विधार्थी और अनुशासन

दीनदयाल उवाच


रात के एक बजे नीचे सडक पर कुछ शोर सुनाई दिया, आँख खुल गई। देखा कि २०-२५ विद्यार्थियों का एक गिरोह नारे लगाता जा रहा है। ‘नारा’ शब्द ठीक नहीं होगा, ‘होली के कबीर’ उपयुक्त रहेगा। पार्सल बाबू का नाम लेकर उसके माँ-बाप का उद्धार किया जा रहा था। ये थे वे विद्यार्थी, जो हाईस्कूल का परीक्षाफल जानने के लिए पार्सल बाबू के पास अखबार लेने के लिए गए, अखबार न मिलने पर अपना रोष सार्वजनिक रीति से प्रकट कर रहे थे। यह लखनऊ है।
एक दूसरा चित्र भी है। वह बांदा का है। वहाँ के जिलाधीश ने पहले से पता लगाकर परीक्षफल के वितरण का प्रबंध किया। स्टेशन के बाहर मैदान में सभी विधार्थियों के एकत्र होने का प्रबंध किया गया, रोशनी की समुचित प्रबंध था। ध्वनिवर्धक लगाकर उस पर संगीत का कार्यक्रम हो रहा था। जिलाधीश महोदय ने अपील की कि विद्यार्थी दस या बारह के गुट बना लें तथा अपना एक मुखिया चुनकर उसे दे दें। अखबारों की आवश्यक संख्या उसे दे दी जाएगी। परिणाम घोषित होने के बाद जिलाधीश ने सफल विद्यार्थियों को बधाई तथा असफल छात्रों के प्रति संवेदना प्रगट कर उनको सांत्वना देने के कर्तव्य का भी निर्वाह किया।
उपर्युक्त दो चित्र अनुशासन पर प्रकाश डालते हैं। पहले में अनुशासनहीनता है तो दूसरे में पूर्ण अनुशासन, किंतु इसकी जिम्मेदारी किस पर है? आजकल अनुशासन के विषय में विद्यार्थियों को दोष देने एवं उपदेश देने की प्रथा सी पड गई है। मैं समझता हूँ कि इस विषय पर विद्यार्थियों को कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं। अनावश्यकता अव्यवस्था की है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में बहुत से विद्यार्थी आते हैं और वे अनुशासन का आदर्श स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। किंतु वे ही विद्यार्थी अन्यत्र अनुशासनहीनता का परिचय देते हैं। क्यों? एक जगह व्यवस्था है तथा दूसरी जगह अव्यवस्था।
यदि हमारे अधिकारी अधिक कल्पनाशील हों तथा वे विद्यार्थियों की स्वाभाविक भावनाओं को समझकर उनके सही रूप में तुष्टीकरण की व्यवस्था करें तो अवश्य ही अनुशासन की स्थिति उत्पन्न होगी।