एकात्म मानव-दर्शन और युग - संदभर

सवाई सिंह शेखावत


दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रस्तावित ‘एकात्म मानव-दर्शन’ के बारे में जब-तब सुना था। अतः जिज्ञासा जागृत हुई कि यह उपनिषदों में वर्णित एकात्म मानववाद को आत्मसात कर उपजा जीवन-दर्शन है या कुछ और? राष्ट्रीय सेवक संघ से जुडे कुछ मित्रों से उपाध्याय जी विरचित साहित्य उपलब्ध कराने को भी कहा, पर कोई ठोस उत्तर नहीं मिला। डॉ. इन्दुशेखर तत्पुरुष का आभार कि उन्होंने न केवल एकात्म मानव-दर्शन से संबंधित दीनदयाल उपाध्याय का साहित्य उपलब्ध कराया, बल्कि अनुरोध भी किया कि ‘मधुमती’ के लिए दीनदयाल उपाध्याय विशेषांक हेतु मैं कुछ लिखूँ भी। इस तरह इस लेख को लिखवाने का श्रेय पूरी तरह उन्हें ही जाता है। मेरी भूमिका इस लेख में एकात्म मानव-दर्शन को जानने-समझने और उपनिषदों में वर्णित व्यापक मानववाद के परिप्रेक्ष्य में उसे परखने भर की है।
‘एकात्म मानव दर्शन; विवेचना सिद्धान्त एवं तत्व मीमांसा’ शीर्षक अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में दीनदयाल उपाध्याय लिखते हैं कि ‘आज भारत के इतिहास में क्रान्ति लाने वाले दो पुरुषों की याद आती है। एक वह कि जब जगद्गुरु शंकराचार्य सनातन बौद्धिक धर्म-संदेश लेकर देश में व्याप्त अनाचार को समाप्त करने चले थे; और दूसरा जब कि ‘अर्थशास्त्र’ धारणा का उत्तरदायित्व लेकर संघ राज्यों में बिखरी राष्ट्रीय शक्ति को संगठित कर साम्राज्य की स्थापना करने चाणक्य चले थे। आज इस प्रारूप को प्रस्तुत करते समय वैसा ही तीसरा महत्वपूर्ण प्रसंग आया है जब कि विदेशी धारणाओं के प्रतिबिम्ब पर आधारित मानव संबंधी अधूरे व अपुष्ट विचारों के मुकाबले विशुद्ध भारतीय विचारों पर अधारित मानव कल्याण का सम्पूर्ण विचार ‘एकात्म मानववाद’ के रूप में उसी सुपुष्ट भारतीय दृष्टिकोण को नये सिरे से सूत्रबद्ध का काम हम प्रारम्भ कर रहे हैं।’
इस प्रस्तावना में कथित विदेशी धारणाओं पर आधारित मानव संबंधी अधूरे व अपुष्ट विचारों के मुकाबले भारतीय विचारों पर आधारित मानव कल्याण के सम्पूर्ण और सुपुष्ट भारतीय दृष्टिकोण को नये सिरे से सूत्रबद्ध किए जाने का उपाध्याय जी का संकल्प स्पष्ट देखा जा सकता है। इस क्रम में उन्होंने भारतीय इतिहास के जिन दो महापुरुषों का उल्लेख किया है उनका दर्शन और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में निश्चय ही उल्लेखनीय योगदान रहा है। बल्कि कहना चाहिए कि इन दोनों ही महापुरुषों ने अपनी धुरी से विचलित भारतीय एकात्म मानववाद को फिर से मूलगामी बनाया। उपाध्याय जी ने इस दिशा में सैद्धान्तिक विवेचन के साथ दो उपन्यास ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ और ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ भी लिखे ताकि इन दोनों युग-नायकों के किए-धरे के मार्फत भी उनके प्रस्वावित एकात्म मानववाद के मॉडल को ठीक से जाना-समझा जा सके।
इस क्रम में जून १९६४ में उदयपुर में दिए उनके दो बौद्धिक प्रवचनों ‘भारतीय और पाश्चात्य दृष्टि में अंतर’ व ‘व्यक्ति और समाज’ को देखना समीचीन होगा। जिनमें उन्होंने पश्चिम की जीवन को टुकडों में देखने की प्रवृत्ति, केवल ज्ञानेन्द्रीय ज्ञान पर निर्भरता, व्यक्ति और समाज का द्वैत तथा वहाँ उभरी पूँजीवाद, समाजवाद और साम्यवादी विचारधाराओं का विवेचन करते हुए उन्होंने अपने उस एकात्म मानववाद की धारणा प्रस्तुत की जिसमें भारतीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के मूल प्रत्यय ‘संघर्ष नहीं सहयोग’, व्यक्ति व समाज की परस्पर अनुपूरकता, अद्वैत दर्शन और मानवीय करुणा से जुडी व्यापक अवधारणाओं का समावेश किया गया। उनके यही बौद्धिक प्रवचन आगे चलकर अप्रैल १९६५ में मुंबई(बम्बई) में दिए उनके चार भाषणों के मूल आधार बने। इनमें क्रमशः उन्होंने ‘राष्ट्रवाद की सम्यक अवधारणा’, ‘एकात्म मानववाद’, व्यष्टि, समष्टि-परमेष्टि और ‘युगानूकूल अर्थ रचना’ जैसे प्रत्ययों को व्याख्यायित किया। अर्थात् वे जीवन मूल्य जिनके जरिए समस्त संसार का निर्वाह हो रहा है। इसे ही प्राचीनों ने ‘जीवन-यज्ञ’ कहा है। अर्थात् वह जीवन-दर्शन जो न केवल मनुष्यों, बल्कि सृष्टि में मौजूद पशु-पक्षियों, कीट-पतंगो तक के भरण-पोषण की चिंता करता है। जिसे लेकर वैदिक मनीषा ने कहा है ः
‘‘देवां मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्वाश्च यज्ञारगदेव संघ,
प्रेता पिशाचस्तव समस्ता चान्नमिच्छति मया प्रदत्तम्।
अप्रर्थमन्नंः हि मया प्रदत्तं तेषामिदं ते मुदता भवन्तु।।’’
अर्थात् देव, मनुष्य पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष, सर्प, प्रेत, पिशाच, वृक्ष ये सभी मेरे द्वारा प्रदत्त अन्न की इच्छा रखते हैं। कर्म-बंधन के पाश से भूखी चींटी, कीट, पतंग आदि मुझ से जुडे हैं। मैंने इनकी परितृप्ति के लिए अन्न दिया है- इसे प्राप्त कर वे सुखी व आमोदित हों।
राष्ट्रवाद की अपनी इस व्यापक अवधारणा में उन्हें ‘गीता रहस्य’ और ‘हिन्द स्वराज्य’ के मार्फत लोकमान्य तिलक और गाँधी भी याद आए। राष्ट्र विकास के सन्दर्भ में उन्होंने उन सांस्कृतिक मूल्यों की बात उठाई जो राष्ट्र के नागरिकों को एक सूत्र में जोडते हैं। अलबत्ता, राष्ट्र किस दिशा में गतिशील हो, इस प्रश्न पर वे उन पश्चगामियों से सहमत नहीं हो पाए जो हजार वर्ष पीछे जाकर भारत राष्ट्र को फिर से संगठित करने की पैराकारी कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा कि हमें ठीक वहीं से आगे बढना होगा, जहाँ देश आज खडा है। क्योंकि सभ्यता के विकास में लौट कर चलना न वांछनीय है और न ही संभव। यद्यपि यहाँ उन्होंने पश्चिमी शिक्षा के प्रभावों का विवेचन करते हुए यूरोपीय राष्ट्रवाद, पूँजीवाद और सर्वहारा की तानाशाही तीनों से बचने की भी बात कही-जिन्होंने एक तरफ व्यक्ति को समाज के प्रति गैर जिम्मेदार बनाया वहीं दूसरी ओर सामाजिक हित के नाम पर उसकी स्वतंत्रता को ही हडप लिया।
सम्यक राष्ट्रवाद की इस धारणा में उनका मानना था कि हमें ऐसे तंत्र का विकास करना चाहिए जिसमें किसी भी स्थिति में मनुष्य की गरिमा कुंठित न हो। क्योंकि व्यक्तियों का समुदाय ही अंततः समाज और राष्ट्र के रुप में प्रतिष्ठापित होता है। पर पूँजीवादी व्यवस्थाओं की अधोगति ने उन्हें यह भी सोचने को विवश किया कि व्यक्ति की इस स्वतंत्रता से समाज की समरसता भी खंडित नहीं होनी चाहिए। यह तभी संभव होगा जब समाज वैदिक मनीषा द्वारा प्रस्तावित धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के पुरुषार्थ चतुष्टय को अपने आचरण में अपनाएगा। एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था जो सबके हित में कार्यशील होकर समता के सच्चे आदर्श को प्राप्त करे। उन्होंने कहा हमें समाज में उस समता को बढावा देना होगा जो आत्मीयता और मानवीय करुणा से उपजती है। ऐसी मूल्यपरक व्यवस्था ही जाति, मत, पंथ, भाषा आदि के संकीर्ण दायरों में
कैद मनुष्य को मानववाद के सच्चे पथ पर ले जा सकती है।
इसीलिए धर्म-संस्कृति-समाज विषयक अपने चिन्तन में उन्होंने संसार में एकता का दर्शन करने और अपने विविध रूपों में जो परस्पर पूरकता का भाव पैदा होता है उन मूल्यों को सच्ची संस्कृति कहा। उनका मानना था कि जिस प्रकार शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समुच्चय से व्यक्ति बनता है, उसी प्रकार देश, संकल्प, धर्म और आदर्श के समुच्चय से राष्ट्र का निर्माण होता है। जैसे व्यक्ति के विकास के लिए शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा का ध्यान रखना *ारूरी है-क्योंकि इन चारों की भूख मिटाए बिना सुखी व्यक्तित्व का विकास नहीं हो सकता, ठीक वही बात राष्ट्र पर भी लागू होती है। इस क्रम में उनके द्वारा प्रस्तुत ‘चिति’ की अवधारणा बहुत महत्वपूर्ण है। चिति अर्थात् वे सनातन विश्व नियम जो आज तक विश्व मानवता को बचाने आये हैं। मनुष्य के उज्ज्वल विवेक के साक्षी रहे उन सात्विक मूल्यों का चिति के आधार पर विकास करने को ही उन्होंने सांस्कृतिक विकास कहा।
लेकिन इससे भी आगे बढकर उनके प्रस्तावित एकात्म मानव-दर्शन का सबसे उल्लेखनीय पक्ष मानव आदर्शों के साथ युगानुकूल आर्थिक दर्शन को अपनाने की मौलिक सूझ है। उनका साफ कहना था कि राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ हमें देश को आर्थिक रुप से भी स्वतन्त्र करना होगा। जिसके लिए उनका मानना था कि शासन का काम सामाजिक, आर्थिक व्यवस्थाओं का संचालन करने वाली संस्थाओं के काम में हस्तक्षेप का हर्गि*ा नहीं होना चाहिए। शासन का काम केवल यह देखना होना चाहिए कि लोग और संस्थाएं अपने दायित्वों का निर्वाह नीति पूर्वक कर रहे हैं अथवा नहीं? इसीलिए राज्य अथवा व्यवस्था को वे उसी धर्मदण्ड से चलाने की बात कहते हैं जिसमें दण्ड की व्यवस्था न अत्यन्त कठोर हो और न ही अत्यन्त उदार। प्रजा के रक्षण, भरण-पोषण की राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी के साथ ही वे मूलभूत मानव अधिकारों की भी बात भी उठाते हैं जिनमें प्रमुख हैंः १. श्रम का अधिकार मनुष्य का संवैधानिक अधिकार होना चाहिए २. राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक को योग्यता और क्षमता अुनसार काम उपलब्ध कराए ३. राज्य सभी को निशुल्क शिक्षा और निशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराए ४. न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नागरिक का जन्म सिद्ध अधिकार हो ५. राज्य व्यक्ति की पूँजी निर्माण की प्रवृत्ति को बढावा दे ६. देश में औद्योगिक विकेन्द्रीकरण के साथ कुटीर उद्योगों को बढावा मिले ७. मशीनों के मर्यादित प्रयोग के साथ मानव श्रम का समुचित नियोजन हो। इस क्रम में उन्हने विश्वेश्वरैया द्वारा सुझाए आर्थिक मामलों में ‘सात मकार मैन, मैटीरियल, मनी, मैनेजमेंट, मोटिव-पावर, मार्केट और मशीन की बात भी उठाई। उनका कहना था कि एकात्म मानववाद के लिए बेहतर आर्थिक प्रबन्धन के साथ ही हमें सामाजिक ऊँच-नीच, जाति-पाँति और भेदभाव को हमेशा के लिए खत्म करना होगा। अतः हमारा जोर उन संस्थाओं के विकास पर होना चाहिए जो मनुष्य में सच्ची कर्म-चेतना और विराट एकता की भावना जागृत करे।
इस तरह दीनदयाल उपाध्याय ने अपने एकात्म मानव-दर्शन में सिद्धांत एवं जीवन-व्यवहार दोनों का समन्वय करते हुए उपनिषदों में वर्णित लगभग सम्पूर्ण एकात्म मानववाद को समेटने की कोशिश की है। पर पश्चिम और भारतीय दर्शन की मूलभूत भिन्नताओं में जाते हुए वे भेद-दृष्टि के शिकार हो गए-‘कि हम ऐसे, वे वैसे हैं’ जो उपनिषदों में वर्णित भूमा-भाव को भुलाने जैसा है। समस्त जीवन सिद्धांतों का निर्वचन करते हुए उपनिषद् अन्त में जिस चरम निष्पत्ति पर पहुँचते हैं, वह है सबको अपने में देखना। इसे लेकर उपनिषदों में कहा गया है कि जो सबको अपने में देखता है वह अमृत में अमृत को देखता है। उधर दूसरे को अपने से भिन्न देखने वाले के लिए कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु में मृत्यु को देखता है। प्राचीनों ने इसे हाथी और अंधों क उदाहरण *ारिए समझाया है; कि हाथी के पाँव, धड, सूँड, कानों आदि को भिन्न-भिन्न मानते हुए अंधे जैसे सम्पूर्ण हाथी को नहीं जान पाते वैसे ही भेद दृष्टि जीवन की समग्र एकता के मर्म म नहीं पैंठ सकती। आचार्य महाप्रज्ञ ने इसे अंग-अंगी भाव कहा था-कि कार्य विभाजन की दृष्टि से हाथ, पैर, मुँह, आँख, कान, नाक, आदि भले अलग-अलग प्रतीत होते हों, लेकिन उनकी भिन्नता को महत्व देते हुए यदि हम यह भुला दें कि वे सभी शरीर के भिन्न-भिन्न अवयव मात्र हैं तो वह दृष्टिकोण जीवन विरोधी हो जाएगा। पेड में जडे भले ही समूचे पेड का हित संधारण करती हों-पर तना, टहनियाँ, पत्ते, फूल-फल उसके विकास का परिणाम है। इस क्रम में भारतीय जीवन दृष्टि को जीवन की मूल दृष्टि कहा जा सकता है, पर पेड में तने, टहनी, पत्ते आदि के महत्व को नकारना भी पेड के अस्तित्व के विरूद्ध जाना होगा।
संभवतः यही कारण रहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के इस एकात्म दर्शन की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी इन दिनों समग्र भारतीय जीवन दृष्टि की व्यापकता के विरुद्ध जाते हुए कुछ मामलों में संकीर्णताओं का शिकार हो रहे हैं। इसे खासतौर से भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन और अतीत के कुछ इतिहास नायकों को कमतर दिखाने की उनकी प्रवृत्ति में वह साफ देखा जा सकता है। अलबत्ता उनकी इस कोशिश से वे उपाध्याय जी के उस दृष्टिकोण के विरुद्ध भी जा रहे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि हमें इतिहास को लौटा लाने की बजाए जहाँ आज हैं उसी से आगे बढना चाहिए। आखिर आज यह भारत देश हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी सभी समुदायों का अपना देश है। ऐसे म किसी भी समुदाय के महापुरुषों की कमतरी देश में असन्तोष और विग्रह का कारण हो सकती है। खेद की बात यह भी है कि अपनी सृजनात्मकता को लेकर विश्व भर में प्रतिष्ठित रहे गालिब व टैगोर तक को पाठ्यक्रम से हटाने का सुझाव दिया है। पर इस सबके बावजूद हमें यह मानना पडेगा कि उपाध्याय जी के एकात्म मानव दर्शन की भले ही कुछ सीमाएं हो सकती हैं, पर वे सिद्धान्त और जीवन व्यवहार में एक-मेक थे। उन्होंने जौनपुर चुनाव में अपनी जाति के प्रचार करने के सुझाव को उन्होंने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि जातिवाद के प्रचार के जरिए हासिल जीत दरअसल बुरी पराजय होगी। उनकी ईमानदारी को लेकर नानाजी देशमुख बताया करते थे कि एक बार सब्जी वाले को भूलवश खोटा सिक्का दे दिए जाने के बाद वे तभी चैन से सोये जब उन्होंने खोटा सिक्का उससे वापस ले लिया। एक बार भीड अधिक होने पर जब उन्हें रेल के दूसरे दर्जे से यात्रा करनी पडी तो उन्होंने टी.टी. के पास जाकर अन्तरराशि चुकाई। वे इस बात का भी सख्त विरोध करते थे कि जो राजनेता हिन्दी बोल सकते हैं वे भला अंग्रेजी में पत्राचार क्यों करें। ज्योतिष की बजाए उन्हें जीवन के कर्म सिद्धान्त पर अधिक भरोसा था। इस सबके साथ ही राष्ट्रवाद के समुचित सैद्धांतिक विवेचन में उन्होंने साफ कहा था कि हमारा ध्येय सांस्कृतिक संरक्षण नहीं बल्कि ऐसे समाज का निर्माण होना चाहिए जो विकासोन्मुख हो। सिद्धांतों के नाम पर भी उन्होंने सम्पूर्ण मानवता की उपलब्धियों पर विचार करने और जो भी देश और काल की परिस्थितियों के अनुकूल हो उसे अपनाने पर बल दिया था। उनका यह कहना आज बहुत महत्व रखता है कि जनता बुद्धिमता पूर्ण ढंग से अपने मत का उपयोग करे, ताकि अपात्र राजनेताओं के चयन पर स्वतः अंकुश लग सके। उनका यह भी मानना था कि जनता किसी दल के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए मत दे और किसी भी दल के बुरे प्रत्याशी का विरोध करते हुए उसे हराए। राजनेताओं के लिए अनुशासन को धर्म दर्जा देने वाले दीनदयाल उपाध्याय ने राजनीतिक अवसरवादिता रोक के लिए आदर्श आचार संहिता के निर्माण पर बल देते हुए १९३७ के चुनाव में मुस्लिम लीग के हाफिज मुहम्मद इब्राहीम का उदाहरण पेश किया था जिन्होंने विधानसभा से त्यागपत्र देकर पुनः कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडा इस तरह उनकी निगाह में किसी व्यक्ति, धर्म, मत-पंथ की बजाए आदर्श का महत्व था। इसलिए आज आवश्यकता है कि उनके जीवन सिद्धांतों के मर्म में पैंठते हुए उनके द्वारा प्रस्तावित एकात्म मानव-दर्शन के फिर से पाठ किया जाए। असमय काल कवलिय हुए उपाध्यायजी यदि आज जीवित होते तो अपने एकात्म मानव-दर्शन को निश्चय ही आज और अब के संदर्भ में पुनः परिभाषित करते। उसकी व्यावहांरिक परिणति तक जाते। हमें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि भेद दृष्टि से मुक्त शुद्ध अभेद दृष्टिवाला दर्शन ही आज समूची मानवता के कल्याण का वाहक हो सकता है। इसके सिवा विश्व मानवता के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है।