अद्वेत वेदांत और एकात्मक मानववाद

स्वामी गोविन्देव गिरी


वेद वाङ्मय के ही सारभूत विचार, जिसे वेदांत कहते हैं, ऐसे उपनिषदों ने संपूर्ण सृष्टि की एकात्मकता का प्रतिपादन किया है। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ नेह नानास्ति कञ्चन (बृ. ४.४१.१९) याने सृष्टि के रूप में प्रतीत होने वाला संपूर्ण दृश्य केवल ब्रह्म का ही आविष्कार है। इसमें प्रतीत होने वाली विविधता एक ही शक्ति का विलास है। इस सिद्धांत को पंडितजी ने सीधे अपने शब्दों में अनूदित किया है। विस्तृत होने पर भी पश्चिमी दर्शन और एकात्म मानवदर्शन की मौलिक भिन्नता जानने के लिए यह परिच्छेद पठनीय है। ‘‘इस प्रकार हमारी प्रकृति ब्रह्मनिष्ठ है, जिनको हम देख नहीं पाते, ऐसे सबको-संपूर्ण सृष्टि को-केंद्र मानकर चलते हैं। हम इस केंद्र की ओर चलते हैं, वे बाहर की ओर चलते हैं। केंद्र की ओर चलने से हम केंद्र के निकट आते हैं। वहाँ जितने व्यक्ति उतने ही केंद्र हैं, वे केंद्र से बाहर चलते हैं। अतः केंद्र से दूर चले जाते हैं। हमारे यहाँ केंद्र ईश्वर, आत्मा, ब्रह्म कुछ भी कहें-है। इसलिए हम सब में एक आत्मा मानते हैं। पश्चिम वाले सबको यंत्रवत् मानते हैं, समाज भी उनके विश्व में एक चैतन्य की कल्पना करते हैं-ईश्वर सब में मौजूद है। हम आत्मवादी हैं, वे अनात्मवादी हैं, जडवादी हैं। हम समाज राष्ट्र को भी आत्म-ईश्वर का रूप मानकर चलते हैं, वे केवल यंत्रवत् राष्ट्र की कल्पना लेकर चलते हैं।’ (पृ. १९१)
ईशावास्य उपनिषद् के आरंभ में ही ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’ आत्मैवेदं सर्वम् (छां. ७.२५.२) में तथा ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छां. ६.११४.१) में भी यही बात कही है। याने इस अखिल सृष्टि में ब्रह्मा से लेकर चींटी तक जो कुछ भी है ईश्वमरय अथवा ब्रह्ममय ही है, ऐसा प्रतिपादन किया गया। इसी उपनिषद् में आगे भी यह पुनः स्पष्ट किया गया कि संपूर्ण अस्तित्व एक ही चैतन्यशक्ति का विलास है। दो तत्त्वों का अस्तित्व ही नहीं है। सबकुछ मुझमें है और सबमें मैं ही हूँ, यही पूर्ण ज्ञान है।
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति,
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।
उपनिषदों का यह अद्वैत ही एकात्म मानवदर्शन का मूल आधार है। और उपनिषदों का यह अद्वैत सिद्धांत अद्यतन पदार्थ विज्ञान भी मान्य कर रहा है। जगद्विख्यात नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. फ्रिटजॉफ काप्रा अपने सुविख्यात
*पूरब की दुनिया के दृष्टिकोण की सबसे महत्त्वपूर्ण विशिष्टता इसकी एकात्मता है। सभी ची*ों एक-दूसरे पर निर्भर और ‘संपूर्ण ब्रह्मांड’ के अविभाज्य अंश के रूप में देखी जाती हैं, एक ही परमसत्य के बहुविध प्रकटीकरण के रूप में। यदि हम सूक्ष्माणु भौतिकी के विभिन्न प्रारूपों का अध्ययन करें तो हम बार-बार और अलग-अलग ढंग से उसी अंतर्दृष्टि को प्रकट होते देख सकते हैं कि द्रव्य के घटक और उनकी भागीदारी वाली मूलभूत घटना सभी परस्पर संबद्ध, परस्पर संबंधित और एक-दूसरे पर निर्भर हैं। उन्हें अलग-अलग घटकों के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण और उसके अविभाज्य अंश के रूप में ही समझा जा सकता है।*
वेदांत शास्त्र में अंतिम सिद्धांत के रूप में सर्व ब्रह्मवाद को स्वीकार किया गया। इसी को ‘चिदविलास’ वाद की भी संज्ञा दी गई। सारा अस्तित्व एक ही शक्ति का विविध रूपों में विस्तार है। यह इसकी मूल धारणा है। अद्वैत वेदांत में सिद्धांत के ब्रह्म और आत्मा समानार्थक पर्याय माने जाते हैं। उसके अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्व का अस्तित्व नहीं। यह बात वेदांत के सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘योगवासिष्ठ’ में विस्तार से निरूपित है, यथा-
चिदिहास्ति हि चिन्मात्रमिदं च।
चित्वं चिदहमेते च लोकाश्चिदिति संग्रहः।।
चिच्चेत्यकलिता बन्धस्तन्मुक्ता मुक्तिरुच्यते।
चिदचेत्या किलात्मेति सर्वसिद्धान्तसंग्रहः।।
(ल.यो.वा. उपराम ५/५४)
एक ही चैतन्यमय शक्ति के विलास के रूप में सारा विश्व-ब्रह्मांड आत्मज्ञानोत्तर प्रतीत होता है, यह इसका सार है। अत्यंत वेग से आधुनिक विज्ञान भी इसी दिशा में आगे बढ रहा है।
*प्रत्येक मनुष्य वही नहीं है, जो वह कई वैज्ञानिकों को दिखाई देता है, यानी भौतिक शक्तियों की सांयोगिक श्ाृंखलाबद्धता। इसके इतर वह चेतना के महासागर पर एक लहर भी है, एक वैयक्तिक लहर, छोटी-सी और नाची*ा,प्रकृति की संपूर्णता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते हुए और उससे पूरी तरह असंपृक्त भी नहीं। (मैक डॉगल, रिलीजन एंड द साइंस ऑफ लाइफ, पृष्ठ १६)*
आर्थर एडिंगटन, मैक्स प्लैंक, आइंस्टीन, श्रॉडिंगर, हे*ानबर्ग, फ्रिट्जॉफ काप्रा आदि श्रेष्ठ वैज्ञानिकों के अनुसंधान एवं लेखन से भी इसी सिद्धांत की अधिकाधिक पुष्टि होती जा रही है, ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। यह सब विस्तार से इसलिए जानना आवश्यक है कि किस प्रकार ‘एकात्मक मानवदर्शन’ भारतीय संस्कृति से और आधुनिक विज्ञान से पूर्णतया समर्थित है, यह सहजता से समझ में आ जाए। साथ-साथ इस बात का भी विश्वास हो जाए कि किस तरह यह विचारधारा सर्वनाशक काल के ऊपर भी विजय प्राप्त करके शाश्वत बनी रहेगी।
किसी भी उत्तम दार्शनिक की विशेषता यह होती है कि वह केवल परंपरा से प्राप्त विचार को ग्रहण करके वैसे ही उसका प्रपिपादन करने के बजाय अपनी ओर से उसमें विशेष परिभाषा, परिष्कार अथवा प्रक्रिया जोडने का योगदान दे। वेदांत के आत्मविचार को ग्रहण करते हुए पंडित दीनदयालजी ने काशी के मौलिक तत्त्वचिंतक पंडित बद्रिसाह ठुलधारिया की विलक्षण कृति ‘दैनिकशास्त्र’ से उनकी विचारधारा का सार ग्रहण कर एकात्म मानवदर्शन को राष्ट्राधर्म की नींव के रूप में विराजमान कर दिया। उनके चिंतन का सुंदर सार देखिए, ‘विश्व में आज समष्टि की सबसे बडी इकाई है ‘राष्ट्र’। अतः राष्ट्र की दृष्टि से भी विचार करें तो राष्ट्र के लिए भी चार बातों की आवश्यकता रहती है। प्रथम आवश्यकता है देश। देश, भूमि और जन दोनों को मिलाकर बनता है। केवल भूमि ही देश नहीं है। किसी भूमि पर एक जन (समाज) रहता हो और वह उस भूमि को माँ के रूप में पूज्य समझे, तभी वह देश कहलाता है। जैसे दक्षिणी ध*ुव में कोई नहीं रहता, तो वह देश नहीं है। किंतु भारत में हम रहते हैं, हम इसे माँ मानते हैं, इसलिए यह देश है। दूसरी आवश्यकता है, सबकी इच्छाशक्ति याने सामूहिक जीवन का संकल्प। तीसरी एक व्यवस्था जिसे नियम या संविधान कह सकते हैं-इसके लिए हमारे यहाँ सबसे अच्छा शब्द प्रयुक्त हुआ है ‘धर्म’। और चौथी है जीवन-आदर्श। इन चारों का समुच्चय याने ‘राष्ट्र’। जिस प्रकार शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समुच्चय से व्यक्ति बनता है, उसी प्रकार देश, संकल्प, धर्म और आदर्श के समुच्चय के समुच्चय से राष्ट्र बनता है।’(पृ. १९७) इसी लेख में व्यक्ति और समूह के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का संपादन करना कैसे आवश्यक और संभव है, इसका भी विचार विद्वान् लेखक ने किया है, जो मूल में ही द्रष्टव्य है।
उनके द्वारा प्रतिपादित राष्ट्र के स्वाभाविक चैतन्य याने ‘चिति’ का अत्यंत महत्त्वपूर्ण विचार अभ्यसनीय है। इसी राष्ट्र की चिति को स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र संजीवनी अध्यात्म शक्ति अथवा रुद्बद्घद्ग-ड्ढद्यश्ाश्ास्र कहा है। वे कहती हैं-
*हमारे जीवन का रक्त आध्यात्मिकता है। यदि यह अबाध रूप से बहता रहे, यदि यह म*ाबूती और शुद्धता और जीवंतता से बहता रहे तो सभी ची*ों सही रहेंगी; सामाजिक और अन्य किसी भी तरह की विकृतियों, यहाँ तक कि देश की दरिद्रता का भी उपचार किया जा सकेगा, यदि जीवन-रक्त शुद्ध रहे तो।*
इस प्रकार का यह विज्ञान से प्रमाणित, परंपरासम्मत तथा राष्ट्र के लिए उन्नायक एवं विश्वकल्याणकारी विचार देकर पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने ‘कालजयी दार्शनिक’ के रूप में अपना स्थान निर्माण किया। केवल राजनकीय कार्यकर्त्ताओं को ही नहीं अपितु किसी भी अंग से राष्ट्र सेवा के कार्य में लगे हुए कार्यकर्ताओं को इसका अध्ययन करना नितांत आवश्यक है। इसका अध्ययन करनेवाले किसी भी कार्यकर्ता का राष्ट्रसेवा का कोई भी काम ईश्वर की पूजा के रूप में आध्यात्मिक साधना बन सकती है। इस विचार की महत्ता लेखक के ही शब्दों में, ‘‘एकात्म मानव विचार भारतीय और भारत-बाह्य सभी चिंतनधाराओं का सम्यक आकलन करके चलता है। उनकी शक्ति और दुर्बलताओं को भी परखता है और एक मार्ग प्रशस्त करता है, जो मानव को अब तक के उसके चिंतन, अनुभव और उपलब्धि की मं*ाल से आगे बढा सके।’’ राष्ट्र की रक्षा में, राष्ट्र के परंपरागत जीवन-मुल्यों की सुरक्षा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है, इसके वे स्वयं उदाहरण बन चुके थे। और इसलिए उनका आत्मकथन कि ‘मैं राजनीतिक में संस्कृति का दूत हूँ’ अत्यंत यथार्थ है।
संस्कृति के दूत होने का अर्थ, भारतीय संस्कृति के दूत-और मेरी दृष्टि में भारतीय संस्कृति महाभारतीय विचारों का प्रगल्भ प्रवाह है। महाभारत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रतिपादन करनेवाला विजिगीषु प्रेरणा का ग्रंथ है। इसीलिए महाभारत के भगवान् श्रीकृष्ण के समान पंडित दीनदयालजी जैसे सात्त्विक नेता भी युद्ध के आग्रही बन सकते हैं। देखिए-‘‘हमने संकट काल में सरकार को सब प्रकार का सहयोग देने का आश्वासन देते हुए चीन से युद्ध की माँग की है। इसीलिए हमें अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को पहचानकर यह घोषणा करनी होगी कि न हम स्वतः शिथिल होंगे और न प्रशासन अथवा जनता को ही शिथिल होने देंगे।’’
राष्ट्र की उन्नति के लिए अपने संपूर्ण जीवन का समर्पण करनेवाले पंडित दीनदयालजी राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा, राष्ट्र की परंपरागत प्राचीन धारणाओं की सुरक्षा और निरंतर राष्ट्र की उन्नति के लिए पुरुषार्थमयी प्रेरणा के लिए मार्गदर्शन करनेवाले ‘राष्ट्र के जागरूक प्रहरी’ के रूप में हमारे अंतः पटल पर साकार होते हैं।
संपूर्ण राष्ट्र की जनता की मानसिकता विजयोन्मुख बनाने के लिए प्रखर राष्ट्रनिष्ठा भी जाग्रत् करनी पडती है। वे कहते हैं, ‘‘हमें तो इस राष्ट्रीयता की भावना को स्वाभाविक दृष्टि से पुष्ट करना पडेगा (पृ. ४२), यह कार्य सरकार के साथ-साथ देश की सभी राष्ट्रवादी शक्तियों का भी कर्तव्य है।’’ वे आह्वान करते हैं, ‘‘संकटों का मुकाबला करने के लिए समस्त राष्ट्रवादी शक्तियों को सतत प्रयत्नशील रहना है। देश और समाज को राष्ट्रवादियों से बहुत सी अपेक्षाएँ हैं।’’ (पृ. १२१)
कश्मीर के आग्रही
सन् १९४७ में भारत देश स्वतंत्र तो हुआ, किंतु आंशिक स्वतंत्रता के साथ-साथ कश्मीर की समस्या भी एक दुर्धर रोग के समान इस देश के साथ आरंभ से ही लगी रही। स्व. पंडितजी पाकिस्तान के निर्माण को पूर्णतया अस्वाभाविक मानते हैं-पाकिस्तान का निर्माण कृत्रिम विभाजन करके हुआ है। इस कृत्रिम विभाजन के साथ-साथ कश्मीर समस्या भी खडी हुई, जो वास्तव में हमारे तत्कालीन नेताओं की असावधानता तथा इच्छाशक्ति के अभाव का परिणाम है। विभाजन के समय के भीषण अत्याचार और तत्पश्चात् निरंतर सरदर्द के रूप में खडा कश्मीर का प्रश्न तथा वहाँ की हिंदू जनता के ऊपर हो रहे आघात अपने आप में हमारे देश की दर्द भरी कहानी बन गए। इसके मूल में है, हमारे नेतृत्व की संवेदनहीनता तथा अदूरदर्शिता। हमारे समाज पर चल रहे अत्याचारों के लिए हम विश्व के बा*ाार में न्याय की भिक्षा माँगें, यह जज्जास्पद लगता है। हमारे भोले-भाले नेता पाकिस्तान की कुटिलता को क्यों नहीं समझ पाए? अपने अत्याचारों को छिपाने के लिए वह न्याय की माँग का बहाना बनाता है-‘‘पाकिस्तान के कश्मीर मुद्दा पुनः सुरक्षा परिषद् में ले जाने का निर्णय, पूर्वी बंगाल में अपनी आपराधिक गतिविधियों पर परदा डालने के लिए किया है।’’(पृ. १४०)
चालाक विदेशी शिक्तयों से हम अपने लिए न्याय की अपेक्षा करें, यह कितना हास्यास्पद है? पंडितजी लिखते हैं-‘‘वाशिंगटन के नीति-निर्माता यह चाहते हैं कि भारत कम्युनिस्ट चीन के विरुद्ध तो दृढ रुख अपनाए, पर साथ ही पाकिस्तान के प्रति नरम रहे। परंतु जब तक भारत और पाकिस्तान मिल करके फिर से एक नहीं हो जाते, वे हिंदू-मुस्लिम देश बने रहेंगे।’’ (पृ. १६०) नरम रुख अपनाने का अर्थ अकसर यही होता है कि सीमा पर चल रही वारदातों का मुँह तोड जवाब प्रत्याक्रमण या प्रतिकार से न करते हुए बातचीत से समझौता किया जाए। पर पंडितजी चेतावनी देते हुए कहते हैं-‘‘लोग पाकिस्तान से समझौते की बात करते हैं। भारत सदा समझौते के लिए तैयार रहा है। पर हम भारत के हितों का बलिदान करके समझौता नहीं कर सकते।’’ (पृ. १३१)
विश्व के इतिहास का थोडा सा भी अवलोकन करने पर ध्यान में आता है कि बलवान राष्ट्र दुर्बल राष्ट्रों को आक्रमण के माध्यम से जीतकर उन्हें निगल जाते हैं। इसको ‘मत्स्य न्याय’ कहते हैं। हय वैसे ही है, जैसे बडी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। इसलिए निसर्गतः सभी को सुरक्षित रहने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता रहती है। सुरक्षित रहना केवल अधिकार नहीं, अपितु अपनी सुरक्षा के लिए सावधान रहना हमारा प्रथम कर्तव्य है कि वह अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करे, उसे सुदृढ एवं स्थायी बनाने का प्रयास करे तथा अपने नागरिकों को ऐसा शासन प्रदान करे, जिसके अंतर्गत वे अपने जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए समृद्ध, सोद्देश्य एवं सुखी समाज के संगठन में सचेष्ट रह सकें।’’ (पृ. २२८) चीन के आक्रमण ने हमारी सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियाँ उडा दीं। आक्रमण के प्रहार के बाद हमारा मोहभंग हुआ और देश की सरकार ने सँभलने का प्रयास आरंभ किया। वास्तव में जैसे पं. दीनदयालजी कहते हैं-‘‘प्रतिरक्षा योजनाएँ पर्याप्त बनाई जानी चाहिए।’’
(पृ. १२) जनता में वजिय का आत्मविश्वास जगाना सुरक्षा के लिए परम आवश्यक है। वे कहते हैं-‘‘यदि लोगों की राज्य की सरकार में आस्था समाप्त हो चुकी है, जैसा कि सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के कथन से स्पष्ट है, तो केंद्र का यह दायित्व है कि वह लोगों का विश्वास पुनः बनाए।’’ (पृ. १४२) किंतु सुरक्षा का यह आर्थिक दृष्टि से सबल हो। यह सिद्धता एकाएक नहीं होती।
हिंदू की व्याख्या करते समय वे स्पष्ट
भारतीय जनसंघ का यह आजीवन महामंत्री और अंतिम वर्ष का अध्यक्ष किसी राजकीय पार्टी का नेता मात्र था, ऐसा लगता हो तो वह निरा भ्रम मात्र है। भारतमाता की सेवा के माध्यम के रूप में उन्हें राजनीति में आना पडा और उस दायित्व को उन्होंने पूरी तरह अत्यधिक सफलता के साथ निभाया भी, किंतु मूल प्रकृति से यह व्यक्तित्व विश्वकल्याण की चिंता वहन करनेवाला चिंतनशील महात्मा का था। हिंदू संस्कृति के विश्व कल्याणकारी रूप को प्रस्तुत करते हुए उनके द्वारा प्रदत्त इन सूत्रों को देखिए-
जीवन की एकता, पूर्ण अभेदता हमारे जीवन की विशेषता है। (पृ. १८९)
पश्चिम में आदम की कल्पना सेब की चोरी की है। हमारे सामने मछली की रक्षा करनेवाले करुणामय मनु की कल्पना है। (पृ. १९१-१९२)
संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए। एकात्मक मानववाद (ढ्ढठ्ठह्लद्गद्दह्म्ड्डद्य ।।ह्वद्वड्डठ्ठद्बह्यद्व) के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का निर्माण करना होगा। (पृ. २३७)
जब तक आत्मा को सुख की प्राप्ति नहीं होती तब तक शरीर, मन, बुद्धि के सुख कुछ एक सीमा तक ही सुखकारक हैं। इसलिए शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारों का विचार करने पर संपूर्ण मनुष्य का विचार हो सकेगा। (पृ. २८०)
हमारा आधार एकात्मकता का है, सद्गुणों का है। यहाँ भी छुआछुत जाति-पाँति आदि अनेक दुर्गुण उत्पन्न हुए, परंतु हमने उन्हें मिटाने के प्रयत्न किए। हमारा वास्तविक कार्य तो एकात्मता बढाने का ही है। (पृ. १८९-१९०)
शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का समुच्चय ही व्यक्ति है। इन चारों का सुख मनुष्य का सुख है।
(पृ. १९६)
हमारी संस्कृति कभी समानता का नारा नहीं लगाती। वह तो आत्मीयता का नारा लगाती है। अर्थात् एक कुटुंब की तरह सबको आवश्यकतानुसार मिले। (पृ. ११२)
हम किसी एक वाद को नहीं मानते। हम तो पूर्णतावादी, एकात्मवादी, आत्मवादी और संघवादी हैं। उसमें भी चैतन्य को, एक जीवमान आत्मा को मानकर चलते हैं। (पृ. २०३)
दीनदयालजी के बारे में कहा गया कि वे भारत के सच्चे राजदूत अथवा प्रतिनिधि हैं। (पृ. ३३०) तथा यह एक अत्यंत ध्यान देने जैसा महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व है- मेनचेस्टर गार्जियन (पृ. ३२३) वास्तविकता यह है कि वे अपने, कार्य तथा वाङ्मय के कारण सर्वदा ही भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में पहचाने जाएँगे और सभी देशभक्तों के लिए राष्ट्रधर्म के पथप्रदर्शक दीपस्तंभ बने रहेंगे। आदर्श देशदूत, सव्यसाची मार्गदर्शक, सार्थक अर्थनीतिज्ञ, राष्ट्रीय शिक्षाविद् और सच्चे प्रन्यासी के रूप में उनका सुभग दर्शन इस खंड में तथा अन्यत्र भी होता ही रहेगा। यह जीवन को सुपुष्ट करनेवाले असंख्य विचार रत्न उनके साहित्य-सागर में छिपे हैं। यहाँ केवल नमूने के लिए उनमें से कुछ चुनकर प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इन पर दृष्टिपात करते ही उनके महान् जीवन के अनेक पहलू स्वतः ही स्पष्ट हो जाएँगे।
राष्ट्र की दृष्टि से चार बातों की आवश्यकता है। वे चार बातें अनुक्रम से देश, सामूहिक जीवन का संकल्प, संविधान और जीवन-आदर्श/धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों के आधार पर हम संपूर्ण जीवन की कामना लेकर चल सकते हैं। (पृ. १९७/२०२)
जो इस भारतभूमि को माँ मानकर चलगे तो हम उनको अपना भाई कहेंगे, पर यदि वे कहेंगे कि नहीं, यह हमारी माँ तो नहीं है, पर हम हिंदुओं के साथ यहाँ मित्रतापूर्वक रहेंगे तो हम उनको मित्र कहेंगे। (पृ. ५५)
व्यक्ति जब से अपने को केंद्र बनाकर चलने लगा है तो सामान्यतः वह समाज को भूलने लगा है।
हम संपूर्ण विश्व में एक चैतन्य की कल्पना करते हैं-ईश्वर सब में मौजूद है। हम आत्मवादी तो वे अनात्मवादी, जडवादी हैं। हम समाज-राष्ट्र को भी आत्म-ईश्वर का रूप मानकर चलते हैं, वे केवल यंत्रवत् राष्ट्र की कल्पना लेकर चलते हैं। (पृ. १९१)
‘हम सब के सब एक हैं’ यह तब तक संभव नहीं जब तक हमें यह ज्ञात न हो कि हमें एक बनानेवाली, हमें जोडनेवाली वस्तुएँ कौन-कौन सी हैं? (पृ. १८३)
समर्थ दुर्बल को समाप्त न करें, इसलिए हम नियम व समाज बनाते हैं। (पृ. १८८)
राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता भी चाहिए। शासन का वयष्टि और समष्टि के प्राकृतिक हित में हस्तक्षेप न करना तथा सदैव उसके अनुकूल चलना राजनीतिक स्वतंत्रता है। (पृ. २३३)
राज्य व्यवस्था की भाँति अर्थव्यवस्था का निकष भी मानव का सर्वतोन्मुखी विकास होना चाहिए।
(पृ. २३५)
राष्ट्रीयकरण का नारा तो *ाोरों से लगाया जाता है, किंतु राष्ट्रीय दृष्टिकोण का अभाव भी आज की समस्याा का मुख्य कारण है। (पृ. २२५)
व्यक्ति जितना गुलाम पूँजीवादी यूरोप में था, संभवतः उससे अधिक गुलाम समाजवादी व्यवस्था में आज है। जितनी विषमाताएँ यूरोप में थीं, उससे अधिक विषमताएँ समाजवादी यूरोप में हैं। (पृ. ७२)
कम्युनिस्ट पार्टी और देश के अन्य राजनीतिक दलों में मूलभूत अंतर है। देश के अन्य सभी दल इस देश को मातृभूमि मानकर चलते हैं। इनका प्रेरणास्रोत यही पावन भूमि है। इसके विपरीत कम्युनिस्ट देश के बाहर से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
...किंतु सनसनी पैदा करने का अर्थ क्रांति नहीं और न क्रांति का अर्थ आवश्यक रूप से प्रगति ही है।
एकता एक जैविक प्रक्रिया है और इसे हिसाब-किताब से नहीं पाया जा सकता। हम जहाँ जुड सकते हैं, वहाँ एक हों। जहाँ हमारा मतभेद है, वहाँ हम दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयाास करें और उसके प्रति सहिष्णु बनें। (पृ. ६४)
हमारे यहाँ संसदीय शासन प्रणाली है। पंरतु शासक दल के प्रचंड बहुमत के कारण यह सरकार मात्र दलीय सरकार बन गई है, जहाँ सारे निर्णय दल की बैठकों में लिए जाते हैं, संसदीय समितियों में नहीं। (पृ. १७३)
इस प्रकार प्रतिपक्ष की संख्या भले ही कम हो, परंतु वह निश्चित ही किसी भी अन्य देश की अपेक्षा अधिक सबल है और प्रभावी है। (पृ. १५३)
नागरिक का धर्म कोई भी हो, उसकी आ*ाादी और सुरक्षा भारत की पवित्र परंपरा रही है। (पृ. १६७)
वे कहते हैं-‘‘विश्व का ज्ञान तथा आज तक की अपनी परंपरा इनके आधार से हम ऐसे नए भारत का सृजन करेंगे कि जो अपने पूर्वजों के भारत से भी अधिक गौरवशाली होगा और यहाँ जन्मा हुआ हर मानव स्वयं के व्यक्तित्व को विकासशील बनाते समय केवल मानवजाति ही नहीं अपितु संपूर्ण सृष्टि के साथ एकात्मता का साक्षात्कार प्राप्त कर नर से नारायण बनने के लिए समर्थ होगा। यही हमारी संस्कृति का शाश्वत, चिरंतन दैवी स्वरूप है। चौराहे पर खडी विश्व की मानवजाति को हमारा यही मार्गदर्शन है। इस कार्य के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान कर हमें इस कार्य में सफल बनाएँ, यही हमारी परमात्मा से प्रार्थना है।’’