राष्ट्रीयकरण नहीं राष्ट्रीय दृष्टिकोण चाहिए

दीनदयाल उवाच


अर्थव्यवस्था में भावों का वही स्थान है, जो शरीर में हृदय का है। भावों का उतार-चढाव बनों को बिगाड सकता है और बिगडों को बना सकता है। हिंदी में व्यापारी के लिए ‘बनिया’ शब्द का प्रयोग शायद इसीलिए आया कि वह हमेशा ‘बनने’ की ही सोचता रहता है। बिना बने उसका काम ही नहीं चलता। बिगड भी गया तो वह जल्दी-से-जल्दी बनने की फिराक में रहता है। कानून में दिवालिया घोषित करने की सुविधा जब तक नहीं थी, तब तक बन-ठनकर अपनी साख बनाए रखना हर व्यापारी के लिए *ारूरी था। साख और भाव का चोली-दामन का संबंध है। भाव गिरे कि साख गिर गई। पर अब *ामाना बदल गया है। अब तो भाव बढने पर साख जाती है। दुनिया की ऐसी कोई गाली नहीं, जो भाव बढानेवाले व्यापारी को न दी जा रही हो। शब्दकोश समाप्त हो रहा है। जखीरेबा*ा, मुनाफाखोर, अनाज चोर आदि न मालूम कितने शब्द हर उस राजनीतिज्ञ के *ाबान पर तूफान मेल की रफ्तार से दौडते रहते हैं, जिसे आटे-दाल का भाव भी नहीं मालूम। कहीं-कहीं तो यह हाल हो गया है कि इधर भाव बढे कि उधर लालाजी पर वह बेभाव की पडी कि छठी का दूध याद आ गया। अभी तक तो गेहूँ को चक्की के पाटों के बीच पीसा जाता था, पर अब तो गेहूँ बेचनेवालों की वही हालत हो गई है। सरकार और खरीदार दोनों पाटों के बीच फँसे गल्ला व्यापारी का भुरकस निकलता जा रहा है। लगता है कि लोगों को खाने को अनाज मिले या न मिले, दाम गिरे या न गिरे, किंतु ‘भुवनेश्वर’ के भक्त१ गल्ला व्यापार को चौपट किए बिना नहीं रहेंगे। उत्तर प्रदेश के एक गुटवादी नेता से एक दिन गाडी में बातचीत हो रही थी। उन्होंने कहा कि यह सरकार तो बनियों की सरकार है। वर्गविहीन और जातिविहीन समाज के पोषक होने के बाद भी उनका यह जातिवादी विश्लेषण मेरी समझ में नहीं आया। पर अब लगता है कि वे ठीक कह रहे थे। अगर सरकार बनियों की नहीं तो उसमें तराजू की डंडी सँभालने की इतनी आकुलता क्यों दिखती। ‘राजदंड’ का स्थान ‘तुलादंड’ ने ले लिया है। ‘राजा कालस्य कारणम्’ के अनुसार व्यापारियों को अपना भविष्य निश्चित करना चाहिए।
चाय की लत लगने और अमरीकी दान का पाउडर का दूध मिलने के बाद गाय भी दुश्मन न*ार आने लगी है। गाय और मनुष्य में संघर्ष छिड गया है। धरती माता गोमाता को खिलाएँ कि अपने प्यारे लाडने मानव को। अब गोमाता हमारी विधाता बन गई हैं। चरागाहों और खेतों में मूँगफली पैदा की जा रही है। ‘बिनौला’ गाय और भैंस को नहीं ‘डालडा’ की फैक्टरियों को खिलाया जा रहा है। मशीन के कोल्हुओं में तेल की आखिरी बूँद भी निचोड ली जाती है। और उसके बाद भी स्नेह रहित खली देश के पशुधन को खिलाने के स्थान पर विदेशों में भेज दी जाती है। ‘ग्वार’ का गोंद बनाया जा रहा है, जिससे बढते हुए दफ्तरों में काग*ाी योजनाओं के लिफाफे चिपकाए जा सकें। केंद्रीय खाद्य मंत्री, श्री सुब्रह्मण्यम ने प्रस्ताव किया है कि सरकार नई तरह की धान कूटने की मिलें खोलेगी, जिसमें २ प्रतिशत अलग चावल मिल सकेगा। अगले दौर में उसका चावल खाने को बताया जाएगा। पर ‘हथकुटा’ चावल पुनः प्रचलित किया जाए तो न चावल की बरबादी होगी और न विटामिन ‘बी’ की गोलियाँ खानी पडेंगी। पर केंद्रीय खाद्य मंत्री ने यह नहीं सोचा कि इन मिलों को खडा करने के लिए पूँजी कहाँ से आएगी? पुरानी मिलों का क्या होगा? सरकारी क्षेत्र में पूँजीकरण का भार पडेगा जनता पर और पुरानी मिलों के बेकार होने से जो निरुद्योगीकरण होगा, उसे भी जनता को ही भोगना पडेगा। राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाए तो कहना होगा कि चौबेजी छब्बे बनने के बजाय दूबे ही रह जाएँगे।
राष्ट्रीयकरण का नारा तो *ाोरों से लगाया जाता है, किंतु राष्ट्रीय दृष्टिकोण का अभाव ही आज की समस्या का मुख्य कारण है। आज सरकार की खाद्य नीति में राष्ट्रीयता नहीं प्रांतीयता है। पंजाब में बैलों को गेहूँ खिलाया जा रहा है और उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में मानव को घास भी नहीं मिलती। मध्य प्रदेश, गुजरात को गेहूँ देने को तैयार नहीं तो गुजरात, मध्य प्रदेश को मूँगफली का तेल देने से इनकार कर रहा है। आगे चलकर कपडे और दूसरी ची*ाों का भी नंबर आ सकता है। कहीं प्रदेश बंदी है तो कहीं *ाला बंदी। थोडे दिनों में मुहल्ला और घर बंदी हो जाएगी। हम आशा करते हैं कि पाकिस्तान हमारे साथ सहानुभूति दिखाए और हमें चावल दे। अमरीका वाले गेहूँ दें। अगर वे कुछ हमारी मुसीबत का नाजाय*ा फायदा उठाते हैं तो हमें बुरा लगता है। पर अपने घर में हम क्या कर रहे हैं? खंडवा और भुसावल कोई दूर नहीं। लोगों का आना-जाना रो*ा चलता रहता है। पर एक जगह के किसान को गेहूँ का दाम नहीं और दूसरी जगह के ग्राहक को किसी दाम पर गेहूँ नहीं। क्या यही समाजवाद की समानता है? आज की सरकारें जिस तरह चल रही हैं, उससे समाजवाद का आना तो दूर, हमारा राष्ट्रवाद भी खत्म हो जाएगा। भारत की एकता को इससे बढकर कौन सा खतरा हो सकता है? जब हृदय कम*ाोर हो जाए, अंतः करण छोटा हो जाए तब सब अपनी-अपनी ही सोचते हैं। ची*ाों के भाव तो बढ ही गए, पर हृदय का भाव भी खत्म हो रहा है। फलतः चारों ओर आपा-धापी और हडबडाहट दिखाई देती है। इस मनोभाव से अभाव और बढता और अखरता जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भाव भी बढते जा रहे हैं।
भावों की कुछ गति ऐसी है कि वस्तुओं के अभाव में वे बढते हैं। यदि भावों का भाव ठीक करने का भाव आफ मन में आता हो तो उसका एक ही रास्ता है कि अभाव की वस्तुओं का प्रादुर्भाव करें। भाव तो माँग और पूर्ति प्रभाव से तय होते हैं। उनकी संवेदनशीलता इतनी अधिक है कि बा*ाार के इशारे पर वे नाचते रहते हैं। बनिया न तो भावों को बना सकता है और न बिगाड सकता है। वह तो दाँव लगाता है और कभी कमाता है तो कभी गँवाता भी है। जो व्यापारी को भावों का नियंता मानते हैं, वे अर्थशास्त्र के नियमों से अनभिज्ञ हैं। अर्थशास्त्र के नियमों की ओर दुर्लक्ष्य करके सरकार भी भावों राज्यशक्ति के वारांगना के समान हाव-भावों के प्रति पूर्णतः उदासीन रहते हैं। सरकारी भावा काग*ा पर रह जाते हैं। असली भाव बा*ाार में चलते हैं। जब सदोबा पाटिल श्रम मंत्री थे तो उन्हें अमरीका का दम था और वे वहाँ से गेहूँ ले आए। बडे दमखम के साथ उन्होंने एक दिन कि अब मेरे पास तो कोई काम नहीं। तो कामकाज के चक्कर में आ गए। पर अमरीका का गेहूँ कितने दिन चलता, कुछ खाया, कुछ सडाया। आज यह हालत है कि सरकार की दुकानों में गल्ले का बोर्ड है, पर गल्ला नहीं। अब दौड-धूप की जा रही है कि गल्ला खरीदा जाए। आग लगने पर कुआँ खोदा जा रहा है। सरकार रि*ार्व स्टाक की नीति में विश्वास करती है। पर वह भूल जाती है कि यह ‘रि*ार्व’ बना रहे हैं, इसके लिए बारंबार खरीदने और बेचने की *ारूरत होती है। सेना रो*ा नहीं लडती, मौके पर लड सके, इसके लिए उसे रो*ा कवायद और अभ्यास करना पडता है। पर जिस सरकार ने सेना को लडाई अभ्यास के स्थान पर बाढ नियंत्रण और समाज सेवा के काम में लगाया और खाद्यान्न के रि*ार्व की ओर दुर्लक्ष्य किया तो आश्चर्य क्या। फलतः काग*ाी रिटर्न दाखिल होते गए और गोदामों में अनाज घटता और सडता गया।
आज जखीरेबा*ाों को गाली दी जा रही है। मगर हमारी समस्या का एकमात्र कारण है कि हमारा जखीरा खत्म हो गया। शहर के नलों में ठीक-ठीक पानी तभी जाएगा जब टंकी में पानी अच्छी तरह भरा हो। टंकी की ओर दुर्लक्ष्य करके नलों में पानी की आशा करना भूल है। पर जब दूसरी मं*ाल वाले से लडाई होती है। आज ऐसी ही लडाई लडी जा रही है। उसे ही समस्या का समाधान समझा जा रहा है। पर थोडे दिनों में पता चलेगा कि नीचे की मं*ाल में भी पानी आना बंद हो गया है। हमें मूल स्रोत का विचार करना होगा। मूल से संबंध रखने के कारण ही संस्कृत में कीमतों को ‘मूल्य’ कहा जाता है। उससे असलियत का पता चलता है। आज तो बिना मूल के मूल्य के बाँधने की कोशिश की जा रही है।
मूल आवश्यकता है कि मूलधन बढाया जाए किंतु इसके लिए सरकार की योजनाओं और दृष्टिकोण में आमूल-चूल परिवर्तन करना पडेगा। आज तो सूत न कपास जुलाहे से लट्ठा की नीति बनती जा रही है। सरकार व्यापारियों पर बरस रही है, व्यापारी सरकार पर। केंद्र प्रांतों को दोषी ठहराता है तो प्रांत केंद्र के मत्थे बला डालकर अपनी विवशता *ााहिर करते हैं। पिछले अनेक वर्षों से हमारा रुपया छोटा होता जा रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज की ‘मुद्रा’ की व्याख्या करते हुए कहा गया था कि ‘प्रतिपदचंद्र लेख व मुद्रा भवाय राजते’। जब मुद्रा प्रतिपदा के चंद्रमा के समान निरंतर बढती जाए, तभी पूर्णिमा की चाँदनी खिलेगी। पर आज भारत की मुद्रा की हालत तो कृष्ण पक्ष के चंद्रमा की सी है, जो प्रतिदिन क्षय होती जाती है। शासन का योजना के नाम पर जो हाथ खुला है, वह सिमटने का नाम नहीं लेता। बिना सरकार की फि*ाूलखर्ची कम किए मुद्रा का अवमूल्यन नहीं रोका जा सकता। बिना मुद्रा का मूल्य बाँधे वस्तुओं के मूल्य नहीं बँध सकते। आज तो दाम में ही दम नहीं बचा। दाम का दम ठीक करें।
भावों का विचार से नहीं हो सकता। समीक्षा और सद्भावना अर्थशास्त्र के ठोस नियमों का स्थान नहीं ले सकती। किताबी सिद्धांतों और ‘समाजवादी’ भावनाओं ने दृष्टि को विकृत कर दिया है। अधिकांश दलों के सामने राजनीतिक लक्ष्य हैं। आर्थिक समस्या का समाधान नहीं। फलतः अर्थ और अनर्थ होता जा रहा है। प्रकृति के प्रकोप, मुद्रा के मूल्य ह*ास तथा शासन की सनकों से त्रिदोष विकृत हो गया है। आज तो सन्निपात की अवस्था है। कुशल वैद्य ही स्थिति को सँभाल सकता है। पर आज मरी*ा नीम हकीमों के हाथों में सौंप दिया गया है। हडकंप छोडकर शांति से विचार कर दृढता से धैर्यपूर्वक काम करने की आवश्यकता है। संकट टल जाएगा।