राष्ट्र का राजनीतिक प्रबोधन और एकात्मक मानव दर्शन

डा कृष्ण गोपाल


स्वतंत्रता के बाद दीनदयालजी पहले ऐसे राजनीतिक चिंतक दिखाई देते हैं जो भारतीय मतदाता को, राजनीतिक दलों को तथा राजनीति में कार्य कर रहे नेतृत्व को व्यापक रूप से प्रशिक्षित करने का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं। देश की राजनीति को वे एक स्वस्थ दिशा देना चाहते हैं। उनका यह प्रबोधन महत्त्वपूर्ण तथा शाश्वत है। दीनदयाल जी की दृष्टि में राजनीति और राजनीतिक दल राष्ट्र के लिए है। राष्ट्र निष्ठा पहले और दल निष्ठा बाद में। इसके प्रबोधन के प्रमुख बिन्दु निम्नानुसार है-
लोकमत जागरूक रहे ः देश में संविधान लागू होते ही सभी वयस्कों को मताधिकार तो प्राप्त हो गया था किंतु इस लोकमत को सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को समझना अवश्यक था। दीनदयालजी चाहते हैं कि मतदाता की जानकारी का स्तर बढे। वह तुलनात्मक विश्लेषण कर सके। इस दृष्टि से वे मतदाता प्रबोधन हेतु कोई भी प्रयास छोडते नहीं।
मतदाता का मत लोकाज्ञा है ः दीनदयालजी कहते हैं कि ‘मतदाता का मत ‘पवित्र’ है। प्रत्येक मत स्वयं एक ‘निर्देश’ और ‘आज्ञा’ का भाव रखता है। राष्ट्र की नीतियों तथा योजनाओं का संचालन उसके अनुसार होना चाहिए। मतदाता का मत लोकाज्ञा है।’ मतदाता सचेत रहे, स्वविवेकी हो, दूरद्रष्टा हो तथा विविध विषयों का जानकार भी हो। अतः उसका प्रशिक्षित होना आवश्यक है। वे कहते हैं कि देश के सामान्य मतदाता का चिंतन और व्यवहार का स्तर उठना चाहिए। ‘देश का मतदाता देश का भाग्यविधाता है, वह हमारे सामने देव स्वरूप है। अतः ‘लोकमत परिष्कार’ प्रत्येक राजनीतिक दल का का एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।
प्रत्येक मत (वोट) के मूल्य को समझें ः ‘प्रयत्न करें कि आपका प्रत्याशी जीते। तथापि पराजित होने पर यह न सोचें कि आपका वोट व्यर्थ गया। यह व्यर्थ नहीं हुआ। यह जो भी आगामी सरकार हो, उसकी नीतियों और दृष्टिकोण को प्रभावित करेगा।’
मतदाताओं का प्रबोधन ः लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता देश की वास्तविक स्थिति से अवगत हों, वे विचारवान हों तथा योग्य रीति से निर्णय लेने में सक्षम हों, यह आवश्यक है। इस हेतु से दीनदयालजी राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति जागरूक करते हुए एक जनसभा में कहते हैं, ‘इस अवधि में देश की समस्याएँ सुलझने की बजाय कई गुना बढी हैं। भू-क्षेत्र की दृष्टि से भारत आज उस समय से छोटा हो गया है, जितना अंगे*जों के छोडने के समय था। एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तानी कब्जे में है, जबकि पूर्वी सीमाओं पर चीन ने अतिक्रमण कर
रखा है।’
धन का प्रभाव ः कुछ धनी लोग अपने धन के बल पर टिकट पाते हैं और प्रचुर धन का उपयोग करके विजयी होना चाहते हैं। दीनदयालजी कहते हैं कि ‘वास्तव में वे जनता और राजनीतिक दलों से उनके मत और टिकट प्राप्त करने नहीं आते, वरन् उसे खरीदने आते हैं।.....यदि समय रहते इस ओर ध्यान न दिया गया तो देश के विधानमंडलों में यह धनिक वर्ग अपना प्रभाव बढा लेगा और उस अवस्था में अब किसी भी समस्या पर निर्णय राष्ट्रीय हितों अथवा लोक-कल्याण के आधार पर शायद ही कभी किया जा सके।’
घोषणा-पत्रों का तुलनात्मक अध्ययन ः दीनदयाल उपाध्यायजी ने स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं का विकास हो, इस दृष्टि से सभी राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए गए घोषणा-पत्रों का विश्लेषणात्मक और तुलनात्मक अध्ययन प्रारंभ किया। दलों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सोच क्या है, यह मतदाता को जानना चाहिए। जनसंघ इन सभी से किस प्रकार भिन्न है, यह अपने कार्यकर्ताओं को तथा मतदाता को ध्यान में रहे। वे लिखते हैं कि ‘ये सभी राजनीतिक दल समाजवाद की चर्चा करते समय अपना ध्यान केवल नागरिकों की आर्थिक उन्नति पर ही दे रहे हैं। भारतीय जनसंघ ने कहा है कि राष्ट्र के स्थायी सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर हम देश का विकास करेंगे।’
राजनीतिक दलों से अपेक्षा ः राजनीतिक दल तो लोकतंत्र की रीढ हैं। स्वतंत्रता के पूर्व सारा देश केवल एक ही दल कांगे*स के नेतृत्व में आ*ाादी की लडाई लड रहा था। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता आते ही सत्ता भी उन्हीं के हाथों में आ गई। राजनीतिक दलों के स्वस्थ विकास की प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं हुई। दीनदयालजी चाहते थे कि कुछ वर्षों के अंदर ही देश भर में एक महान् राष्ट्रीय उद्देश्य को लेकर; उद्द्ेश्य के लिए समर्पित, अनुशासित, प्रशिक्षित कार्यकर्ता खडे कर दिए जाएँ और इस हेतु से उनका कार्यकर्ता प्रबोधन का कार्य अनवरत चलता रहता था।
अच्छा दल कौन सा है ः दीनदयालजी कहते हैं कि ‘जिस दल के कार्यकर्ताओं में सर्वोच्च पदाधिकारियों से लेकर साधारण कार्यकर्ता तक अपने आदर्शों के प्रति निष्ठा होगी।’ अर्थात् जिस दल के सभी कार्यकर्ता कुछ उद्देश्यों तथा आदर्शों को सामने रखकर कार्य करते हैं, वे ही देश को कुछ दिशा दे सकते हैं।
राजनीतिक दलों का दायित्व ः जब सब लोग चुनाव जीतना ही लक्ष्य रखते हों, उस समय दीनदयालजी ने राजनीतिक क्षेत्र में आदर्शों की स्थापना का लक्ष्य अपने सामने रखा। उनका मानना था कि राजनीतिक दलों का दायित्व है कि वे जब उम्मीदवारों का चयन करें तब यह ध्यान रखें- (१) उम्मीदवारों की कुछ योग्यता होनी चाहिए। (२) उम्मीदवार स्वयं के दल का प्रतिनिधित्व करते हों। (३) वे अपने दल के प्रति अनुशासित हों। प्रत्याशी के लिए, जीतनेवाला है और पैसेवाला है, केवल यह आधार उचित नहीं है। विधायिका में धनपतियों का प्रभाव बढने से राष्ट्रहित गौण हो जाएगा।
लोकतंत्र के लिए अच्छा स्वरूप कब? दीनदयालजी स्पष्ट करते हैं कि ‘संगठित जागरूक समाज, सुव्यवस्थित राजनीतिक दल तथा राजनीतिक जीवन में आदर्शों की प्रस्तुति करने वाले कार्यकर्ता जहाँ होंगे, वहाँ लोकतंत्र का आदर्श स्वरूप आ सकता है। इसके लिए दलों के सामने उच्च आदर्श, निः स्सवार्थ कार्यकर्ताओं की समर्पित टोली, संगठन में अनुशासन और इस दृष्टि से वह दल कार्यक्रम करता है।
राजनीतिक दलों के बडे नेताओं का व्यवहार ः दीनदयालजी का मत था कि अपने देश में लोकतंत्र का विकास हो रहा है। कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण चल रहा है। जैसा व्यवहार और आचरण हमारे नेता लोग करेंगे, वैसा ही अनुसरण हमारे कार्यकर्ता भी करेंगे।
राजनीतिक दलों का आपसी व्यवहार ः दीनदयालजी को चिंता है कि ‘एक ही देश के राजनीतिक दलों का आपसी व्यवहार कैसा है? राजनीतिक दल कितने भी हों, सभी का उद्देश्य तो एक ही है कि देश की उन्नति हो। अपना देश आगे बढे। किंतु आपसी व्यवहार संकुचित हैं। राजनीतिक दल आपस में शत्रुवत् व्यवहार क्यों करते हैं? हम सभी विविध दल मिलकर अच्छा प्रेमपूर्ण व्यवहार क्यों नहीं कर सकते?’ वे कहते हैं-*ष्ठद्बद्घद्घद्गह्म्द्गठ्ठह्ल श्चश्ाद्यद्बह्लद्बष्ड्डद्य श्चड्डह्म्ह्लद्बद्गह्य द्बठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड ह्यद्गद्गद्वह्य ह्लश्ा ड्ढद्ग ड्डह्ल 2ड्डह्म् 2द्बह्लद्ध द्गड्डष्द्ध श्ाह्लद्धद्गह्म् ड्डद्यद्य ह्लद्धह्म्श्ाह्वद्दद्ध*. राजनीतिक दलों के ऐसे व्यवहार से सामान्य जनता क्या सीखेगी? राजनीतिक नेताओं के प्रति मतदाताओं की धारणा अच्छी नहीं बनेगी। राजनीति का स्तर गिरेगा।
राजनीतिक अस्पृश्यता बहुत खराब है ः दीनदयालजी का मानना है कि देश के विविध राजनीतिक दल आपसी सौहार्द बनाकर रखें। राजनीतिक दलों के आपसी संबंध इतने निम्न स्तर पर हैं कि किसी को शर्म आ जाए। ऐसा लगता है कि सभी दल आपस में युद्धरत हैं। कुछ दलों की आपस में निकटता हो सकती है किंतु इसका यह अर्थ नहीं हो सकता है कि अन्य दलों के साथ वे अस्पृश्यता का व्यवहार करेंगे। यदि हम सामाजिक अस्पृश्यता को बुरा मानते हैं तो इसकी तुलना में राजनीतिक क्षेत्र की अस्पृश्यता तो बहुत बुरी मानी जाएगी।
दीनदयालजी ने डॉ. राधाकृष्णनजी के प्रथम भाषण का उल्लेख किया और कहा कि ‘हमारे सभी के आपसी संबंध आत्मीय और प्रेमपूर्ण होने चाहिए।’ ** ठ्ठड्डह्लद्बश्ाठ्ठ द्बह्य ठ्ठश्ाह्ल द्भह्व3ह्लड्डश्चश्ाह्यद्बह्लद्बश्ाठ्ठ श्ाद्घ द्बठ्ठस्रद्ब1द्बस्रह्वड्डद्यह्य. ढ्ढह्ल द्बह्य ड्ड ह्यश्ाष्द्बद्गह्ल4 ड्ढड्डह्यद्गस्र श्ाठ्ठ ड्ड ष्श्ाद्वद्वह्वठ्ठद्बष्ड्डह्लद्बश्ाठ्ठ श्ाद्घ द्वद्बठ्ठस्र, ड्ड ह्वठ्ठद्बश्ाठ्ठ श्ाद्घ द्धद्गड्डह्म्ह्लह्य.*
जाति के आधार पर राजनीति उचित नहीं ः दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद से ही राजनीति में जातीयता का प्रयोग प्रारंभ हो गया था राजनीतिक दलों ने जाति के आधार पर वोट माँगना प्रारंभ कर दिया था। और यह स्वभाव बढता जा रहा था। दीनदयालजी सावधान करते हैं-‘प्रत्याशी निर्धारित करते समय जातीयता का यह भूत राजनीतिक दलों को बहुत प्रभावित करता है। लेकिन यदि प्रत्याशी में अन्य सभी योग्यताएँ विद्यमान हैं तो मैं इस बात की चिंता करना आवश्यक नहीं समझता कि उम्मीदवार किस जाति विशेष का है।’
अच्छे कार्यकर्ता किसी भी दल के विजयी हों ः दीनदयालजी ने देखा कि राजनीतिक दलों के विद्वान् तथा प्रामाणिक लोग चुनाव हार जाते हैं, यह तो ठीक नहीं है। मतदाताओं को उनका आग्रह था कि प्रत्याशी का चयन करते समय पहले सिद्धांत, फिर पार्टी, फिर व्यक्ति का क्रम रहे। दीनदयालजी दुःख के साथ कहते हैं कि आचार्य कृपलानी और आचार्य नरेंद्र देव जैसे विद्वान् तथा अनुभवी लोगों को छुटभैयाओं के सामने हारना पडा। यह तो उचित नहीं है।’ यद्यपि श्री कृपलानी तथा आचार्य नरेंद्र देव जनसंघ के नेता नहीं थे। किंतु दीनदयालजी दुखी थे। दीनदयालजी चाहते थे कि अच्छे देशभक्त कार्यकर्ता चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, विजयी होकर आगे आने चाहिए। इस कारण दीनदयालजी ने अन्य दलों के योग्य कार्यकर्ताओं (उम्मीदवारों) को भी विजयी बनाने के लिए अनेक बार आह्वान किया। समाजवादी दल के श्री राम मनोहर लोहिया (फूलपुर-इलाहबाद) तथा आचार्य कृपलानी (उत्तर मुंबई) जैसे अनेक उम्मीदवारों को विजयी बनाने के लिए आह्वान किया और जनसंघ के कार्यकर्ताओं को उनके चुनावों में लगया।
दक्षिण-वाम की शब्दावली ठीक नहीं ः फ्रांस में १९७० के दशक में राजा लुईस (सोलहवें) के दरबार में बाँईं ओर बैठने वाले लोग राजा की आलोचना करते थे, जिन्हें राक्षसी (ह्यद्बठ्ठद्बह्यह्लद्गह्म्ह्य) कहा जाता था। वहाँ से यह वामपंथी (रुद्गद्घह्लद्बह्यह्ल) शब्द प्रारंभ हुआ। राजा के पक्ष वाले लोग दाहिनी ओर बैठते थे और दक्षिणपंथी कहलाने लगे। दीनदयालजी इस शब्दावली का प्रयोग अपने देश में उचित नहीं मानते। दीनदयालजी कहते हैं कि ‘पश्चिमी देशों में राजनीतिक दलों का वर्गीकरण दक्षिणपंथी और वामपंथी कहकर किया जाता है। भारतवर्ष में भी भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों के लिए इसी शब्दावली का प्रयोग कर उनकी विशेषताएँ और उद्देश्य बताए जाते हैं।’ यह उचित नहीं है।
भारतीय भाषाएँ और अंग्रे*ाी
दीनदयालजी का निश्चित मत था कि देश को स्वतंत्रता मिली है और अंग्र*ाों के जाने के बाद हम अपनी भारतीय भाषाओं की प्रगति पर ध्यान दें। हिंदी को देश भर में पहुँचाने के लिए उन्होंने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडनजी की प्रशंसा की। भाषा विषय पर दीनदयालजी कहते हैं कि देश की सभी भाषाएँ भारतीय हैं, महत्त्वपूर्ण हैं तथा सम्माननीय हैं। अंग्रे*ाी उनका स्थान नहीं ले सकती। ‘जब तक भारत की उर्वर और समृद्ध भाषाएँ हैं, तब तक कोई भी शक्ति यहाँ अंग्रे*ाी को बनाए नहीं रख सकती।... इसका निर्णय उसी दिन सुना दिया गया था, जिस दिन अंग्रे*ाों ने भारत छोडा।’ भारतीय भाषाओं के बारे में वे कहते हैं कि ‘प्रथम भाषा आयोग की संस्तुतियाँ कूडेदान के हवाले की जा चुकी हैं और संसदीय समिति की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति के निर्देशों को विस्मृत किया जा चुका हैं।
भारत की सभी स्थानीय, प्रांतीय भाषाओं में आपस में कोई विरोध नहीं है। ‘वास्तव में भारत की सभी भाषाएँ एक ही परिवार की सदस्या हैं। इसलिए उनका परस्पर एक साथ जितना मेल हो सकता है, अंग्रे*ाी के साथ उतना नहीं हो सकता।’ दीनदयालजी कहते हैं कि जितना जल्दी हो उतना शीघ्र भारत अपनी स्वदेशी भाषाओं के साथ खडा हो जाए किंतु सरकार में बैठे कुछ लोग ‘देश की भाषा-नीति में अंग्रे*ाी को ‘सखी राजभाषा’ (*ह्यह्यश्ाष्द्बड्डह्लद्ग रुड्डठ्ठद्दह्वड्डद्दद्ग) बनाए रखने के लिए शासन की ओर से विधेयक प्रस्तुत करने की बात कर रहे हैं। यह बात देश के लिए अत्यंत घातक है।’ ‘संविधान बनते समय उसके बनाने वाले भारत के सभी भाषा-भाषी थे और अपनी भाषा की नीति उसी समय संविधान के द्वारा स्वीकृत हो चुकी है।... मालवीयजी ने कहा था, ‘‘अपने देश में अपना राज। यदि यहाँ अंग्र*ाी में राजकाज चलेगा, वह कैसे अपना राज बनेगा? राज्यों की सरकारें ‘‘अपने प्रदेश स अंग्रे*ाी को निकाल दीजिए। प्रदेश की भाषा से राजकाज तथा अन्य काम चलाइए। फिर हिंदी स्वयं और स्वाभाविक रूप से जितना आवश्यक होगा, उतना स्थान बना लेगी।’’
एक नई हिंदुस्तानी भाषा के नाम पर हिंदी में फारसी तथा अरबी शब्दों के प्रयोग पर उन्होंने आपत्ति व्यक्त की और कहा कि भारत के लोगों को असंस्कृत बनाने का यह एक षड्यंत्र है।
सम्यक आर्थिक चिंतन आवश्यक
१९० वर्षों के अंग्रे*ाी राज्य ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत आने के समय भारत की विश्व व्यापार में भागीदारी २३ प्रतिशत थी किंतु जब अंग्रे*ा भारत से गए, तब यह हिस्सेदारी केवल १ प्रतिशत तक रह गई। निर्यात नगण्य रह गया और देश में पडने वाले अकालों से करोडों लोगों की मृत्यु होती थी। शस्यश्यामला धरती बाहर से खाद्यान्नों का आयात करती थी। पुराने उद्योग चौपट हो चुके थे और नवीन उद्योगों का कोई वातावरण नहीं था। देश भयंकर गरीबी से जूझ रहा था। दीनदयालजी का मानना था कि भारत अपनी परिस्थितियों, आवश्यकताओं तथा अपने संसाधनों के अनुसार अपनी आर्थिक नीतियों का विकास करे। अमरीका, रूस या यूरोप की परिस्थितियाँ हमसे बहुत भिन्न हैं। हम उनका अनुसरण करके कहीं के भी नहीं रहेंगे।
दीनदयालजी कहते हैं-बडे-बडे उद्योगों में बहुत पूँजी लगती है और रो*ागार कम उपलब्ध होते हैं। इससे बेरो*ागारी बढेगी। भारत जैसे देश के लिए रो*ागारोन्मुखी योजनाएँ लागू करनी होंगी।
‘‘उत्पादन के कार्यक्रमों की योजना इस प्रकार बने कि आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण न हो तथा वर्तमान की आर्थिक असमानता को दूर किया जा सके। सामान्य व्यक्ति की क्रयशक्ति को तभी बढाया जा सकेगा, जब सभी के हाथों में रो*ागार होगा।’’
कृषि क्षेत्र को प्रमुखता मिले ः वे कहते हैं-‘‘पहली प्राथमिकता कृषि क्षेत्र को मिलनी चाहिए, ताकि देश खाद्यान्न और खेती से जुडे कच्चे माल के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो सके। दूसरे, बडे पैमाने पर लघु उद्योगों व उपभोक्ता उद्योगों की स्थापना की जाए।’’
कृषक की क्रयशक्ति बढे ः दीनदयालजी कहते हैं कि यदि देश के कृषक की क्रयशक्ति बढ गई तो यह अन्य उद्योगों के उत्पादों को खरीदेगा और उद्योग-धंधे भी अच्छे चलेंगे। ‘‘एक संपन्न कृषक वर्ग अकेले ही उद्योगों के लिए सबसे बडा बाजार उपलब्ध करा सकता है।....दूसरी पंचवर्षीय योजना इस संबंध में बुरी तरह विफल हो गई। इसका पूरा *ाोर औद्योगिक विकास और वह भी भारी उद्योगों पर रहा।’’
दीनदयालजी कहते हैं कि ‘‘देश की ७२ प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आधारित है और इसकी सकल राष्ट्रीय आय में भागीदारी लगभग आधी है।’’ रूस को देखकर हमने भी कृषि में यंत्रीकरण प्रारंभ कर दिया। यंत्रीकरण ने बडी संख्या में लोगों को बेरो*ागार कर दिया। रूस को देखकर साठ के दशक में कांग्रेस कोऑपरेटिव फार्मिंग की योजना लेकर आई थी। यद्यपि दीनदयालजी राजनीतिक दल के नेता हैं, किंतु वे कार्यकर्ताओं के राजनीतिक स्वार्थों को नहीं जगाते बल्कि उनके हृदय में अपनी मातृभूमि के प्रति भक्तिभाव जगाते हैं। समाज को आराध्य मानते हुए उसके प्रति दायित्व भाव उत्पन्न करते हैं। देश के अंदर किसी भी प्रकार के विभाजन या विभेदों को समाप्त कर एक अविभाज्य, अखंड, एकात्म राष्ट्र के शाश्वत भाव को स्थापित करने में सफल रहते हैं।