आथिर्क नीतिया का पुन्म्रुल्याकन

दीनदयाल उवाच


संभवतः बिहारी से प्रेरणा पाकर ही श्री मोरारजी भाई को देश का नशा उतारने का नशा सवार हो गया है। पुराने बंबई राज्य के मुख्यमंत्री के नाते उन्होंने नशाबंदी को इस कठोरता के साथ लागू किया कि एक बार तो बडे-बडे पियक्कड भी तौबा करने लगे। पर भला करे भट्टीवालों का, जिसके कारण पीनेवालों की उखडी साँस और आबकारी विभाग की डूबी साख दोनों ही वापस लौट आईं। सरकार ने नीरा केंद्र खोले, पर जब घर-घर में ‘मधुशाला’ की सुविधा हो तो नीरस के पीछे भागने की *ाहमत कौन मोल ले। सरकारी काग*ाों में ‘नशाबंदी’ चलती रही, राजस्व की हानि और नशाबंदी विभाग का खर्चा दोनों का भार बढाती गई। दूसरी ओर व्यवहार में ‘पियो और पिलाओ’ का नारा भी बंबई की गलियों और कूचों में काम करता रहा। महाकवि *ाौक१ के अनुसार, ‘‘रात को पी ली, सुबह को तौबा कर लिया; रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गई।’’ शासन की हाँ में हाँ मिलानेवाले इस योजना की सफलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहे। यह छद्माचार पिछले बीस वर्षों से बंबई ही नहीं, देश के अनेक भागों में चल रहा है। मद्य-पान की हमारे यहाँ पंचमहापातकों में गिनती है। इसलिए इस योजना के सदुद्देश्य से सहमत होने के कारण लोगों ने उसका विरोध नहीं किया और जिन्होंने कभी मुँह खोला, उन्हें पातकी ठहराया गया।
राजस्व की चिंता
पर चीनी अफीमचियों ने जब कम्युनि*म के नशे में चूर होकर भारत पर आक्रमण बोल दिया तो यहाँ के भी कुछ लोगों की पिनक छूटी। उन्हें असलियत न*ार आई और उन्होंने सोचा कि इस योजना में कुछ फेरबदल करना चाहिए। उन्हें लोगों के पीने-पिलाने की तो कोई चिंता नहीं, पर राजस्व की अवश्य चिंता हुई। पर वह भी कोई नशा है, जो एकाध झटके में ही काफूर हो जाए। श्री मोरारजी भाई ने उन्हें सलाह दी कि वे इस योजना को तिलांजलि न दें। यदि उन्हें पैसे की *ारूरत है तो उसके लिए नए उपाय ढूँढें, कुछ केंद्र भी मदद करेगा और आखिर देश की जनता जब तक बरकरार है, उस पर नए-नए टैक्स लगाए जा सकते हैं।