भारतीयता की युगीन परिभाषा

रामनाथ कोविंद


दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही लोगों के दृष्टि-पटल पर एक शब्द आता है, वह है ‘एकात्म मानववाद’। जीवन और प्रकृति के प्रत्येक भाग को अपने में समाहित करनेवाली एक ऐसी विचारधारा, जो प्रत्येक कालखंड की सभी समस्याओं के व्यावहारिक समाधान हेतु प्रासंगिक सिद्ध हुई है। इसमें समग्र सृष्टि का विचार है। यह एक ऐसी विचारधारा है, जिसमें जीवन का समग्रता से चिंतन किया गया है। उसके साथ ही जीवन के विकास का प्रबंध भी किया गया है। संपूर्ण मानवता ही एकात्म मानववाद का केंद्र है।
दीनदयालजी सच्चे अर्थों में कुशल राजनेता थे। समाज और दुनिया का कोई भी पक्ष उनसे कभी ओझल नहीं हुआ। यही एकात्म मानववाद का आधार भी है। सभी को एक में समाहित करना, सभी की चिंता करना और सभी को किसी-न-किसी स्तर और रूप में जोडना। दीनदयालजी कभी सत्ता में नहीं रहे, लेकिन सत्ता के संचालन और तरीकों के बारे में जो कुछ भी कहा, उसकी ५० वर्ष बाद आज भी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है।
पंडित दीनदयालजी ने भारतीय एकता और अखंडता को स्थापित करने के लिए सनातन भारतीयता को युगीन परिभाषा दी। वे भारत में विश्व गुरुत्व का साक्षात्कार करते थे। वे जातिवाद और अस्पृश्यता के घोर विरोधी थे। उनका सपना समाज की अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति को विकास की धारा से जोडना था। उनमें आम जनमानस को अपनी ओर आकर्षित करने तथा अपने तेजस्वी विचारों से उन्हें सम्मोहित करने की अद्भुत क्षमता थी। वह एक प्रभावशाली वक्ता थे तथा साहित्यकार भी।
दीनदयालजी का मानना था कि राजशक्ति का प्रयोग जनकल्याण के लिए करना चाहिए न कि व्यक्तिगत और दलगत स्वार्थ के लिए। तमाम विषम परिस्थितियों में अगर उनको किसी पर विश्वास रहता था तो वह था कार्यकर्ताओं का मनोबल।
दीनदयालजी ने आंध* प्रदेश के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्ग १६ मई, १९६५ को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘आप समाज की चिंता करोगे तो समाज आपकी चिंता करेगा। समाज अपने पास कुछ नहीं रखता है।’’ उन्होंने समाज की तुलना माँ से करते हुए कहा था, ‘‘जब कोई बेटा अपनी कमाई माँ को लाकर देता है तो माँ स्वयं न खाकर बेटे को ही खिलाती है। इसी तरह से समाज अपने पास कुछ भी न रखते हुए हमको देता है।’’ व्यक्ति को समाज से जोडने के लिए इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है।
पंचवर्षीय योजनाओं के ऊपर ‘योजना बदलो’ शीर्षक से दीनदयालजी ने कुल पाँच लेख थे, वे तत्कालीन सरकार की असफल योजनाओं के कारणों को रेखांकित करते हैं। वे कहा करते थे कि ‘‘हम देश के विकास के लिए मानव शक्ति का पूरा उपयोग नहीं कर रहे। योजनाओं की यह मौलिक गलती है कि वे श्रम प्रधान नहीं हैं।’’ (योजना बदलो-२, अध्याय-१९) उनका मानना था कि जब तक हम श्रम को महत्त्व नहीं देंगे और जब तक देश के आम आदमी का हाथ म*ाबूत नहीं होगा, तब तक देश का विकास नहीं हो सकता चाहे योजनाओं का अंबार क्यों न लग जाए।
दीनदयालजी हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के सदैव पक्षधर रहे। वे अंग्रे*ाी के साम्राज्य तथा आरोपण के प्रबल विरोधी थे। उनका मानना था कि जनता की बात उसकी मातृभाषा में होनी चाहिए। वे हिंदी तथा सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय मानते थे। वे चाहते थे कि अंग्र*ाी भाषा का वर्चस्व समाप्त हो तथा स्वतंत्र भारत की राजभाषा हिंदी तथा अन्य भारतीय
भाषाएँ बनें।
दीनदयालजी कहते थे कि ‘‘आजकल राष्ट्रवाद पर बहस चल रही है। आ*ाादी की बात हो रही है और क्रांति के नाम पर निर्दोष का खून बहाया जा रहा है। कारण संभवतः यही है कि हम स्वतंत्रता की कीमत नहीं समझते।’’ क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के निधन पर दीनदयालजी ने अपने परम मित्र श्री वचनेशजी को एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने इन विषयों पर बात की थी। उज्जैन से लिखे गए इस पत्र में उन्होंने कहा था कि ‘‘स्वतंत्रता के लिए हमारे द्वारा दी गई कीमत को भी हम नहीं समझ पाए। समाज और शासकों के मन में यही भाव है कि स्वतंत्रता हमें दान में मिली है और दान की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते, इस कहावत के अनुसार दान में मिली स्वतंत्रता का अधूरापन होना खटकता नहीं, उसके ऊपर होनेवाले अक्रमण से उनके मन पर चोट भी नहीं पहुँचती। स्वतंत्रता को साकार करने करने के लिए जो प्रयत्न और पुरुषार्थ चाहिए था, वह भी नहीं दिखते। जो भी हो, यदि स्वतंत्रता और प्रजातंत्र को कोई भावात्मक आधार देना है तथा सुधार और सृजन की भावना पैदा करनी है तो समाज में क्रांतिकारी मनोवृत्ति को जगाना होगा। हाँ, आज इस आतंकवाद की *ारूरत नहीं, जिसका सहारा अंग्रे*ाों के समय में लेना आवश्यक था, पर बटुकेश्वर दत्त के प्रति यही वास्तविक श्रद्धांजलि होगी।’’
(पत्र-वचनेश जी, २४ जुलाई १९६५, अध्याय-४३) उनके द्वारा लिखा गया यह पत्र और उसकी भाषा को देखने पर सहजता से कोई भी उनके अंतर्मन की व्यथा को समझ सकता है। देश और क्रांतिकारियों के प्रति उनके मन में कितनी अगाध श्रद्धा थी, वह इस पत्र से प्रतीत होता है।