संपादको के भी सपादक दीनदयाल जी

मनोहर पुरी


जीवन पर्यंन्त दीनों की सेवा में रत, एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने पत्रकारिता को आदर्श मानते हुए अपनाया था न कि किसी व्यवसाय के रूप में। उनकी दृष्टि पत्रकार की थी और लेखनी साहित्यकार की। भारत बँटवारे के तुरन्त बाद जब उन्हें ‘‘राष्ट्र धर्म’’ मासिक प्रकाशित करने का दायित्व सौंपा गया तो पत्रकारिता का क्षेत्र उनके लिए बिल्कुल नया था। इस क्षेत्र के प्रति उनका कोई रुझान भी नहीं था। उन्होंने इस कार्य को एक कर्तव्य मान कर स्वीकार किया और जीवन पर्यंन्त अपनी इस मान्यता पर अडिग रहे कि एक पत्रकार की निष्ठा केवल देश के प्रति ही होनी चाहिए।
दीनदयालजी यथास्थितिवाद को बिलकुल पसंद नहीं करते थे। किसी भी कार्य को उसके सैद्धांन्तिक और व्यावहारिक आधार पर खडा करना उनका स्वभाव था। हाथ में लिए हुए काम को किसी तरह चलाए रखने में उनकी रुचि नहीं थी। वे किसी व्यक्ति अथवा विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह बना कर चलने के विरुद्ध थे। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रकारिता की दुनिया म उनका पहला कदम था। प्रारम्भ से श्री अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें एक सहयोगी के रूप म मिले। अटल जी ने इस संबंध में स्वयं लिखा है कि, ‘‘मुझे लिखने का शौक अवश्य था, किन्तु पत्र का सम्पादन करना पडेगा, यह सुनकर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। लेकिन यह जानकर ढाढस बँधा कि केवल नाम का सम्पादक बनना है। काम करने और करवाने के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय
मौजूद रहेंगे।’’
पत्रकारिता के विषय में उन्होंने समस्त जानकारी अपने अध्ययन और अनुभव से प्राप्त की। न केवल संपादन करना सीखा बल्कि अटल जी के साथ-साथ दूसरों को भी सिखा दिया। दीनदयालजी काम करते हुए स्वयं सीखते थे और सीखते हुए दूसरों को सिखाते चलते थे। अपने इस गुण का उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में पूरी तरह से उपयोग किया।
पत्रकारिता के सन्दर्भ में दीनदयालजी के व्यक्तित्व के कई पहलू सामने आते हैं। औपचारिक रूप से भले ही उन्हें ऐसा पत्रकार स्वीकार न किया जाए जो पत्रकारिता के माध्यम से अपनी रोटी-रोजी कमाता हो अथवा उसने किसी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की विधिवत शिक्षा ग्रहण की हो। परन्तु स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और उसके बाद भी अनेक दर्जनों लोगों ने पत्रकारिता को ‘मिशन’ बना कर इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश का विकास ही किसी ‘मिशन’ का ध्येय हो सकता था। दीनदयालजी का एक मात्र उद्देश्य देश को हर तरह से परम वैभव के मार्ग पर ले जाना था। उनके इस दौर में मिशनरी पत्रकारिता के प्रतीक रूप म अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, बालेश्वर अग्रवाल, केवलरत्न मलकानी, यादवराव देशमुख, देवेन्द्र स्वरूप अग्रवाल और भानु प्रताप शुक्ल सरीखे वरिष्ठ पत्रकारों की गणना की जा सकती है।
जनकल्याण व देशहित उनकी लेखनी में सदैव सर्वोपरि रहता था। प्रसिद्ध विचारक श्री दत्तोपंत ठेंगडी के अनुसार पत्रकार के नाते दीनदयालजी का योगदान अनुकरणीय था। वे पत्रकार थे, किन्तु कार्ल माक्र्स ने जिस श्रेणी को ‘जर्नलिस्ट थिंकर’ कहा है, उस श्रेणी में आप नहीं थे। उनकी पत्रकारिता मात्र समकालीन परिस्थितियों में ही उपयुक्त हो, ऐसी नहीं थी। उनकी पत्रकारिता तो सुदूर भविष्य तक उपयोगी रहने वाली पत्रकारिता थी।
उन्होंने राष्ट्रधर्म मासिक, के बाद ‘पांचजन्य साप्ताहिक’ और ‘स्वदेश’ नामक दैनिक समाचार पत्र प्रारम्भ किए। संपादक के रूप में उनका अपना नाम कहीं नहीं छपता था परन्तु इन पत्रों का कोई अंक ऐसा नहीं निकला जिनमें उनके विचारों कि अमिट छाप न हो। सकारात्मक सामग्री के चयन के कारण, राष्ट्रवादी पत्रकारिता की यात्रा में आज भी इन पत्रिकाओं को मील का पत्थर माना जाता है।
शनैः-शनैः देश के विभिन्न भागों से प्रकाशित होने वाली कितनी ही पत्र-पत्रिकाओं के साथ दीनदयालाजी का नाता जुडता गया। आज देश के प्रायः हर जिले और देश की हर भाषा में प्रकाशित होने वाली कितनी ही जागरण पत्रिकाएँ दीनदयालजी के विचार से ही प्रारम्भ हुई हैं।
‘पांचजन्य’ के संपादक श्री भानु प्रताप शुक्ल ने यह स्वीकार किया कि भले ही दीनदयाल जी ‘पांचजन्य’ के साथ ऊपरी संबंध दिखाई न देते हों परन्तु हर अंक के भीतर उनकी छवि झलकती थी। समय समय पर वह ‘पांचजन्य’ और ‘आर्गेनाइजर’ के संपादकों से विचार विमर्श करते थे। उनका सान्निध्य बहुत मधुर और शिक्षाप्रद होता था। वे आते थे, पत्रकारिता पर चर्चा होती थी, खबर कैसे बनाना, शीर्षक कैसे लगाना आदि से लेकर समाचारों से जुडी सभी छोटी-बडी बातें खुलकर होती थी। संपादकीय विभाग के लोग हमेशा उनके सुझाव जानने के इच्छुक रहते थे। इस प्रकार वह संपादकों के भी संपादक थे।
दीनदयालजी ने अनगिनत लेख लिखे हैं। सुप्रसिद्ध कांग्रेसी नेता तथा काशी विद्यापीठ के तत्कालीन कुलपति डॉ. संपूर्णानंद ने दीनदयाल जी के पत्रकरिता से संबधित लेखों को तीन विभागों में वर्गीकृत किया है। अखबारी तर्क-विर्तक को ध्यान में रख कर लिखे गए वे लेख जो केवल तात्कालिक अवसरों पर किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया के लिए लिखे गए। ऐसे लेखों में आमतौर पर एक दूसरे पर राजनैतिक प्रहार करने अथवा ऐसे प्रहारों का उत्तर देने की कोशिश की गई है। इनमें राजनीतिक उठा-पटक, खासतौर पर चुनावी-जोड-तोड की भरमार है।
दूसरी श्रेणी में उन लेखों को गिना जा सकता है जो पहली श्रेणी के लेखों से जुडे होते हुए भी अपने कलेवर में अधिक विस्तार लिए हुए हैं। ऐसे लेखों में गंभीर चिंतन दिखाई देता है। इन लेखों को पढकर पाठक संबंधित मुद्दों पर विचार करने के लिए बाध्य हो जाता है। ऐसे लेख बाद में भी महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। भविष्य में इतिहास का अध्ययन करने वालों के लिए ये मार्गदर्शक का काम करते रहे हैं। आने वाली पीढियों को इनके माध्यम से यह समझने में आसानी होगी कि किसी विशेष समय और परिस्थिति में क्या हुआ था और वैसा क्यों हुआ था? उन्हें इस बात की भी पूरी जानकारी मिल सकेगी कि कुछ विशेष व्यक्ति और नारों ने आम लोगों के ध्यान को क्योंकर और किस प्रकार अपनी ओर खींचा था। आने वाले लोग यह भी समझ सकेंगे कि विभिन्न दलों द्वारा जारी किए गए वक्तव्यों में तर्क की क्या भूमिका रही। संक्षेप में ऐसे लेखों में वह सब विषय मौजूद हैं जिनके बिना निकट अतीत को समझ पाना कठिन होगा। यही निकट का अतीत वर्तमान का विकास करते हुए उस भविष्य की सीढी बनेगा जिसका आज हम सपना देखते हैं।
तीसरी श्रेणी के लेख वर्तमान समय की सीमा से बहुत आगे हैं। भले ही ऐसे लेखों की संख्या कम है परन्तु उनका महत्व बहुत अधिक है। ऐसे लेखों में उन समस्याओं पर विचार किया गया है जिन पर अतीत में भी विचार-विमर्श होता रहा है और भविष्य में जिनका समाधान पाने के लिए आने वाली पीढियों को भी बहुत अधिक कोशिश करनी पडेगी।
उन्होंने निरन्तर ‘राजनैतिक डायरी’ और ‘विचार वीथी’ जैसे कॉलम लिख कर पत्रकारिता में अपनी जगह बनाते हुए पत्रकारों और संपादकों का मार्गदर्शक किया है। समय-समय पर उनके द्वारा लिखे गए दर्जनों लेख देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नीतियों के पथप्रदर्शक बने और आज भी उनका महत्व कम नहीं हुआ है। उन्होंने राजनैतिक व्यवस्था और राष्ट्रीय जीवन के दार्शनिक सरोकारों से संबधित मुद्दों पर जम कर लेखन किया। ये सभी लेख उनके गंभीर चिंतन, देशहित की ललक और सोचने समझने की शैली के द्योतक हैं।
दीनदयालजी मूलतः एक सामाजिक संगठन के प्रचारक थे। संगठन कार्य से ही उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया था। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह किया। एक प्रकाशक के रूप में दीनदयालजी ने ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’ एवं ‘स्वदेश’ इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। वे इन सबके संचालक भी थे। एक संचालक के नाते उन्हें संवादाताओं, संपादकों और अन्य कर्मचारियों का चयन ही नहीं करना पडता था बल्कि उनके वेतन, मुद्रण और प्रकाशन पर होने वाले व्यय के लिए आवश्यक साधन भी जुटाने पडते थे। वह इनके लिए लेख और स्तम्भ लिखते थे। इन पत्रों में वे कई बार अपने नाम से संपादकीय भी लिखते थे। बिना नाम के संपादकीय लिखना तो आमतौर पर होता ही था। अनेक बार उनमें संशोधन करने के लिए दिशा-निर्देश देते थे। पांचजन्य में वह ‘पाराशर’ के नाम से ‘विचार वीथी’ तथा ‘ऑर्गेनाइजर’ में अपने नाम से ‘पोलिटिकल डायरी’ नियमित रूप से लिखते रहे। इन स्तंभों को पढने पर यह बात उभर कर सामने आती है कि नेहरू युग की अनेक नीतियों की तीखी आलोचना करते हुए भी उनमें असंयमित भाषा का प्रयोग कहीं नहीं हुआ।
दीनदयालजी के मीडिया के साथ अच्छे संबंध थे। स्वयं पत्रकार होते हुए भी उन्होंने अपने लिए प्रचार का कोई उपक्रम नहीं किया। दीनदयालजी कार्य करने में विश्वास करते थे न कि प्रसिद्धि पाने में। उनका कहना था कि पत्रकारों से व्यक्तिगत संबंध रखना तो उपयोगी है परन्तु उनका उपयोग ‘सेल्फ प्रोजेक्शन’ के लिए नहीं किया जाना चाहिए। राजनेता होने के कारण उन्हें अपने वक्तव्य स्वयं लिखने होते थे और अपने विचार लोगों तक पहुँचाने के बारे में भी सोचना
होता था।
पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखने के लिए उनके पास समय का बहुत अभाव रहता था। फलतः वे अधिकतर ऐसा लेखन अपनी यात्राओं के दौरान ही करते थे। स्तम्भ ठीक समय पर लिख कर देने के लिए वे बहुत सचेत थे।
वरिष्ठ नेता श्री प्यारेलाल खण्डेलवाल के अनुसार एक बार दीनदयाल जी को इन्दौर से खरगौन कार द्वारा यात्रा करनी थी। वे इन्दौर में रुके। खरगौन रवाना होने में अभी कुछ समय था। समय मिलते ही वे एक लेख लिखने लगे। लेख लिखने का कार्य पूरा हुआ। उसको लिफाफे में डाल कर चिपकाया और पता लिख कर पोस्ट करने के लिए मुझे दे दिया। उसे दोबारा पढने की आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि उन्हें अपने लेखन पर गजब का आत्मविश्वास था।
पत्र-पत्रिकाओं को स्थापित करने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए दीनदयालजी कडा परिश्रम करते थे। अखबार का प्रत्येक कार्य वे स्वयं करने को तत्तपर रहते थे। संपादन से लेकर अखबार के बंडल ढोने तक। कई बार रात भर जाग कर अखबार के लिए सामग्री कंपोज करते, प्रूफ पढते और उसे छपवाते। आवश्यक हो तो थका होने के बावजूद अखबार के बंडल स्वयं साईकल पर बाँध कर रेलवे स्टेशन तक पहुंचाते थे। उनका मत था कि यदि समाचार पत्र समय पर पाठक के हाथों में नहीं पहुँचा तो सारा परिश्रम ही व्यर्थ है। समाचार पत्र वितरित करने वाले कर्मचारियों को वह समाचार जगत का सबसे महत्वपूर्ण अंग
मानते थे।
उन्होंने साहित्य लेखन और पत्रकारिता के महत्व को न केवल समझा बल्कि दूसरों को भी समझाया। दीनदयाल जी के अनुसार, ‘‘समाचार और साहित्य में मूल अंतर यही है कि समाचार मुख्यतः दूसरों की घटी और कृति से संबंध रखता है, जबकि साहित्य प्रधानतः आत्माभिव्यक्ति है। वस्तुगतता समाचार का मुख्य गुण है, किन्तु अनगिनत घटनाओं में से समाचार संकलनकर्ता कुछ ही को ‘रिपोर्ट’ करता है। सबका संकलन न तो संभव है न आवश्यक। घटना का यथार्थ वर्णन मात्र समाचार नहीं, बल्कि रुचिकर तथा जनता की जिज्ञासा को शान्त करने वाला भी होना चाहिए। संवाददाता के बारे में उन्होंने लिखा है कि, ‘‘जनरुचि और जनजिज्ञासा का विचार करते हुए भी संवाददाता केवल दृष्टा और उदासीन भाव से काम नहीं करता। जनरुचि और जनजिज्ञासा की संतुष्टि ही नहीं तो जनरुचि का निर्माण तथा उसे दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य भी संवाददाता को करना होता है। यह उनके कार्य का भावात्मक एवं रचनात्मक पहलू है। यदि उसे इस दिशा का भान नहीं रहा तो समाचार संकलन तथा वितरण में उसे सदैव कठिनाई बनी रहेगी तथा उसमें वह कोई विशेष योगदान नहीं दे सकेगा।’’
दीनदयाल जी सामाजिक सरोकारों से भटकी हुई पत्रकारिता को बहुत खतरनाक मानते थे। वे चाहते थे कि पत्रकार समाज का मार्गदर्शन करें। पत्रकारों का कर्त्तव्य है कि वे लोगों को नया विचार दें। दीनदयालजी का मत था कि पत्रकारिता की भाषा में सौम्यता होनी चाहिए। पत्रकारिता को परस्पर संवाद के रास्तों का निर्माण करना चाहिए। जो बात कहनी हो उसे पूरी सच्चाई और दृढता से कहना चाहिए। सरकार के प्रति नरम दृष्टिकोण की आवश्यकता नहीं। विरोधी दल के पत्रों को उनका सुझाव था कि वे नरम रुख अपना कर अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकते।
संवाददाता को उपदेशक की भूमिका में नहीं आना चाहिए। उसे यथार्थ के सहारे पाठक को ‘शिव तत्व’ की ओर इस तरह ले जाना चाहिए कि शिव वास्तविकता बन जाए। उनका मत था कि पत्रकार का यह उद्देश्य होना चाहिए कि सत्य और केवल सत्य ही लिखे। गीता के उपदेश से पे*रित वह कहा करते थे कि कटुसत्य को भी प्रिय रूप में लिखना चाहिए। इतना ही नहीं, कथन यदि सत्य और प्रिय दोनों हो परन्तु देश और समाज के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे न लिखना ही वे पत्रकार का आदर्श मानते थे। स्वयं अपने लेखों में वह इस बात का ध्यान रखते थे कि उनमें एक भी ऐसे शब्द का प्रयोग न हो जाए जिसका प्रभाव लोकहित के प्रतिकूल हो। हर लेख में वह अपनी बात को आग्रहपूर्वक रखते थे लेकिन भाषा में पूरी शालीनता हो इसका भी ध्यान उन्हें निरन्तर रहता था। जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति वह शब्दों में भी मितव्ययिता बरतते थे। अपनी बात बहुत सटीक ढंग से नपे तुले शब्दों में करते थे।
दीनदयालजी का मत था कि समाज में पत्रकार का वही स्थान होता है जो शिक्षक का होता है। जो सूचना देने में भेदभाव करता है वह पत्रकार नहीं
हो सकता।
दीनदयाल जी के अनुसार, ‘‘संवाददाता न तो शून्य में विचरता है और न ही कल्पना जगत की बातें करता है। वह तो जीवन की ठोस घटनाओं को लेकर चलता है और उसमें शिव का सृजन करता है।’’ दीनदयालजी ने अनुभव किया था कि- ‘‘तथ्यगतता समाचार का प्रधान गुण होते हुए भी वह संकलनकर्ता के व्यक्तित्व से अछूता नहीं रह सकता। प्रत्येक समाचार में अपनी निजी विशेषता रहनी चाहिए।’’
दीनदयाल जी ने पाया कि समाचार पत्रों के पास समाचार आने का एक ही स्रोत होता है। इस कारण समाचार-पत्र के व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता। एक- आध न्यूज एजेन्सी के अतिरिक्त अधिकतर समाचार-पत्र अपनी सामग्री के लिए सरकार के सूचना विभाग पर निर्भर रहते हैं। समाचार पत्रों के पास निजी संवाददाताओं की संख्या बहुत ही कम होती है। एक ही संवाददाता कई समाचार पत्रों को समाचार भेजता है। स्वतंत्रता के बाद से पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई विशेष विकास नहीं हुआ है। इसका एक कारण था भारतीय भाषाओं की उपेक्षा ‘क्योंकि संवाद की भाषा के महत्व को हमारे देश में ठीक से समझा’ ही नहीं गया। समाचार जगत् का पूरा कार्य-व्यवहार अंगे*जी में होता है। भारतीय भाषाओं के पत्र भी अंगे*जी से अनुवाद के सहारे काम चलाते हैं। अंगे*जी में सोचने-विचारने और लिखने वाले संवाददाता, स्तंभकार और संपादक भारतीय भावों की गहराई को समझ ही नहीं पाते। जो थोडा बहुत समझ लेते वे उन्हें अंगे*जी भाषा में ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते। जितने समाचार संकलित किए जाते वे अंगे*जी के पाठकों को ध्यान में रख कर किए जाते हैं। पृष्ठ संख्या कम होने के कारण हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं के पत्रों को समाचार छोटे करके भेजे जाते हैं। इन्हें समाचार एजेन्सी की कम दरों वाली सेवा ही उपलब्ध करवाती है। इन समाचारों के संपादक केवल अनुवादक बन कर रह जाते हैं। उनकी सारी प्रतिभा अनुवाद कार्य में ही लग जाती है। अक्सर ऐसा होता है कि कोई नेता हिन्दी में अपना वक्तव्य देता है। संवाददाता उसे अंगे*जी में अनुवाद करके एजेन्सी में भेजती है। छपने से पहले पुनः उसका हिन्दी अथवा संबंधित भाषा में अनुवाद किया जाता है। इस दोहरे अनुवाद से मूल की दुर्गति हो जाती है। कई बार तो अर्थ का अनर्थ ही हो जाता है।
दीनदयाल जी समाचार जगत में एक बदलाव ला कर ऐसे सभी आधिपत्यों को समाप्त करना चाहते थे। उनका मत था कि जब तक विदेशी समाचार, अंगे*जी भाषा, राजनीति, एक ही समाचार एजेन्सी और सरकारी सूचना विभाग के एकाधिकार को समाप्त नहीं किया जाएगा तब तक इसका विकास संभव नहीं। इसके लिए उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार को परिपुष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। दीनदयालजी के सहयोगियों और परिचितों की यह आम राय रही है कि यदि वह राजनीति में नहीं जाते तो निश्चय ही एक सफल पत्रकार अथवा लेखक होते। राजनीति के उलझन भरे माहौल में निरन्तर काम करते हुए भी पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है।