दीनदयाल उपाध्याय ओर एकात्म मानववाद

डॉ.कमलकिशोर गोयनका


दीनदयाल उपाध्याय के सम्बन्ध में मैं जब भी कुछ सोचता हूँ अथवा आज जब मैं उनके जीवन तथा राजनीति के भारतीय दर्शन पर कुछ लिखने बैठा हूँ तो मेरे मन में उनकी एक धुँधली-सी मूर्ति उभरती है। मेरी आँखों के सामने एक आम हिन्दुस्तानी का रूप उभरता है जो धोती-कुर्ता और साधारण-सी चप्पल पहने, कंधे पर किताबों से भरा झोला लटकाये तथा बगल में अपना मामूली-सा बिस्तर दबाये खडा है। कुछ ऐसा ही रूप गांधी का था। गाँधी लंगोटी पहने और एक धोती से शरीर को लपेटे इंग्लैंड पहुँच गये थे। ये वे हिन्दुस्तानी हैं जिन्हें आम हिन्दुस्तानी की तरह रहने में ही आनन्द की अनुभूति होती है।
स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका में कहा था कि आफ देश में टेलर-अर्थात् दर्जी आदमी को सज्जन और कुलीन बनाता है, किन्तु मेरे देश में तो चरित्र ही आदमी को भला एवं सज्जन आदमी बनाता है। भारत की यह विशेषता है कि यहाँ पद-पैसा-ताकत आदमी को महान् नहीं बनाता, यहाँ तो तपस्वी-त्यागी-सेवक-संन्यासी ही राष्ट्र-पुरुष-----और सबका पूजनीय बन सकता है। महात्मा गांधी को देश की जनता ने क्यों राष्ट्र-पिता के रूप में स्वीकार किया, इसका कारण हम समझ सकते हैं। दीनदयाल उपाध्याय चाँदी की चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए थे, वे एक साधारण ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए, छोटी आयु में ही उनके माता-पिता का देहावसान हो गया और मामा-मामी ने उनका पालन-पोषण किया। उन्होंने शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति पाई और साथी छात्रों को सदैव पढाते रहे और सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वे सदैव सादा जीवन, उच्च विचार के अनुयायी रहे और एक इंटरव्यू में धोती-कुर्ता-टोपी पहन कर जाने पर भी अंग्रेज अफसरों द्वारा चुने गये। सेवा-कार्य में वे सबसे आगे रहे और बहन की सेवा के लिए परीक्षा तक में नहीं बैठे। उनके विवाह के लिए जब दबाव बना तो उन्होंने अपनी मामी से कहा था कि यदि तुम्हें मेरी *ारूरत है तो मेरा विवाह न करो और यदि बहु चाहिए तो विवाह कर सकती हो। स्वाभाविक है, इसके बाद विवाह का प्रसंग हमेशा के लिए खत्म हो गया और वे शादी-ब्याह के चक्कर से मुक्त होकर देश की सेवा में लग गये।
दीनदयाल उपाध्याय के व्यक्तित्व में अनेक गुण थे, जिनमें अध्ययनशीलता का विशेष गुण था। उनके व्यक्तित्व में सेवापरायणता, निस्वार्थता, देशभक्ति, तीक्ष्ण बुद्धि, अहंकारहीनता आदि गुणों ने भी उन्हें राष्ट्र-सेवक के रूप में स्थापित करने में बडा योगदान किया। उनकी अध्ययनशीलता से उनका विचार पक्ष मजबूत हुआ और उन्होंने अपना एक जीवन-दर्शन विकसित किया। उपाध्याय जी ने इस प्रक्रिया में ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ की नींव डाली और ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’, ‘स्वदेश’, ‘तरुण भारत’, ‘हिमालय’ आदि पत्र-पत्रिकाएँ निकालीं, जैसे महात्मा गाँधी ने दक्षिणअफ्रीका में ‘इंडियन ओपिनियन’ तथा भारत आने पर ‘यंग इंडिया’, ‘नव जीवन’, ‘हरिजन’ आदि अखबार निकाले। आप देखेंगे, दोनों ही राजनेताओं के राष्ट्र-चिन्तन में समानता है और दोनों ही अपने देश का कायाकल्प करना चाहते हैं। हमारे यहाँ राष्ट्र-दर्शन, जो मानवीय दर्शन ही होता रहा है, की खोज होती रही है। वेद का मंत्र है ‘सत्यमेव जयते’ और वह आज हमारे राष्ट्र का केन्द्रीय बिन्दु है। राम-कथा के माध्यम से राम-राज्य का महान् सूत्र मिला, ‘महाभारत’ से धर्म और अधर्म का द्वन्द्व सामने आया और धर्म की विजय दिखाई, गाँधी ने ‘अहिंसा’ को जीवन की प्रमुख नीति बनाया और दीनदयाल उपाध्याय ने अपने युग की आवश्यकता के अनुसार ‘एकात्म मानववाद’ का जीवन-दर्शन दिया। उपाध्याय जी ने भारतीय और पश्चिमी जीवन-दर्शनों का गम्भीरता पूर्वक अध्ययन किया था। उनका मत था कि पश्चिम के आदर्श, चाहे वह राष्ट्रीयता हो, प्रजातन्त्र, समता या समाजवाद, वे सब अधूरे हैं और समस्याओं को जन्म देते हैं। राष्ट्रीयता के विचार ने तो महायुद्ध ही करा दिया था। पश्चिमी आदर्श सार्वकालिक और सार्वलौकिक नहीं है। कार्ल माक्र्स के समाजवाद के सिद्धान्त को तोते की तरह रटते हुए भारत पर लागू करना वैज्ञानिक दृष्टि का प्रमाण नहीं है। अतः यह आवश्यक है कि भारत की समस्याओं का समाधान भारत की चिन्तन-प्रक्रिया और भारतीय आदर्शों से किया जाये, क्योंकि कोई भी विदेशी विचार या बीज भारत की भूमि पर फल-फूल नहीं सकता, इसके लिए स्वदेशी विचार और स्वदेशी जलवायु दोनों ही आवश्यक हैं। इस प्रकार दीनदयाल उपाध्याय का विचार था कि कोई भी ऐसा जीवन-दर्शन, जो मानव-कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो, जो व्यक्ति-समाज-राष्ट्र और विश्व के कल्याण का विचार लेकर चलने वाला हो, वह भारतीय संस्कृति की चिन्तन-परम्परा और मानवीय मूल्यों को आत्मसात् करके ही विकसित हो सकता है। अपने देश में वही विचार पनप सकते हैं जो देश की संस्कृति और इतिहास से जन्में हों, विदेशी विचारों की नकल से हम अपने देश का कल्याण नहीं कर सकते। ‘समाजवाद’ और ‘पूँजीवाद’ दोनों ही विदेशी विचार थे और उनकी रचना में किसी भारतीय की कोई हिस्सेदारी नहीं थी, तथा दोनों की ही विचारधारा भौतिकतावादी थी,जबकि मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताएँ भी हैं, अतः कोई भी विचार भारतीय होकर ही भारतीय-मन का जीवन-दर्शन बन सकता है।
दीनदयाल उपाध्याय ने अपने जीवन-दर्शन का नाम ‘एकात्म मानववाद’ रखा। यह कुछ लोगों को भारी-भरकम शब्द लग सकता है, किन्तु इसका अर्थ एक बार समझने के बाद यह हमेशा के लिए आफ मन में जगह बना लेगा। इसमें ‘एकात्म’ का अर्थ है एकमेक होना, विभिन्न भावों, विचारों, वस्तुओं का सम्मिलित होकर एक इकाई के रूप में मिश्रित होना, जैसे भारत के अनेक प्रान्त मिलकर एक गणराज्य के रूप में एकात्म हो जाते हैं, जैसे दादा-दादी, पिता-माता, पुत्र-पुत्री आदि मिलकर एक परिवार में बदल जाते हैं, वैसे ही मानव-कल्याण के विचारों को एक सूत्र में पिरोकर जो दर्शन बनता है, वह ‘एकात्म मानववाद’ कहा जा सकता है। यह मानव-कल्याण का एक ऐसा विचार है जो भारतीय दर्शन एवं प्राकृतिक सत्यों पर आधारित है, और इस कारण यह पूरे मानवीय समाज के लिए व्यावहारिक और उपयोगी है। उपाध्याय जी ने इन तत्त्वों की व्याख्या की है कि कैसे ये विचार और सिद्धान्त हमें एक सूत्र में बाँधते हैं। उनका पहला मत है कि भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। वह सम्पूर्ण जीवन का, सम्पूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है, वह टुकडों-टुकडों में विचार नहीं करती, जैसे पश्चिमी सभ्यता करती है। दूसरी विशेषता है हमारी विविधता में एकता की खोज, जिसे हम ‘अनेकता में एकता’ कहकर भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र कहते हैं। हमारे यहाँ अनेकता के होते हुए भी एकता का भाव है- जैसे प्रकृति और पुरुष तथा नर और नारी में एकत्व का भाव है, ‘अर्धनारीश्वर’ इसी एकता का प्रमाण है। प्रकृति का यही सत्य है- वृक्ष का मूल बीज, तना, शाखा, पत्ते, फल-फूल आदि कई रूप रखते हैं, परन्तु उनमें एकत्व है, सब मिलकर वृक्ष कहलाते हैं और एक के नष्ट होने पर वृक्ष की सत्ता नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार हमारा जो सूर्यमंडल है, उसमें अनेक ग्रह हैं और वे एक सूर्य-परिवार की तरह रहते हैं, किन्तु यदि पृथ्वी अपना स्थान और दिशा बदल ले तो आप समझ सकते हैं कि क्या परिणाम होगा। तीसरी विशेषता उपाध्याय जी के अनुसार यह है कि हमें मानव-कल्याण के लिए संघर्ष का त्याग करके परस्पर सहयोग ही सबसे उत्तम नीति है। संघर्ष विकृति का प्रमाण है और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ तो जंगल का विधान है। आज हम अपनी राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों को देखें तो इस संघर्ष ने अराजकता के साथ लोकतन्त्र को ही निरर्थक बना दिया है। वैसे भी प्रकृति और प्राणी एक दूसरे के सहयोग से ही चलते हैं, वे एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति में पेड-पौधे-वनस्पतियों से हमें ऑक्सीजन मिलती है और वनस्पतियों को हमसे कार्बन डाइऑक्साइड और इस परस्पर पूरकता से ही यह संसार चल रहा है। हमारी संस्कृति प्रकृति के इन्हीं सत्यों के साथ चलती हैं और अनेक प्रकार की विविधताओं, अनेकताओं के होने पर भी एकता और समन्वय से ही सृष्टि चलती रहती है। भारतीय-दर्शन में अद्वैत का बुनियादी भाव है, जो प्रकृति और मानव-समाज का भी सत्य है।
दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ के स्वरूप के उद्घाटन के लिए कुछ उदाहरण और कुछ प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने मनुष्य, समाज और विश्व के सम्बन्धों की व्याख्या की है। मनुष्य केवल एक व्यक्ति मात्र नहीं हैं। वह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है, अर्थात् इन चारों के मिलने से शरीर बनता है। मनुष्य की प्रगति का अर्थ है इन चारों तत्त्वों की प्रगति। पश्चिम केवल शरीर की प्रगति की बात कहता है और भारत इन चारों तत्त्वों के सन्तुलित विकास की बात करता है। दुर्बल मनुष्य आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता, इसलिए भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों के रूप में एक समन्वित जीवन दर्शन देने का प्रयत्न किया है। ये चार पुरुषार्थ अलग-अलग हैं, अलग-अलग आयु से सम्बन्धित हैं, किंन्तु ये जीवन के अंग है और जीवन से गूंथे हुए हैं। इसी प्रकार उपाध्याय जी ने मनुष्य, समाज, राष्ट्र और परमसत्ता के एकत्व की स्थापना की है। इन सब की स्वतन्त्र सत्ता है, पर परस्पर सम्बद्ध हैं। व्यक्ति की ‘स्व’ से पहचान होती है, किन्तु ‘हम’ अर्थात् सामूहिक जीवन पर ही सब कुछ निर्भर है। व्यक्ति की सत्ता है और समाज की भी सत्ता है। व्यक्ति राष्ट्र की आत्मा प्रकट करता है, परन्तु उनमें परस्पर एकात्मकता, समन्वय एवं सामंजस्य रहता है। व्यक्ति और समाज अभिन्न हैं। उचित दशा यही है कि व्यक्ति अपनी चिन्ता करते हुए समाज की चिन्ता करे। उपाध्याय जी लिखते हैं कि इसी कारण हम व्यक्तिवादी भी हैं और समाजवादी भी। व्यक्ति की चिंता करते हैं इसलिए व्यक्तिवादी हैं, समाज की चिन्ता करते हैं, इसलिए समाजवादी हैं। सच यह है कि व्यक्ति के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती और समाज के बिना व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं है। भारतीय दर्शन में इस कारण दोनों का समन्वय ही समाधान है। अतः भारतीय दर्शन तथा उससे जन्मा ‘एकात्म मानववाद’ समन्वयवादी दर्शन है।
उपाध्याय जी ने राष्ट्र, राष्ट्र की आत्मा एवं चिति, एकात्म राज्य, धर्म, धर्मनिरपेक्षता, धर्म और रिली*ान में अन्तर, संस्कृति, भारतीय संस्कृति का स्वरूप, सांस्कृतिक स्वतन्त्रता, अखंड भारत, राष्ट्रीयता, भारत का राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता और धर्म, लोकतन्त्र, राजनीतिक दल, भारत की संघीय कल्पना, सेक्यूलर राज्य, पंचवर्षीय योजना, केन्द्रीयकरण और विकेन्द्रीकरण आदि अनेक विषयों पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया है, जिससे उनके एकात्म मानववाद को समझने के लिए काफी सामग्री मिलती है। उनका यह दर्शन केवल व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के लिए ही नहीं है, यह सम्पूर्ण मानवता के लिए है। भारतीय दर्शनों की तरह इस एकात्म मानववाद का भी यह वैशिष्ट्य है कि यह समग्र मानव जाति के लिए है। जैसे गीता का सन्देश केवल भारत के लिए नहीं है और उसी प्रकार अहिंसा तथा सबके कल्याण का मंगल सन्देश भी पूरे विश्व के लिए है। दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन में भी वैश्विक कल्याण का भाव-विचार है और जीवन के सभी पक्षों के सन्तुलित संयोजन से समरसता लाने का संकल्प है।