थापित किया था। आदि शंकराचार्य ने राष्ट्र को एक करने के लिए विभिन्न उपायों पर विचार किया होगा और अन्ततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचे होंगे कि एक राष्ट्र के रूप में भारत का अस्तित्व साझी सांस्कृतिक विरासत पर टिका है जिसका मूलधार वैदिक अथवा हिन्दू संस्कृति है। साहित्य-रचना यदि एक सोद्देश्य कर्म है तो दीनदयाल उपाध्याय जैसे राष्ट्रवादी, भारतीय संस्कृति के प्रबल पक्षधर के लिए आदि शंकराचार्य से बढकर नायक कौन हो सकता था? यही कारण है कि उन्होंने आदि शंकराचार्य के जीवन और कृतित्व को आधार बनाकर यह जीवनीपरक ऐतिहासिक उपन्यास रचा जो प्रेरक भी है और मनोरंजक भी।
(१) ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ का कथानक ः
जगद्गुरु श्री शंकराचार्य उपन्यास का कथानक शंकराचार्य के जीवन पर आधारित है। सुदूर केरल के कालरी गाँव में शिवगुरु और आर्याम्बा के यहाँ भगवान शिव की कृपा से घोर साधना कर आर्यम्बा ने जिस पुत्र रत्न को प्राप्त किया वही शंकर कहलाया। छह वर्ष की अवस्था में गुरुकुल में प्रवेश कर मात्र दो वर्ष में शास्त्रज्ञान प्राप्त कर आचार्य बनकर लौटा शंकर, शंकराचार्य बना। पिता का इस बीच देहान्त हो गया। ग्राह द्वारा ग्रस लिए जाने के भय से माँ ने बालक को संन्यासी बनने की अनुमति दे दी। बालक शंकराचार्य गुरु की खोज में अमरकण्टक में नर्बदा के किनारे बने श्री गोविन्दपाद के आश्रम में पहुँचे और उनसे शास्त्र ज्ञान प्राप्त किया। गोविंदपाद बदरीकाश्रम में रहने वाले आचार्य गौडपाद के शिष्य थे। वे अपने योग्य शिष्य को अपने गुरु के पास बदरीकाश्रम ले गए। आचार्य गौडपाद ने बालक शंकराचार्य को वेदान्त की शिक्षा दी और सभी शास्त्रों का ज्ञान दिया। गुरु के आदेश से शंकराचार्य ने यही रहकर प्रस्थान त्रयी पर सोलह भाष्य लिखे। सम्पूर्ण भारतीय दर्शन-परम्परा का ज्ञान प्राप्त कर गुरु के आशीर्वाद से धर्म विजय के लिए शंकर काशी पहुँचे। काशी के विद्वान ब्राह्माणों से शास्त्रार्थ कर उन्होंने अद्वैतवाद की विजय का बिगुल बजाया। सैंकडों मेधावी शिष्य उनके साथ हो लिए। काशीराज रत्न सिंह ने भी साथ दिया। शंकराचार्य काशी से प्रयाग पहुँचे और प्रभाकराचार्य जैसे महान् कर्मकाण्डी को अपना शिष्य बनाने में सफल हुए। पटना में कुमारिल भट्ट के कार्य और प्रभाव को देखा और उनके परम शिष्य और विद्वान कर्मकाण्डी मण्डन मिश्र से मिथिला में शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित कर अपना शिष्य बनाया। उनकी पत्नी भारती ने भी शंकर से शास्त्रार्थ किया और उनके सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए उनकी व्यावहारिता पर प्रश्न चिह्न लगाया। कहते हैं कि व्यावहारिक सामाजिक जीवन का अनुभव पाने के लिए योगबल से राजा अमरूक का शरीर धारण कर राजकार्य करके छह माह पश्चात शंकराचार्य लौटे और पुनः भारती से शास्त्रार्थ कर उसे पराजित किया। वहाँ से दक्षिण में कांचीपुरम पहुँकर वहाँ के कर्मकाण्डियों को वेदान्त की दीक्षा दी। शंकराचार्य ने पंचायतन अर्थात् शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य और विष्णु की आराधना के लिए शिष्यों को प्रोत्साहित किया और अपने आराध्य को मध्य में स्थापित कर उसे विशेष स्थान देने को कहा। उनका मानना था कि सर्वदेव उपासना के योग्य हैं, श्रद्धापात्र है, पूज्य है। महाराष्ट्र पहुँचकर शैवों को वेदान्त ज्ञान दिया। विदर्भ के लक्ष्मी पूजकों को समझाया कि लक्ष्मी तो विष्णु की अनुचर है इसलिए विष्णु के अवतारों की आराधना करो। वहाँ से उडीसा में जगन्नाथपुरी पहुँच कर जात-पात की उपेक्षा कर विष्णु अवतार कृष्ण की पूजा को प्रोत्साहित किया। भक्ति को ज्ञान का प्रथम सोपान स्वीकार किया और सभी देवताओं और मत-मतन्तरों में समन्वय स्थापित किया। शंकर की धर्म विजय का मूलमंत्र समन्वय था, संघर्ष नहीं, इसलिए तर्क की अपेक्षा, भावना पर अधिक बल देते रहे। जगन्नाथ पुरी से सुदूर पश्चिम स्थित, द्वारिका में धर्म विजय करते हुए वे राजस्थान में होते हुए पंजाब पहुँचे। तक्षशिला में बौद्धों को राष्ट्रवाद का पाठ पढाते हुए उन्हें हिन्दू और वैष्णव सिद्ध किया और महात्मा बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर बौद्धों को शकों और हूणों से अलग किया तथा राष्ट्र की मुख्य धारा में लाए। अब भारत का सुदूर पूर्व का क्षेत्र बचा था जहाँ तिब्बत की तांत्रिक परम्पराएँ, शाक्त परम्परा से मिलकर वामपंथ के रूप में विकसित हुई थीं। आचार्य वहाँ शिष्यों सहित पहुँचे और वासनामय तंत्रवाद का खण्डन कर अद्वैतवाद और व्यावहारिक तथा नैतिक पूजा को प्रचलित किया। कॉमरूप और आसाम में रोगग्रस्त होते हुए भी आचार्य वहीं डटे रहे, अभिनवगुप्त जैसे कापलिकों से लोहा लेते रहे। अन्ततः जनमत उनके पक्ष में बना और लोगों ने शंकराचार्य का साथ दिया। वहाँ से आचार्य अपने गुरु के आश्रम बदरीनाथ पहुँचे तथा वहाँ से केदारनाथ गए। वहीं पर उनका
निधन हुआ।
(२) जगद्गरु श्री शंकराचार्य का कथ्य ः
निश्चय ही शंकराचार्य का जीवन परिचय देना मात्र इस उपन्यास का लक्ष्य नहीं रहा होगा यद्यपि शंकराचार्य का कोई प्रामणिक जीवन परिचय उनके समकालीनों या शिष्यों ने भी नहीं लिखा। मध्ययुग में मध्वाचार्य विरचित ‘शंकर दिग्विजय’ और आनन्दगिरि विरचित ‘शंकर-विजय’ रचनाएँ शंकराचार्य के जीवन पर प्रकाश डालती है परन्तु उन पर पौराणिकता का प्रभाव है। बंगाल में द्विजदास, राजेन्द्रनाथ और सुरेन्द्रनाथ भौमिक ने बांग्ला भाषा में उनकी जीवनियाँ लिखी हैं। रामकृष्ण आश्रम (नागपुर) के स्वामी अपूर्वानन्द ने भी ‘आचार्य शंकर’ शीर्षक से जीवनी लिखी है। दीनदयाल उपाध्याय के उपन्यास में जीवनी का तानाबाना लोकप्रचलित ही किया गया है परन्तु इसका लक्ष्य न तो शंकराचार्य की जीवनगाथा दुहराता है और न ही शंकर की धर्मविजय दिखाकर अद्वैतवाद का प्रचार करना है। दीनदयाल उपाध्याय ने शंकराचार्य के मानवीय पक्ष को उभारते हुए उनकी मातृभक्ति, दीनदयालुता, विद्यानुराग, कर्मठता, कष्ट सहन क्षमता और राष्ट्रप्रेम को रेखांकित अवश्य किया है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक एक बडे राष्ट्रीय लक्ष्य की पूर्ति करना चाहता है और वह है भारत की सांस्कृतिक एकता को रेखांकित करते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण में शंकराचार्य की भूमिका को दर्शाना। इस महान् योद्धा संन्यासी ने मात्र ३२ वर्ष की अवस्था में राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को समेटने, समन्वित और सुदृढ करने और सदैव के लिए सुरक्षित करने में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई उसपर इस उपन्यास में प्रकाश डाला गया है।
शंकराचार्य की दिग्विजय का लक्ष्य न तो अपने वेदान्त ज्ञान का डंका बजाना था न ही प्रचलित मत-मतान्तरों को नीचा दिखाकर अपना वर्चस्व स्थापित करना था। उनका लक्ष्य निर्गुण-सगुण उपासना पद्धतियों का समन्वय करते हुए विभिन्न पूजा-पद्धतियों, कर्मकाण्डों को आत्मोन्नति का साधन स्वीकार करते हुए आत्मा की अजरता, अमरता को सिद्ध करना, सभी में परमात्मा के अंश की विद्यमानता को रेखांकित करते हुए सर्वात्मैक्य भावना पर बल देना था। ‘अद्वैतवाद’ के माध्यम से व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि की एकता का जयघोष करना ही उनकी धर्मविजय का लक्ष्य था। भारत को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने हेतु सांस्कृतिक एकता के सूत्रों को रेखांकित करना और उन्हें सुदृढ करना ही इस उपन्यास का लक्ष्य है। शंकराचार्य के मन में राष्ट्र का स्वरूप कितना स्पष्ट था यह इस बात से ही पता चल जाता है कि उन्होंने भारत की चार दिशाओं में, चार प्रान्तों में धार्मिक मठ जिन्हें धर्म दुर्ग भी कह सकते हैं स्थापित किए। प्रहरियों के समान चारों वेद इन मठों में भारत की सांस्कृतिक सीमाओं की रक्षा हेतु स्थापित किए। शंकराचार्य की यह धर्मनीति दिग् विजयी सेनापति की रणनीति से मिलती है। उत्तर में बदरिकाश्रम में ज्योतिर्मठ, पश्चिम में द्वारिका में शारदा मठ, पूर्व में गोवर्धन मठ, जगन्नाथ पुरी में तथा दक्षिण में कांची में श्ाृंगेरी मठ स्थापित किया। चारों मठों के स्वामी शंकराचार्य कहलाए। चारों दिशाओं में हिन्दू धर्म रक्षकों के गढ स्थापित हो गए।
(३) ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ उपन्यास का शिल्प ः
साहित्य में ‘क्या कहा गया है’ के साथ-साथ ‘कैसे कहा गया है’ का महत्त्व भी होता है। उपन्यास का विषय राष्ट्रीय महत्त्व का है, हर भारतीय के जीवन को छूने वाला है इसमें सन्देह नहीं परन्तु क्या उपन्यास शिल्प की दृष्टि से भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, यह शंका उन लोगों को हो सकती है जो दीनदयाल उपाध्याय को एक विचारक, चिन्तक के रूप में तो मान्यता देते हैं परन्तु एक साहित्यकार के रूप में उन्हें मान्यता देने में संकोच करते हैं। वास्तव में दार्शनिक, धर्मोपदेशक और साहित्यकार, तीन ही जीवन-सत्य का उद्घाटन अपने-अपने ढंग से करते है। दार्शनिक, सत्य को ‘ज्ञेय’ बनाता है, धर्मोपदेशक उसे ‘श्रेय’ बनाता है और साहित्यकार उसे ‘पे*य’ बनाता है।
साहित्यकार का सत्य दार्शनिक के सत्य की तरह बुद्धि को ही नहीं भाता, उसका सत्य उपदेशक के सत्य की तरह केवल कल्याणकारी ही नहीं होता, वह सत्य को ऐसी भाषा, ऐसी शैली में प्रकट करता है कि वह प्रिय लगता है, अनायास हमारे मनोमस्तिष्क पर छा जाता है। उपाध्याय जी का यह उपन्यास सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विषय को शंकराचार्य के गौरवमय जीवन के माध्यम से ऐसी सरस, रोचक, ग्राह्य और प्रभावशाली भाषा शैली में प्रस्तुत करता है कि पाठक अनायास ही इसमें खो जाता है। इस उपन्यास में वर्णन शैली का प्रयोग प्रकृति-चित्रण में अधिक हुआ है। वहाँ भी भावुकता का मिश्रण और कल्पना की उडान दिखाई पडती है। व्याख्यान शैली का प्रयोग करना इस उपन्यास के विषय के अनुरूप आवश्यक था क्योंकि शंकराचार्य जगद्गुरु थे और उनकी अमृतयी वाणी को सुनने को लोग आतुर रहते थे। तर्क-वितर्क शैली का प्रयोग उपन्यास में अधिकतर स्थानों पर हुआ है क्योंकि आदि शंकराचार्य की धर्मविजय का आधार शास्त्रार्थ था जो कि तर्क-वितर्क के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का एक मार्ग है। सभी प्रतिद्वन्द्वी विद्वानों और आचार्यों के साथ शास्त्रार्थ करते हुए शंकराचार्य ने वेदान्त का प्रचार क्रिया और उसके द्वारा ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की स्थापना की। आचार्य शंकर ने शास्त्रार्थ संस्कृत में ही किया होगा, विद्वानों के साथ इसी भाषा में संवाद स्थापित किया होगा इसलिए ऐतिहासिकता की रक्षा करते हुए संस्कृतनिष्ठ शुद्ध हिन्दी का प्रयोग सहज ही किया गया है। लेखक की कल्पना की उडान उपमाओं, रूपकों में दिखाई पडती है और समाज सम्पृक्ति का प्रमाण मुहावरों और लोकोक्तियों के मुक्त प्रयोग में मिलता है। कथा-प्रवाह निरन्तर बना रहता है और पाठक की जिज्ञासा निरन्तर बनी रहती है कि ‘आगे क्या हुआ या होगा।’
३.१ व्याखान शैली ः आदि शंकराचार्य ने काशी में धार्मिक दिग्विजय पर निकलने पर निकलने से पूर्व अपने शिष्यों को प्रोत्साहित करते हुए भाषण देते हुए जो कहा वह व्याख्यान शैली का सुन्दर उदाहरण है। उन्होंने अपने शिष्यों और उपस्थित जनसूह को संबोधित करते हुए कहा- ‘‘बंधुवर्ग! आज हममें से प्रत्येक अपने तत्त्व सिद्धांतों का सर्वत्र प्रसार करने को उत्सुक है। पिछले १००० वर्ष में अपने धर्म की स्थिति विचित्र हो गई है। उसकी जडों को अनेक प्रकार से खोखला करने का प्रयत्न किया गया है और उसने अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर अपने ऊपर के आघातों को रोका है। हमें अभिमान है कि हमारे धर्म को अंदर और बाहर से कोई भी नष्ट नहीं कर पाया। यहीं पास ही सारनाथ है, वहीं एक दिन भगवान् बुद्ध ने धर्मचक्र-प्रवर्तन की घोषणा की थी। प्राचीन परंपरा के प्रति उदासीन रह कर उन्होंने नई रीति से धर्म की स्थापना की, उनके अनुयायियों ने इस उदासीनता को विरोध में पलट दिया। आक्रमणकारी विदेशियों ने इस विरोध का लाभ उठाकर उसे अपनाया तथा हमारे मर्मस्थलों पर आघात करके हमें नष्ट करने का प्रयत्न किया। किंतु जिस नदी का स्रोत अक्षय हिमराशि के नीचे हिमाद्रि के गर्भ में नहीं है, वह वर्षा ऋतु में कितना भी उफन-उफनकर चले, आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न कर दे, ग्रीष्म में तो वह सूख जाती है; उसका प्रवाह अजस्र नहीं रह सकता। यह श्रेय तो गंगोत्तरी से उद्भूत गंगा को ही मिलेगा। आज वेदविरोधी धर्म अंतिम साँसें ले रहा है। दूसरी ओर हिंदू धर्म के उत्थान के भी प्रयत्न हुए हैं। इन सब प्रयत्नों का हमें समन्वय करना है, एकीकरण करना है। महर्षि कौटिल्य ने जिस राष्ट्र मंदिर की नींव रखी थी तथा जिसका निर्माण इतने दिनों से अनेक आत्मविजयी, ऋषि-मुनि, दिग्विजयी सम्राट्, कवि, कलाकार, साहित्यकार, स्मृतिकार, पुराण के रचयिता तथा धर्मशास्त्रों के प्रणेता करते चले आ रहे हैं। आज उस मंदिर में राष्ट्रपुरुष की मूर्ति स्थापित करके उसे अभिमंत्रित करना है। भगवान् को धन्यवाद दें कि यह सौभाग्य हमको प्राप्त हुआ है। पूर्वजों के प्रगति पथ पर प्रयाण कर हम उनके कार्य को पूर्ण करें, इस मंदिर के प्रथम पुजारी बनें। ऐसा प्रबंध कर चलें कि पीछे आने वाली पीढियाँ इस मंदिर में अनंत काल तक पूजा कर सकें। जिन तत्त्वों का प्रतिपादन किया है, वे वेद सम्मत हैं, सत्य हैं, शाश्वत हैं, लोक कल्याणकारी हैं। किंतु केवल तत्त्वों को तर्क के तराजू में तौलते उनकी सत्यता और सुंदरता की आपस में ही चर्चा करते हुए मन-ही-मन मोद मनाते रहना अथवा कल्पना के किले बनाते रहने में काल का व्यय करना किसी भी उपयोग का नहीं है। उन तत्त्वों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता है। अपने धन, धाम, धरणी और धर्म की रक्षा के निमित्त अपना संदेश देश के कोने-कोने में, घर-घर में पहुँचाना होगा। देश की दुर्दशा तथा दीन-दुखियों पर दलबद्ध दुष्ट दानवों के अनाचार को देखकर केवल दो आँसू बहाने की अपेक्षा देह को कष्ट देकर दंभियों के दंभ को दूर करना होगा। दुष्टों की दुष्टता का दलन करना होगा। हमारे धैर्य के सम्मुख दुर्विनीतों का दर्प चूर हो जाएगा, दुष्टों की दाल नहीं गल पाएगी तथा तामसी तस्कर तीन-तेरह हो जाएँगे, जिसको अपने धर्म से प्रेम है, जिसकी नसों में अपने पूर्वजों का रक्त प्रवाहित होता है, जिसको अपने कार्य पर श्रद्धा है, जिसके मन में आत्मविश्वास जड जमाकर बैठा है, जिसके हृदय में उत्साह का सागर हिलोरें ले रहा है; मान-सम्मान, सुख और आनंद को विदा कर चुके हैं, जिन्होंने कष्टों का कर ग्रहण किया है, वे इस देश के कार्य के निमित्त, पुण्य कार्य के निमित्त मेरे साथ आएँ। भगवान् का आशीर्वाद, अपने पूर्वजों का पुण्य प्रताप, अनेक तपस्वियों का तपस्तेज तथा वीरों के बलिदान हमारे साथ हैं। हमें विश्वास है कि सफलता हमारा मार्ग साफ करती हुई चलेगी। जिसे चलना हो वह चले।’’१
इस भाषण को पढते समय पाठक को लगता है कि लेखक भाषणकला का अच्छा ज्ञाता है। काशी में खडे होकर वेद-विरोधी बौद्ध धर्म की आलोचना करते हुए, सारनाथ में दिए बुद्ध के व्याख्यान की प्रशंसा करना, बौद्ध कार्य की बरसाती नदी का उफान और वैदिक धर्म को हिमालय से निकलने के वाली सदानीरा गंगा बताना व्याख्यान कौशल को दर्शाता है। वैदिक धर्म के अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों की विकृतियों के कारण हिन्दूधर्म आहत हुआ है परन्तु लेखक शंकराचार्य के मुख से कहलाता है कि हमें समन्वय करते हुए उसी राष्ट्रमंदिर का निर्माण करना होगा जिसकी नींव चाणक्य ने रखी थी। वह अपने अनुयाइयों को अपने रास्ते ठीक होने का विश्वास दिलाता है और अपने धन, धाम, धरती की रक्षा के लिए कटिबद्ध होने के लिए प्रोत्साहित करता है। देशवासियों की दुर्दशा को देखते हुए वह सभी देशभक्तों को अपने साथ आने का आह्वान करता है। व्याख्यान में धारा प्रवाह शैली में अपने अनुयायियों को प्रात्साहित करते हुए वह उन्हें कर्मशील बनने की प्रेरणा देता है। भाषा का सौन्दर्य देखिए- ‘देश की दुर्दशा तथा दीन-दुखियों पर दलबद्ध दुष्ट दानवों के अनाचार को देखकर केवल दो आँसू बहाने की अपेक्षा देह को कष्ट देकर दंभियों के दंभ को दूर करना होगा। दुष्टों की दुष्टता का दलन करना होगा।’’ इन पंक्तियों में ‘द’ की ध्वनि का इतनी बार प्रयोग किया गया है कि रीतिकालीन कवि भी इस अनुप्रास योजना और ध्वन्यात्मकता को देखकर लजा जाएँ। व्याख्यान का इच्छित प्रभाव भी भीड पर पडा, यथा- ‘‘शंकर स्वामी ने शंख की ध्वनि की। चारों ओर का वातावरण गूँज उठा। कान में तेल डालकर बैठे हुए कर्महीनों के कर्ण-कुहरों में भी ध्वनि समा गई। विरोधियों के दिल दहल गए, अच्छे-अच्छे उस्ताद सब छक्के-पंजे भूलकर कन्नी काटने लगे।मत-मतांतर मनौतियाँ मानने लगे। प्रपंच परकटे पक्षी की भाँति छटपटाने लगा। आडंबर अचकचाकर पोल खुलती देख पीला पड गया। अनेकता और अनबन अब कुछ बनती न देखकर पाँव दबाकर खिसकने लगे। भेदभाव अपने ही भँवर में चक्कर खाने लगे, भीरुता भय खा गई, कायरता कूच कर गई तथा क्रूरता को काठ मार गया। उसी शंखध्वनि ने सहयोगियों का दिल दूना कर दिया। कर्मयोगियों के कर में मानो करवाल आ गई। ऐरे-गैरों में भी गुरुमंत्र के प्रभाव से अच्छे-अच्छों से आँखे मिलाकर खडे होने की हिम्मत आ गई। समन्वयता मानो संपूर्ण गगन-मंडल में गूँज के साथ छा गई। सरलता और शांति के साम्राज्य की मानो घोषणा हुई हो। स्पष्टवादिता सीधी-सीधी सुनाने को समुद्यत हो गई। मेल-मिलाप मनमुटाव को मटियामेट करके मोद
मनाने लगे।’’२
सफल भाषण का ऐसा ही परिणाम अपेक्षित था। भाषा प्रवाह दर्शनीय है। घोर-प्रवाह शैली का यह सुन्दर उदाहरण है।
३.२ वर्णनात्मक शैली ः उपन्यास में जगद्गुरु शंकराचार्य का देशप्रेम इसके भौगोलिक अवयवों को प्रगाढ आत्मीयता के साथ साहित्यक भाषा में वर्णन करने में प्रकट हुआ है। सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करते हुए काशी, कांचीपुरम, पाटलीपुत्र, द्वारिका, प्रयाग और जगन्नाथ पुरी जैसे शहरों से होकर वे गए तो इन शहरों का मनोहारी चित्रण किया। यहाँ की नदियों, गंगा, यमुना, सिन्ध और नर्बदा का गुणगान किया और गंगा, यमुना और नर्बदा पर अष्टक लिखे। उषा, मध्याह्न, संध्या एवं रात्रि का चित्रण मनोयोग से किया। सूर्य और चन्द्रमा का भी मोहक वर्णन उपन्यास में हुआ है। यह वर्णन कितना साहित्यिक और मर्मस्पर्शी है, इसे निम्न उदाहरणों से देखा जा सकता है-
३.२.१ हिमालय के दो चित्र ः ‘‘उसने देखा कि जो हिमालय बडे-बडे आँधी तूफानों में सिर उठाए खडा रहता है, वह गर्मी में अपने शरीर को गला-गलाकर भागीरथी को जीवन-दान देता है ताकि भारत के अगणित नर नारी जीवन और पुण्य लाभ करें। हिमाद्रि की इस मूक देशभक्ति को देखकर शंकर श्रद्धा से उनके सामने झुक गया।’’(पृ. ३१)
३.२.२ अपने अन्तिम दिनों में बदरीनाथ, केदारनाथ में घूमते हुए शंकराचार्य ने हिमालय का जो रूप देखा उसका वर्णन करते हुए लेखक कहता है- ‘‘भारतीय जीवन में हिमालय का एक विशेष स्थान एवं आकर्षण है। उसके प्रति प्रत्येक भारतीय का सिर कृतज्ञता के भार से झुक जाता है। वह माता के संतरी के समान दृढता से खडा है, अनेक बर्बर जातियों ने उसके ऊपर प्रहार किए, चोटें खा-खाकर स्वयं पत्थर बन गया किंतु उनको अंदर नहीं आने दिया। उत्तर के शरीर को भी भेदने वाली बर्फानी वायु को स्वयं पी जाता है, अपने शरीर को हिममय बनाकर दधीचि के समान हमारी रक्षा करता है। उद्धत दक्षिण सागर मेघ बनकर भारत की सीमा को पार करने का असफल प्रयास करता है, किंतु वह इस प्रहरी से नहीं बच पाता, वह अनुनय-विनय करता है, आर्द्रता दिखाता है, चीखता है, चिल्लाता है, आँखें तरेरता है, आठ-आठ आँसू रोता है, किंतु इस पत्थर हृदय, प्रहरी का दिल नहीं पसीजता, हार मानकर सागर में पानी-पानी होकर लौट जाता है, और हिमालय सागर की धृष्टता के दंड-स्वरूप जल लेकर हमको दे देता है, स्वयं नहीं रखता। निदाघ में तप्तांशु के प्रचंड करों से जब संपूर्ण भारत भूमि जल उठती है और उसकी संतान शुष्क कंठ हो तडफडाने लगती है, तब हिमालय ही अपने शरीर को गला-गलाकर हमको जलदान करता है। गंगा, यमुना और सिंधु अमृत-कलश लिए उसकी गोद से उतरकर हमको जीवन दान देती हैं। प्रभात के समय सुवर्ण रश्मियाँ जब हिमालय को स्नान कराती हैं तो वह उनकी सुवर्ण प्रभा को छीनकर अनंत रत्नों तथा नाना प्रकार की वीर्यवती औषधियों के रूप में हमको दे
देता है।’’३
हिमालय के अवदान का ऐसा मनोहारी, मार्मिक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। हिमालय की प्रशंसा करते हुए शंकराचार्य की भावमग* स्थिति को लेखक चित्रित करता है।
‘‘संपूर्ण विश्व की समृद्धि वृद्धि करते हुए भी उससे अलिप्त, विरक्त, शांत और ध्यानस्थ कर्मयोगी के रूप में हिमाचल उनके सामने खडा था। वे उस वृत्ति को हृदय में धारण कर लेना चाहते थे। उनके लिए हिमालय त्रिविष्टप की पवित्र भूमि, अनेक तपस्वियों की तपोभूमि तथा पुरुषार्थियों की कर्मभूमि थी। भगवान् शंकर का वासस्थान उनके समान ही योगमय किंतु सर्वतोभावी, साम्य किंतु भीषण, शांत किंतु सिंहनाद परिपूर्ण, दयालु किंतु कठिन, अवघड दान देते हुए’’४ भी अतिशय धनाढ्य, अनेकों की मृत्यु का कारण होते हुए भी जीवनदाता, वल्कल धारण किए हुए भी दिगंबर, हिमांशुधारी होकर भी उग्र था।’’ (पृ.-२०६) लेखक, हिमालय और शिवजी का साम्य इतने भावपूर्ण, प्रवाह युक्त शैली में करता है कि शिवरूप हिमालय का चित्र आँखों के सामने साकार हो उठता है।
३.३ नदियों का वर्णन ः प्रस्तुत उपन्यास में नर्बदा, गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का चित्रण भी आत्मीयता से किया गया है। गंगा का एक चित्र देखिए-
‘कल-कल करती जाह्नवी ने उनका समर्थन किया। उसकी उर्मिमाला उछल-उछलकर उनके इस शुभ संकल्प पर उसको बधाई देने का प्रयत्न करने लगी। पुण्य सलिता की स्वच्छ जलराशि ने उनको स्नान के लिए आमंत्रित किया मानो वह उनमें भागीरथ का अथक परिश्रम फूँक देना चाहती थी। उनमें उन समस्त ऋषियों का तप और तेज फूँक देना चाहती हो जिन्होंने स्नान किया और जिनका समस्त तप उसने उनसे मैल के मिस छीन लिया है। इसलिए गंगाजल में पवित्रता है, पापियों को भी तारने की शक्ति है, पुण्य करने का सामर्थ्य है।’’ (पृ. ४१) यहाँ प्रसंग काशी से दिग्विजय हेतु निकलने से पूर्व शंकराचार्य द्वारा गंगा स्नान का है। लेखक गंगा को सजीव मानता है, उसे भारतीय परम्पराओं की प्रतिनिधि मानता है। गंगाष्टक, नर्बदाष्टक और यमुनाष्टक लिखकर शंकराचार्य ने इन नदियों के प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया है। सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नदियाँ उत्तर में मानसरोवर से निकल कर क्रमशः पश्चिम और पूर्व की ओर बहती है, इसका वर्णन करते हुए लेखक कहता है-
‘भगवान शंकर के चरण प्रक्षालन करके मानसरोवर, ज्ञान और भक्ति का चरणोदक सिन्धु और ब्रह्मपुत्र के द्वारा भारत को भेजता है। दोनों सरिताओं के बाहुपाश में जकडा भारत युग-युग से शिव की आराधना करता आ रहा था।’’ (पृ. ९५) उपन्यास में वर्णनात्मक शैली का सौन्दर्य पग-पग पर देखा जा सकता है। ठोस बिम्बों, भावपूर्ण एवं प्रवाहयुक्त शब्द-विन्यास, कोमल कल्पनाओं से युक्त रूपकों के माध्यम से देश के कण-कण का चित्र लेखक ने प्रस्तुत किया है। पूरा उपन्यास भारत माता के गुणगान से भरा है।