विकेद्रिकरण की विंडबना

दीनदयाल उवाच


.....पश्चिम की बडे आधार की प्रौद्योगिकी और विकेंद्रीकरण एक साथ नहीं चल सकते। बहुत से लोग विकेंद्रीकरण का अर्थ केवल प्रादेशिक विचार से करते हैं। वे विकेंद्रीकरण के नाम पर बंबई और अहमदाबाद जैसे कारखानों को गाँवों में स्थापित करके समाधान कर लेंगे। समाजवादी राजनीतिक शक्ति का बँटवारा करके संतुष्ट हो जाएगा तथा गाँव, *ाला, प्रांत और केंद्र के चौखंभे राज्य के रूप में उनका समाजवाद पनपेगा। किंतु हर स्थान पर आर्थिक शक्ति राज्य की इकाइयों के हाथ में रहेगी तथा जिस प्रौद्योगिकी को लेकर स्थान-स्थान पर उत्पादन होगा, वह पश्चिमी ढंग का ही होगा। उनका स्वामित्व बँटवारे का है, मौलिक नहीं। सर्वोदयवादी वर्तमान तकनीक का तो विरोध करता है, किंतु उसके ग्रामराज्य में संपूर्ण गाँव की भूमि पर कृषि एक खेत के रूप में ग्राम पंचायत की देखरेख में होगी। गाँव की शेष आर्थिक व्यवस्था भी पंचायत के अधीन रहेगी। व्यवहार में यह स्थिति रूस की सामूहिक खेती से भी खराब होगी। इसमें न तो आधुनिक मशीनें ही प्राप्त होंगी और न व्यक्ति को उत्पादन की स्वतंत्रता। समाजवादी, वे फिर किसी रूप-रंग के क्यों न हों, पश्चिमी प्रौद्योगिकी में अमिट श्रद्धा लेकर चलते हैं। उनकी लडाई मशीन से नहीं बल्कि मशीन के मालिक से है। फलतः वे उसकी मिल्कियत राज्य को सौंपकर समाधान मान लेते हैं। दूसरी ओर सर्वोदयवादियों ने मशीन की बुराइयाँ समझीं और इसलिए उसका बहिष्कार किया; निजी संपत्ति की बुराइयाँ देखीं, इसलिए उसे समाप्त करने का बीडा उठाया। समाजवादी राज्य की भारी और निरंकुश शक्ति देखकर उसे भी त्याज्य ठहराया तथा शासनविहीन समाज में संपूर्ण शक्ति गाँव की पंचायत को सौंप दी। यह सब अव्यावहारिक तो है ही, किंतु जिन बुराइयों से बचने के उद्देश्य से यह किया जा रहा है-वे बुराइयाँ इससे समाप्त नहीं होंगी-यह तो रोग को दूर करने के हेतु रोगी को ही समाप्त करने की प्रक्रिया होगी। विकेंद्रीकरण की यह बिडंबना नहीं तो क्या है?.....
विकेंद्रीकरण की इकाई
विकेंद्रीकरण की मौलिक इकाई है-व्यक्ति और कुटुंब। व्यक्ति के प्रयत्नों तथा कुटुंब के सहारे और स्वामित्व के द्वारा सभी व्यापक रूप से विषमता अथवा शोषण की संभावनाएँ नहीं उत्पन्न हो सकती हैं। ये प्रवृत्तियाँ तो तब बलवती हुईं, जब व्यक्ति इन मर्यादाओं से आगे निकलकर सामूहिक संस्थाओं और निगमों के द्वारा अधिकाधिक शक्ति का स्वामी बनता गया। अतः साधारणतया उत्पादन का आधार व्यक्ति या कुटुंब होना चाहिए। हमें ऐसी प्रणाली को अपनाना पडेगा, जिसमें हम कुटुंब को इकाई बना सकें। उद्योगों में कुटीर और छोटे-छोटे उद्योग, जो घर में ही चलाए जा सकते हों, हमारे व्यापक औद्योगीकरण का कार्यक्रम हो सकते हैं। हाँ, इनमें हम अच्छी से अच्छी मशीनों और बिजली का उपयोग कर सकते हैं।
स्वामित्व का प्रश्न
गंभीरता से देखें तो स्वामित्व का अधिकार वास्तव में निश्चित मर्यादाओं और निश्चित उद्देश्यों के लिए किसी वस्तु के उपयोग का ही अधिकार है। समय के साथ इन अधिकारों में परिवर्तन होता रहता है। अतः हम सैद्धांतिक दृष्टि से व्यक्ति और समाज के अधिकारों के झगडे में नहीं पडेंगे। हमारे यहाँ तो समाज का केवल एक ही स्वरूप अर्थात् राज्य नहीं माना गया। व्यक्ति, कुटुंब, कुल, जाति, राज्य आदि अनेक रूपों में समाज अपने आपको अभिव्यक्त एवं उनके माध्यम से अपना मनोरथ सिद्ध करता है। व्यक्ति में समाज हित की भावना बनी रहे, इसलिए हमारे यहाँ सम्मिलित कुटुंब की एक व्यावहारिक इकाई रखी गई, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति कमाने का अधिकारी है तथा संपत्ति का उपभोग कुटुंब के हित में होता है। मनमाने ढंग से नहीं। ट्रस्टीशिप का यही भारतीय सिद्धांत गाँधीजी, गुरुजी आदि विचारकों ने समाज के सम्मुख रखा है।
सार्वजनिक उद्योगों का प्रबंध
सार्वजनिक उद्योगों के कारण अधिकाधिक शक्ति राज्य के हाथ में आती है। राज्य का प्रजातंत्र में व्यावहारिक अर्थ होता है, वह दल जिसके हाथ में शासन के सूत्र हों। इस प्रकार शासकीय दल के हाथ में अधिकाधिक शक्ति आ जाती है। यह केंद्रीकरण सदैव ही प्रजातंत्र के लिए घातक होता है। उद्योग-धंधों को यदि सफलतापूर्वक चलाना है तो यह आवश्यक है कि उन्हें पूर्णतया आर्थिक आधार पर सार्वजनिक हितों के अधीन चलाया जाए। अतः उन्हें दिन-प्रतिदिन बदलनेवाली दलीय राजनीति से अलिप्त रखना होगा। इस दृष्टि से उन्हें स्वायत्तः निगमों के द्वारा परिचालित करना चाहिए। दिन-प्रतिदिन के व्यवहार में उन्हें स्वतंत्रता हो किंतु यह व्यवस्था भी करनी होगी कि उन पर संसदीय नियंत्रण रह सके। श्रमिकों को प्रबंध में सहभागी बनाने की दृष्टि से सर्वाजनिक उद्योगों को शेष का मार्गदर्शन करना चाहिए।....