सनातन दृष्टि का युगानुकूल भाष्य

डा मोहन भागवत


चराचर विश्व सुख के लिए जीवनयापन करता है। विश्व के ज्ञात प्राणियों में मनुष्य सर्वाधिक विकसित वैचारिक क्षमता प्राप्त प्राणी है। अतः मानव के जीवन, विकास व उनके परिणामों को ही विश्व की इस सुखलक्षी यात्रा के फलित का मानक व परिणाम माना जाता है। विश्व के विकास अथवा विनाश, दोनों की कुंजी आज मानव समूह के ही हाथ में है। मनुष्य की बुद्धि में संस्कार तथा विकार दोनों हैं। अपना स्वयं का, जिस जगत में हम ह उसका तथा इन दोनों के परस्पर संबंधों का ज्ञान मनुष्य को सार व असार, उचित व अनुचित तथा कर्तव्य व अकर्तव्य का विवेक प्रदान करता है। उसी के आधार पर मनुष्य संस्कारों व विकारों की अलग-अलग पहचान करता आया है, अपने क्रियाकलापों से सृष्टि के साथ जीवन-चक्र की दिशा व गति निर्धारित करता रहा है। जीव, जीवन व जगत् को देखने की दृष्टि समकालीन मानव जीवन की व्यवस्थाओं तथा उनके अच्छे-बुरे परिणामों को निर्धारित करती है। वही उसे उसके शाश्वत संपूर्ण तथा अमिश्रित शुद्ध सुख की प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचती है अथवा उससे दूर भटकती है।
आज के जगत् की दशा-दिशा और उसमें स्वयं अपनी स्थिति से मनष्य संतुष्ट नहीं है। अब वह किसी नई राह की प्रतीक्षा कर रहा है। यह बात विश्व भर के प्रमुख व्यक्तियों के समय-समय पर व्यक्त होने वाले चिंतन से समझ में आती है। विज्ञान व तकनीक के अभूतपूर्व विकास के बाद भी जिन संकीर्णताओं के कारण समय-समय पर मानव जति विनाश के कगार पर जाकर खडी हुई, उन संकीर्णताओं का वही विनाशकारी खेल हम आज भी देख रहे हैं। सुख-सुविधाओं की भरमार होने के बाद भी समाधान व शांति तो दूर असंतुष्टि, अशांति व विनाश के नए-नए कारकों का जन्म उन्हीं सुविधाओं व व्यवस्थाओं से होता हुआ देखकर मानव समाज किंकर्तव्यविमूढ है। सृष्टि का स्वामी बनने की राह पर चलने का दम भरने वाला मानव समाज अब उन्हीं सुविधाओं, व्यवस्थाओं व संकीर्णताओं का असहाय दास बनकर चलने को विवश है। इसलिए विश्व भर के चिंतक अंतर्मुख होकर इस खोज में लगे दिख रहे हैं कि संपूर्ण प्रचलित व्यवस्था तथा मनुष्यों के विकास की सद्यः कालीन दिशा को जन्म देने वाली आधुनिक दृष्टि में कहाँ-कहाँ त्रुटियाँ रह गईं।
प्रचलित दृष्टि जीव, जीवन व जगत् का पृथकात्मता व पृथकता की पद्धति से समझने का प्रयास करती है। समय की तात्कालिकता के धरातल पर उससे कुछ आंशिक लाभ भले ही मिले, परंतु विश्व की वास्तविकता के धरातल से यह दृष्टि अभी बहुत दूर है। इस दूरी के चलते सारी व्यवस्था में तथा जीवन में भी कुछ ऐसा अधूरापन व्याप्त है, जो अंततः सुख को मरीचिका ही बनाए रखता है। क्या शाश्वत, संपूर्ण, निर्मिश्र व शुद्ध सुख मात्र एक स्वप* है? अधूरी, एकांगी तथा जगत् को टुकडों में विभाजित करने वाली दृष्टि के आधार वह सुख वास्तविक जीवन में कभी नहीं आएगा?
भारत की सनातन परंपरा ने तर्क, अनुभव व प्रयोग- तीनों कसौटियों पर परख कर इस प्रश्न का उत्तर दिया है। संपूर्ण अस्तित्व की एकता व जीवन की समग्रता के सत्य को जानना और उसको निरंतर मन, वचन, कर्म में प्रतिष्ठित करके, जीवन की सारी व्यवस्थाओं व शैलियों को उस सत्य पर ही अधिष्ठित करके विकसित करने से सभी को अमिश्रित संपूर्ण व शाश्वत सुख की प्राप्ति होना संभव है। इस दृष्टि पर आधारित जीवन व्यवस्था से उत्पन्न सर्वसंपन्न, स्थिर व शांतिपूर्ण, सामूहिक जीवन हमने पूर्व काल में युगों तक चलाकर दिखाया है। परंतु वर्तमान जगत् को उसी दृष्टि के आधार पर नई राह दिखलानी है तो उस सनातन दृष्टि की युगानुकूल परिभाषा क्या होगी? विज्ञान व तकनीकी की प्रगति संपन्न आधुनिक अवस्था में, उस एकात्म व समग्र दृष्टि की दिशा क्या होगी? व्यवस्था कैसे बनेगी? मनुष्य के जीवन से दुख, अभाव, शोषण व विषमता को हटाकर सुख, समृद्धि, सामरस्य व सेवा भाव लाने वाली नीतियाँ क्या होंगी? इन सारे प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास है- एकात्म मानवदर्शन!