भारतीय अर्थचिंतन : दीनदयाल उपाध्याय

डॉ.बजरंग लाल गुप्ता


भारत की दो पंचवर्षीय योजनाओं का प्रारूप आ जाने के बाद दीनदयाल जी उपाध्याय द्वारा १९५८ में ‘द टू प्लान्स, प्रोमिसे*ा, परफॉरमेंस, प्रॉस्पेक्ट्स’ (दो योजनाएँ ः वायदे, अनुपालन, आसार) नामक पुस्तक के रूप में एक गहन समीक्षात्मक विवेचन- विश्लेषण प्रस्तुत किया गया था। संपूर्ण पुस्तक पाँच खंडो एवं इक्कीस अध्यायों में विभाजित है। स्वतंत्रता के बाद भारत के विकास के लिए नियोजन का मार्ग चुनने से पहले इस पर खुली एवं व्यापक बहस होनी चाहिए थी, किंतु ऐसी किसी बहस के बिना ही भारत के नेतृत्व ने रूस की नकल कर पंचवर्षीय योजना का मार्ग अपना डाला। दीनदयालजी ने भारत की प्रथम दो योजनाओं की समीक्षा के माध्यम से योजना की संकल्पना, आवश्यकता, दृष्टि व दिशा को लेकर एक राष्ट्रीय विमर्श प्रारंभ करने का ही प्रयास किया था। विमर्श के इस क्रम में भारत में योजना के संक्षिप्त इतिहास को जान लेना उपयोगी रहेगा। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उसके सामने प्रश्न यह था कि वह अपने विकास के लिए कौन सा रास्ता अपनाए? उसके समाने मुख्य प्रश्न यह था कि वह अपने विकास का काम निजी उद्यमियों एवं बाजारतंत्र के सहारे छोड दे अथवा आर्थिक नियोजन की प्रणाली को अपनाए? इस प्रश्न पर स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ही विचार प्रारंभ हो गया था। अधिकांश लोगों का यह मानना था कि बाजार की अपूर्णताओं के कारण भारत में बाजारतंत्र देश के विकास को गति प्रदान नहीं कर सकता। भारतीय नेताओं व विचारकों ने यह भी महसूस किया था कि अंगे**ा सरकार की नकारात्मक नीतियों के कारण भारत आर्थिक क्षेत्र में पिछड गया था। दुनिया के अनेक देशों का अनुभव भी यह बताता था कि कोई भी देश सरकार के सक्रिय सहयोग एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर यह महसूस किया गया कि भारत को आर्थिर्क नियोजन का ही मार्ग अपनाना चाहिए। अतः भारत ने आर्थिक नियोजन का मार्ग चुना।
भारत में स्वतंत्रता से पहले ही यहाँ के नेता एवं विचारक विकास के लिए नियोजन के महत्व को स्वीकार कर चुके थे। अतः उन्होंने आ*ाादी से पूर्व भी किसी न किसी रूप में भारत के विकास की योजना का प्रारूप देना प्रारंभ कर दिया था। इस दृष्टि से सबसे पहला प्रयत्न १९३४ में एक विख्यात इंजीनियर एम. विश्वेश्वरैया ने किया। उन्होंने ‘प्लान्ड इकोनॉमी फॉर इंडिया’ (भारत की योजित अर्थनीति) नामक पुस्तक लिखी और इसमें भारत के आर्थिक विकास के लिए एक दस वर्षीय योजना प्रस्तुत की। इस पुस्तक के कारण देश के विद्वानों में नियोजन के प्रति काफी रुचि का निर्माण हुआ।
फलस्वरूप इस विषय पर और भी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई जैसे डॉ.पी.एस. लोकनाथ की ‘सम आस्पेक्ट्स ऑफ प्लानिंग’ (नियोजन के सिद्धांत), एन.एस.सुब्बाराव की ‘सम आस्पेक्ट्स ऑफ प्लानिंग’ (नियोजन के कुछ आयाम) और के.एन. सेनी की ‘इकोनॉमिक रिकंस्ट्रॅक्शन’ (आर्थिकपुनर्रचना)। १९३८ में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय नियोजन समिति’ का गठन किया गया। इस समिति ने भारत में नियोजन के बारे में कई रिर्पोटों का प्रकाशन किया। जनवरी, १९९४ में बंबई के आठ प्रमुख उद्योगपतियों ने ‘ए प्लान ऑफ इकॉनोमिक डिवेलपमेंट फॉर इंडिया’ (भारत के आर्थिक विकास के लिए एक योजना) शीर्षक से देश के विकास की एक योजना का प्रकाशन किया। इसे सामान्यतः ‘बंबई योजना’ के नाम से जाना जाता है। लगभग इसी समय एम.एन.राय ने ‘पीपुल्स प्लान’ प्रस्तुत किया और एस.एन.अग्रवाल ने गांधीजी के विचारों को आधार बनाकर ‘गाँधीयन प्लान’ प्रस्तुत किया।
आ*ाादी के पश्चात् अखिल भारतीय कांगे*स कमेटी ने देश के विकास की रूपरेखा तैयार करने के लिए नवंबर १९४७ में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक ‘आर्थिक कार्य समिति’ का गठन किया। इस समिति ने २५ जनवरी १९४८ को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए एक स्थायी योजना आयोग बनाने का सुझाव दिया। इस सुझाव के अनुसार ही भारत सरकार ने १५ मार्च, १९५० को भारतीय योजना आयोग के गठन की घोषणा कर दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू इसके पहले अध्यक्ष थे। भारत के प्रथम योजना आयोग ने भारत के विकास के लिए पाँच वर्षों की समयावधि वाली योजनाएँ प्रारंभ करने का सुझाव दिया था और इसीलिए भारत की विकास योजनाओं का नाम पंचवर्षीय योजनाएँ पड गया। पहली पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जुलाई,१९५१ में प्रस्तुत किया गया और दिसंबर, १९५२ में इसे अंतिम रूप दिय गया।
नियोजन के अर्थ एवं परिभाषा को लेकर एक लंबे समय से बहस एवं विवाद चला आ रहा है। दीनदयाल जी ने इसीलिए कहा था कि योजना एवं नियोजन का अलग-अलग अर्थ एवं परिभाषा होने के कारण एक भ्रमपूर्ण स्थिति का निर्माण हो गया है और योजना का कोई एक सुनिश्चित अर्थ स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। नियोजन शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों एवं विभिन्न संदर्भों में किया जा रहा है। दीनदयालजी की यह आशंका कुछ हद तक सही थी, पर हम भारतीय योजना आयोग द्वारा प्रथम पंचवर्षीय योजना में आर्थिक नियोजन की परिभाषा को इन शब्दों में पाते हैं- ‘आर्थिक नियोजन एक ऐसी विधि है, जिसके माध्यम से निश्चित सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधनों का संगठन एवं अधिकतम लाभप्रद ढंग से उपयोग किया
जाता है।’
दीनदयालजी का मानना था कि नीतियों के निर्माण एवं विकास के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों को शुरु करते समय गहन एवं गंभीर चिंतन नहीं किया गया। ऐसा लगता है कि योजनाकारों एवं नीति निर्माताओं ने भारत की आवश्यकताओं के अनुसार स्वतंत्र चिंतन की क्षमता ही खो दी है। वे लिखते हैं- ‘‘अवधारणा से आरंभ तक यह योजना (दूसरी पंचवर्षीय योजना) संसाधनों की संभावित उपलब्धता के अनुमानों पर खडी की गई थी, जिसका वास्तविकता से कोई रिश्ता नहीं था। जिन अनुमानों को आधार माना गया वह वो तो सिर्फ खयाली पुलाव था।’’*
विकास के सपनों का महल जब दरकने लग रहा था तो इसकी कारण-मीमांसा व समाधान के लिए कमेटियाँ एवं कमीशन नियुक्त कर दिए गए, पर इनके सुझाव परस्पर विरोधी एवं वास्तविकताओं के परे थे। अतः समस्याएँ सुलझने की बजाय और अधिक उलझती गईं। कुल मिलाकर आर्थिक नीतियों के संबंध में दीनदयालजी ने बहुत ही सटीक टिप्पणी इन शब्दों में की थी, ‘‘क्रियान्वयन में ही नहीं, योजनाओं के निरूपण में और प्राथमिकताओं को तय करने म भी आर्थिक व राजनीतिक पहलू के मद्देन*ार किसी विस्तृत और एकीकृत दृष्टि को नहीं अपनाया गया है.....यदि पूरी ईमानदारी से सभी योजनाएँ लागू कर भी दी जाएँ (फिलहाल संसाधनों और कर्मचारियों को छोड दें।) तो भी वे आपस में टकराएँगी और भीषण अव्यवस्था पैदा हो जाएगी।’’
दीनदयालजी का दृढ मत था कि हमें नियोजन के अपने संपूर्ण दृष्टिकोण के बारे में ही पुनर्विचार करना चाहिए।
योजना विशेषज्ञों का मानना था कि भारत की जनता बहुत गरीब, बहुत अज्ञानी और पुरानी व्यवहार-परंपराओं से घिरी होने के कारण, उसकी विकास योजनाओं का निर्माण एवं क्रियान्वयन कछ समय तक ऊपर से ही किया जाना चाहिए। दीनदयालजी इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे, क्योंकि यह देश की जनता की क्षमता में विश्वास की कमी को दर्शाता है, जिसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। वे तो नीचे के स्तर से जनभागीदारी और साझेदारी से योजना बनाने के पक्षधर थे।
आर्थिक नियोजन की दिशा के बारे में गंभीर सवाल उठाते हुए दीनदयालजी ने कहा था- ‘‘ हमें यह भी निश्चित करना है कि आर्थिक योजना सामाजिक और राजनीतिक योजना की सहायक हो या सामाजिक राजनीतिक मूल्य भी आर्थिक मूल्यों से ही संचालित हों। क्या हम आर्थिक कल्याण के आगे अपने लोकतांत्रिक, मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों की बलि चढा दें?’’
भारत में योजना को सत्तारूढ दल के चुनाव घोषणा-पत्र के रूप में ही अधिक प्रस्तुत एवं क्रियान्वित किया गया।
१९५१ में प्रथम पंचवर्षीय योजना का जो ड्राफ्ट प्रसारित गया किया था, कमोबेश रूप में वह कांगे*स पार्टी के घोषणा-पत्र की ही नकल था। इस पर एतराज करते हुए दीनदयालजी ने कहा था कि देश की विकास योजना के बारे में सबसे व्यापक संवाद व परामर्श होना चाहिए था, जो नहीं हुआ। अतः यह राष्ट्रीय योजना की बजाय एक पार्टी योजना बनकर रह गई। पहली दो योजनाओं की संसद में प्रस्तुति एवं बहस मात्र औपचारिकता थी। योजना पर काम पहले शुरू हो गया और उसकी संसद में प्रस्तुति व स्वीकृति बाद में हुई, यह लोकतांत्रिक परंपराओं की घोर अनदेखी
ही थी।
योजना आयोग ने योजना के लिए हेरॉड-डोमर मॉडल को अपना आधार बनाया था, जिसने दूसरी योजना से नेहरू-महालनोबिस मॉडल का रूप ले लिया था। इसके अनुसार आर्थिक संवृद्धि का मुख्य कारक निवेश दर को माना जाता है, अतः पूँजी-उत्पाद-अनुपात के आधार पर संवृद्धि दर के किसी विशेष लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक निवेश दर (या पूँजी निर्माण की दर) का आकलन प्रस्तुत किया जाता है। इस मॉडल में आर्थिक विकास के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक व मानवीय कारकों को स्थिर मानकर केवल पूँजी को प्रधान कारक माना गया है। इसके अनुसार विकास की दर को बढाने के लिए निवेश की दर में वृद्धि होना आवश्यक माना जाता है। किंतु अब इस दृष्टिकण पर प्रश्नचिह्न लगना प्रारंभ हो गया है। निवेश व पूँजी बढाने की अंधी दौड में दुनिया के अनेक देश कर्ज जाल में फँसते न*ार आ रहे हैं। अतः अब अनेक विद्वान्-मनीषी सामाजिक-सांस्कृतिक-मानवीय कारकों को अधिक गतिमान बनाकर विकास दर बढाने की रणनीति पर विचार करने लगे हैं। दीनदयालजी अपनी इस समीक्षा-पुस्तक में संभवतः इसी संभावना को तलाशने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। योजना आयोग ने नियोजन का एक प्रमुख उद्देश्य आर्थिक संवृद्धि दर में वृद्धि कर सामान्य जनता के रहन स्तर को ऊपर उठाना माना था और इसके लिए पूँजी निर्माण की दर को बढाना आवश्यक था।
योजना का दूसरा उद्देश्य आर्थिक विषमता को कम करना माना गया। इसके लिए विभिन्न आय समूहों के बीच अंतर कम करना आवश्यक था। किंतु आर्थिक संवृद्धि के लिए यदि पूँजी निर्माण दर में वृद्धि करना है तो अल्पकाल में योजना आयोग विभिन्न आय समूहों के बीच अंतर को बनाए रखने को स्वीकार करता है। इस प्रकार आर्थिक संवृद्धि तथा आर्थिक विषमता में कमी परस्पर विरोधी उद्देश्य बन जाते हैं। भारत का योजना एवं नियोजन तंत्र अंत तक इन दोनों परस्पर विरोधी उद्देश्यों के बीच ही उलझा रहा और कोई संतोषजनक समाधान का मार्ग नहीं खोज सका।
भारत में आर्थिक नियोजन की प्रारंभिक दिशा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर राज्य के नियंत्रण में वृद्धि की रही है। इसी का परिणाम यह हुआ कि अस्सी के दशक तक आते-आते भारतीय अर्थव्यवस्था कोटा, परमिट, लाइसेंस एवं सार्वजनिक उद्यमों के वर्चस्व के माध्यम से एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित हो गई। परिणामस्वरूप कार्य, कार्यकुशलता एवं उत्पादकता निम* स्तर पर पहुँच गई और केंद्रीकरण, विषमता, पक्षपात व भ्रष्टाचार काफी बढ गया। पहली योजना अपने उद्देश्य की कोई सुनिश्चित एवं संकलित दिशा नहीं पकड सकी, यह तो पहले से चली आ रही कुछ कार्य योजनाओं की घालमोल वाली एक गठरी बनकर रह गई। समाज एवं योजना आयोग के बीच संवाद सहयोग की कडी के रूप में भारत सेवक समाज और सार्वजनिक सरकार के लिए राष्ट्रीय सलाहकार समिति नामक दो गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाओं का गठन किया गया था। किंतु कालांतर में ये दोनों संस्थाएँ कांग्रेस पार्टी के नेताओं का जमावडा बनकर रह गईं और इन्होंने संपूर्ण समाज का प्रतिनिधि स्वरूप खो दिया। इन संस्थाओं के माध्यम से जनभागीदारी तो श्रमदान के नाम पर कभी-कभार किया जाने वाला मात्र फोटो प्रचारतंत्र बनकर रह गया। सामुदायिक विकास योजना के माध्यम से ग्रामीण भारत में युगांतरकारी परिवर्तन लाने की कल्पना की गई थी। इसके लिए भारत-अमरीकी तकनीकी सहकार निधि और फोर्ड फाउंडेशन से विशेषज्ञ एवं धनराशि प्राप्त की गई थी। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि ये योजनाएँ भारत के सामान्य जनसमाज, समझदार एवं प्रबुद्ध लोगों पर कोई भी सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करने में असफल रहीं।
दीनदयालजी का मानना था कि भारत में व्याप्त घोर क्षेत्रीय असमानताओं के कारण अखिल भारतीय औसतों के आधार पर बनाई गई कोई भी नीति उपयोगी नहीं हो सकती। यदि विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न वर्गों के लोगों की क्रयशक्ति में पाए जाने वाले अंतर को ध्यान में रखा जाए तो हमें भारत में केंद्रीकृत योजना के स्थान पर विकेंद्रीकृत योजना नीति को अपनाना चाहिए। प्रथम पंचवर्षीय योजना बनाते समय बेरोजगारी को एक गंभीर समस्या ही नहीं माना गया था। दीनदयालजी के अनुसार यह योजना आयोग की भारी भूल थी। कोरियन युद्ध जनित ते*ाी के समाप्त होते ही १९५३ में रो*ागार की समस्या ने विकराल रूप लेना प्रारंभ कर दिया था।
दीनदयालजी ने योजना के उद्देश्यों व लक्ष्यों के बारे में बहुत ही सटीक एवं तथ्यात्मक-तर्कसंगत विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इतना ही नहीं, इस पुस्तक में उनके द्वारा कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्र, कीमत स्तर, रोजगार स्थिति, गरीबी एवं विषमता, वित्तीय व्यवस्था, कराधान, आंतरिक एवं बाह्य संसाधन जुटाने, निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र, व्यापार शेष एवं भुगतान संतुलन, परिवहन, घाटे की वित्त व्यवस्था आदि के बारे में विस्तृत एवं गहन समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यह आर्थिक विषयों के बारे में दीनदयालजी के गहन आर्थिक चिंतन को दर्शाता है तथा भविष्य में भी आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सूत्र प्रदान करने वाला है।
दूसरी योजना के मुख्य कल्पनाकार प्रो.महालनोबिस हो गए थे, किंतु इस योजना का प्रारूप मुख्य रूप से रूसी विशेषज्ञों के निर्देशन में ही तैयार किया गया था, अतः श्री जयप्रकाश नारायण जी को भी कहना पडा कि ‘‘पंडित नेहरू की द्वितीय पंचवर्षीय योजना के सभी सातों लेखक लौह आवरण के पीछे के लोग थे।’’
दूसरी पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य समाजवादी समाज रचना की स्थापना करना कहा जा सकता है। इस योजना में तीव्र औद्योगीकरण, विशेषतः भारी एवं आधारभूत उद्योगों पर खास *ाोर दिया गया था। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को अधिक महत्व दिया गया। आय व धन की विषमता को कम करने के लिए संस्थागत परिवर्तनों और राजकोषीय उपायों को माध्यम बनाने की बात कही गई थी। किंतु इसे भारतीय नियोजन की त्रासदी ही कहा जाएगा कि हर योजना में विषमता घटाने का उद्देश्य रखने के बावजूद देश में विषमता भयंकर रूप से बढती गई।
किसी भी योजना की सफलता की शर्त को दीनदयालजी ने योजना आयोग के ही शब्दों में इस प्रकार उद्धृत किया है, ‘‘यदि केंद्र और राज्य दोनों की प्रशासनिक मशीनरी दक्षता, सत्यनिष्ठा, तात्कालिकता की भावना, समुदाय के लिए चिंता के भाव से काम करती है तो द्वितीय पंचवर्षीय योजना की सफलता सुनिश्चित है।’’ यह बहुत ही गहरी एवं मार्मिक
टिप्पणी थी।
कांगे*स के आवडी अधिवेशन के प्रस्ताव तथा रूस व चीन के प्रभाव के कारण द्वितीय योजना का वैचारिक आधार समाजवाद को बनाया गया। इस प्रकार इस योजना से भारत में नियोजन को एक वैचारिक एवं मूल्यगत दृष्टि प्रदान की गई, इसे ही आगे चलकर समाजवादी समाज रचना के उद्देश्य के रूप में परिभाषित किया गया। दीनदयालजी ने ‘समाजवाद’ की इस संकल्पना के अर्थ एवं परिभाषा को लेकर व्याप्त मतभेद एवं संभ्रम की ओर संकेत किया था। शायद यही संभ्रम भारतीय नियोजन की दिशाहीनता का कारण भी रहा है। दूसरी योजना की समीक्षा करते हुए दीनदयालजी ने आवश्यकता से अधिक विदेशी निर्भरता के खतरों को भाँप लिया था और समय-समय पर देश को इस संबंध में सजग-सतर्क रहने के दिशा संकेत भी दिए गए थे। किंतु देश के नेतृत्व ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और तब से लेकर अब तक वह विदेशी निवेश, विदेशी तकनीक-टेक्नोलॉजी और विदेशी विशेषज्ञों के भँवरजाल में ऐसा फँसा कि वह स्वावलंबन के लिए ठोस आधार भूमि तैयार करने का साहस ही नहीं जुटा पाया। आगे इस दिशा में यदि हम कुछ कर सके तो वह दीनदयालजी के सपनों को साकार करने की दिशा में एक बडा और महत्वपूर्ण कदम होगा।
दीनदयालजी के अनुसार भारतीय नियोजन विशेषतः दूसरी योजना जनसंख्या वृद्धि दर, पूँजी निर्माण की वृद्धि दर और पूँजी-उत्पाद अनुपात से संबंधित गलत मान्यताओं पर आधारित थी। परिणामस्वरूप योजना के उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में संतोषजनक प्रगति नहीं हो सकी। योजना के लक्ष्यों को प्राप्त करने दृष्टि से घरेलू एवं बाह्य संसाधनों की कमी भी एक बडी बाधा के रूप में उपस्थित हुई। यह संसाधनों के बारे में सही आकलन न कर पाने को ही दरशाता है।
भारतीय योजनाकार योजनाओं की प्राथमिकताओं के निर्धारण में व्यावहारिक एवं आदर्शात्मक दोनों ही धरातलों पर असफल रहे हैं। इस ओर इशारा करते हुए दीनदयालजी ने दूसरी योजना के बारे में कहा था कि ‘‘गलत आर्थिक समझ, खराब आँकडे और पूर्वज्ञान का अभाव ही आयोग का मार्गदर्शक रहा होगा, जिसके कारण इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को बुरी तरह से नजरअंदाज किया गया। वस्तुतः जल्दबाजी में चीजों का साधारणीकरण और अधिक सरलीकरण करना, साथ ही पाँच वर्ष की अवधि को न देखकर केवल एक-दो साल को ही दृष्टि में रखना, आयोग की गलती कही जा सकती है।’’
अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्र की योजनाओं के बीच समन्वय का नितांत अभाव था। दीनदयाल जी द्वारा भारतीय नियोजन पर की गई यह टिप्पणी सख्त अवश्य है किंतु सार्थक है। उन्हीं के शब्दों में -‘‘अब कहा जा सकता है कि जिन धारणाओं पर आयोग काम रहा था, वे तर्कसगत नहीं थीं। जो तरीके इसने अपनाए, वे हमारे देश की परिस्थितियों के हिसाब से अवैज्ञानिक और अनुपयुक्त थे। उत्पादन के लक्ष्य मनमाने ढंग से निर्धारित किए गए और जिन संसाधनों की बात की गई, वे तथ्यों से परे थे। एक अविकसित अर्थव्यवस्था के,जहाँ संगठित क्षेत्र, असंगठित क्षेत्र और विमुद्रीकरण तथा अल्प मुद्रीकरण का सह-अस्तित्व हो, वहाँ के नियम नहीं समझे गए।’’
ऐसा दिखाई देता है कि भारत का योजना आयोग एक ओर तो रूसी आदर्श पर बहुत अधिक आसक्त होकर सरकारी उद्यमों का विस्तार करना चाहता था किंतु दूसरी ओर पुराने परंपरागत ढाँचे को छोडना भी नहीं चाहता था। योजना आयोग की इस दुविधा ने अनिश्चितता की स्थिति खडी कर दी थी। वह एक साथ गाँधीवादी, सर्वोदयवादी, पश्चिमी प्रजातंत्रवादी, पूँजीवादी एवं समाजवादी, सभी को साथ लेना चहता था, परिणामस्वरूप योजना कोई निश्चित दिशा नहीं पकड सकी और इधर से उधर झूलती रही। अतः दीनदयालजी का सुझाव था कि हमें सोच-समझकर अपनी प्राथमिकताओं का स्पष्टता के साथ पुननिर्धारण करना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था के कृषिक्षेत्र और विकेंद्रित लघु उद्योग क्षेत्र को उचित एवं महत्वपूर्ण स्थान देना होगा। संसाधनों के अंतर को भरने की ओर ध्यान देना होगा और अत्यधिक घाटे की वित्त व्यवस्था के खतरों से बचना होगा, अनावश्यक खर्चों को कम करना होगा और देश के नेतृत्व वर्ग को सादा जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
दीनदयालजी की यह पुस्तक सभी नीति-निर्माताओं, अध्येताओं, शोधार्थियों, अकादमिक विद्वानों के लिए सर्वथा पठनीय एवं माननीय है। दीनदयालजी ने देश के विकास, नियोजन एवं आर्थिक नीतियों के संबंध में जो राष्ट्रीय विमर्श प्रारंभ किया था, वह भले ही उस समय पर्याप्त गति नहीं पकड सका हो, किंतु अब देश व दुनिया के लंबे अनुभव के बाद अवश्य ही इस दिशा में एक सार्थक बहस प्रारंभ हो, ऐसी अपेक्षा है।