समावेशी विकाश के लिए समेकित अर्थनीति

प्रो.भगवती प्रकाश शर्मा


अनुपम विविधताओं से युक्त भारतीय अर्थव्यवस्था का संचालन किसी भी पश्चिमी औद्योगिक देश अथवा किसी साम्यवादी देश के अंधानुकरण से सम्भव नहीं है। दीनदयाल उपाध्याय का स्पष्ट मत था कि यूरो-अमेरिकी पूंजीवाद या तत्कालीन सोवियत संघ प्रणीत साम्यवाद के विकास प्रतिरूपों (माडल्स) के अनुकरण से भारत जैसे देश के विशाल जन समाज के योगक्षेम की व्यवस्था सम्भव नहीं है। उनके द्वारा उद्घोषित ‘‘हर हाथ को काम व हर खेत को पानी’’ का ध्येय वाक्य ही भारत को समावेशी विकास के लक्ष्य को प्राप्त करा सकता है। स्वाधीनता के बाद साढे चार दशक तक अपनायी मिश्रित अर्थव्यवस्था व उसके बाद १९९१ से अपनायी विदेशी निवेश प्रोत्साहन की नीतियों के कारण आज देश अनेक आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है। वैसे केवल भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के लिये भी भारतीय सनातन मूल्यों से अनुप्राणित व दीनदयाल जी द्वारा व्याख्यायित एकात्म मानव दर्शन ही सभी आर्थिक, सामाजिक व परिस्थितिकीय समस्याओं का समाधान कर सकता है।
आज स्वाधीनता के ७० वर्ष बाद भी उनके द्वारा तब पांच दशक पूर्व इंगित समस्याएँ आज भी पूर्ववत ही मुहँ बायें खडी है। सोवियत संघ तो १९८९ में १४ टुकडों में विभक्त हो गया था व अमेरिका अर्थव्यवस्था भी २००८ के मेल्टडाउन के बाद आज भी सम्भल नहीं पायी है। अब आज तो सभी देशों में दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित समेकित व धारणक्षम विकास की ही चर्चायें चल रहीं हैं। उस दिशा में आगे बढने हेतु आज सर्वाधिक उपयोगी विचार, दीनदयाल जी का एकात्म मानव दर्शन है। आज तेजी से बढती बेरोजगारी, रोजगार विहीन आर्थिक वृद्धि, तेजी से बढ रही आर्थिक विषमता, जनता में व्याापक स्तर पर कुपोषण, उच्च शिशु मृत्यु दर, बढती कृषि समस्याओं के बीच किसानों की आत्महत्याओं जैसी समस्याओं का निवारण, केवल सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) वृद्धि से सम्भव नही है। देश की ५२* जनसंख्या तो कृषि पर निर्भर है, जिसका आज देश के सकल उत्पादन में मात्र १४* अंश रह गया है व उसकी (कृषि की) औसत वार्षिक वृद्धि दर ३* से भी न्यून है। उद्योगों पर भी आज देश की २५* जनसंख्या निर्भर है, और उनकी भी आज औसत वार्षिक वृद्धि दर ३.५* ही है। सेवाओं पर जहाँ मात्र २२* जनसंख्या निर्भर है, का आज देश के सकल घरेलु उत्पाद में ६२* योगदान है व उनकी वृद्धि दर भी १२-१५* होने से ही हमारी सकल वार्षिक वृद्धि दर ६.५-७.५* हो जाती है। लेकिन, वास्तव में देश की तीन चौथाई जनसंख्या के लिये तो आज औसत वृद्धि दर १.५-३.५* ही रह जाती है। इसके अतिरिक्त, आज भारत तो विश्व का दूसरा सर्वाधिक आर्थिक विषमता युक्त देश बन गया है, जहाँ देश की ५८* सम्पदा मात्र १* जनता के स्वामित्व व नियंत्रण में है। जापान में शीर्ष १* जनसंख्या का अधिकार वहाँ कि मात्र २२* सम्पदा पर ही है। आज देश में जहाँ उच्च शिशु मृत्यु दर, व्यापक कुपोषण, देश के उद्योग, व्यापार व वाणिज्य पर विदेशी कम्पनियों का बढता नियंत्रण, रोजगार विहीन आर्थिक वृद्धि, शिक्षा व चिकित्सा सुविधाओं की अपर्याप्तता, किसानों की आत्महत्या, कृषि उत्पादकता में पिछडापन जैसी समस्याओं पर विचार करें तो स्वाधीनता के ७० वर्ष बाद भी देश गम्भीर आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है। वैश्विक विनिर्माणी उत्पादन (वर्ल्ड मेन्यूफेक्चरिंग) में भारत का अंश आज मात्र २.१* है, जबकि चीन का अंश आज २२* है।
देश की अर्थव्यवस्था, ऐसी सारी विसंगतियों से मुक्त रहे, इस हेतु ही दीनदयाल जी ने तब पाँच दशक पूर्व ‘एकात्म अर्थनीति’ का प्रतिपादन करने के साथ ही समग्र, समावेशी व धारणक्षम अर्थात टिकाऊ विकास एवं विश्व मंगल के पावन लक्ष्य-साधन हेतु, ‘‘एकात्म मानव दर्शन’’ की अवधारणा का निरूपण किया था, वह आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। दीनदयाल जी तब यह प्रश्न करते थे कि समग्र विश्व में चल रही अर्थनीति ने विकास में क्या योगदान किया है? वे स्पष्ट कहते थे कि आज की उत्पादन-वृद्धि में मर्यादाहीन स्पर्धा तथा असीम उपाभोग की लालसा के कारण अमरीका धरती की प्राकृतिक सम्पदा का निरंकुश उपयोग करते हुए सारे विश्व के सम्मुख भारी पर्यावरण संकट खडा कर रहा है। उनका यह भी कथन था कि, ‘‘अमरीकी भोगवाद आज विश्व के ४२* अल्युमिनियम, ४४* कोयला, ३३* तांबा, २८* लोहा, ६३* प्राकृतिक गैस, ३३ पेट्रोलजन्य पदार्थ, २४* टिन, ३८* निकिल जैसे पुनर्निर्मित न किये जा सकने वाले खनिजों का नाश कर रहा है। भोगवाद व समृद्धि के लालच में ही इतनी बडी मात्रा में प्राकृतिक सम्पदा को नष्ट करने वाले अमरीका की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की मात्र ५.६* ही है।’’ आज वही विनाश लीला चीन खडी कर रहा है जो कोयले सहित विश्व के आधे से अधिक खनिजों का अकेले ही दोहन कर रहा है और विश्व की आधी से अधिक कार्बनडाई ऑक्साइड सहित सारी प्रदूषणकारी ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन कर विश्व में सर्वाधिक प्रदूषण फैला रहा है।
एकात्म मानवदर्शन ः श्रेष्ठतम समाधान आज की विषमतापूर्ण वैश्विक परिस्थितियों में दीनदयाल जी द्वारा प्रतिपादित व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, जीवनसृष्टि, प्रकृति व समष्टि में सामंजस्य का एकात्म मानव दर्शन भारत ही नहीं, समग्र विश्व के लिये विकास का सर्वग्राह्य विचार है। वस्तुतः यह एकात्म अर्थनीति का दर्शन उनके वृहत्तर ‘एकात्म मानव दर्शन’ पर आधारित है, जो मनुष्य का विचार केवल ‘आर्थिक मानव’ व उसकी भौतिक आवश्यकताओं के एकांगी दृष्टिकोण पर ही विचार न करते हुए जीवन के समग्र पहलुओं का, यथा व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा और धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षरूपी चतुर्विध पुरूषार्थो की साधना का निरूपण करता है। साथ ही परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व सहित एकात्म समष्टि का भी विचार करने वाला मानव इस दर्शन का केन्द्र बिन्दु माना है।
अर्थ का अभाव व प्रभाव दोनों अनुचित ः अर्थ का अभाव व अतिरेक (अर्थात् अनुचित प्रभाव), दोनों का ही दीनदयाल जी ने निषेध किया है। इस संबंध में दीनदयाल जी, आर्चाय चाणक्य के इस कथन को उद्धृत करते थे कि-‘‘सुखस्य मूलम् धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः’’। सुख धर्ममूलक है और धर्म का मूल अर्थ है। भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण रहा है कि व्यक्ति एवं समाज का भरण-पोषण एवं उनकी भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होने वाली व्यवस्था में निहित मूल भाव धर्म है। धर्म की पालनार्थ अर्थ भी आवश्यक है अर्थ के बिना व्यक्ति धर्म पर टिक नही सकेगा। यह बात व्यक्ति और समाज दोनों पर लागू होती है। अर्थ के अभाव के कारण व्यक्ति के लिए कर्तव्यरूप धर्म का पालन करना भी कठिन हो जाता है। ‘बुभुक्षितः किं न करोति पापम्’ वाली उक्ति के अनुसार उसके पैर अनैतिक मार्ग पर पड सकते हैं। दूसरी ओर अर्थ का जीवन पर अनुचित प्रभाव भी नहीं होना चहिये। जीवन व मनोंभावों पर अर्थ के अत्यधिक प्रभाव के कारण भी धर्म का ह्रास होता है। सम्पत्ति के इस प्रभाव का पाश्चात्यों ने विचार ही नहीं किया है। अर्थ के प्रभाव का अर्थ स्पष्ट करते हुए दीनदयाल जी कहते हैं, प्रत्यक्ष सम्पत्ति अथवा उसकी सहायता से प्राप्त होने वाली वस्तुओं एवं भोग-विलासों में आसक्ति अनैतिकता की सीमा तक भी निर्मित हो सकती है, तो उसे ही सम्पत्ति के प्रभाव का लक्षण माना जाता है जिस व्यक्ति को केवल सम्पत्ति का लालच होता है वह देश, धर्म, मानव-जीवन के परमसुख आदि महत्वपूर्ण बातों को भुला देता है। इस प्रकार सम्पत्ति के लोभ का शिकार विषयासक्त व्यक्ति विवेकहीन या नैतिकता विहीन बन सकता है तथा अपना और समाज का पतन करता है चूंकि विषय-भोग पर सीमा या मर्यादा तो होती नहीं, ऐसा व्यक्ति और समाज अंत में नष्ट हो जाते हैं। इसलिये अर्थ का अभाव भी नहीं होना चाहिये और प्रभाव भी नहीं होना चाहिये। यह बात व्यक्ति व राष्ट्र दोनों पर लागू होती है।
उचित अर्थायाम व आर्थिक व्यवहारों का तर्क ः संगत नियमन अर्थ (सम्पत्ति) के अभाव एवं प्रभाव इन दोनों से ही मानव जीवन व समाज जीवन को निस्पृह या मुक्त रखकर समाज में सम्पत्ति के अर्जन, निवेश व व्यय के बारे में एक योग्य, तर्कसंगत व मूल्यपरक व्यवस्था निर्मित करने को भारतीय संस्कृति में अर्थायाम कहा गया है। अर्थ का जीवन में उचित नियमन व इस संबंध में योग्य एवं सुस्पष्ट मर्यादापूर्वक अर्थ के उत्पादन, स्वामित्व, वितरण तथा भोग की समुचित और संतुलित व्यवस्था ही अर्थायाम के प्रमुख अंग हैं। अतः अर्थायाम का विचार करते समय
नैतिकता व न्यायपरकता आदि सब बातों का भी विचार करना होगा।
विकास की भारतीय अवधारणा आधारित ः एकात्म अर्थनीति वस्तुतः दीनदयाल जी का कथन था कि एकात्म अर्थनीति व एकात्म मानव दर्शन कोई नया विचार न होकर हमारे भारतीय सनातन विचार की सामायिक व्याख्या है। हमारी सनातन भारतीय, सनातन आर्थिक विचारधारा अग्रानुसार है ः-
(अ) विकास की भारतीय अवधारणा ः विकास की भारतीय अवधारणा सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के अनुरूप ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे व्यापक कल्याण के उपनिषद वाक्यों के अनुरूप है। इसमें मानव मात्र के त्रिविध कष्टों से निवृत्ति के साथ उसके योगक्षेम में, इस प्रकार अभिवृद्धि का निर्देश है, कि सम्पूर्ण जीव सृष्टि व पर्यावरण में भी सुस्थिर सामंजस्य रहे। यहाँ मानव मात्र के त्रिविध कष्टों से अभिप्राय समस्त प्रजा को शारीरिक, दैविक (प्रकति या परिवेश जन्य) और भौतिक साधनों के अभाव-जन्य कष्टों से मुक्ति से है, जो रामचरित मानस में इन शब्दों में व्यक्त है ः ‘‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहूहि नहीं व्यापा’’। योगक्षेम म योग से आशय है अप्राप्त की प्राप्ति (जो अब तक प्राप्त नहीं हुआ है उसकी प्राप्ति) एवं क्षेम का अर्थ है, जो प्राप्त हो गया, उसकी सुरक्षा। यहाँ पर योगक्षेम से आशय भी सम्पूर्ण समाज के न्यायोचित योगक्षेम से है। अमर्यादित उपभोग योगक्षेम नहीं कहा जा सकता है। जितने न्यूनतम वैयक्तिक उपभोग से विश्व के सभी व्यक्तियों की न्यायोचित भौतिक आवश्यकताओं की पूर्त्ति-बिना जीव सृष्टि के अन्य घटकों को उद्वेग दिय-सुदीर्घ काल तक चल सके वही विकास है। इसीलिये श्रीमद्भागवत् पुराण में कहा है कि ‘‘यावद्भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं ही देहिनाम्। अधिकम् याऽभमन्येत स स्त्तेनो दण्डमर्हति।।’’ अर्थात जितने उपभोग से व्यक्ति की उदर पूर्त्ति हो जाये या उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्त्ति हो जाये उतने पर ही उसका अधिकार है, उससे अधिक पर अपना अधिकार जताने वाला व्यक्ति चोर है, जो दण्डित किये जाने का पात्र होता है। इसी कारण दैनिक बलिवेश्वदेव में विधान है कि प्रत्येक व्यक्ति उसके द्वारा अर्जित संसाधनों (व उपभोग्य सामग्रियों) से चींटी जैसे क्षुद्र प्राणी, कौआ, कबूतर आदि पखेरूओं, गौ व श्वान सहित सभी चौपायों सहित अभ्यागतों (कुछ भी प्राप्ति की आशा से उसके पास आने वाले मनुष्यों) के अधिकतम पोषण व अनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपनी पूरी क्षमता से सहयोग करे। समाज की अपेक्षाओं की पूर्त्ति हेतु ही वेदों में उत्पादन में सभी प्रकार के अन्न धनादि प्रचुरताओं का निर्देश किया है। यथा ‘‘गोधूमाश्चमे, माषाश्चमें,तिलाश्चमे, मुद्गाश्चमे.......’’। अर्थात् मेरे गेहुँ के भण्डार, उडद के भण्डार, तिल के भण्डार, मूंग के भण्डार आदि सभी प्रकार के उत्पादकीय पदार्थों के उत्पादन व भण्डारों में प्रचुर वृद्धि होवे एवं होती रहे। ऐसे सभी प्रकार के कृषि पदार्थों ही नहीं वस्त्र, रत्न, धातु, यान, जलयान, आदि अनगिनत वस्तुओं की प्रचुरता के कई मंत्र वेदों में हैं।
इसी क्रम में आज की भांति अनेक स्थानों पर पूंजी निवेश कर व्यवसाय कर लाभार्जन के भी अनेक मंत्र है। व्यवसाय की यह अभिवृद्धि दस गुने से अरबों गुने तक होने की कामना की गयी है। वेदों में अन्य बातों के साथ-साथ अत्यन्त समुन्नत व्यापार, वाणिज्य व उद्योगों के व्यवस्थित संचालन का विषद वर्णन है। प्राचीन काल में सम्भवतः व्यवसाय आज से भी अधिक उन्नत रहा है, इसलिये धन के लिये शब्दावली की दृष्टि से आज की तुलना में कहीं अधिक ६०-७० प्रकार के धन व पूंजी के वर्णन है। ऋग्वेद में सौ चप्पुओं वाले जलयान से व्यापारिक यात्राओं से लेकर सहस्त्र खम्भों के भवनों के उल्लेख आदि अति प्राचीन काल में यहाँ उन्नत व वृहद् स्तरीय व्यापार, वाणिज्य व उद्योगों के प्रमाण प्रचुरता में उद्घृत हैं।
(ब) विकेन्द्रित उत्पादन व पूर्ण रोजगार का निर्देश ः प्राचीन शास्त्रों में ऐसे संसाधन जिनका नवीनीकरण या पुनर्जनन सम्भव नहीं है उनका अत्यन्त मर्यादित उपयोग के निर्देश है। विकेन्द्रित उत्पादन, सबको रोजगार के अवसर एवं ऐसी पूंजी से अधिकांश परिवार स्वावलम्बी हो, यह अपेक्षा ऋग्वेद, अथर्ववेद व कई नीति ग्रन्थों में है। इसीलिये ऋग्वेद में परिवार की उत्पादकीय सम्पत्ति को पूंजी कहा गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि, किसी भी परिवार को उसकी उस पूंजी से किसी भी स्थिति में वंचित नहीं किया जाय। इसका उद्देश्य था कि राज्य में विकेन्द्रित उत्पादन से अधिकांश परिवारों को स्व-रोजगार सुलभ हो सके।
विकास के भारतीय अर्थ चिन्तन में व्यापक रोजगार को प्राधान्यता दिये जाने के कारण ही चाणक्य के अर्थशास्त्र की परिभाषा आज भी सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध होती है। चाणक्य रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार मनुष्य मात्र अर्थात सभी प्रजाजनों को जीवन वृत्ति प्रदान करने के शास्त्र को ही अर्थशास्त्र कहा है। चाहे स्व रोजगार हो या कोई व्यक्ति कहीं भी भृत्ति अर्थात वेतन या मजदूरी के बदले सेवा दे, उसकी भृत्ति अर्थात मजदूरी या वेतन इतना होना अपेक्षित है कि उस पर आश्रित सभी परिवारजनों का भरण पोषण हो सके। यथा ‘‘अवश्यपोष्य भरणं भृत्तिकाद्भवेत’’ याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार व्यक्ति को इतना पारिश्रमिक प्रदान करना ही चाहिये कि वह उस पर अवलम्बित उसके सभी परिवारजनों का पोषण कर सके। हिन्दु अर्थ चिन्तन में आज के अर्थशास्त्र के सभी अंगों यथा उपभोग, उत्पादन, मूल्य, आय, किराया व लोकवित्त आदि का सांगोपांग एवं अत्यन्त समन्वित विवेचन है। मांग व पूर्त्ति के अनुरूप मूल्यों में उतार चढाव से लेकर मूल्य नियन्त्रण हेतु पण्य विचक्षणा जैसे ‘मूल्य निर्धारण मण्डल’ तक की व्यवस्थाओं के साथ-साथ करारोपण के सिद्धान्तों का भी समुचित विवेचन हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मिल जाता है।
यथा शुक्र नीति में करारोपण के सिद्धान्तों के रूप में कहा है कि जिस प्रकार मधुमक्खी द्वारा पुष्पों से पराग एकत्र करने पर पुष्प को कोई पीडा नहीं होती उसी प्रकार राजा को भी कर संग्रह इस प्रकार करना चाहिये कि प्रजा को कर चुकाने में कष्ट नहीं हो।
(स) आज की अर्थरचना में एकात्म दर्शन के सूत्र ः व्यष्टि से समष्टि पर्यन्त अर्थ पुरुषार्थ अर्थात् अर्थ व्यवस्था के संचालन में एकात्मकता परम आवश्यक है आज की हमारी अधिकांश आर्थिक समस्याओं का कारण ही अर्थ व्यवस्था के संचालन में एकात्म दृष्टि का अभाव है। इस दृष्टि से निम्न बिन्दु विशेष विचारणीय हैं-
(१) समावेशी विकास के लिये विकेन्द्रित उत्पादन ः प्रक्रिया व आर्थिक प्रणाली-स्वदेशी व स्वावलंबन हेतु देश में कृषि, लघु उद्योग, ग्रामोद्योग की सहभागिता युक्त उत्पादन तंत्र ही हमारी वृहद जनसंख्या के योगेक्षेम की व्यवस्था कर सकता है। देश तीन चौथाई से अधिक जनसंख्या अनिगमित व अनौपचारिक अर्थ तंत्र में नियोजित है। उसको दृष्टिगत रख कर आर्थिक नीतियाँ व प्रणाली का चयन आवश्यक है।
(२) पारिस्थितिकीय संतुलन व पर्यावरण की मर्यादाओं के अनुसार पर्यावरण सहिष्णु उत्पादन, इस दृष्टि से रोजगार सृजनकारी प्रौद्योगिकी, जो नवकरणीय साधनों पर अवलम्बित हो उसके विकास पर बल देना।
(३) मूलभूत आवश्यकताओं (भोजन, समुचित पोषण, कपडा, मकान, रक्षा, शिक्षा व स्वास्थ्य) की सम्यक पूर्त्ति की सुविधाएँ व अनुकूल परिवेश।
(४) धारणक्षम व संयमित उपभोग एवं भविष्य की आवश्यकताओं के आलोक में उपभोग व उत्पादन तंत्र का विकास।
(५) एकाधिकारी बाजार व अधिकतम लाभ केन्द्रित चिन्तन के स्थान पर समाज-हित केन्द्रित अर्थचिन्तन-अर्थरचना में व्यक्ति को गरिमापूर्ण स्थान मिले। गला काट स्पर्द्धा के स्थान पर समावेशी उत्पादन व विकास तंत्र की रचना।
(६) अर्थायाम ः अर्थ का अभाव नहीं, अर्थ का प्रभाव भी नहीं होना चाहिये। अर्थ के उत्पादन, वितरण व भोग में संतुलन होना चाहिये।
(७) विकेन्द्रित नियोजन ः एक सौ पच्चीस करोड जनसंख्या वाले देश में साम्यवादी व्यवस्था के प्रतीक केन्द्रीकृत नियोजन से समावेशी (द्बठ्ठष्द्यह्वह्यद्ब1द्ग) विकास एवं धारणक्षम वृद्धि (ह्यह्वह्यह्लड्डद्बठ्ठड्डड्ढद्यद्ग द्दह्म्श्ा2ह्लद्ध) संभव नहीं है। इसलिये ग्राम व कस्बों में उपलब्ध संसाधनों व उनकी आवश्यकताओं के आधार पर विकेन्द्रित नियोजन ही श्रेयस्कर है।
(८) कृषि में प्राकृतिक संतुलन के साथ सम्यक आधुनिकता ः असंतुलित रासायनिक सघनता वाली कृषि में. जहाँ पोषक तत्वों के असंतुलन से जहाँ भूमि बंजर हो रही है। वहीं कीटनाशकों के विवेकहीन दुरूपयोग और जी.एम. फसलों व जी.एम. खाद्य से स्वास्थ्य के लिये गम्भीर चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं। देश में पर्याप्त जल संसाधनों के होते हुए भी खेती युक्त जमीन का १/३ क्षेत्र ही सिंचित है। कृषि म पर्याप्त सार्वजनिक निवेश के अभाव में कृषि उत्पादकता वैश्विक औसत की मात्रा एक तिहाई है। इसलिये देश में बडी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, अतएव कृषि में उचित निवेश, सम्यक प्रौद्योगिकी एवं जैविक कृषि तकनीकों का उपयोग करते हुए प्राकृतिक संतुलन के साथ कृषि पर आधारित देश के आधे से अधिक जनसंख्या के समुचित योगक्षेम पर ध्यान देना चाहिये।
(९) सम्यक आर्थिक संतुलन ः बजट में बढते राजकोषीय घाटे और विदेश व्यापार और चालु खाता घाटे पर पूर्ण नियंत्रण किया जाना चाहिये।
(१०) समन्वित कराधान ः सभी प्रकार के करों (ञ्जड्ड3द्गह्य) की संरचना तर्कसंगत एवं विवेकपूर्ण
होनी चाहिये।
(११) उचित प्रौद्योगिकी का विकास ः देश की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वदेश में विकसित उत्पादों के निर्माण के लिये उचित प्रौद्योगिकी का विकास और अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा के लिये अगली प्रौद्योगिकी का संवर्धन होना चाहिये।
(१२) स्वावलम्बी विकास ः अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी पर निर्भर होने के स्थान पर आन्तरिक संसाधनों पर निर्भर होनी चाहिये।
(१३) उचित आर्थिक नीतियाँ ः देश की औद्योगिक व्यापार सम्बन्धी मौद्रिक, राजकोषीय, वित्तीय सेवाओं और वित्तीय बाजारों से सम्बन्धित सारी आर्थिक नीतियाँ देश को स्वावलम्बी व प्रबल बनाने वाली
होनी चाहिये।
(१४) रोजगार ः सम्पूर्ण अथतंत्र का संचालन प्रत्येक सक्षम व्यक्ति को रोजगार प्रदान करने वाला होना चाहिये, जिसमें स्वरोजगार पर अधिकाधिक बल दिया
जाना चाहिये।
(१५) अवसंरचनाओं व जनोपयोगी सेवाओं का समुचित विकास एवं उनकी सर्व सुलभता।
(१६) वैश्विक आर्थिक रचना ः विश्व में विद्यमान सभी २०० से अधिक देशों की प्रजाओं की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति उचित रूप से हो सके और बिना किसी एकाधिकारी शोषण के उनका योग क्षेम सुनिश्चित हो ऐसी आर्थिक रचनाओं का विकास। सभी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों यथा हृह्र, ढ्ढरूस्न, ङ्गश्ाह्म्द्यस्र क्चड्डठ्ठद्म, आदि का संचालन भी एकात्म दर्शन के आधार पर होना चाहिए।
एकात्म मानव दर्शन की संकल्पना
एकात्म मानव दर्शन में व्यक्ति से परमेष्ठी पर्यन्त सभी अंगांगी अवयवों अर्थात् व्यक्ति, परिवार, समाज, समुदाय, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व, सृष्टि, समष्टि और परमेष्ठी के बीच सामंजस्य, सहकारिता एवं एकात्मता के प्रवर्तन-पूर्वक परिपूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति का चिन्तन है। व्यक्तित्व की आन्तरिक सुसंगतता, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि व अन्तरात्मा में एकात्मता अभिप्रेत है, ऐसे एकात्म व्यक्ति को जीवन के ध्येय रूपी चारों पुरुषार्थों यथा; धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हेतु यदि इस प्रकार अग्रसर किया जाये कि उससे राष्ट्र व प्रकृति से सामंजस्य पूर्वक सुव्यवस्था विकसित हो एवं वह सतत् व सहज चलती रह।
भारतीय संस्कृति व दर्शन, व्यक्ति की अन्तर्निहित (शरीर, मन बुद्धि व आत्मा की) एकता, व्यक्ति से विश्व पर्यन्त सभी अंगांगी घटकों (व्यक्ति, परिवार, समाज, समुदाय, राष्ट्र, विश्व, सृष्टि या समष्टि व परमेष्ठी) की एकता व परस्पर अवलम्बन और व्यक्ति के जीवन के उद्देश्यों, जिन्हें हम धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के रूप में पुरुषार्थ चतुष्टय भी कहते हैं उन सबके बीच सुसमन्वय के प्रबल पक्षधर है। इसलिये देश की अर्थनीति (कृषि, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, सेवाओं जन-उपयोगिताओं, अवसंरचनाओं, विदेशी पूंजी, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों सम्बन्धी नीति) शिक्षा, राजनीति, शासन व्यवस्था, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों, जीवन मूल्य, सामाजिक व संस्थागत व्यवहार, संविधान, कानून, विधायिका व कार्य पालिका का व्यवहार सम्बन्धी विविध नीतियाँ, न्याय, प्रशासन आदि सम्बन्धी नीतियों का निरूपण व उनके संचालन में उक्त एकात्मता व अन्योन्याश्रयता को दृष्टिगत रखना होगा। सम्पूर्ण देश, समाज व विश्व के मन मानस में इस एकात्मता का भाव एवं इनके सभी व्यवहार तद्नुरूप हो ऐसी राष्ट्र व विश्व की चिति या समग्र चिन्तन, दर्शन व मूल्य हों, यह एकात्म मानव दर्शन के व्यवहार की आदर्श स्थिति है। व्यक्ति व उस विराट ब्रह्म में एकत्व ही हमारा जीवन ध्येय होना है।
व्यक्ति व समष्टि में एकात्मता ः
जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि एकात्म मानव दर्शन मानव की परिपूर्णता से लेकर हमारी पारिवारिक, सामाजिक सामुदायिक, राष्ट्रीय एवं वैश्विक परिपूर्णता की अपेक्षा करता है और सृष्टि में ऐसी परिपूर्णता की स्थापना की प्रेरणा देता है। व्यष्टि से समष्टि पर्यन्त इस परिपूर्णता की प्राप्ति के लिये एकात्म मानव दर्शन सर्वंकश एकात्म विश्व दृष्टि की बात करता है। इस विचार दर्शन के अनुसार व्यष्टि से समष्टि पर्यन्त खण्ड-खण्ड या टुकडों-टुकडों में विकास की बात नहीं सोची जा सकती है। वरन् व्यष्टि से समष्टि पर्यन्त सभी अंगों पर समग्र व एकात्मकवादी दृष्टि से उनके विकास व उनकी परिपूर्णता व समन्वन का विचार किया जाना चाहिये। इस दृष्टि से इन सभी घटकों के बीच पारस्परिक समन्वय सामंजस्य आवश्यक है,
जिसे अग्रांकित चित्र के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है।
यदि व्यक्ति स्वयं को सम्पूर्ण वैश्विक संरचना के एक अंगांगी घटक के रूप में मानकर चलता है, तब ऐसी स्थिति में हमारे सारे व्यवहार, पर्यावरण व समाज के प्रति सहिष्णुता पूर्ण होंगे। व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, जीव-सृष्टि और परमेष्टी परस्पर अवलम्बित हैं। इन सबके बीच परस्पर संबन्धों को दृष्टिगत रखते हुए ही विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को अपना उपभोग व जीवन-चर्या निश्चित करनी चाहिए। प. दीनदयाल जी के इस विचार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार मन में रखना चाहिये कि, वह स्वयं कोई स्वायत्त या सम्प्रभु इकाई नहीं होकर वह अपने परिवार व समाज का अंग है। प्रत्येक परिवार, अपने समाज या समुदाय का अंग है। समाज, या समुदाय राष्ट्र का अंग है। राष्ट्र विश्व का, विश्व इस सम्पूर्ण सृष्टि का, और यह सृष्टि उस परमेष्टी का अंग है जो इस सम्पूर्ण व अनन्त ब्रह्माण्ड में संव्याप्त या विस्तारित है। इसलिये हमारा उपभोग इन सभी घटकों के बीच समन्वय पर आधारित होना चाहिये। लेकिन ये सभी परस्पर संलग्न भी हैं। निम्न चित्र १ में इन्हें अलग-अलग दर्शाया है यह संकेन्द्री रचना भी पाश्चात्य खण्ड दृष्टि को दिखलाती है।
वस्तुतः मानव, परिवार, समाज, विश्व आदि के रूप् में ये वलय भी पृथक-पृथक या खण्ड-खण्ड पृथकता वाले घटक न होकर एक ही समेकित इकाई के परस्पर अवलम्बित व अविच्छिन्न घटक हैं। इन्हें, एकात्म मानव दर्शन के भारतीय चिन्तन की व्याख्या करते हुये, स्व. दीनदयाल जी उपाध्याय ने निम्नानुसार अखण्ड मण्डलाकार रूप में दर्शाया है।
इस प्रकार व्यक्ति यदि समष्टि से एकात्मकता का अनुभव कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्त्ति हेतु न्यूनतम ग्रहण करें और वह भी केवल नवकरणीय साधनों से तब ही यह सृष्टिक्रम अनवरत निर्बाध
जारी रहेगा।