दीनदयाल उपाध्याय का चिन्तन

शान्ता कुमार


भारत की स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक जीवन में चिंतन की सबसे अधिक कमी महसूस की गई है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में चिंतन और मनन करने वाले दार्शनिकों की पीढी के अंतिम चिंतक रहे हैं।
स्वामी विवेकानंद एक क्रांतिकारी देशभक्त और मौलिक साहसी संन्यासी थे। उन्होंने दासता में हीन भावना से ग्रसित भारत के चिंतन को एक नई दिशा दी। उन्होंने भारतीय चिंतन, यहाँ तक कि धार्मिक चिंतन को भी ‘सत्य नारायण’ से ‘दरिद्र नारायण’ की ओर मोडा। बहुत दूरदर्शी थे स्वामी विवेकानंद। उन्होंने मोक्ष के ध्येय को भी छोड दिया और यहाँ तक कह दिया कि जब तक भारत का प्रत्येक व्यक्ति भरपेट भोजन नहीं कर लेता और भारत में नया सांस्कृतिक जागरण नहीं होता, वे भारत में बार-बार जन्म लेना चाहेंगे। वे भारत की दरिद्रता और गरीबी को देखकर इतने आहत हुए कि यहाँ तक कह दिया कि जो लोग भारत के साधनों से संपन्न हो जाते हैं, परन्तु गरीब के बारे में न कुछ सोचते हैं और न कुछ समझते हैं, वे गद्दार हैं। इसी विचार-परंपरा को स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने आगे बढाया और अंत्योदय की बात की। यह चिंतन समाजवाद की आँधी में धूमिल हो रहा था कि उसी चिंतन की धारा को आगे बढाने का काम पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के आंदोलन में गाँव और गरीब और की बात कही गई। महात्मा गाँधी ने ग्राम-प्रधान अर्थव्यवस्था का आग्रह किया। सोहन लाल द्विवेदी ने ‘है सच्चा हिंदुस्तान कहाँ, वह बसा हमारे गाँव में’ के गीत गाए। दादाभाई नौरोजी ने भारत की गरीबी पर पहली प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। स्वतंत्रता के बाद के कुछ वर्षों में भारत के नीति-निर्माता गाँव और गरीब को पूरी तरह भूल गए। विकास की ढेरों योजनाएँ बनीं और चली, पर सबसे नीचे तक या तो पहुँची ही नहीं या बहुत कम पहुँचीं। उसी का परिणाम है कि आज देश में ३५ करोड लोग गरीबी की रेखा से नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं। आजादी के तुरंत बाद भारत के नीति-निर्धारक साम्यवाद और समाजवाद के नशे में लीन हो गए। सरकारीकरण शुरू हुआ। सार्वजनिक क्षेत्र में अरबों रुपए का निवेश कर दिया गया। बडे-बडे उद्योगों की बडी-बडी बातें, बडे-बडे नगरों की बडी-बडी योजनाएँ गाँव में रहनेवाला भारत उपेक्षित
होता गया।
श्री दीनदयाल उपाध्याय भारत के उन विचारकों में से थे, जिन्होंने धरती की सच्चाई को पहचानकर सही दिशा-निर्देश दिया। जिस ग्रामीण-प्रधान अर्थव्यवस्था की बात महात्मा गाँधी जी ने की, उसी को एक नए और परिष्कृत रूप में देश के सामने रखने वाले सबसे प्रमुख आर्थिक चिंतक पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। पूँजीवाद में व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक महत्व देकर आर्थिक व्यवस्था बनाने की कोशिश की गई। साम्यवाद में व्यक्ति का महत्व समाप्त करके समाज-प्रधान व्यवस्था बनाने की कोशिश की गई। कुल मिलाकर आज दोनों वाद विफल सिद्ध हो गए हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था पर जोर दिया। समाजवाद में सारी शक्तियों का केंद्रीकरण होता है, जैसे रूस और चीन में हुआ परंतु ये व्यवस्थाएँ जोर से गिरती हैं। उसी गति से गिरती हैं, जिस गति से स्थापित होती हैं, जैसे रूस में हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने शेखावटी जनसंघ सम्मेलन के अवसर पर पिलानी में कहा था, ‘‘देश का दारिद्रय दूर होना चाहिए, इसमें दो मत नहीं किंतु प्रश्ा* यह है कि यह कैसे दूर हो? हम अमरीका के मार्ग पर चलें या रूस के मार्ग का अपनाएँ अथवा यूरोपीय देशों का अनुकरण करें? नकल से समस्या का समाधान नहीं होगा। वादों के घेरे से मुक्त होकर हमें एक स्वतंत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास करना होगा, जो मनुष्य को समग्रता में देखे।’’
भारतीय चिंतन सदा से समग्रता का चिंतन रहा है। जीवन को टुकडों में नहीं समग्रता में देखा गया है। ईशावास्योपनिषद का यह मंत्र इस चिंतन की पुष्टि करता हैः
ईशावास्यमिंद सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।
जो कुछ भी है, वह प्रभु का है, किसी और का नहीं। उसका भोग करने की बात करो, लेकिन वह भोग त्यागमय हो। एक तरह से यह मंत्र भौतिकता के आध्यात्मीकरण का संदेश देता है। दीनदयाल उपाध्याय की आधुनिक चिंतन के लिए सबसे बडी देन एकात्मक मानववाद है। उन्होंने सदियों के भारतीय चिंतन को आधुनिक संदर्भ में एक नए रूप में प्रस्तुत किया। मनुष्य केवल शरीर ही नहीं, मन भी है और उसमें आत्मा भी है। मनुष्य के संबंध में कोई भी सोच अलग नहीं हो सकती। उसी प्रकार समाज केवल भीड नहीं है। लोग समाज में भी होते हैं, भीड में भी होते हैं। भीड भेड की तरह चलती है और समाज एक व्यवस्था में चलता है।
दीनदयाल उपाध्याय ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है। उसे उन्होंने ‘चिति’ का नाम दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य और समाज के संबंध में टुकडों में नहीं अपितु एक समग्र चिंतन होना चाहिए। एकात्मक मानववाद और ग्राम-प्रधान अर्थव्यवस्था के माध्यम से उन्होंने समाज के अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति के महत्व और उसके विकास का महत्व प्रतिपादित किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मशीनों के विरुद्ध नहीं थे, लेकिन वे मशीन को मनुष्य के लिए समझते थे, मनुष्य को मशीन के लिए नहीं। वे संयत उपयोग की बात करते थे। उन्होंने ‘प्रत्येक व्यक्ति को काम’ के सिद्धांत को मान्यता दी थी। उन्होंने कहा था, ‘‘योजनाएँ बनाने से पहले हमें प्रत्येक व्यक्ति को काम के सिद्धांत को मान्यता देनी पडेगी। यदि इसे मान लिया जाए तो योजनाओं की दिशा एवं स्वरूप बदल जाएँगे, भले ही बेकारी धीरे-धीरे दूर हो। इसका विचार करके हम उत्पादन और साधनों का निश्चय करें। यदि ज्यादा आदमियों का उपयोग करने वाले छोट-छोटे कुटीर उद्योग अपनाए गए तो कम पूँजी तथा मशीनों की आवश्यकता पडेगी, नौकरशाही का बोझ कम होगा, विदेशी ऋण भी नहीं लेना पडेगा। देश की सच्ची प्रगति होगी तथा प्रजातंत्र की नींव पक्की हो जाएगी।’’
दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय राजनीति में वैचारिक पक्ष को आगे बढाया। उनका चिंतन भारत की मिट्टी से जुडा था। उन्होंने देश के लिए अपेक्षित आर्थिक मूल्यों को भारत की संस्कृति से जोडा।