दीन दयाल जी का पत्र मामा के नाम

दीनदयाल उवाच


सादर प्रणाम! आपका पत्र मिला। देवी की बीमारी का हाल जानकर दुःख हुआ। आपने अपने पत्र में जो कुछ लिखा है, सो ठीक ही लिखा है। उसका क्या उत्तर दूँ, यह मेरी समझ में नहीं आता। परसों आपका पत्र मिला, तभी से विचारों एवं कर्तव्यों का तुमुल युद्ध चल रहा है। एक ओर तो भावना और मोह खींचते हैं तो दूसरी ओर प्राचीन ऋषियों, हुतात्माओं और पुरखों की अतृप्त आत्माएँ पुकारती हैं।....
.....परमात्मा ने हम लोगों को सब प्रकार समर्थ बनाया है, क्या फिर हम अपने में से एक को भी देश के लिए नहीं दे सकते हैं? आपने मुझे शिक्षा-दीक्षा देकर सब प्रकार से योग्य बनाया, क्या अब मुझे समाज के लिए नहीं दे सकते हैं? जिस समाज के हम उतने ही ऋणी हैं। यह तो एक प्रकार से त्याग भी नहीं है, विनियोग है। समाजरूपी भूमि में खाद देना है।
आज केवल फसल काटना जानते हैं, पर खेत में खाद देना भूल गए हैं, अतः हमारा खेत जल्द ही अनुपजाऊ हो जाएगा। जिस समाज और धर्म की रक्षा के लिए राम ने वनवास सहा, कृष्ण ने अनेक कष्ट उठाए, राणा प्रताप जंगल-जंगल मारे फिरे, शिवाजी ने सर्वस्वार्पण कर दिया, गुरु गोबिंद सिंह के छोटे-छोटे बच्चे जीते जी किले कि दीवारों में चुने गए, क्या उसके खातिर हम अपने जीवन की आकांक्षाओं का, झूठी आकांक्षाओं का त्याग भी नहीं कर सकते हैं? आज समाज हाथ पसारकर भीख माँगता है और यदि हम समाज की ओर से ऐसे ही उदासीन रहे तो एक दिन वह आएगा, जब हमको वे ची*ों, जिन्हें हम प्यार करते हैं, जबरदस्ती छोडनी पडेगी।.....
.....मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आप संघ की कार्यप्रणाली से पहले से परिचित होते तो आफ हृदय में किसी भी प्रकार की आशंका नहीं उठती। आप यकीन रखिए कि मैं कोई ऐसा कार्य नहीं करूँगा, जिससे कोई भी आपकी ओर अंगुली उठाकर देख भी सके। उलटा आपको गर्व होगा कि आपने देश और समाज के लिए अपने एक पुत्र को दे दिय है। बिना किसी दबाव के केवल कर्तव्य के खयाल से आपने मेरा लालन-पालन किया, अब क्या अंत में भावना कर्तव्य को धर दबाएगी। भावना से कर्तव्य सदैव ऊँचा रहता है। लोगों ने अपने इकलौते बेटों को सहर्ष सौंप दिया है, फिर आफ पास एक के स्थान पर तीन-तीन पुत्र हैं। क्या उनमें आप एक को भी समाज के
लिए नहीं दे सकते हैं? मैं जानता हूँ कि आप ‘नहीं’
नहीं कहेंगे।.....