रिश्वत का बाजार केसे ठंडा करे

दीनदयाल उवाच


रिश्वत का बाजार आजकल चारों ओर गरम है। ऊपर से लेकर नीचे तक आप कोई भी काम करना चाहें, बिना सी.डी. देशमुख के परिचयपत्र* के वह संभव नहीं।
वैसे तो रिश्वतखोरी कोई नई बुराई नहीं। कम-से-कम अंगे**ाों के आने के समय तो यह प्रचलित थी ही, इससे भी पूर्व यह थी अथवा नहीं, कहा नहीं जा सकता। संस्कृत में रिश्वत के लिए कोई शब्द न होने के कारण यह अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि प्राचीन भारत में शायद वह बुराई नहीं थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के कारकुन आम तौर पर रिश्तवखोरी के शिकार थे, यहाँ तक कि वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ तो रिश्वत लेने का मुकदमा भी ब्रिटेन की पार्लियामेंट में चलाया गया, पर धीरे-धीरे अंगे**ा शासकों ने यह अनुभव किया अंगे**ा कर्मचारियों में से रिश्वतखोरी समाप्त किए बिना वे हिन्दुस्तान की प्रजा के ऊपर अपना नैतिक सिक्का नहीं जमा सकेंगे। मद्रास के एक अंगे**ा गवर्नर ने तो यह स्पष्ट कहा कि हमें अंगे**ाों में से रिश्वतखोरी दूर कर देनी चाहिए तथा नीचे के हिन्दुस्तानी कर्मचारियों में यह बनी रहे तो विशेष चिंता की बात नहीं। इससे एक बहुत बडा लाभ यह होगा कि हिन्दुस्तान के लोगों के मन में यह भावना जड पकड लेगी कि अंगे**ा उनके देशवासियों के मुकाबले में अधिक ईमानदार और सच्चे हैं। इसलिए अंगे**ा अफसरों के लिए तनख्वाहों के गे*ड बढाए। साथ ही उन्हें और सब प्रकार की सुविधाएँ भी दीं और दूसरी ओर हिन्दुस्तानी कारकुनों का वेतन कम ही नहीं, इतना कम रखा कि वे बिना रिश्वत काम ही नहीं चला सकते थे। पटवारी, कानूनगो आदि सरकारी कर्मचारी रिश्वत लेना कोई पाप नहीं समझते अपितु आमदनी का एक जाय*ा *ारिया मानते हैं।
ब्रिटिश युग
पिछली लडाई के दिनों में जब महँगाई बढने लगी तो उत्तर प्रदेश कानूनगोंओं का एक डेपुटेशन उस समय के चीफ सेक्रेटरी, जो एक अंगे**ा था, से मिला और माँग की कि उनका वेतन बढाया जाए। उसने स्पष्ट कर दिया कि तनख्वाह और आफ खर्च का कोई संबंध ही नहीं है। उसने कहा कि मैं तुम्हारी आमदनी के जरिए जानता हूँ और तुम उनके द्वारा भली प्रकार अपना खर्च चला सकते हो। अर्थात इस प्रकार की रिश्वतखोरी बहुत दिनों से प्रचलित है और जनता व कर्मचारी इसके आदी हो गए है। मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में तनख्वाह तो पूनम के चाँद की तरह है, जो महीने में केवल एक दिन अपनी पूर्ण आभा से उदय होता है और फिर बराबर घटता रहता है। भला उससे काम चल
सकता है!
रिश्वतखोरी की उपर्युक्त पद्धति तो खराब है ही, परंतु जिससे जनता बहुत अधिक परेशान है, वह रिश्वतखोरी पिछले चौदह वर्षां से प्रारम्भ हुई। इसमें बिना रिश्वत के और वह भी भारी रिश्वत के, किसी का काम नहीं बनता। कहीं-कहीं तो इससे भी आगे बढकर रिश्वत देने के लिए निर्दोष व्यक्तियों को किसी-न-किसी जाल में फँसाने की कोशिश की जाती है। ठेकेदार से पी.डब्ल्यू.डी. के कर्मचारी अपना दस प्रतिशत बहुत दिनों से लेते जा रहे हैं। परंतु इससे पूर्व ठेका देने में कभी भी भेदभाव नहीं बरता जाता था। अब तो रुपए के बल पर किसी भी व्यक्ति को ठेका मिल सकता है और उसकी कैसी भी चीज पास हो सकती है। इसका परिणाम यह हो गया है कि जनता का रुपया तो बरबाद होता ही है, सार्वजनिक निर्माण कार्यों का स्तर भी बहुत नीचे गिर गया है।
रिश्वत देने वाले
इस प्रकार के बहुमुखी और नाना रूप धारण करके आने वाली रिश्वतखोरी को मिटाना सहज नहीं, क्योंकि इसमें रिश्वत लेने वाले तो बहुत बार नेक और ईमानदार कर्मचारियों को भी थोडे दिनों में बेईमान और रिश्वतखोर बना देते हैं। अभी तक इन रिश्वत देने वालों के विरुद्ध राजनीतिक संस्थाओं ने कोई जिहाद नहीं बोला और साधारणतः यही समझकर चला जाता है कि रिश्वत देने वाला बेबस होकर ही रिश्वत देता है जो कि अधिकांश सत्य नहीं। हम इस पाप को यदि जडमूल से मिटाना चाहते हैं तो इन पर चारों ओर से हमला करना पडेगा। प्रथम तो यह भाव व्यापक रूप से समाज में उत्पन्न करना होगा कि रिश्वत लेना और देना कानून की दृष्टि से ही दंडनीय नहीं, सामाजिक रूप से भी पाप है। जो इस पाप के दोषी हों, वे समाज में अधिकाधिक निंदनीय हों, इसका प्रयत्न करना होगा। ऐसे लोग मताधिकार से वंचित किए जाने चाहिए। उनको दंड दिया जाए। वह जेल की चहारदीवारी तक ही सीमित न रखा जाए, किंतु वह समाज को भी दिखाई दे।
कानून की दृष्टि से आज रिश्तव लेने वाला और देने वाला दोनों ही जुर्म करते हैं और यह ठीक है, परन्तु इसका दूसरा परिणाम यह हो रहा है कि कई बार रिश्वत का रा*ा खुल नहीं पाता। इसके लिए हमें यह व्यवस्था करनी चाहिए कि यदि रिश्वत देने वाला स्वयं आकर रिश्वत की बात बताए तो वह क्षमा किया जा सके। साथ ही रिश्वत के लिए कठोर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए तथा न्याय जल्दी हो सके,इस प्रकार का भी कानून में परिवर्तन होना चाहिए। हो सकता है कि इस प्रकार के कठोर उपायों से दो-चार निर्दोष भी पिस जाएँ, परंतु जब कभी सामूहिक बुराई को दूर करना होता है तो कुछ न कुछ बलि अवश्य देनी पडती है। निरुपाय होकर हमें इस बलि को स्वीकार करना होगा।
अधिकारी *ाम्मेदार
आज की बढी हुई रिश्वतखोरी के लिए हमारे ऊपर के अधिकारी भी जिम्मेवार हैं। एक स्टेशन पर जब बाबू ने टिकट बनाने के लिए आठ आने पैसे अतिरिक्त माँगे और उसको कहा गया कि ये नाजाय*ा है तो उसने उत्तर दिया कि बडे-बडे मिनिस्टर तो लाखों डकार जाते हैं, आप उनसे तो कुछ नहीं कहते और हम गरीब लोग, जिन्हें केवल अस्सी रुपए माहवार मिलता है, उनके आठ आने भी आपको खटकते हैं। आप ही बताइए, मेरे दो लडके कॉलेज में पढते हैं, उन्हीं को १५० रुपया मासिक भेजना होता है। कैसे काम चलाया जाए? बाबू के तर्क में कुछ सत्य अवश्य है और उसका विचार करना होगा। गुलिस्ताँ के एक पद का हिन्दी अनुवाद किसी कवि ने किया है -
एक मुर्ग के हित नृपति करे जो अत्याचार ।
चाकर वाके नित्य प्रति मारें मुर्ग ह*ाार ।।
आज वह यह बात बिल्कुल सत्य सिद्ध हो रही है। ऊपर मंत्रिमण्डल में अनेक घोटाले होते हैं और वे दबा दिए जाते हैं। ‘सीजर की पत्नी का चरित्र संदेह से ऊपर होना ही चाहिए’ इस कहावत के अनुसार तो मंत्रियों को यह आदर्श उपस्थित करना चाहिए कि उनके संबंध के कोई उँगली तक न उठा सके। इसके लिए यह आवश्यक होगा कि कोई भी ऐसा केस सम्मुख आए तो उसकी पूरी जाँच और दोषियों को दंड देने की व्यवस्था हो।
कानून में परिवर्तन
रिश्वत बहुत कुछ आज के कानूनों के कारण भी है। लाल फीताशाही रिश्वत का द्वार खोल देती है। गरजमंद चाहता है कि उसका काम जल्दी-से-जल्दी पूरा हो जाए, परंतु उसकी फाइल तब तक आगे नहीं बढती जब तक कि हर एक स्टेज पर दान-दक्षिणा न चढा दी जाए। इस दुर्व्यव्यवस्था को भी रोकना होगा, साथ ही कानून की पद्धति, जो न्याय के स्थान पर केवल लिखित विधान का ही अनुसरण करती है, उसे भी बदलना होगा।
भिन्न-भिन्न विभागों में स्पेशल ऑफिसर नियुक्त करके और सभी अधिकार उनके हाथ में देकर रिश्वत का नया रास्ता खोला गया है। कई जगह तो मंत्री महोदय भी कुछ कमाई कर सकें, इसलिए उन्होंने जिलाधीशों के अधिकारों को छीनकर अपने अधीन किसी विशेष ऑफिसर को दे दिए हैं। उत्तर प्रदेश में स्कूलों की टेक्स्ट बुक स्वीकार करने का काम जहाँ पहले एक कमेटी करती थी, पिछले दिनों वह काम एक स्पेशल एजुकेशन ऑफिसर को, जो उस समय के शिक्षा मंत्री थे, सौंप दिया गया। कहने को तो मित्र महोदय इस काम का वेतन नहीं लेते थे किंतु रिश्वत का बा*ाार इस प्रकार गरम हुआ कि अच्छी-अच्छी किताबों की तो कोई पूछ नहीं और निम* स्तर की किताबें स्कूलों के लिए स्वीकृत हो गईं। नौकरियों और तरक्की में भी पब्लिक सर्विस कमीशन को एक ओर रखकर नए-नए पद पैदा किए गए और उन पर नौकरियाँ दी गईं। इन सबको रोकना नितांत आवश्यक है।
उत्पादन वृद्धि
किंतु उपर्युक्त उपायों से भी अधिक आवश्यक है कि चीजों का बाहुल्य हो और मनुष्यों में नेकनीयत और संतोष का भाव पैदा हो। जब तक माँग के मुकाबले किसी भी वस्तु की कमी होगी, तब तक किसी-न-किसी प्रकार प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष रिश्वत चलती रहेगी। और इसी भाँति अपने स्वार्थों को सर्वोपरि मानने की भावना जब हमारे कार्यों की प्रमुख प्रेरक शक्ति हो तो अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए रिश्वत लेना और देना जारी रहेगा। अतः आवश्यक है कि हम देश के उत्पादन को बढाएँ, ताकि सभी प्रकार की वस्तुओं का अभाव दूर हो जाए। वितरण को समान करें, जिससे कि आज बहुत से लोग, जिनकी इच्छाएँ अपूर्ण हैं और इसलिए अनैतिक उपायों को अपनाते हैं, उनसे बाज आ जाएँ और वे लग, जिनके पास धन की अधिकता होने के कारण उस धन को रिश्वत के तौर पर दे सकते हैं, भी रिश्वत न दे सकें। एतदर्थ छोटे कर्मचारियों का वेतन हमें बढना चाहिए। बडे कर्मचारियों का वेतन भी घटाना आवश्यक है। रहन-सहन के तरीके में भारी अंतर छोटे कर्मचारियों के मन में बहुत इच्छाएँ पैदा कर देता है, जिनको पूर्ण करने के लिए वे अनुचित उपायों का अवलंबन करते हैं।
धर्म का भाव
धर्म का भाव भी हमारी इन बुराइयों को दूर करने में समर्थ होगा। आज लोगों में पाप से डरने और पुण्य को करने की प्रवृत्ति नहीं। कानून न तो हर जगह पहुँच सकता है और न हर जगह देख सकता है। अंधेरी बंद कोठरी में किए गए पाप केवल मन के पुलिसमैन को छोडकर और किसी को नहीं दिखते। आज सेकुलरिज्म के नाम पर उस पुलिसमैन को हमने बरखास्त कर दिया है। नतीजा यह हो गया है कि हम बुरे काम से नहीं डरते, केवल इतनी ही चिंता करते हैं कि कानून की गिरफ्त में न आएँ। कानून का आधार भी आज धर्म नहीं रह गया। उसके कोई सर्वमान्य सिद्धांत नहीं। वे जनता की भावनाओं और उनकी मान्यताओं का विचार न करते हुए केवल कुछ लोगों की सनक पर बनाए जाते हैं।
कोटा राज्य के पुराने महाराज के समय की एक घटना है। हिन्दुओं में एक पद्धति है कि मृत्यु के पश्चात् तेरहवें दिन सभी बिरादरी को भोज दिया जाता है। एक विधवा धनाभाव से ऐसा न कर सकी। उसकी बिरादरी वालों ने उसे बुरा-भला कहा। वह महाराज के पास पहुँची और अपना दुखडा रोया। महाराजा ने इस प्रकार का अन्याय देखकर कानून बना दिया कि मृत्यु के पश्चात बारह ब्राह्मणों को छोडकर और किसी को भोजन न कराया जाए। दौरा करते हुए दो वर्ष पश्चात जब वे एक ग्राम में पहुँचे और चौधरी से पूछा कि हमारा भोज वाला कनून तो ठीक चल रहा होगा तो उसने उत्तर दिया, हुजूर! बहुत चल रहा है। इतना ही है कि पहले एक भोज करते थे, अब दो करते हैं। महाराजा ने जब इसका अर्थ पूछा तो उत्तर मिला कि पहले तो हम केवल मृतक का ही भोज करते थे, परंतु अब दारोगा का भी करना पडता है। यदि दारोगा का न करें तो कानून की गिरफ्त में आ जाते हैं और मृतक का न करें तो बिरादरी से बुरे बनते हैं। हमें दोनों को निभाना है, इसलिए दोनों की पेट-पूजा करनी पडती है। तात्पर्य यही है कि जब कोई कानून समाज की प्रचलित रीति-नीति के अनुरूप नहीं होगा तो वह रिश्वत को जन्म देगा। रीति-नीतियों में परिवर्तन कानून से नहीं होता, वह प्रचार से होता है और प्रचार की एक स्टेज आने के बाद ही विधान बनाना चाहिए। हमारे बहुत से राशनिंग कानून रिश्वत के लिए उत्तरदायी हैं। कंट्रोलों ने भी बढावा दिया है। इसमें परिवर्तन करना ही होगा।