दीनदयाल उपाध्याय और डॉ राम मनोहर लोहिया द्वरा भारत-पाकिस्तान और हिन्दू-मुस्लिम समस्या के समाधान

दीनदयाल उवाच


‘‘हमारा यह दृढ मत है कि पाकिस्तान के हिन्दुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी देना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। इस मामले में निरा कानूनी दृष्टिकोण लेते हुए यह कहना कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू पाकिस्तानी नागरिक हैं, खतरनाक होगा और इससे दोनों देशों में कम या ज्यादा मात्रा में मार-काट और प्रतिहिंसा फैलेगी।
जब भारत सरकार पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने में असफल रहती है तो लोगों का क्रुद्ध होना स्वाभाविक है। जनता से हमारी अपील यह है कि वे अपना रोष सरकार पर प्रकट करें और किसी भी हालत में भारतीय मुसलमानों को उसका शिकार न बनाएँ। यदि जनता आपस में लडती है तो इससे सरकारों को अपनी काहिली और असफलता छिपाने, जनता को बदनाम करने और उस पर जुल्म ढाने का मौका मिलता है।
जहाँ तक भारतीय मुसलमानों का संबंध है, हमारा यह दृढ मत है कि अन्य सभी नागरिकों के समान, सभी परिस्थितियों में, उनके जीवन और संपत्ति की रक्षा की जानी चाहिए। कोईभी घटना या तर्क इस सच्चाई से समझौता करने को सही नहीं ठहरा सकते। एक राज्य, जो अपने नागरिक को जीने के अधिकार की गारंटी नहीं दे सकता और ऐसे नागरिक, जो अपने पडोसियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते, बर्बर ही कहलाएँगे। चाहे उसका धर्म कोई भी हो, हर नागरिक को स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान करना वास्तव में भारत की एक पावन परम्परा रही है। इस सम्बंध में हम हर भारतीय मुसलमान को पुनः आश्वस्त करते हुए हर हिन्दू घर में यह संदेश पहुँचाने की कामना करते हैं कि इस आश्वासन को पूरा करना उनका नागरिक और राष्ट्रीय कर्त्तव्य है।......
हमारा यह मानना है कि दो भिन्न देशों के रूप में भारत और पाकिस्तान का अस्तित्व एक कृत्रिम स्थिति है। दोनों सरकारों के संबंधों में मन-मुटाव असंतुलित दृष्टिकोण और टुकडों में बात करने की प्रवृति का परिणाम है। दोनों सरकारों के बीच चलने वाला संवाद टुकडों में ही न होकर निष्पक्षता से होना चाहिए। ऐसी खुले दिल से हने वाली बातचीत से ही विभिन्न समस्याओं का समाधान निकल सकता है, सद्भावना पैदा की जा सकती है और किसी प्रकार के भारत-पाक महासंघ बनाने की दिशा में शुरूआत की जा सकता है।’’