दीनदयाल उपाध्याय के दो उपन्यास

डॉ महेश चन्द्र शर्मा



दीनदयाल उपाध्याय का समग्र व्यक्तित्व, अभी उनके देहावसान के बाद पाँच दशक बीतने पर भी, देश और दुनिया के सामने प्रकट और प्रत्यक्ष नहीं हुआ है। दीनदयाल उपाध्याय का सर्जनात्मक साहित्य उनके दो उपन्यास ‘सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’-१९४६ और ४७ की रचनाएँ हैं। अर्थात् सात दशक हो गए इनका प्रणयन हुए। इनका प्रणयन क्यों हुआ था? क्या इसलिए हुआ था कि दीनदयाल उपाध्याय को नाटककार या उपन्यासकार बनना था? इसलिए नहीं हुआ था। जिस ध्येय को वे जीते थे उस ध्येय के अनुकूल रचनात्मक विधाओं को वे खोजते थे।
प्रथम उपन्यास ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ उपन्यास विधा के नाते, साहित्य के नाते कैसा है, इस पर विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। वह काल था-जब आजादी का आंदोलन चल रहा था। देश की आजादी हमें लडकर प्राप्त होगी, याचक बनने से हमें कोई आजादी नहीं देगा-इस भावबोध को उद्दीप्त करने के लिए, आजादी के आंदोलन को एक वीरवृत्ति और नीतिमत्ता चाहिए थी। आजादी के आंदोलन की वीरवृत्ति कैसी हो? आजादी के आंदोलन की नीतिमत्ता कैसी होगी? उस वीरवृत्ति और नीतिमत्ता को उन तक पहुँचाना था, जो तब बाल और किशोरवय के स्वयंसेवक थे।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तत्कालीन कांग्रेस प्रस्तावों के याचक प्रयत्नों से संघ की सहमति नहीं थी। दीनदयाल जी उनमें नीतिमत्ता व वीरवृत्ति का अभाव देखते थे। ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ में ऐतिहासिक पात्रों चन्द्रगुप्त व चाणक्य के माध्यम से दीनदयाल उपाध्याय ने पराक्रमी व रणनीति कुशल स्वातंत्र्य-प्रयत्नों की ओर किशोर हृदयों को प्रवृत्त करने का प्रयत्न किया है। इस उपन्यास का कथाप्रवाह इतना सरस है कि एक बार पुस्तक पढना आरम्भ करने पर उसे पूरा पढने का आकर्षण उत्पन्न होता है। वैचारिक तथा दार्शनिक पक्ष से पुस्तक को बोझिल नहीं होने दिया गया है। भावों की तेजस्विता, भाषा का लालित्य व कथा का प्रवाह इस कृति की विशेषता है।
‘मनोगत’ में दीनदयाल उपाध्याय लिखते हैं ः ‘‘जिनके लिए यह पुस्तक लिखी गई है उन्हें सब प्रकार के ऐतिहासिक तथ्यों के वन में भ्रमण कराने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें इतना जानना पर्याप्त है कि यूरोपियन विद्वानों द्वारा प्रयत्नपूर्वक तथा उनका अन्धानुकरण करने वाले भारतीय विद्वानों द्वारा अनजाने में फैलाए हुए अंधकार को नष्ट करने वाले ऐतिहासिक शोध के सूर्यप्रकाश में देखी गई ये सत्य घटनाएँ हैं।’’
‘सम्राट् चन्द्रगुप्त’ विशिष्ट विचारधारा से आप्लावित एक किशोरोपयोगी ऐतिहासिक उपन्यास विधा में रचित उत्तम साहित्यिक कृति है। यदि दीनदयाल उपाध्याय ने उसे एक बैठक में लिख डाला तो यह उनकी विलक्षण साहित्यिक व बौद्धिक क्षमता का परिचायक है। बिना संदर्भ ग्रंथों की सहायता लिए कृति की रचना करना उनकी अध्ययन प्रवणता पर प्रकाश डालता है तथा स्मरण शक्ति के वैशिष्टय को भी प्रकट करता है।
दीनदयाल उपाध्याय की द्वितीय औपन्यासिक कृति है ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ जिनमें पात्र एवं घटनाएँ पुरानी हैं पर भाव, विचार व परिवेश नया है। दीनदयाल जिस पद्धति से कार्य करते थे उसमें समय देने के लिए जवानों को प्रेरित करना, उनमें देश के सांस्कृतिक गौरव का अभिमान उत्पन्न करना तथा अपना जीवन
समर्पित करने की आकांक्षा पैदा करना इस कृति का उद्देश्य था।
गुरुकुल प्रसंग पर अपनी इस कृति में दीनदयाल अपने एक पात्र सोमदेव से कहलवाते हैं ः
‘‘आजकल तो जितनी छोटी आयु में हो सके उतने में ही बालक को गुरु के पास भेज देना चाहिए। चारों ओर नास्तिकतावादी बौद्धों तथा वाममार्गियों का इतना प्रभाव बढता जा रहा है कि यदि छोटी आयु में वैदिक धर्म के भले संस्कार न पडे तो कुमार्ग पर बह जाने का डर रहता हैं न जाने कब इन वेद-विरोधियों का नाश होगा?’’
तत्कालीन समाज में व्यक्तिगत धनार्जन की प्रवृत्ति व राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक कल्याण की ओर दुर्लक्ष्य दीनदयाल उपाध्याय को पीडित करता था। वे यह भी देख रहे थे कि धर्मविरोधी वामपंथी लोग इस सामाजिक दुर्बलता का लाभ लेकर युवकों को विद्रोही बना रहे हैं। अतः उन्होंने समाज के आर्थिक कल्याण की उपेक्षा व व्यक्तिगत धनार्जन की वृत्ति को एक सामाजिक विडम्बना बताया। जब शंकराचार्य एक गरीब घर की आर्थिक दुर्दशा देखकर उसके धनाढ्य पडोसी के घर भिक्षा के लिए गए तो ‘‘.........वह धनी व्यक्ति भिक्षा लेकर उपस्थित हो गया। शंकराचार्य ने भिक्षा के लिए हाथ आगे बढाने के स्थान पर हाथ पीछे खींच लिये तथा मृदु स्मित हास्य के साथ मधुर शब्दों में बोले ‘‘जो अपने समाज के लोगो को अपना नहीं समझता, जिसके हृदय में अपने लोगों के लिए पे*म नहीं, ममता नहीं, उसका अन्न खाकर क्या धर्म वृत्ति उत्पन्न होगी?’’
‘‘जिसके बगल में इतना निर्धन परिवार हो वह स्वयं सुख और वैभव की गोद में खेलकर भी अपने को समाज सेवक कहे, अपने धर्म की दुहाई दे, यह कैसी विडम्बना है?’’
इस उपन्यास में जिस काल का ऐतिहासिक परिवेश है उस समय बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार की प्रतिक्रिया में वैदिक-जन अधिक कर्मकाण्डी व पोथी-पंथी हो चले थे। शंकराचार्य ने इस कर्मकाण्डिता व पोथी-पन्थिता का विरोध किया था। वैदिक मतानुसार पहले ब्रह्मचर्य, फिर गृहस्थ, उसके बाद वानप्रस्थ तथा अंत में संन्यास आश्रम की व्यवस्था है। जिसका अर्थ संसार त्याग, लेकिन शंकराचार्य ने इस आश्रम व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए बौद्धों के समान युवावस्था में संन्यास ग्रहण किया।
‘‘उस समय के हिंदू संन्यास लेकर देश का कार्य करने के पुराने आदर्श को न केवल भूल ही गए थे, अपितु उसको बुरा भी समझते थे, क्योंकि बौद्धों ने अपने धर्म में संन्यास को प्रमुख स्थान दे रखा था। अतः साधारणतया अप्रचलित संन्यासधर्म का आश्रय शंकर ले, यह वे (आर्यम्बा) नहीं
चाहती थीं।’’
संन्यास का तात्पर्य वैराग्य नहीं, संसार का त्याग, नहीं, वरन् देश सेवा का सामाजिक कार्य है। हिंदू शास्त्रों में इसकी व्यवस्था रही हो या नहीं, संघ में प्रचारक व्यक्ति गृह त्याग कर सामाजिक कार्यकर्ता बनता है। शंकराचार्य शायद वैदिक धर्म के ऐसे प्रथम संन्यासी थे। उन्होंने कहा, ‘‘हम नियमों के दास नहीं, स्वामी हैं।........नहीं भाई, जंगल नहीं जाऊँ गां। संन्यास का अर्थ संसार को छोडकर वन में तपस्या करना नहीं है। मैंने कर्म-संन्यास लिया है, जिसका अर्थ कर्म छोडना नहीं कर्म करना है देश और धर्म के कर्म करना है जो सत्य है तथा मनुष्य को कर्मफल-बंधन में नहीं बांधते।’’
‘‘.......वर्णाश्रम-व्यवस्था समाज के कल्याण के लिए समाज द्वारा निर्मित व्यवस्था है। अपने बनाए नियमों के हम स्वामी हैं, दास नहीं।’’
इसके अतिरिक्त इस संदर्भ में यह वाक्य भी उल्लेखनीय है ः
‘‘...........व्यवस्था और नियम साध्य नहीं, साधन है। साधन का उपयोग तब तक है जब तक वह साध्य को प्राप्त कराने में सहायक हो। केवल लकीर पीटने से क्या लाभ?’’
शंकराचार्य ने संन्यास के स्वरूप पर भी इन शब्दों में प्रकाश डाला है ‘‘इस संन्यास में अलगाव नहीं अपनाव है; विरक्ति नहीं, प्रेम है। हाँ, इस प्रेम में आसक्ति नहीं, मोह नहीं। इसमें संकुचितता नहीं, विशालता है; दुर्बलता नहीं, शक्ति है; व्यक्ति के लिए समाज का त्याग नहीं, समाज के लिए व्यक्ति का राग है।’’
सामाजिक कार्यकर्ता एवं सामाजिक परिस्थिति का चित्रण दीनदयाल उपाध्याय ने जहाँ कुशलतापूर्वक किया है, वहीं यह पुस्तक उनके बहुश्रुत व बहुपठित होने की भी परिचायक है। इनमें भारतीय वैदिक परम्परा, दर्शन व औपनिषदिक परम्परा के इतिहास का विशद एवं सुरुचिपूर्ण वर्णन है। दीनदयाल उपाध्याय दार्शनिक स्तर पर समाज की अवस्था को माया कहकर उपेक्षित करने वालों व अध्यात्म की बात करने वालों को चुनौती देते हैं।
‘‘आर्त्त की पुकार में जिनको भगवान की वाणी नहीं सुनाई देती, उनके कान भगवान के शांत स्वर को नहीं सुन सकते। दुर्बल और दुःखी की आत्मा को जो नहीं पहचान सकता वह सर्वात्मा का क्या दर्शन कर सकेगा?’’
कार्यकर्ता बनाने की प्रक्रिया और व्यक्ति निर्माण की कार्य पद्धति को ध्यान में रख कर ही आश्रम में शंकराचार्य की शिक्षा के संदर्भ में दीनदयाल लिखते हैं ‘‘वे शंकर को कच्चा निकलने देना चाहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि जहाँ एक अच्छा कार्यकर्ता समाज को अवनति की गर्त से निकालकर हिमाद्रि के उत्तुंग शिखर पर आसीन कर सकता है, वहाँ एक अयोग्य कार्यकर्ता समाज के मार्ग में रोडे ही अटकाएगा तथा किसी न किसी दिन अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, नाम और यश के पीछे धर्म का घात करने को तैयार हो जाएगा। अहंकार वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति को गहरे गर्त में डालता है, किंतु समाज के कार्यकर्ता का अहंकार तो उसके साथ-साथ सम्पूर्ण समाज में फैलकर चारों ओर के वातावरण को विषाक्त कर देता है। वे जानते थे कि शंकर अंहकार आदि दुर्गुणों से कोसों दूर हैं, परंतु फिर भी उन्होंने उसे अपने पास और चार वर्ष रखा, स्वयं उसको शिक्षा दी तथा दोषों को बीन-बीन कर निकाल फैंका।
जिस समय यह ग्रन्थ लिखा गया था, तब संघ की राजनीतिक किंवा सांस्कृतिक भूमिका पर सांगठनिक चिंतन चल रहा था। दीनदयाल उपाध्याय ने इस बात पर बल दिया है कि संघ के जीवन में सांस्कृतिक पक्ष प्रबल है। स्वयं उनके शब्दों में ‘‘वहाँ उन्होंने (शंकराचार्य) निर्णय किया हो तो क्या आश्चर्य कि बिना सांस्कृतिक एकता के, बिना विचारों के एकछत्र साम्राज्य के, राजनीतिक एकता टिकाऊ नहीं होती। राजनीतिक एकता के मूल में सांस्कृतिक एकता चाहिए। सांस्कृतिक एकता हुई तो फिर राजनीतिक एकता के लिए प्रयत्न करने वाले वीर जन्म ले सकते हैं। सांस्कृतिक एकता होते हुए, राजनीतिक विभिन्नता भी राष्ट्र का गला नहीं घोंट सकती, उसके शरीर को चाहे कृश कर दें पर आत्मा को नष्ट नहीं कर सकती।’’
शंकराचार्य द्वारा वैदिक धर्म के प्रचार के अभियान का दीनदयाल उपाध्याय ने बडा प्रभावी व प्रखर वर्णन किया है। साहित्यिक शैली में जिस प्रकार उन्होंने वर्णन किया है, उससे पाठक के मन में एक वातावरण उत्पन्न होने लगता है। शब्द प्रयोग बडे अलंकार पूर्ण हैं ‘‘समन्वयता मानों सम्पूर्ण गगन मंडल में गूंज के साथ छा गई। सरलता और शांति की मानों घोषणा हुई हो। स्पष्टवादिता सीधी-सीधी सुनाने को समुद्यत हो गई। मेलमिलाप मनमुटाव को मटियामेट करके मोद मनाने लगे। शूरता सिर पर सवार थी, वीरता बढकर बातें करने लगी। दया दिल खोलकर दान देने लगी। अभेद और अद्वैत आनंदातिरेक से आप से बाहर हो रहे थे।’’
वैदिक मतों के मतमतांतर शंकराचार्य के काल में वैसे ही थे जैसे दीनदयाल उपाध्याय के काल में विभिन्न भारतीय सम्प्रदायों की आपसी स्थिति थी। अपने को अपेक्षित राष्ट्रीय एकता के लिए वे शंकराचार्य से कहलवाते हैं ः ‘‘सभी देवी-देवता एक ही परंब्रह्म के भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं......रामेश्वरम् में शिव की प्रतिष्ठा और उपासना करके समुद्रोत्तरण व लंका विजय करने वाले राम और राम का नाम लेकर हलाहल पान करने वाले शिव में विरोध कैसा? सती के शव के कन्धे पर रखकर भारत-भ्ररण करने वाले शिव और दूसरे जन्म में भी शिव को वरण करने की इच्छा से घोर तपस्या करने वाली गिरिजा में कैसा अंतर? ये सब तो एक ही हैं। जो वैष्णव हैं वह शैव हैं और वही शाक्त भी हैं।’’
कुमारिल भट्ट के प्रखर कर्मकाण्डितापोषक शिष्य मण्डन मिश्र से शंकराचार्य का बडा ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था। दीनदयाल उपाध्याय ने उस शास्त्रार्थ को सौम्य एवं समन्वयकारी वार्तालाप में बदल दिया। जब श्राद्ध कर्म कर रहे मण्डन मिश्र के पास शंकर पहुँच गए तो मिश्र ने आवेशपूर्वक शंकराचार्य से कहा, ‘‘वैदिक धर्म की बातें तो खूब करते हो किंतु व्यवहार तो बौद्धों जैसा ही है। वैदिक धर्म में संन्यास कहाँ है? और फिर संन्यासी की श्राद्धकर्म में उपस्थिति घोर वेदविरोधी कृत्य है।’’ दीनदयाल के शंकरचार्य इस कर्मकाण्डिता व शास्त्रीयता के विवाद में उलझते नहीं तथा कहते हैं, ‘‘मित्र प्रवर! आज की देश की दशा आपसे छिपी नहीं है। यह बात सत्य है कि भट्टपादाचार्य कुमारिल ने अपना जीवन सर्वस्व इस धर्म की सेवा में लगा दिया, जीवन का एक-एक क्षण वैदिक धर्म की पुनः स्थापना और वेदविरुद्ध धर्मों के खण्डन में ही बिताया। उसमें उन्हें सफलता भी मिली; किंतु आज भी तो बौद्ध धर्म उत्तर-पश्चिम प्रांतों में विद्यमान हैं तथा इस राष्ट्र के लिए आपत्ति का कारण बना हुआ है। आओ हम दोनों मिलकर इन राष्ट्र-विरोधियों को समाप्त करें; सम्पूर्ण भारतवर्ष में हिंदू धर्म का प्रचार करें तथा भट्टपाद के अधूरे कार्य को पूरा करें।’’
वैदिक मतों में स्त्रियों के संन्यास की व्यवस्था नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर दीनदयाल उपाध्याय मण्डन मिश्र की पत्नी से महिला के अधिकारों का वर्णन करवाते हुए उसे शास्त्रार्थ का अधिकार देकर, अंत में उसे संन्यास ग्रहण करवा देते हैं। महिला अधिकारों के लिए भारती तर्क देती हैं- ‘‘स्त्री हूँ तो क्या हुआ आचार्य? स्त्री के क्या विचार नहीं होते? उसके मन में क्या शंकाओं-कुशंकाओं की आँधी नहीं उठ सकती? उसके पास भी मस्तिष्क है, हृदय है और फिर वह भी तो राष्ट्र का अंग है। उसका भी राष्ट्र के प्रति दायित्व, स्त्रियों के साथ क्या शास्त्रार्थ नहीं हुए हैं? गार्गी व याज्ञवल्क्य का संवाद आपको ज्ञात नहीं है? गार्गी क्या पुरुष थीं? और उसका शास्त्रार्थ भी किसी साधारण विषय पर नहीं बल्कि अत्मा के संबंध में हुआ था। जनक और सुलभा का शास्त्रार्थ तो प्रसिद्ध ही हैं, सुलभा भी कोई पुरुष नहीं थीं। जनक और याज्ञवल्क्य भी कोई साधारण मनुष्य नहीं थे किंतु अत्यंत प्रसिद्ध महात्मा थे। यदि ये महात्मा-गण स्त्रियों से विवाद कर सकते हैं तो आप मुझसे क्यों नहीं कर सकते।’’
तत्कालीन वैदिक समाज अपनी कर्मकाण्डिता के कारण सिकुडता जा रहा था। शंकराचार्य ने एक प्रकार से बौद्ध पद्धति से ही वैदिक धर्म का पुनः स्थापन किया था। इसीलिए शंकराचार्य पर प्रच्छन्न बौद्ध होने का भी आक्षेप है।
बौद्धों के तर्कवाद को दीनदयाल उपाध्याय किंकर्तव्यविमूढ बनाने वाला वर्णित करते हैं, ‘‘कर्मण्यता का पौधा तर्क की मरुभूमि में नहीं किंतु भावना की उपत्यका में लहलहाता है, शब्दों का जंजाल तो व्यवहार को किंकर्तव्यविमूढ बना
देता है।’’
बौद्ध भिक्षुओं से वार्तालाप में शंकराचार्य कटु यथार्थ को जिस मृदुता, शालीनता व दृढता से कहते हैं, शायद वही दृढता, दीनदयाल उपाध्याय को तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व से मुसलमानों के लिए अभिप्रेत थी। मुसलमानों की अलग पहचान को स्वीकार कर उन्हें तुष्ट करने की वृत्ति के दीनदयाल उपाध्याय आलोचक थे। उनके चिंतन का यह पहलू शंकराचार्य के इन शब्दों का स्मरण कराता है ः
‘‘भगवान बुद्ध मेरे ही पूर्वज थे....मुझे भगवान् बुद्ध से विरोध नहीं है, न उसके नैतिक आदेशों से ही विरोध है। परंतु तनिक सोचो भिक्षु श्रेष्ठ! क्या आज हम उसके आदर्श का पालन कर रहे हैं? उनकी आत्मा की पुकार आज हम सुन पा रहे हैं? .......हम अपनी इन आँखों से शकों और हूणों के अत्याचार नहीं देखते?’’
‘‘शक और हूण बौद्धधर्म में इसलिए दीक्षित नहीं हुए कि उन्हें बौद्धधर्म प्रिय था अथवा उन्हें भगवान् बुद्ध से प्रेम था........उन्होंने बौद्धधर्म को अपनी राजनीति के चंगुल में फँसाया। उनके बौद्धधर्म स्वीकार करने से तुमने समझा कि वे अपने हो गए।.......कनिष्क ने बौद्धधर्म का पुनः संस्कार भी किया और साथ ही भारत की स्वतंत्रता का गला भी घोटता रहा। तुमने एक को देखा पर दूसरे की ओर ध्यान देना तो दूर उल्टे उसकी सहायता ही की।.........शासक का कोई धर्म नहीं होता, भिक्षुवर।’’
बौद्धों के तथाकथित अंतर्राष्ट्रीयतावाद व पृथक पहचान को नकारते हुए शंकराचार्य कहते हैं ‘‘आप इस पुण्यभूमि हिंदुस्तान के निवासी आर्यों की संतान हैं, प्राचीन परम्परा के मानने वाले हैं, राम और कृष्ण की संतान हैं अतः हिंदू हैं। भगवान् बुद्ध की आत्मा का आपने साक्षात्कार किया है; अतः बौद्ध हैं। विष्णु के अवतार भगवान बुद्ध के पुजारी होने के नाते वैष्णव हैं और राष्ट्र के शिव की आराधाना आपको शैव भी बनायेगी।’’
इस उपन्यास में जहाँ वर्तमान परिप्रेक्ष्य व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का दीनदयाल उपाध्याय ने एक मंजुल सामंजस्य प्रस्तुत किया है, वहीं उनकी साहित्यिक प्रतिभा भी इसमें झलकती है। स्थान-स्थान पर सुन्दर एवं कोमल दृश्यों का वे सृजन करते हैं, शब्द चयन एवं वाक्य द्युति चमकती हुई दिखाई पडती है, ‘‘तक्षशिला से आचार्य शंकर कश्मीर की ओर चले। महर्षि कश्यप की भूमि कश्मीर के क्रोड में केवल कुमकुम की क्यारियाँ ही नहीं किंतु काव्य और कला भी क्रीडा करती थीं।’’
इसी प्रकार निम्न पंक्तियों में प्रकृति का सजीव और सुन्दर वर्णन उनकी उच्चकोटि की साहित्यिक प्रतिभा को दर्शाता हैः ‘‘आचार्य शंकर का ध्यान करते हुए मंदिर की ओर बढते जाते थे। प्रकृति नटी ने साज-श्ांृगार करके उनको विमोहित करना चाहा; प्रस्फुटित पुष्पों ने हँस कर उनका स्वागत किया और दो बातें करनी चाहीं, कलियों ने चटक कर धीरे से कान में अपना प्रेमभरा राग सुनाया और कर स्पर्श की लालसा प्रकट की, अप्सराएँ सरोवर में अपना स्वरूप देखने के बहाने उतर आईं, गंधर्व पक्षियों के स्वर में गाने लगे किंतु कोई भी आचार्य शंकर को रोक नहीं पाया।’’
‘‘प्रातःकाल बालारुण की स्वर्णिम रश्मियाँ जब हिमाच्छादित शृंगों पर पडतीं तो केसर की क्यारियों की प्रतिच्छाया और आचार्य शंकर के दृढ निश्चय का तेज एक साथ हिमालय की चोटियों पर चमक उठता। उषा विदा होते-होते अपने कर से केसर का तिलक भारत के भाल पर लगा जाती। आचार्य शंकर आगे बढते और भारतीय आत्मा का आध्यात्मिक, आधिवैदिक और आधिभौतिक स्वरूप सम्पूर्ण दृश्य में नाच उठता।’’
इस उपन्यास को लिखने का हेतु न तो निरपेक्ष रूप से साहित्य सृजन का था, न इतिहास लिखने का। दीनदयाल उपाध्याय अपने सामाजिक राष्ट्रीय किंवा राजनीतिक-सांस्कृतिक विचारों के प्रसार के माध्यम के रूप में इस औपन्यासिक विधा का उपयोग करना चाहते थे, और वह उन्होंने प्रभावी ढंग से किया। साहित्यिक, ऐतिहासिक, तर्क अथवा दर्शन की कसौटी पर यदि हम इस पुस्तक को कसना चाहेंगे तो हमें इसमें विधागत भूलें, विसंगतियाँ व अनैतिहासिकता भी दिख जाएँगी। ऐतिहासिक उपन्यासकार जितना अपने द्वारा स्वीकृत ऐतिहासिक आख्यान की ऐतिहासिकता की रक्षा करने में सचेत रहता है, दीनदयाल ने इसकी बहुत परवाह नहीं की है।
‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ तथा ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ जिनका प्रणयन क्रमशः १९४६ व १९४७ में हुआ, दीनदयाल उपाध्याय के सम्पूर्ण साहित्य में ये दो ही साहित्यिक कृतियाँ हैं। उनका साहित्यिक रूप इन प्रथम कृतियों में ही इतना प्रगल्भतापूर्ण है कि यदि दीनदयाल उपाध्याय अपने आगामी जीवन में साहित्यिक क्षेत्र को ही चुनते तो वे सम्भवतः भारत के बडे साहित्यकारों में गिने जाते। लेकिन १९४७ के बाद उन्होंने किसी अन्य साहित्यिक कृति का सृजन नहीं किया। आगे का उनका साहित्य विचारप्रधान व सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक निबंधों, भाषणों व पुस्तकों का संकलन है। उस साहित्य में वह लालित्य व भावप्रवणता नहीं है जो इन प्रथम दो रचनओं में है।