प्रजातंत्र का आधार:आर्थिक विकेंदीकरण

चिंतन-वीथी


दीनदयाल उपाध्याय प्रचलित अर्थों में अर्थशास्त्री नहीं थे। वे भारतीय ऋषि परंपरा के ऐसे आधुनिक चिंतक हैं जिन्होंने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के विविध आयामों पर मूलगामी विचार करते हुए देश को एक नई दिशा प्रदान की। वे महात्मा गाँधी की तरह समाज रचना पर विचार करते हैं, राजनीति पर विचार करते हैं, धर्म-संस्कृति पर विचार करते हैं, अर्थनीति पर विचार करते हैं। वे हर अधिष्ठान पर इस भाव से विचार करते हैं कि जो भारतीयता को अक्षुण्ण रख सकता हो उसका अंगीकार और जो भारत को उसकी पहचान को मिटाकर पश्चिम का या अन्य किसी देश का अंधानुयायी बनाता हो उसका प्रतिकार। वे उस दृष्टि का भी प्रतिषेध करते हैं जो भारत को पीछे की ओर लौटाती हो। उनका स्पष्ट मत है कि, ‘‘हम भारत को न तो किसी पुराने समय की प्रतिच्छाया बनाना चाहते हैं और न रूस या अमेरिका की अनुकृति’’१
अपनी भारतीय मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए दीनदयाल जी ने ‘अर्थायाम’ पर चिंतन किया और इस संदर्भ में यथावसर जिन महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख उन्होंने किया है उन पर दृष्टिपात करना प्रसंगोचित होगा। वे कहते हैं कि, ‘‘हमें स्वीकार करना होगा कि भारत की आर्थिक प्रगति का रास्ता मशीन का रास्ता नहीं है। कुटीर उद्योगों को भारतीय अर्थनीति का आधार मानकर विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का विकास करने से ही देश की आर्थिक प्रगति संभव है।’’२
‘‘केन्द्रीय व्यवस्थाएं मानव को मानव न मानकर, उसके एक ‘टाइप’ के साथ व्यवहार करती हैं। इनमें मानव की विविधताओं और विशेषताओं के लिए कोई स्थान नहीं। फलतः वे उसे ऊँचा उठाने के स्थान पर एक मशीन का पुर्जा मात्र बना देती है। उसका अपना व्यक्तित्व मर जाता है। अतः विकेंद्रीकरण ही हमारी संस्कृति के अनुकूल है।’’३
हम देखते हैं कि दीनदयाल जी आमूल रूप से विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था के पक्षधर हैं। प्रश्न उठता है कि भूमंडलीकरण और वैश्विक बाजार व्यवस्था के प्रचण्ड समय में जहाँ सारी अर्थव्यवस्थाएँ वृहत्तर सत्ता केंद्रों से संचालित हो रही हों, वहाँ विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था का क्या कोई मूल्य है? दीनदयाल जी कहते हैं कि विकेन्द्रीकरण हमारी संस्कृति के अनुकूल हैं, तो क्या दीनदयाल जी के लिए यह प्रश्न मात्र संस्कृति की रक्षा का प्रश्न है अथवा किसी वृहत्तर मानवीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे ऐसा कहते हैं? वस्तुतः दीनदयाल जी जहाँ जिस संस्कृति की बात करते हैं वह, वही चिरंतन भारतीय संस्कृति है जो मनुष्यमात्र की सत्ता और अस्मिता का सम्मान कर उसे स्वतंत्र विकास का अवसर प्रदान करती है। वे अनुभव करते हैं कि आर्थिक केन्द्रीकरण मनुष्य की विविधताओंे को नष्ट कर राज्य व्यवस्था को अधिनायकवाद की ओर ले जाता है। यह मनुष्य के लोकतांत्रिक स्वभाव के प्रतिकूल है चाहे लोकतंत्र की आड में ही क्यों न किया गया हो। एक अन्य स्थान पर दीनदयाल जी आर्थिक विकेन्द्रीकरण को हमारी स्वतंत्रता से जोडते हुए एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत
करते हैं।
‘‘आर्थिक क्षेत्र में स्वतंत्रता समाप्त हुई तो राजनीतिक क्षेत्र में भी समाप्त हो जाती है। समाजवाद और प्रजातंत्र साथ-साथ नहीं चल सकते। सच्चे
प्रजातंत्र का आधार आर्थिक विकेंद्रीकरण ही हो सकता है। अतः सिद्धांततः हमें छोटे-छोटे उद्योगों को ही
अपनाना चाहिए।’’४
यहाँ यह स्पष्ट है कि दीनदयाल जी आर्थिक स्वतंत्रता को क्यों इतना महत्व देते हैं और आर्थिक स्वतंत्रता को निगल जाने वाली व्यवस्था समाजवाद का क्यों प्रतिषेध करते हैं। वे निर्विवाद रूप से यह मानते हैं कि मनुष्य की आर्थिक स्वतंत्रता समाप्त हो जाने पर उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता भी समाप्त हो जाती है और यह आर्थिक स्वतंत्रता आर्थिक विकेन्द्रीकरण के द्वारा ही संभव है। आर्थिक विकेन्द्रीकरण लघु-कुटीर उद्योगों से ही पनपता है। इस प्रकार दीनदयाल जी विकेन्द्रीकृत व्यवस्था को हमारी स्वतंत्रता के ही एक आयाम के रूप में देखते हैं। वे यह भी देखते हैं कि केन्द्रीकृत व्यवस्थाएँ जिस व्यक्ति स्वातंत्र्य की बात करती हैं वह समाज के शिखर स्तर के व्यक्ति की स्वतंत्रता को ही सुनिश्चित करती हैं न कि समाज के निचली पायदानों पर खडे सर्वसाधारण नागरिक की स्वतंत्रता को। इसीलिए आगे वे एक नेत्रोन्मीलक टिप्पणी करते हैं कि, ‘‘व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वप्रथम है। जब टाटा-बिरला, व्यक्ति स्वातंत्र्य या मुक्त प्रेरणा की बात करते हैं तो उसका अभिप्राय होता है, उनकी अपनी स्वतंत्रता, उनके कारखानों में गुलाम बने हुए लाखों-करोडों मजदूरों की स्वतंत्रता नहीं। हमें तो लाखों-करोडो मानवों की स्वतंत्रता का विचार करना है। शक्ति चाहे वह राजनीतिक हो या आर्थिक, केंद्रीकरण से व्यक्ति स्वातंत्र्य समाप्त हो जाता है।’’५
इस प्रकार दीनदयाल जी जब आर्थिक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो वे इस ओर भी सजग और सावधान रहते हैं कि यह स्वतंत्रता अंतिम पायदान पर खडे व्यक्ति तक को शामिल कर पाती है अथवा शीर्षस्थ लोगों (ष्टह्म्द्गड्डद्व4 रुड्ड4द्गह्म्) को ही छूकर निकल जाती है।
केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था उपभोग की अधिकतम सीमा, अन्तर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान, अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा, अन्तर्राष्ट्रीय श्रमशक्ति और अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी आदि पर निर्भर है जबकि विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था उपभोग की न्यूनतम सीमा, स्थानीय आदान-प्रदान, स्थानीय प्रतिस्पर्धा, स्थानीय श्रमशक्ति, स्थानीय पूँजी आदि पर निर्भर है। केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था में शोषण भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संपन्न होता है जिसका निदान किसी भी शोषित देश के हाथ में नहीं रहता। जबकि विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था में शोषण भी स्थानीय स्तर पर ही होता है और जिसका निदान किसी भी देश अथवा राज्य के हाथ में ही रहता है। बडे एवं भारी भरकम उद्योग विदेशी पूँजी, विदेशी निवेश, विदेशी तकनीकी, विदेशी श्रमशक्ति, विदेशी लाभांश पर निर्भर हैं जबकि लघु एवं कुटीर उद्योग देशी पूँजी, देशी निवेश, देशी तकनीकी, श्रमशक्ति, देशी लाभांश पर निर्भर होते हैं। यह सच है कि केन्द्रीय अर्थव्यवस्था हमारे श्रेष्ठिवर्ग के भौतिक स्तर को एकाएक उन्नत कर उनके जीवन स्तर को आश्चर्यजनक रूप से ऊपर उठा सकती है किंतु सर्वसाधारण के आर्थिक स्तर की घोर उपेक्षा करती है।
दीनदयाल जी कहते हैं कि केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था मनुष्य को मशीन का एक पुर्जा मात्र बना देती है, उसका व्यक्तित्व मर जाता है। यह एक प्रकार से आर्थिक गतिशीलता म उसकी भागीदारी का शून्य हो जाना है। यह स्थिति समुदाय को बहुत तेजी से बेराजगारी की ओर धकेलती है। इसलिए वे ऐसी व्यवस्था अपनाने पर बल देते हैं जो भारी उद्योगों के स्थान पर लघु उद्योगों को बढावा दे और प्रत्येक नागरिक के लिए रोजगार के अवसर सुनिश्चित करे। इसका यह भी फलितार्थ है कि उनके मत में ऊँची-ऊँची गगनचुंबी अट्टालिकाओं, चमचमाती सडकों और रोशनी में नहाये शहरों के सहोत्पाद (क्च4 क्कह्म्श्ास्रह्वष्ह्ल) के रूप में यदि खेतों को सिकुडते जाना, गाँवों का विलुप्त होना, प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम शोषण होना, कच्ची बस्तियों का उगना, श्रमविहीन मनुष्यों का बढते जाना आदि के रूप में परिलक्षित होता हो तो वह व्यवस्था भारतीय संस्कृति के अनुकूल कदापि नहीं हो सकती। वह देश को अमेरीका, इंग्लैण्ड, रूस या चीन की अनुकृति तो बना सकती है पर भारत को मौलिक भारत से बहुत दूर ले जाती है। यह व्यवस्था एक अलोकतांत्रिक, असमान और वर्गभेदपूर्ण समाज को जन्म देती है।
इस प्रकार की जो अर्थव्यवस्था समाज में अंनियंत्रित बेरोजगारी उत्पन्न करती है वह अनुचित और अनुपयोगी अर्थव्यवस्था है। दीनदयाल जी कहते हैं हर हाथ को काम मिले यह राज्य का उत्तरदायित्व है। वह ऐसी अर्थनीति लागू करे कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए कार्यावसर उपलब्ध रहे। उत्पादन बढा देने की कीमत पर कार्यावसरों को छीनने वाली व्यवस्था न केवल असंतोष को जन्म देती है वरन् वह असमानता, भ*ष्टाचार, भेदभाव व अराजकता की जननी होती है इसलिए वे श्रम के अधिकार की पक्षकारिता करते हैं। उनके अनुसार, ‘‘श्रम का अधिकार (ऋद्बद्दद्धह्ल ह्लश्ा ङ्गश्ाह्म्द्म) मनुष्य का संवैधानिक अधिकार है। राज्य का यह पहला कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक को उसकी योग्यता व क्षमता के अनुसार काम करने का अवसर दे। इन अवसरों में किसी प्रकार का भेदभाव, न जाति, न रंग का और न लिंग का होने दे। राष्ट्र के पुननिर्माण की जो भी योजना बनाई जाए उसका उद्देश्य सभी व्यक्तियों को काम दिलाना (स्नह्वद्यद्य श्वद्वश्चद्यश्ा4द्वद्गठ्ठह्ल) होना चाहिए।’’६
दीनदयाल जी जब ‘श्रम का अधिकार’ की वकालत करते हैं तो वे मात्र अर्थशास्त्री या मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता के नाते यह बात नहीं कहते, वे मानवीय व्यक्तित्व की समग्रता को दृष्टिगत कर एक तत्वचिंतक की भाँति बात करते हैं, जो कि मनुष्य को एकात्म भाव से देखने पर प्रतिफलित होती है। वे कहते है कि, ‘‘मानव को पेट और हाथ दोनों मिले हैं। यदि हाथों को काम न मिले और पेट को खाना मिलता रहे तो मनुष्य सुखी नहीं रहेगा, उसका विकास नहीं होगा। निसंतान स्त्री जैसे अपने जीवन में अधूरापन तथा व्यथा का अनुभव करती है, वैसे बेकार, पुरुषार्थ रहित व्यक्ति अधूरापन तथा व्यथा का अनुभव करता है।’’७
आर्थिक विकास को मापने का जो प्रतिमान दीनदयाल जी बताते हैं वह एक सच्ची मानवीय संवेदनापूर्ण एकात्मक दृष्टि के बिना संभव नहीं है। इसलिए वे कहते है कि, ‘‘आर्थिक योजनाओं तथा प्रगति का माप समाज के ऊपर की सीढी पर पहुँचे व्यक्ति से नहीं, बल्कि सबसे नीचे के स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होगा। आज देश में ऐसे करोडों मानव हैं, जो मानव के किसी भी अधिकार का उपभोग नहीं कर पाते।........हमारी भावना और सिद्धांत है कि वह मैले-कुचैले, अनपढ, लोग हमारे नारायण हैं। हमें इनकी पूजा करनी है। यह हमारा सामाजिक एवं मानव धर्म है। जिस दिन इनको पक्के, सुंदर, स्वच्छ घर बनाकर देंगे, जिस दिन हम इनके बच्चों और स्त्रियों को शिक्षा और जीवन-दर्शन का ज्ञान देंगे, जिस दिन हम इनके हाथ और पाँव की बिवाइयों को भरेंगे और जिस दिन इनको उद्योगों और धंधों की शिक्षा देकर इनकी
आय को ऊँचा उठा दगे, उस दिन हमारा भ्रातृभाव व्यक्त होगा।’’८
यह है दीनदयाल जी का सर्वजनकल्याणकारी, सर्वजनसुखाय, सर्वजनहिताय, दरिद्र को नारायण मानकर उसकी सेवा का दरिद्रनारायण दर्शन अर्थात एकात्म मानवदर्शन।
विकेन्द्रीकृत अर्थनीति के व्यावहारिक स्वरूप को समझने की दृष्टि से दीनदयाल जी की एक टिप्पणी
द्रष्टव्य हैः-
‘‘हमारे विकास-कार्यों को पूँजी पर कम, और श्रम पर अधिक निर्भर होना चाहिए।......हमें छोटी बाँध-योजनाओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए था। उसमें कम खर्च होता, अधिक गति से उपयोग होता और निश्चय ही वे जल्दी भी सम्पन्न होतीं तथा अपेक्षाकृत अधिक लाभ होता।......हम बहुत सारे भवन बनवा रहे हैं और हम उन्हें पूरे का पूरा सीमेंट से बनवाते हैं। हम स्थानीय रूप से तैयार की गयी ईंटों का उपयोग क्यों नहीं कर सकते? उससे न केवल सीमेण्ट के परिवहन का रेलवे पर पड रहा दबाव घट जाता,
बल्कि स्थानीय विकेन्द्रीकृत ईंट-भट्टा-उद्योग को भी
प्रोत्साहन मिलता।’’९
आर्थायाम की व्यावहारिक निष्पत्ति हेतु दीनदयाल जी ‘‘आर्थिक क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्य’’ की बात भी करते हैं। यहाँ प्रचलित अर्थनीति को संयम और सादगीपूर्ण भारतीय जीवन मूल्यों से ओतप्रोत करना ही आर्थिक क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्य है। दीनदयाल जी देखते हैं कि वर्तमान अर्थनीति समाज में एक ओर अमीर-गरीब की खाई को बढाती जा रही है तो दूसरी ओर बेरोजगारों की अनियंत्रित भीड को उत्पन्न कर रही है। इस पूँजीवादी दुर्नीति से उपजा असंतोष प्रायः वर्गसंघर्ष को प्रतिष्ठापित करने की भूमि का निर्माण करता है। वर्ग संघर्ष की यह भूमिका समाज को माक्र्सवाद जैसे अधिनायकवादी तंत्र की ओर धकेलने का पुख्ता आधार प्रदान करती है जो कि एक और भीषण दुरवस्था है। दीनदयाल जी इस ओर असावधान नहीं हैं और वे इसका हल आर्थिक क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्य के द्वारा देखते हैं। वे कहते हैं कि, ‘‘भारतीय मतवाद जब वर्गसंघर्ष का खंडन करता है, तब उसका तात्पर्य यही होता है कि उसने उपभोग को नियंत्रित कर लिया है तथा अधिकाधिक उपभोग की बजाय न्यूनतम उपभोग को आदर्श बनाया है। मनुष्य की प्राकृत भावनाओं का संस्कार करके उसमें अधिकाधिक उत्पादन, समान वितरण तथा संयमित उपभोग की प्रवृति पैदा करना ही
आर्थिक क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्य है। इसमें ही तीनों का संतुलन है।’’१०
दीनदयाल जी के अनुसार (१)अधिक उत्पादन (२) समान वितरण (३) संयमित उपभोग इस तिपाई पर अर्थ व्यवस्था को टिकाना ही ‘‘आर्थिक क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्य’’ है। इसमें यह बात भी स्पष्ट है कि भारतीय चिंतन के अनुसार उपभोग को न्यूनतम किए बिना वर्ग-संघर्ष का खंडन नहीं किया जा सकता है। हाँ, उसका भ्रम अवश्य पैदा किया जा सकता है। निश्चय ही इस सांस्कृतिक कार्य के लिए समाज में समुचित शिक्षा और संस्कार की आवश्यकता होगी।
दीनदयाल जी की ही शब्दावली में कहें तो इसके लिए पुनः ‘‘समाज और राज्य के क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्य’’ की आवश्यकता होगी। सौभाग्य से इसका समाधान भी दीनदयाल जी स्वयमेव हैं। वे स्वयं को भी राजनीति के क्षेत्र में संस्कृति का प्रतिनिधि मानते थे।
यहाँ यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि दीनदयाल जी जब भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो वे भारत को किसी पुरातन युग की ओर लौटाना नहीं चाहते। वे एक सतत गतिशील और विकासमान राष्ट्र की अर्थनीति का प्रस्ताव करते हैं। इस तथ्य पर बलाधान की आवश्यकता इसलिए प्रतीत होती है कि पूर्वाग्रह अथवा नासमझी के कारण बहुधा यह भ्रम पैदा किया जाता रहा है कि दीनदयान जी भारत के पुरातन अतएव कालबाह्य और पिछडे हुए मॉडल के प्रवक्ता हैं। तथ्य यह है कि दीनदयाल जी स्पष्ट शब्दों में संस्कृति के संरक्षण की नहीं अपितु उसको सजीव और सक्षम बनाने की बात कहते हैं। वे पुरानी रूढियों को समाप्त करने और उनमें बहुत से सुधार करने की बात
कहते हैं।
दीनदयाल जी के विचारों के साथ यहाँ यह इसलिए भी दुर्घटित होता है कि अनेक खण्डदृष्टि वाले भावुक संस्कृति-भक्त परम्परा के सडे-गले अंश और अर्थहीन रूढियों को भी संस्कृति के नाम पर छाती से चिपकाए रहते है। भारत के गौरव की पुनर्स्थापना, इस लक्ष्यमात्र की समानता होने के कारण, मतभिन्नता और मार्गभिन्नता होने के बावजूद दीनदयाल जी को उनका भी प्रवक्ता मान लिया जाता है। जबकि दीनदयाल जी ने अपने विचार और कार्य में ऐसे एकपक्षीय विचारकों से अत्यंत सजगतापूर्वक दूरी बनाए रखी।
उनके अनुसार ‘मानव का विकास’ और ‘राष्ट्र की एकात्मता’, ये दो अपरिहार्य मापदंड हैं जिन पर खरा उतरते हुए हमें भारत का नीतिपथ सुनिश्चित करना है। जो नीति इन दोनों आधारों के लिए पोषक सिद्ध हो वह स्वीकार्य हो और जो इनके लिए बाधक हो वह अस्वीकार्य। इसका तात्पर्य है कि कोई भी व्यवस्था जो मानव के विकास के लिए उपयोगी हो किन्तु राष्ट्र की एकात्मता को खण्डित करती हो अथवा कोई व्यवस्था जो राष्ट्र की एकात्मता के लिए उपयोगी हो किन्तु मानव के विकास को अवरुद्ध करती हो तो, ये दोनों ही स्थितियाँ अभिप्रेत नहीं हैं। उनका मूल कथन इस
प्रकार हैः-
‘‘हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण नहीं अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाना है। उसके आधार पर राष्ट्र की धारणा हो और हमारा समाज स्वस्थ एवं विकासोन्मुख जीवन व्यतीत कर सके, इसकी व्यवस्था करनी है। इस दृष्टि से हमें अनेक रूढियाँ खत्म करनी होंगी, बहुत से सुधार करने होंगे। जो हमारे मानव्य का विकास और राष्ट्र की एकात्मता की वृद्धि में पोषक हो, वह हम करेंगे और जो बाधक हो उसे हटाएँगे।’’११
वस्तुतः यह उनके व्यष्टि को एकात्मक रूप में देखने का फलितार्थ है। और इसलिए पुरातन और आधुनिक, देशी और विदेशी, व्यक्तिपरक और समाजपरक, अपनाने योग्य और त्यागने योग्य आदि द्वन्द्वों के व्यामोह से निकलने का जो सूत्र वे बताते हैं वह मार्गदर्शी सिद्धांत की तरह बारम्बर स्मरणीय और करणीय है। दीनदयाल जी कहते हैं कि, ‘‘जहाँ तक शाश्वत सिद्धांतों तथा स्थायी सत्यों का संबंध है, हम संपूर्ण मानव के ज्ञान और उपलब्धियों का संकलित विचार करें। इन तत्वों में जो हमारा है, उसे युगानुकूल और जो बाहर का है, उसे देशानुकूल ढालकर हम आगे चलने का विचार करें।’’१२